खेती और गाँव: अर्थव्यवस्था की नींव
1880 के दशक में रूसी साम्राज्य के लगभग 80 प्रतिशत लोग किसान थे। बहुत से लोग गाँव-समुदायों (ओब्शीना) में रहते थे, जो ज़मीन बाँटते और दोबारा बाँटते थे। 1861 के बाद किसानों ने अपनी आज़ादी के लिए मोचन किश्तें चुकाईं, इसलिए ज़्यादातर ग़रीब रहे। राज्य पैसे कमाने के लिए अनाज विदेश में बेचता था। 1891-92 में फ़सल बिगड़ी तो बड़ा अकाल पड़ा।
1897 की जनगणना में साम्राज्य में लगभग 12.5 करोड़ लोग गिने गए, जिनमें सिर्फ़ लगभग 100 में से 13 शहरों में रहते थे।
रेलवे: बढ़त का इंजन
रेल की लंबाई लगभग 1,500 किमी (1860) से लगभग 23,000 किमी (1880) और 1900 तक 50,000 किमी से ज़्यादा हुई। रेलें चार काम करती थीं: अनाज बंदरगाह तक ले जाना, कोयला-लोहा कारख़ानों तक ले जाना, सैनिकों को ले जाना, और दूर की ज़मीनें खोलना।
सबसे बड़ी परियोजना ट्रांस-साइबेरियन रेल थी, जो 1891 में यूरोपीय रूस को प्रशांत तट से जोड़ने के लिए शुरू हुई। मुख्य लाइन बनने में 10 साल से ज़्यादा लगे और यह दुनिया की सबसे लंबी रेलों में है।
रेल के लिए लोहे और इस्पात की माँग से और खदानें और मिलें बनीं, इसलिए रेल ने दूसरे उद्योगों को भी खींचा।
औद्योगीकरण: नए कारख़ाना-इलाक़े
औद्योगीकरण का मतलब है घर में हाथ से नहीं, बड़े कारख़ानों में मशीनों से सामान बनाना। रूस में यह 1890 के दशक में सबसे तेज़ बढ़ा, जब कुछ वर्षों में उद्योग लगभग 8 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ा।
- दक्षिण (दोनबास, क्रिवॉय रोग): कोयला और लोहा, विदेशी निवेशकों की मदद से बड़े संयंत्र।
- बाकू: तेल, 1900 के आसपास दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों में।
- उराल: पुराने लोहे और ताँबे के कारख़ाने।
- मॉस्को, इवानोवो: सूती कपड़ा। सेंट पीटर्सबर्ग: मशीनें और जहाज़।
सर्गेई विट्टे, 1892 से वित्त मंत्री, ने गाँवों पर कर, विदेशी सामान पर ऊँचे शुल्क, विदेशी क़र्ज़ और सोने से जुड़े रूबल (1897) से इसे तेज़ किया। फ़्रांस, बेल्जियम, ब्रिटेन आदि के विदेशी निवेशकों ने कई संयंत्र बनाए।
शहरीकरण और मज़दूर
शहरीकरण का मतलब है कि ज़्यादा लोग शहरों में रहें। किसान काम के लिए आते थे, अक्सर साल के कुछ हिस्से में, और गाँव में घर भी रखते थे। 1890 के दशक में सेंट पीटर्सबर्ग और मॉस्को हर एक में लगभग 10 लाख लोग हो गए।
मज़दूर भीड़-भरे बैरकों या किराये के कोनों में रहते, रोज़ 11-12 घंटे काम करते और कम कमाते थे। पहले कारख़ाना-क़ानून (1882, 1885) और निरीक्षकों से थोड़ी मदद मिली। इन हालात से हड़तालें हुईं और आगे चलकर मज़दूरों की पार्टियाँ बनीं।
नतीजे और कर के देखो
1900 तक रूस उत्पादन में दुनिया के पाँच सबसे बड़े औद्योगिक देशों में था, फिर भी ज़्यादातर लोग किसान और ग़रीब थे। उछाल तेज़ था पर असमान। रेल और कारख़ानों ने नौकरी और ताक़त दी; भूख और कम मज़दूरी ने ग़ुस्सा।
- 3D में: आख़िरी चरण में हर क्षेत्र चुनो और बताओ कि बढ़त बड़ी है या कठिनाई।
- गणित: रेल की लंबाई 23,000 किमी से 50,000 किमी हुई। कितने गुना? (लगभग 2.2)
- मन में नक़्शा: अपने घर का कोई सामान चुनो (कपड़ा, तेल, इस्पात)। 1895 के आसपास उसे रूस का कौन-सा इलाक़ा बनाता?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- औद्योगीकरण: बड़े कारख़ानों में मशीनों से सामान बनाना
- शहरीकरण: ज़्यादा लोगों का शहरों में रहना
- रेलवे: लगभग 23,000 किमी (1880) से 50,000 किमी+ (1900)
- ट्रांस-साइबेरियन रेल: शुरू 1891
- विट्टे: वित्त मंत्री 1892-1903; सोने का रूबल 1897
- अकाल 1891-92: बुरी फ़सल और ग़रीब गाँव
हल किए गए उदाहरण
1. रेलों ने कारख़ानों को बढ़ने में कैसे मदद की?
चरण 1: कारख़ानों को कोयला, लोहा और ख़रीदार चाहिए। चरण 2: रेलों ने इन्हें लंबी दूरी तक सस्ते में पहुँचाया। चरण 3: रेल बनाने में लोहा-इस्पात लगा, इसलिए और खदानें और मिलें खुलीं।
2. रेल की लंबाई 23,000 किमी (1880) से 50,000 किमी (1900) हुई। कितने किमी बढ़ी?
50,000 - 23,000 = 27,000 किमी, 20 सालों में; यानी लगभग 1,350 किमी प्रति वर्ष।
3. तेज़ औद्योगीकरण का एक लाभ और एक नुक़सान बताओ।
चरण 1: लाभ: नई नौकरियाँ, नए शहर और मज़बूत राज्य। चरण 2: नुक़सान: कम मज़दूरी, भीड़-भरे बैरक और गाँवों पर भारी कर। चरण 3: यानी बढ़त असली थी, पर असमान।
4. अगर 1897 में हर 100 में 13 लोग शहरों में रहते थे और साम्राज्य में लगभग 12.5 करोड़ लोग थे, तो शहरों में लगभग कितने रहते थे?
12.5 करोड़ का 13% = 0.13 x 12.5 करोड़ = 1.625 करोड़, यानी लगभग 1.6 करोड़।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि 1890 में रूस ज़्यादातर शहरी, औद्योगिक देश था। ज़्यादातर लोग अब भी खेती करते थे।
- औद्योगीकरण (कारख़ाने) और शहरीकरण (शहरों में बसना) को एक समझना। दोनों साथ चलते हैं पर एक नहीं हैं।
- विट्टे की भूमिका (1892-1903) भूल जाना या कहना कि उसने रेलें शुरू कीं। रेलें पहले शुरू हुईं; विट्टे ने उन्हें ज़ोर से बढ़ाया।
- यह कहना कि सबको फ़ायदा हुआ। मज़दूरी कम थी और 1891-92 का अकाल कठिनाई दिखाता है।