निकोलस प्रथम को कड़ी पकड़ क्यों चाहिए थी
निकोलस प्रथम ने 1825 से 1855 तक रूस पर शासन किया। उन्हें ज़ार बनने की उम्मीद नहीं थी। बड़े भाई अलेक्ज़ेंडर प्रथम बिना संतान मरे, और अगले भाई ने गद्दी छोड़ दी। इसलिए निकोलस जल्दी में ताजपोशी करके ज़ार बने।
14 दिसंबर 1825 को युवा अफ़सरों के एक समूह ने, जिन्हें बाद में डिसेम्ब्रिस्ट कहा गया, सैनिकों को राजधानी के चौक में खड़ा कर दिया। वे चाहते थे कि क़ानून ज़ार की ताक़त सीमित करें और दास-प्रथा ख़त्म हो। निकोलस के वफ़ादार सैनिकों ने एक दिन में बग़ावत दबा दी। पाँच नेताओं को फाँसी हुई और बहुतों को साइबेरिया भेजा गया।
नए ज़ार ने दो बातें सीखीं: सरदार ख़तरनाक हो सकते हैं, और राज्य मज़बूत तथा निगरानी में होना चाहिए। यही सोच 30 साल चली।
केंद्रीकरण: ज़ार की निजी चांसलरी
केंद्रीकरण (Centralisation) का मतलब है कि फ़ैसले ऊपर, एक ही जगह लिए जाएँ। निकोलस ने यह ज़ार की निजी चांसलरी से किया। यह ज़ार का अपना दफ़्तर था, जो कई "खंडों" में बढ़ गया। हर खंड एक बड़ा काम देखता था:
- खंड 1: ज़ार के काग़ज़ और नियुक्तियाँ।
- खंड 2: क़ानूनों को सजाना (संहिताकरण, नीचे)।
- खंड 3 (1826): गुप्त पुलिस।
बाद में और खंड जुड़े, जैसे राज्य के किसानों और दान-संस्थाओं के लिए। मंत्रालय रहे, पर ज़रूरी काम ज़ार के अपने दफ़्तर में चला गया। इससे कुछ काम तेज़ हुए, पर राज्य एक आदमी पर निर्भर हो गया।
तीसरा खंड, जेंडर्म और सेंसर
तीसरे खंड के प्रमुख काउंट बेंकेंडोर्फ़ थे। वही जेंडर्म दल (हथियारबंद पुलिस) के भी प्रमुख थे। वे समाज के मिज़ाज की रिपोर्टें जमा करते, चिट्ठियाँ पढ़ते और लेखकों व विद्यार्थियों पर नज़र रखते थे।
सेंसर बहुत सख़्त हो गया। 1826 के नियम इतने कड़े थे कि लोग उन्हें "लोहे जैसे" कहते थे। 1828 में नरम नियम आए, फिर भी लेखकों और शिक्षकों को सावधान रहना पड़ता था। किताबें, अख़बार और नाटक जनता तक पहुँचने से पहले जाँचे जाते थे।
क़ानूनों का संहिताकरण
संहिताकरण (Codification) का अर्थ है क़ानूनों को जमा करना, छाँटना और एक क्रम में किताब बनाना। निकोलस से पहले सबसे नई क़ानून-पुस्तक 1649 की थी, और उसके बाद के हज़ारों क़ानून अलग-अलग दफ़्तरों में पड़े थे। जज अक्सर नहीं जान पाते थे कि कौन-सा क़ानून लागू है।
- निकोलस ने इस काम के लिए अपनी चांसलरी का दूसरा खंड बनाया।
- मिखाइल स्पेरांस्की ने काम सँभाला। पहले सारे क़ानून तारीख़ के क्रम में जमा हुए: क़ानूनों का पूरा संग्रह (45 जिल्दें, 1830)।
- फिर जो क़ानून अभी लागू थे, उन्हें विषय के हिसाब से छाँटकर क़ानून संहिता (15 जिल्दें, 1832-33) लिखी गई। यह 1 जनवरी 1835 से लागू हुई।
ध्यान दो: इसने क़ानून बदले नहीं। बस साफ़ किए। फिर भी अगली एक सदी तक अफ़सरों और जजों के बड़े काम आई।
सरकारी राष्ट्रीयता और शिक्षा
1833 में शिक्षा मंत्री सेर्गेई उवारोव ने राज्य के विचार को तीन शब्दों में कहा: रूढ़िवादी चर्च, निरंकुशता, राष्ट्रीयता। इसे "सरकारी राष्ट्रीयता" कहते हैं। मतलब: चर्च के प्रति, अकेले शासन करने वाले ज़ार के प्रति और रूसी लोगों के अपने तौर-तरीक़ों के प्रति वफ़ादार रहो।
स्कूल इसी विचार पर चले। 1828 के नियमों से सीढ़ी बनी: पल्ली स्कूल, ज़िला स्कूल, जिम्नेज़ियम। सरदारों के बच्चे जिम्नेज़ियम तक जाते; ग़रीब बच्चे ज़्यादातर पहले ही रुक जाते। 1835 के विश्वविद्यालय नियमों ने विश्वविद्यालयों की आज़ादी घटाई। शिक्षकों पर नज़र रही और 1840 के दशक में विद्यार्थियों की संख्या सीमित की गई।
किसान, मुद्रा और रेल
निकोलस दास-प्रथा को बुराई कहते थे, पर उन्होंने उसे ख़त्म नहीं किया। दस गुप्त समितियों ने इस सवाल को देखा। ज़मींदारों के दासों के लिए थोड़ा ही बदला। पर पावेल किसेलेव ने राज्य के किसानों का जीवन सुधारा (1837-41): नया मंत्रालय, बेहतर ज़मीन, स्कूल और अनाज-भंडार। 1842 के क़ानून ने मालिकों को छूट दी कि वे कर्तव्यों के बदले दासों को ज़मीन दें, पर लगभग किसी ने ऐसा नहीं किया।
वित्त मंत्री कांक्रिन ने चाँदी के रूबल को स्थिर किया (सुधार 1843 तक पूरा)। पहली रूसी रेल, ज़ारस्कोये सेलो, 1837 में खुली और पीटर्सबर्ग-मॉस्को लाइन 1851 में। कारख़ाने बढ़े, पर पश्चिमी यूरोप तेज़ी से आगे निकल रहा था और रूस पीछे रहा।
नतीजे, आसान शब्दों में
- ज़ार की ताक़त कभी इतनी मज़बूत नहीं थी, और उसके शासन में कोई नई बग़ावत नहीं हुई।
- राज्य ज़्यादा सुव्यवस्थित हुआ (क़ानून, मंत्रालय, दफ़्तर), पर सिर्फ़ ज़ार पर टिका रहा।
- दास-प्रथा बनी रही और देश यूरोप से धीमा बढ़ा।
- क्रीमिया युद्ध की हार (अगला पाठ) ने इस व्यवस्था की क़ीमत दिखा दी।
करके देखो: पकड़ या बदलाव?
