जड़ें: यहूदी-विरोध, नस्लवाद और नाज़ी राज्य
यहूदी-विरोध (antisemitism) का अर्थ है यहूदियों के प्रति शत्रुता या नफ़रत। यूरोप में यह सदियों से धार्मिक पूर्वाग्रह, झूठी अफ़वाहों और यहूदियों के रहने-काम करने पर पाबंदियों के रूप में मौजूद था।
1800 के दशक में नस्ली यहूदी-विरोध आया: यह झूठा दावा कि यहूदी एक अलग 'नस्ल' हैं जो बदल नहीं सकती। छद्म-विज्ञान (pseudo-science) ने लोगों को 'ऊँची' और 'नीची' नस्लों में बाँटा।
पहले विश्व युद्ध और 1929 की मंदी के बाद जर्मनी का वाइमार गणराज्य कमज़ोर हुआ। जनवरी 1933 में हिटलर चांसलर बना और जल्दी ही गुप्त पुलिस (गेस्टापो), एसएस, सेंसरशिप और प्रचार के साथ एक-दलीय तानाशाही बना दी। नाज़ी विचारधारा कहती थी कि 'शुद्ध आर्य' लोगों को 'रहने की जगह' चाहिए और उन्हें यहूदियों व 'अयोग्य' बताए गए दूसरों से 'साफ़' करना है। प्रचार ने हार, ग़रीबी और साम्यवाद के लिए यहूदियों को दोषी ठहराया।
होलोकॉस्ट के चरण, 1933–1945
- बहिष्कार (1933–1938): यहूदी दुकानों का बहिष्कार (अप्रैल 1933); सरकारी नौकरियों, स्कूलों और पेशों से निकाला गया; न्यूरेमबर्ग क़ानूनों (1935) ने नागरिकता छीनी और ग़ैर-यहूदियों से विवाह पर रोक लगाई; 9–10 नवंबर 1938 के नवंबर दंगे ('क्रिस्टालनाख़्त') में सिनेगॉग जलाए गए और लगभग 30,000 यहूदी पुरुषों को यातना शिविरों में भेजा गया। बहुत से यहूदियों ने देश छोड़ना चाहा, पर ज़्यादातर देशों ने कम शरणार्थी लिए।
- घेटो (1939–1941): 1939 में जर्मनी के पोलैंड पर हमले के बाद यहूदियों को वारसॉ और वूच जैसे बंद घेटो में ठूँसा गया, जहाँ भूख, बीमारी और जबरन मज़दूरी थी।
- सामूहिक गोलीबारी (जून 1941 से): सोवियत संघ पर हमले के साथ चलते-फिरते हत्या-दस्तों (आइनज़ात्सग्रुपन) और उनके मददगारों ने गाँव-गाँव यहूदियों को गोली मारी; कीव के पास बाबी यार में दो दिन में लगभग 33,000 लोग मारे गए।
- मृत्यु शिविर (1942–1944): वान्सी सम्मेलन (20 जनवरी 1942) ने 'अंतिम समाधान' का समन्वय किया। पूरे यूरोप से यहूदियों को रेल से कब्ज़े वाले पोलैंड के हत्या-केंद्रों में भेजा गया: ख़ेल्मनो, बेल्ज़ेत्स, सोबिबोर, त्रेब्लिंका, माइदानेक और सबसे बड़ा ऑशविट्ज़-बिरकेनाउ, जहाँ लगभग 11 लाख लोग मारे गए।
- अंत (1944–1945): मित्र सेनाओं के बढ़ने पर क़ैदियों को मौत के मार्च पर धकेला गया। 27 जनवरी 1945 को सोवियत सेना ऑशविट्ज़ पहुँची; दूसरे शिविर अप्रैल–मई 1945 में मुक्त हुए।
जर्मनी के सहयोगियों और साथ देने वालों ने भी भाग लिया। उदाहरण के लिए, रोमानिया में इयोन अंतोनेस्कु के शासन ने, ख़ासकर ट्रांसनिस्ट्रिया भेजकर, लाखों यहूदियों और बहुत से रोमा लोगों को मारा।
पीड़ित, यहूदी जीवन और प्रतिरोध, बचाने वाले और तमाशबीन
