प्रबुद्ध निरंकुशता और नकाज़
कैथरीन द्वितीय जन्म से जर्मन राजकुमारी थीं और पति पीटर तृतीय के विरुद्ध तख़्तापलट के बाद 1762 में गद्दी पर आईं। उन्होंने फ़्रांसीसी विचारक मॉन्टेस्क्यू और इतालवी बेकारिया को पढ़ा और वॉल्तेयर को पत्र लिखे। प्रबोधन एक आंदोलन था जो कहता था कि शासन को तर्क से चलना चाहिए, क़ानून न्यायपूर्ण हों और क्रूरता ख़त्म हो।
प्रबुद्ध निरंकुशता का अर्थ है कि शासक सारी शक्ति रखता है पर कहता है कि वह उसे सुधार और सबकी भलाई के लिए इस्तेमाल करेगा। 1767 में कैथरीन ने नकाज़ ("निर्देश") लिखा, जो क़ानून बनाने वालों के लिए मार्गदर्शिका थी। उसमें कहा गया कि क़ानून सबकी भलाई के लिए हों, यातना ग़लत है और सज़ा न्यायपूर्ण हो। पर यह भी कहा गया कि रूस के आकार को एक मज़बूत शासक चाहिए, इसलिए निरंकुशता बनी रही।
विधायी आयोग (1767 से 1768)
1767 में कैथरीन ने मास्को में नई क़ानून-संहिता लिखने के लिए विधायी आयोग बुलाया। पाँच सौ से अधिक प्रतिनिधि आए: सामंत, शहरवासी, राज्य के किसान, कज़ाक और ग़ैर-रूसी जातियाँ, और कुछ सरकारी दफ़्तरों से। भूदासों ने कोई प्रतिनिधि नहीं भेजा।
प्रतिनिधि अपने इलाक़ों से लिखित माँगें ("निर्देश") लाए, और आयोग ने उन पर बहस की। सामंतों ने ज़्यादा अधिकार और भूदासता की रक्षा माँगी; शहरवासियों ने व्यापार के अधिकार; किसानों ने राहत। आयोग संहिता पर सहमत नहीं हो सका। दिसंबर 1768 में कैथरीन ने ओटोमन साम्राज्य से युद्ध शुरू होने को कारण बताकर उसे बंद कर दिया।
कोई नई संहिता नहीं बनी, पर कैथरीन ने जाना कि अलग-अलग समूह क्या चाहते हैं, और बाद के सुधारों में इसका उपयोग किया।
प्रांतीय सुधार (1775)
पुगाचोव विद्रोह (1773 से 1775) ने दिखाया कि स्थानीय शासन कमज़ोर है। 1775 में कैथरीन ने रूस को छोटे प्रांतों (गुबेर्निया) में बाँटा, हर एक में कर-सूची के लगभग 3 से 4 लाख पुरुष, और हर प्रांत को कम आबादी वाले ज़िलों में। 1796 तक लगभग पचास प्रांत थे। हर प्रांत में शासक द्वारा भेजा गया गवर्नर, कोषागार, पुलिस और सामंतों, शहरवासियों और राज्य के किसानों के लिए अलग-अलग अदालतें थीं।
सामंत कुछ स्थानीय अधिकारी चुनते थे, इसलिए उन्हें अपने ज़िलों के संचालन में हिस्सा मिला। नतीजा: राज्य के अफ़सर लोगों के नज़दीक बैठे, सामंतों को भूमिका मिली और व्यवस्था रखना आसान हुआ।
1785 के चार्टर
सामंतों के चार्टर ने सामंतों को मिले अधिकारों की पुष्टि की और बढ़ाया: अनिवार्य राज्य-सेवा से मुक्ति (1762 से), करों और शारीरिक दंड से मुक्ति, ज़मीन और भूदास रखने का अधिकार, अपने बराबर वालों की अदालतें और हर प्रांत में सभाएँ जो एक नेता ("मार्शल") चुनती थीं। इससे सामंत एक साफ़, सुरक्षित वर्ग बने।
शहरों के चार्टर ने शहरवासियों को भी अधिकार दिए। नागरिक श्रेणियों में बाँटे गए; व्यापारी धन के अनुसार गिल्डों में शामिल हुए; शहर की चुनी हुई परिषद (दूमा) और महापौर थे। अमीर व्यापारियों को शारीरिक दंड से सुरक्षा और व्यापार चलाने का अधिकार मिला।
किसानों के लिए कोई चार्टर नहीं था। 1767 में कैथरीन ने भूदासों के ज़मींदारों के विरुद्ध शिकायत करने पर भी रोक लगा दी, और 1785 के चार्टर ने ज़मींदार के अधिकार बनाए रखे। इसलिए सुधारों से ऊपर और बीच वालों को लाभ हुआ, नीचे वालों को नहीं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- प्रबुद्ध निरंकुशता: सर्वशक्तिमान शासक जो सुधार के लिए तर्क के उपयोग का दावा करता है।
- नकाज़ (1767): कैथरीन का क़ानून बनाने वालों के लिए निर्देश, प्रबोधन के विचारों पर आधारित।
- विधायी आयोग (1767 से 1768): कई वर्गों के प्रतिनिधि (भूदास नहीं); कोई संहिता नहीं बनी।
- प्रांतीय सुधार (1775): लगभग 50 प्रांत, हर एक में 3 से 4 लाख पुरुष, ज़िलों में बँटे।
- सामंतों का चार्टर (1785): सेवा, कर और शारीरिक दंड से मुक्ति; ज़मीन और भूदास बने रहे।
- शहरों का चार्टर (1785): गिल्ड, नगर-परिषद और व्यापारियों के अधिकार।
हल किए गए उदाहरण
1. कैथरीन के शासन को "प्रबुद्ध निरंकुशता" क्यों कहते हैं?
उनके पास पूरी शक्ति (निरंकुशता) थी पर उन्होंने प्रबोधन के विचारकों को पढ़ा और नकाज़, न्यायपूर्ण क़ानूनों की योजनाओं और स्थानीय सुधारों में उनके विचार लिए। शक्ति उन्हीं के पास रही, इसलिए यह ऊपर से सुधार था।
2. विधायी आयोग संहिता क्यों नहीं बना पाया?
वर्ग अलग-अलग चीज़ें चाहते थे, जैसे सामंत भूदासता की रक्षा और शहरवासी व्यापार के अधिकार। सहमति नहीं बनी, और 1768 में ओटोमन युद्ध ने कैथरीन को उसे बंद करने का कारण दिया।
3. 1785 के चार्टरों से सबसे ज़्यादा लाभ किसे हुआ और किसे कुछ नहीं?
सबसे ज़्यादा सामंतों को: सेवा, कर और शारीरिक दंड से मुक्ति, और ज़मीन व भूदासों पर नियंत्रण। शहरवासियों को कुछ अधिकार मिले। भूदासों को कुछ नहीं मिला और ज़मींदारों की ताक़त उन पर बनी रही।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि विधायी आयोग ने नई क़ानून-संहिता लिखी। वह बैठा और बिना संहिता के ख़त्म हुआ।
- यह कहना कि भूदास आयोग में बैठे। भूदासों का कोई प्रतिनिधि नहीं था।
- यह मानना कि प्रबुद्ध निरंकुशता का अर्थ सीमित शासक है। शासक सारी शक्ति रखता था।
- चार्टर गड़बड़ाना: सामंतों का चार्टर (1785) उस 1762 के आदेश से अलग है जिसने अनिवार्य सेवा ख़त्म की, हालाँकि उसने उसकी पुष्टि की।