सार्वजनिक जीवन और बुद्धिजीवी वर्ग
बुद्धिजीवी वर्ग का मतलब रूसी समाज का पढ़ा-लिखा मध्य समूह: शिक्षक, लेखक, डॉक्टर, छात्र, वकील। बहुत से लोग इस बात से अपराध-बोध महसूस करते थे कि वे पढ़े-लिखे हैं और किसान ग़रीब हैं, और "जनता" की सेवा को अपना फ़र्ज़ मानते थे।
सार्वजनिक जीवन और तरीक़ों से भी बढ़ा। स्थानीय परिषदों (ज़ेम्स्त्वो) ने स्कूल और दवाख़ाने बनाए, अख़बारों और मोटी पत्रिकाओं ने विचार फैलाए, और बहुत लोग चर्चा-मंडलियों में जुड़े। पर राज्य राजनीतिक पार्टियों या आज़ाद प्रेस की इजाज़त नहीं देता था, इसलिए विचार अक्सर चुपचाप चले।
लोकलुभावनवाद (नरोदनिक)
लोकलुभावनवाद (नरोद, "जनता" से) यह विश्वास था कि रूस कठिन कारख़ाना-युग को छोड़कर गाँव-समुदाय से न्यायपूर्ण समाज बना सकता है। लोकलुभावन किसानों के लिए ज़मीन और ज़ार का अकेला राज ख़त्म चाहते थे।
- 1874, "जनता के बीच जाना": हज़ारों छात्र गाँव गए। किसान उलझन में थे और कभी-कभी आगंतुकों को पुलिस को सौंप देते थे। सैकड़ों गिरफ़्तार हुए।
- 1876, भूमि और स्वतंत्रता: एक गुप्त समूह जिसने बेहतर संगठित काम की योजना बनाई।
- 1879, टूट: काला बँटवारा (शांत, ज़मीन का बँटवारा) और जनता की इच्छा (आतंक)।
- 1 मार्च 1881: जनता की इच्छा ने सिकंदर द्वितीय को मारा। नए ज़ार सिकंदर तृतीय ने कड़ा शासन चलाया और कुछ सालों में यह गुट तोड़ दिया गया।
मार्क्सवाद का आगमन
मार्क्सवाद जर्मन विचारक कार्ल मार्क्स का विचार है। यह कहता है कि औद्योगिक समाजों में कारख़ाना-मज़दूर (सर्वहारा) समाज बदलने की ताक़त बनेंगे, क्योंकि वे संख्या में ज़्यादा हैं, कारख़ाने से संगठित हैं और उनके पास खोने को कम है।
1880-90 के दशक में रूसी कारख़ाने बढ़े तो मार्क्सवादी विचार जँचने लगे। मुख्य कदम:
- 1883: गिओर्गी प्लेखानोव ने जिनेवा में "श्रम-मुक्ति" समूह बनाया।
- 1885: ओरेखोवो-ज़ुएवो में मोरोज़ोव कपड़ा मिल की बड़ी हड़ताल; 1886 में अन्यायपूर्ण जुर्माने सीमित करने वाला क़ानून बना।
- 1895: लेनिन और अन्य ने सेंट पीटर्सबर्ग में "मज़दूर वर्ग की मुक्ति के लिए संघर्ष-संघ" बनाया।
- 1898: मिंस्क में रूसी सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी का पहला सम्मेलन; ज़्यादातर प्रतिनिधि जल्द गिरफ़्तार हुए।
लोकलुभावन बनाम मार्क्सवादी
| लोकलुभावन | मार्क्सवादी | |
|---|---|---|
| मुख्य भरोसा | किसान | कारख़ाना-मज़दूर |
| रास्ता | गाँव-समुदाय, बिना कारख़ाना-युग | कारख़ाना-युग, मज़दूर की अगुवाई |
| तरीक़ा | शिक्षा; कुछ ने आतंक | अध्ययन-मंडली, हड़ताल, पार्टी |