- 3D में: आख़िरी चरण में हर नीति चुनो। उसके लिए "पकड़", "बदलाव" या "दोनों" लिखो।
- अभिनय: घर पर एक व्यक्ति सेंसर बने और एक लेखक। लेखक छोटी कहानी पढ़े; सेंसर नेता की आलोचना वाली हर पंक्ति काट दे। लेखक को कैसा लगा?
- छाँटो: घर या कक्षा के दस नियम लिखो और विषय के हिसाब से एक नियम-पुस्तिका बनाओ। यही संहिताकरण है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- डिसेम्ब्रिस्ट बग़ावत: 14 दिसंबर 1825
- ज़ार की निजी चांसलरी: ज़ार का अपना दफ़्तर; खंड 1, 2, 3 और अन्य
- तीसरा खंड (1826): बेंकेंडोर्फ़ के अधीन गुप्त पुलिस; जेंडर्म उसका बल थे
- क़ानूनों का पूरा संग्रह (1830, 45 जिल्दें); क़ानून संहिता (1832-33, 15 जिल्दें, लागू 1835)
- सरकारी राष्ट्रीयता (1833, उवारोव): रूढ़िवादी चर्च, निरंकुशता, राष्ट्रीयता
- राज्य के किसानों का किसेलेव सुधार (1837-41); पहली रेल 1837
हल किए गए उदाहरण
1. निकोलस प्रथम के लिए "केंद्रीकरण" का क्या मतलब था?
चरण 1: केंद्रीकरण यानी फ़ैसले ऊपर चले जाएँ। चरण 2: निकोलस ने खंडों वाली निजी चांसलरी से बड़े मामले ख़ुद सँभाले। चरण 3: इससे राज्य एक आदमी पर ज़्यादा निर्भर हुआ और परिषदों पर कम।
2. पूरे संग्रह और क़ानून संहिता में क्या अंतर है?
चरण 1: पूरे संग्रह (1830, 45 जिल्दें) में हर क़ानून, पुराना-नया, तारीख़ के क्रम में रखा गया। चरण 2: संहिता (15 जिल्दें, 1832-33) में सिर्फ़ लागू क़ानून थे, विषय के हिसाब से। चरण 3: यानी संग्रह पूरा अभिलेख है, संहिता काम की नियम-पुस्तिका।
3. 1825 के बाद निकोलस प्रथम को स्वतंत्र सोच से डर क्यों लगा?
चरण 1: डिसेम्ब्रिस्ट सेना के अफ़सर थे जिन्होंने यूरोप के क़ानून और आज़ादी के विचार पढ़े थे। चरण 2: निकोलस ने देखा कि विचार बग़ावत बन सकते हैं। चरण 3: इसलिए तीसरा खंड, सख़्त सेंसर और सरकारी राष्ट्रीयता बनाई गई, ताकि दिमाग़ों की रखवाली हो।
4. क्या निकोलस प्रथम ने किसानों की मदद के लिए कुछ किया?
चरण 1: उन्होंने दास-प्रथा ख़त्म नहीं की। चरण 2: किसेलेव ने राज्य के किसानों का जीवन स्कूल, ज़मीन और अनाज-भंडार से बेहतर किया (1837-41)। चरण 3: पर ज़मींदारों के दासों, यानी ज़्यादातर किसानों, के लिए लगभग कुछ नहीं बदला, इसलिए मुख्य समस्या अगले ज़ार तक रही।
आम गलतियाँ
- क़ानून संहिता ने क़ानून बदले, ऐसा सोचना। उसने सिर्फ़ जमा और छाँटा।
- तीसरे खंड (गुप्त पुलिस, 1826) और दूसरे खंड (क़ानून) को मिला देना।
- यह कहना कि निकोलस प्रथम ने दास-प्रथा ख़त्म की। उन्होंने उसे बुराई कहा, पर रहने दिया।
- यह भूल जाना कि इसी शासन में पहली रेल और स्थिर रूबल भी आए: सख़्त शासन का मतलब यह नहीं कि कुछ नहीं बदला।