लोग चुपके से बहस क्यों करते थे
निकोलस प्रथम के समय दल, चुनाव और खुली राजनीति नहीं थी, और सेंसर कड़ा था। विचारों के लिए खुली जगह सिर्फ़ कला, इतिहास और साहित्य में थी। पढ़े-लिखे लोग मॉस्को और पीटर्सबर्ग में मंडलियों (छोटे दोस्ताना समूह) और सैलूनों (घरों में बातचीत की शामें) में मिलते थे। वे पत्रिकाओं में भी लिखते थे, जिन पर सेंसर की कड़ी नज़र थी।
राज्य की अपनी राय थी: सरकारी राष्ट्रीयता (रूढ़िवादी चर्च, निरंकुशता, राष्ट्रीयता)। बाक़ी सब या तो उसके जवाब में बोलते थे या उन समस्याओं पर, जिन्हें वह अनदेखा करती थी, जैसे दास-प्रथा।
चादायेव का पत्र (1836)
प्योत्र चादायेव पढ़े-लिखे सरदार और पूर्व अफ़सर थे। 1836 में पत्रिका "टेलीस्कोप" ने उनका दार्शनिक पत्र छापा। उन्होंने तीखे शब्दों में लिखा कि रूस यूरोप के इतिहास से अलग खड़ा है और उसने दुनिया को बहुत कम दिया। ज़ार बहुत नाराज़ हुए। पत्रिका बंद हुई, संपादक निर्वासित हुए और चादायेव को सरकारी तौर पर पागल घोषित करके डॉक्टर की निगरानी में रखा गया।
पत्र ने एक बड़ा काम किया: लोग पूछने लगे "दुनिया में रूस की जगह क्या है?" नीचे के दोनों पक्ष इसी सवाल से निकले। (बाद की रचना "एक पागल की सफ़ाई" में चादायेव ने अपनी राय नरम की।)
पश्चिमपंथी और स्लावपंथी
स्लावपंथी
मुख्य विचारक: अलेक्सेई ख़ोम्याकोव, भाई इवान और प्योत्र किरीयेव्स्की, भाई कॉन्स्टेंटिन और इवान अक्साकोव, यूरी समारिन। वे कहते थे:
- रूस का अपना रास्ता है; वह यूरोप की ख़राब नक़ल नहीं।
- रूस की ताक़त है गाँव का मीर (सामूहिक व्यवस्था), रूढ़िवादी आस्था और मिल-जुलकर रहने की भावना (सबोर्नोस्ट)।
- पीटर प्रथम ने विदेशी तरीक़े अपनाकर रूस को उसकी जड़ों से काट दिया।
- ज़ार शासन करे, पर पुरानी "ज़ेम्स्की सोबोर" जैसी सभाओं से जनता की बात सुने। वे पश्चिमी ढंग की संसद नहीं चाहते थे।
- वे दास-प्रथा के विरुद्ध थे।
पश्चिमपंथी
मुख्य विचारक: तिमोफ़ेई ग्रानोव्स्की (इतिहासकार), विस्सारियोन बेलिंस्की (आलोचक), कॉन्स्टेंटिन काविलिन, वसीली बोत्किन, पावेल अन्नेनकोव, और युवा अलेक्ज़ेंडर हर्ज़ेन तथा निकोलाई ओगारेव। वे कहते थे:
- रूस यूरोप का हिस्सा है और वही रास्ता लेगा, बस देर से।
- पीटर प्रथम के सुधार बड़ा आगे का क़दम थे।
- रूस को क़ानून का शासन, शिक्षा, विज्ञान, उद्योग और व्यक्ति की आज़ादी चाहिए।
- वे भी दास-प्रथा का अंत चाहते थे। हर्ज़ेन जैसे कुछ मानते थे कि मीर एक न्यायपूर्ण रूसी समाजवाद की नींव बन सकता है।
कहाँ सहमत, कहाँ असहमत
वे सहमत थे कि दास-प्रथा ग़लत है और राज्य में बदलाव चाहिए। वे असहमत थे आदर्श पर (यूरोप या रूस का अपना अतीत), पीटर प्रथम पर और मीर पर। वे अक्सर एक ही सैलूनों में मिलते और एक-दूसरे का सम्मान करते थे।
पेत्राशेव्स्की मंडली (1849)
मिखाइल पेत्राशेव्स्की शुक्रवार को युवा लेखकों, अफ़सरों और शिक्षकों को घर बुलाते, जहाँ वे सामाजिक बदलाव की किताबें पढ़ते और चर्चा करते थे। अप्रैल 1849 में, जब यूरोप में क्रांतियाँ हो रही थीं, पुलिस ने कई सदस्य पकड़ लिए। लेखक फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की भी उनमें थे। सज़ाएँ कठोर थीं (नक़ली फाँसी की तैयारी, फिर कारावास और निर्वासन), और उनसे दिखा कि राज्य खुली चर्चा से कितना डरता था।