पीड़ित
- लगभग 60 लाख यहूदी, यानी यूरोप के लगभग दो-तिहाई यहूदी, जिनमें लगभग 15 लाख बच्चे थे।
- रोमा और सिंती: अनुमानित 2 से 5 लाख मारे गए (पोराइमोस या समुदारिपेन के नाम से याद)।
- विकलांग लोग: लगभग 2.5–3 लाख, 1939 के 'टी4' कार्यक्रम से शुरू।
- दूसरे राष्ट्र और समूह: लगभग 30 लाख सोवियत युद्धबंदी; लाखों पोलिश और दूसरे स्लाव नागरिक, जिनके पढ़े-लिखे वर्ग को निशाना बनाया गया; राजनीतिक विरोधी, समलैंगिक पुरुष और यहोवा के साक्षी।
यहूदी जीवन और प्रतिरोध
घेटो में लोग छिपकर स्कूल, प्रार्थना, संगीत और अभिलेख चलाते रहे (वारसॉ का रिंगेलब्लुम अभिलेखागार)। हथियारबंद विद्रोह भी हुए: वारसॉ घेटो विद्रोह (अप्रैल–मई 1943), और त्रेब्लिंका व सोबिबोर में विद्रोह (1943)। जंगलों में छापामार लड़े।
बचाने वाले, तमाशबीन, अपराधी
ज़्यादातर लोग तमाशबीन रहे जिन्होंने कुछ नहीं किया; कुछ ने फ़ायदा उठाया या यहूदियों को पकड़वाया। कुछ लोग बचाने वाले बने। इस्राइल का याद वाशेम 28,000 से ज़्यादा 'राष्ट्रों के बीच धर्मी' (Righteous Among the Nations) का सम्मान करता है, जैसे इरेना सेंडलर, जिन्होंने वारसॉ घेटो से लगभग 2,500 बच्चों को चुपके से बाहर निकालने में मदद की; यान और अंतोनिना ज़ाबिंस्की, जिन्होंने वारसॉ चिड़ियाघर में यहूदियों को छिपाया; और उल्मा परिवार, जो 1944 में अपने छिपाए आठ यहूदियों के साथ मार दिया गया। कब्ज़े वाले पोलैंड में यहूदियों की मदद की सज़ा मौत थी। निर्वासित पोलिश सरकार ने यहूदियों की मदद के लिए ज़ेगोता परिषद (1942) बनाई, और उसके संदेशवाहक यान कार्स्की ने मित्र देशों के नेताओं को हत्याओं की ख़बर दी। जर्मनी के अंदर 'व्हाइट रोज़' जैसे छात्र समूहों ने विरोध किया और उन्हें मौत की सज़ा मिली।
इतिहास और स्मृति: मुक़दमे, शोध और स्मरण
- मुक़दमे: न्यूरेमबर्ग अंतरराष्ट्रीय सैन्य न्यायाधिकरण (1945–46) ने बड़े नाज़ी नेताओं पर मानवता के विरुद्ध अपराधों का मुक़दमा चलाया; यरूशलम में आइशमान मुक़दमे (1961) में बचे हुए लोगों ने दुनिया के सामने गवाही दी; जर्मनी, पोलैंड और दूसरी जगहों पर मुक़दमे चलते रहे।
- क़ानून: राफ़ाएल लेमकिन ने जनसंहार (genocide) शब्द बनाया (1944)। संयुक्त राष्ट्र के जनसंहार अभिसमय (1948) ने इसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून में अपराध बनाया।
- शोध: इतिहासकार नाज़ी दस्तावेज़ों, तस्वीरों, बचे लोगों की डायरियों और वीडियो गवाहियों (जैसे ऐन फ़्रैंक की डायरी) से दिखाते हैं कि आम संस्थाओं ने भी कैसे भाग लिया।
