समाज को कानून और नैतिक शिक्षा क्यों चाहिए?
जब बहुत लोग साथ रहते हैं, तो झगड़े सुलझाने और चीज़ें न्याय से बाँटने के लिए औज़ार चाहिए। दो औज़ार हैं। कानून शासक या राज्य का बनाया नियम है, जिसे तोड़ने पर दंड मिलता है। नैतिक शिक्षा अच्छी आदतें बनाती है, ताकि कोई न देखे तब भी लोग सही करें। इतिहास इन दोनों औज़ारों को मिलाने की कहानी है।
प्राचीन चीनी कानून: विधिवादी और कन्फ्यूशियस
चीनी विचारक बहस करते थे कि शासन का सबसे अच्छा तरीका क्या है। विधिवादी कहते थे कि साफ़ कानून और पक्के इनाम-दंड से लोग चलते हैं; छिन राज्य ने यह खूब अपनाया। कन्फ्यूशियस के अनुयायी कहते थे कि शासक अपने अच्छे उदाहरण से नेतृत्व करे और सद्गुण सिखाए, क्योंकि जो सिर्फ़ दंड से डरते हैं उनमें शर्म नहीं होती। छिन के बाद हान शासकों ने धीरे-धीरे दोनों मिलाए: कानून ढाँचा बना, कन्फ्यूशियस मूल्य लक्ष्य बने। बाद की संहिताओं, जैसे थांग संहिता (7वीं सदी), में दंड और नैतिक कर्तव्य, जैसे माता-पिता का आदर, दोनों लिखे गए।
भारत में भी ऐसा दिखता है। सम्राट अशोक (ईसा पूर्व तीसरी सदी) ने नियम और नैतिक सलाह पत्थर के स्तंभों पर खुदवाई।
पश्चिमी कानून: रोम से आगे
हम्मूराबी जैसी शुरुआती संहिताएँ (लगभग 1750 ईसा पूर्व, मेसोपोटामिया) सार्वजनिक जगह पर लगाई जाती थीं। रोम में बारह तालिकाएँ (लगभग 450 ईसा पूर्व) इसलिए लिखी गईं क्योंकि आम नागरिक नियम जानना चाहते थे। बाद में रोमन विधिवेत्ताओं ने कानून को समझाया और व्यवस्थित किया, और छठी सदी में सम्राट जस्टिनियन ने उसे एक संग्रह में जुड़वाया। रोमन विचार: कानून लिखित और सार्वजनिक हो, तर्क से समझाया जाए, और नागरिकों पर बराबर लागू हो (हालाँकि दासों और स्त्रियों के अधिकार कम थे)। आगे यूरोप में मैग्ना कार्टा (1215) ने कहा कि राजा को भी कानून मानना होगा, जो कानून के शासन की ओर शुरुआती कदम था।
आधुनिक राज्यों में कानून का शासन
कानून का शासन का अर्थ है: कानून सार्वजनिक, साफ़ और सब पर बराबर हो, अदालतें उन्हें निष्पक्ष लागू करें, और सरकार तथा नेता भी उनसे बँधे हों। चीन, भारत और कई देशों के संविधान कहते हैं कि कानून सर्वोच्च है और अधिकारी उसके अधीन काम करते हैं। यह "कानून द्वारा शासन" से अलग है, जहाँ कानून सिर्फ़ शासक का औज़ार है। नैतिक शिक्षा अब भी ज़रूरी है: कानून हर छोटे काम तक नहीं पहुँच सकता, इसलिए स्कूल मूल्य और नागरिक आदतें भी सिखाते हैं।
परंपराओं की तुलना
- विधिवादी विचार: कड़ा, साफ़ कानून और दंड।
- कन्फ्यूशियस विचार: पहले सद्गुण, उदाहरण और शिष्टाचार; कानून सहारे के रूप में।
- रोमन विचार: लिखित, सार्वजनिक, तर्कपूर्ण कानून और प्रशिक्षित विशेषज्ञ।
- कानून का शासन: कोई कानून से ऊपर नहीं, शासक भी नहीं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- कानून = लिखित नियम + राज्य द्वारा लागू करना
- नैतिक शिक्षा = आदतें और मूल्य सिखाना
- विधिवादी: साफ़ कानून और दंड से व्यवस्था
- कन्फ्यूशियस: सद्गुण, उदाहरण और शिष्टाचार से व्यवस्था
- कानून का शासन = कानून सर्वोच्च, सार्वजनिक, बराबर; शासक भी बँधे
- कानून द्वारा शासन ≠ कानून का शासन
हल किए गए उदाहरण
1. एक राजा स्तंभ पर नियम लिखवाता है पर सिर्फ़ गरीबों को दंड देता है। क्या यह कानून का शासन है?
नहीं। कानून का शासन सब पर, शक्तिशाली लोगों पर भी, एक-सा कानून माँगता है। स्तंभ कानून को सार्वजनिक बनाता है, पर असमान दंड बराबरी वाला भाग तोड़ देता है।
2. एक शिक्षक कहता है: "पहले ईमानदारी, फिर दंड।" कौन-सा प्राचीन चीनी मत इसके सबसे पास है?
कन्फ्यूशियस मत, जिसने दंड से पहले सद्गुण और उदाहरण रखा।
3. रोमनों ने बारह तालिकाएँ क्यों लिखीं?
आम नागरिक नियम जानना चाहते थे। सार्वजनिक लिखित कानून अधिकारियों को चुपके से नियम बदलने से रोकता है।
4. एक स्कूल में कड़े नियम हैं पर ईमानदारी का महत्व कभी नहीं सिखाया जाता। कौन-सा औज़ार छूटा है और क्या हो सकता है?
नैतिक शिक्षा छूटी है। छात्र नियम तभी मान सकते हैं जब कोई देखे, और अकेले में नकल कर सकते हैं।
5. शासक कानून के अधीन होता है, इस विचार की ओर एक शुरुआती कदम बताइए।
इंग्लैंड का मैग्ना कार्टा (1215), जहाँ राजा को कानून द्वारा तय सीमाएँ माननी पड़ीं।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि विधिवादी और कन्फ्यूशियस सहमत थे। वे असहमत थे, बाद के शासकों ने दोनों मिलाए।
- "कानून द्वारा शासन" (कानून शासक का औज़ार) और "कानून का शासन" (शासक भी बँधा) को मिला देना।
- कानून और नैतिकता को एक कहना। कानून राज्य लागू करता है; कृतज्ञता जैसे कई नैतिक कर्तव्य कानून नहीं हैं।
- यह मानना कि रोमन कानून सबके लिए न्यायपूर्ण था। दासों और स्त्रियों के अधिकार कम थे।