यह क्यों ज़रूरी है
इन बहसों ने क़ानून तुरंत नहीं बदला। पर उन्होंने उस पढ़े-लिखे वर्ग को गढ़ा जिसने क्रीमिया युद्ध के बाद महान सुधारों (अगले पाठ) के लिए ज़ोर दिया। उन्होंने आगे के विचारकों को आधार भी दिया: कुछ हर्ज़ेन के "रूसी समाजवाद" की ओर गए, कुछ उदार सुधार की ओर, और कुछ अधिक मज़बूत राष्ट्रीय विचार की ओर।
करके देखो: दो पक्षों की बहस
- 3D में: आख़िरी चरण में हर मुद्दा चुनो और दोनों पक्षों के लिए "एक जैसे" या "अलग" लिखो।
- बहस: स्कूल से जुड़ा विषय लो (जैसे "क्या हमारा स्कूल विदेशी स्कूल-प्रणाली की नक़ल करे?")। एक पक्ष स्लावपंथी बने (अपने तरीक़े), दूसरा पश्चिमपंथी (बाहर से सीखो)। एक ऐसा बिंदु खोजो जहाँ दोनों सहमत हों।
- तुलना: दो कॉलम की तालिका बनाओ: रास्ता, मीर, पीटर प्रथम, यूरोप, दास-प्रथा।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- चादायेव का दार्शनिक पत्र: 1836
- स्लावपंथी: ख़ोम्याकोव, किरीयेव्स्की भाई, अक्साकोव भाई, समारिन; अपना रास्ता, मीर, रूढ़िवादी आस्था
- पश्चिमपंथी: ग्रानोव्स्की, बेलिंस्की, काविलिन, बोत्किन, युवा हर्ज़ेन; यूरोप का रास्ता, क़ानून, शिक्षा
- दोनों: दास-प्रथा के विरुद्ध
- पेत्राशेव्स्की मंडली की गिरफ़्तारी: 1849
- सरकारी राष्ट्रीयता: रूढ़िवादी चर्च, निरंकुशता, राष्ट्रीयता (1833)
हल किए गए उदाहरण
1. चादायेव का पत्र इतना बड़ा झटका क्यों था?
चरण 1: उन्होंने लिखा कि रूस ने विश्व-संस्कृति को कम दिया। चरण 2: तब राज्य लोगों से रूस के अपने तौर-तरीक़ों पर गर्व करने को कहता था। चरण 3: इसलिए ज़ार ने पत्रिका को सज़ा दी और उन्हें पागल कहा, और पत्र ने रूस की जगह पर राष्ट्रीय बहस शुरू कर दी।
2. पीटर प्रथम पर स्लावपंथी और पश्चिमपंथी कैसे अलग थे?
चरण 1: पश्चिमपंथी कहते थे कि उनके सुधारों ने रूस को यूरोप की ओर बढ़ाया, जो अच्छा था। चरण 2: स्लावपंथी कहते थे कि उन्होंने रूस को उसकी जड़ों और जनता से काट दिया। चरण 3: यानी वही व्यक्ति एक पक्ष के लिए नायक और दूसरे के लिए ग़लती था।
3. दो बातें बताओ जिन पर दोनों पक्ष सहमत थे।
चरण 1: दोनों दास-प्रथा के विरुद्ध थे। चरण 2: दोनों मज़बूत, पढ़ा-लिखा और ज़्यादा न्यायपूर्ण रूस चाहते थे। चरण 3: फ़र्क सिर्फ़ रास्ते का था: यूरोप का या रूस का अपना।
4. लोग मंडलियों और पत्रिकाओं में बहस क्यों करते थे?
चरण 1: दल या चुनाव नहीं थे। चरण 2: सेंसर खुली राजनीति रोकता था। चरण 3: इसलिए साहित्य, इतिहास और निजी समूह ही विचारों की जगह थे। जब राज्य डर गया तो उसने सदस्य पकड़े (1849)।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि स्लावपंथी हिंसक क्रांति चाहते थे। वे ज़्यादातर रूढ़िवादी विचारक थे।
- यह सोचना कि पश्चिमपंथी रूस से नफ़रत करते थे। वे उससे प्यार करते थे और उसे बेहतर देखना चाहते थे।
- सरकारी राष्ट्रीयता (राज्य की राय) और स्लावपंथी राय को एक समझना। वे सुनने में मिलती हैं, पर एक नहीं हैं।
- यह कहना कि स्लावपंथी दास-प्रथा के समर्थक थे। दोनों पक्ष उसका अंत चाहते थे।