| समय | 1870-1881 | 1883 से |
उदारवादी तीसरा समूह थे। वे शांतिपूर्ण तरीक़ों से संविधान और चुनी हुई परिषदें चाहते थे, और बहुत से ज़ेम्स्त्वो के ज़रिये काम करते थे।
यह क्यों ज़रूरी है, और कर के देखो
इन आंदोलनों ने 1905 और 1917 की क्रांतियों की ज़मीन तैयार की। 1880-90 के दशक की अध्ययन-मंडलियों में सीखे विचार अगली सदी की पार्टियाँ बन गए।
- 3D में: आख़िरी चरण में छह समूहों को मज़दूर-स्तंभ के छोटे से बड़े क्रम में लगाओ।
- बहस: एक दोस्त लोकलुभावन, एक मार्क्सवादी बने। हर एक के पास 1 मिनट है बताने को कि समाज कौन बदलेगा।
- समय-रेखा: 1874, 1876, 1879, 1881, 1883, 1895, 1898 बनाओ और हर एक के लिए एक चित्र।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- बुद्धिजीवी वर्ग: पढ़े-लिखे लोग जो जनता के प्रति फ़र्ज़ मानते हैं
- लोकलुभावनवाद (नरोदनिक): किसानों पर भरोसा; "जनता के बीच जाना" 1874
- जनता की इच्छा 1879: आतंक; 1 मार्च 1881 को सिकंदर द्वितीय की हत्या
- मार्क्सवाद: कारख़ाना-मज़दूर (सर्वहारा) बदलाव की अगुवाई करते हैं
- प्लेखानोव 1883; संघर्ष-संघ 1895; पार्टी सम्मेलन 1898
हल किए गए उदाहरण
1. "जनता के बीच जाना" (1874) असफल क्यों हुआ?
चरण 1: शहरी युवा गाँव के जीवन को ठीक से नहीं जानते थे। चरण 2: किसान अजनबियों पर भरोसा नहीं करते थे और उनके विचार नहीं अपनाए। चरण 3: पुलिस ने बहुतों को गिरफ़्तार किया। इसलिए आंदोलन किसानों को साथ नहीं ला सका।
2. लोकलुभावन और मार्क्सवादियों में मुख्य अंतर क्या है?
चरण 1: लोकलुभावन किसानों और गाँव-समुदाय पर भरोसा करते थे। चरण 2: मार्क्सवादी औद्योगिक शहरों के कारख़ाना-मज़दूरों पर। चरण 3: यानी पहले ने देहात की ओर देखा, दूसरे ने कारख़ाने की ओर।
3. पहला सामाजिक-जनवादी सम्मेलन (1898) प्लेखानोव के समूह (1883) के कितने साल बाद आया?
1898 - 1883 = 15 साल।
4. सिकंदर द्वितीय की हत्या लोकलुभावनों के लिए बुरी क्यों साबित हुई?
चरण 1: नया ज़ार ज़्यादा सख़्त था। चरण 2: पुलिस ने जनता की इच्छा को तोड़ा और बहुतों को गिरफ़्तार किया। चरण 3: ज़्यादातर लोग आतंक के साथ नहीं थे। इसलिए लोकलुभावनवाद कमज़ोर हुआ।
आम गलतियाँ
- लोकलुभावन (किसानों पर भरोसा) और मार्क्सवादी (मज़दूरों पर भरोसा) को मिला देना।
- यह सोचना कि सारे लोकलुभावन आतंक करते थे। सिर्फ़ जनता की इच्छा ने; काला बँटवारा शांत था।
- यह कहना कि 1898 में बनी पार्टी तभी सत्ता में आई। वह बहुत छोटी थी और ज़्यादातर प्रतिनिधि गिरफ़्तार हुए।
- यह भूल जाना कि बुद्धिजीवी वर्ग पढ़े-लिखे लोगों का समूह है, राजनीतिक पार्टी नहीं।