- स्मृति: स्मारक और संग्रहालय (ऑशविट्ज़-बिरकेनाउ राजकीय संग्रहालय, याद वाशेम, बर्लिन का यूरोप के मारे गए यहूदियों का स्मारक)। संयुक्त राष्ट्र 27 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय होलोकॉस्ट स्मृति दिवस मनाता है; 2 अगस्त रोमा पीड़ितों की याद का दिन है।
- इनकार और तोड़-मरोड़: कुछ लोग होलोकॉस्ट से इनकार करते या उसे छोटा बताते हैं। यह इतिहास की सबसे अच्छी तरह दर्ज घटनाओं में है, और इनकार नफ़रत फैलाता है।
करके देखो
काग़ज़ पर 'नफ़रत का पिरामिड' बनाओ: सबसे नीचे मज़ाक़ और रूढ़ियों के उदाहरण, फिर भेदभाव, फिर हिंसा, और सबसे ऊपर जनसंहार। हर स्तर के आगे लिखो कि एक विद्यार्थी उसे वहीं रोकने के लिए क्या कर सकता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य तारीख़ें: 1933 नाज़ी सत्ता में → 1935 न्यूरेमबर्ग क़ानून → 1938 नवंबर दंगा → 1939 घेटो → 1941 सामूहिक गोलीबारी → 1942 वान्सी और मृत्यु शिविर → 1943 वारसॉ घेटो विद्रोह → 27 जनवरी 1945 ऑशविट्ज़ मुक्त
- जनसंहार = किसी राष्ट्रीय, नृजातीय, नस्ली या धार्मिक समूह को पूरा या आंशिक रूप से मिटाने के इरादे से किए गए काम (संयुक्त राष्ट्र, 1948)
- भूमिकाएँ: अपराधी, सहयोगी, तमाशबीन, पीड़ित, प्रतिरोधी, बचाने वाले
- नफ़रत का पिरामिड: पूर्वाग्रह → भेदभाव → हिंसा → जनसंहार
हल किए गए उदाहरण
1. इतिहासकार होलोकॉस्ट को एक घटना नहीं, एक प्रक्रिया क्यों कहते हैं?
यह 12 साल में चरणों में बढ़ा: प्रचार और बहिष्कार, फिर क़ानून, फिर दंगे, फिर घेटो, फिर सामूहिक गोलीबारी और अंत में मृत्यु शिविर। हर क़दम आज़माया गया; जब कम विरोध हुआ, तो अगला क़दम आया।
2. हथियारबंद लड़ाई के अलावा यहूदियों ने प्रतिरोध के दो तरीक़े बताओ।
1) संस्कृति ज़िंदा रखना: छिपे स्कूल, प्रार्थना, संगीत, और रिंगेलब्लुम अभिलेखागार जैसे रिकॉर्ड जिन्होंने सच दर्ज किया। 2) भागना, छिपना या नक़ली काग़ज़ बनाकर जान बचाना।
3. न्यूरेमबर्ग मुक़दमों और 1948 के जनसंहार अभिसमय ने क्या बदला?
इनसे तय हुआ कि नेताओं को मानवता के विरुद्ध अपराधों के लिए निजी तौर पर सज़ा दी जा सकती है, और जनसंहार अंतरराष्ट्रीय क़ानून में अपराध है जिसे रोकना और सज़ा देना देशों का कर्तव्य है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि होलोकॉस्ट मृत्यु शिविरों से शुरू हुआ। यह 1933 में शब्दों, बहिष्कार और क़ानूनों से शुरू हुआ।
- यह मानना कि सिर्फ़ जर्मनों ने भाग लिया। कई कब्ज़े वाले और सहयोगी देशों के सहयोगियों और मददगारों ने भी भाग लिया।
- यह सोचना कि यहूदियों ने प्रतिरोध नहीं किया। आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और हथियारबंद प्रतिरोध हुआ, जिसमें वारसॉ घेटो विद्रोह शामिल है।
- यातना शिविर और मृत्यु शिविर को एक समझना। त्रेब्लिंका जैसे मृत्यु शिविर मुख्यतः सामूहिक हत्या के लिए बनाए गए थे।