स्कूलों से पहले और लिखने वाली सभ्यताएँ
सबसे पुराने समाजों में बच्चे जीते हुए सीखते थे: खेती, खाना बनाना, हुनर और कहानियाँ परिवार और बड़ों से। जब लोगों ने लिखना खोजा तो प्रशिक्षित विशेषज्ञ चाहिए थे, इसलिए स्कूल शुरू हुए।
- मिस्र: लिपिक (scribes) मंदिर या महल के स्कूलों में चित्रलिपि, गिनती और कानून सीखते थे ताकि राज्य की सेवा करें।
- इज़राइल: पिता घर में धार्मिक कानून और कहानियाँ सिखाते थे; बाद में लिपिक और शिक्षक आराधनालयों में लड़कों को तोराह पढ़ना सिखाते थे।
- यूनान: स्वतंत्र लड़कों को संगीत, व्यायाम और पढ़ने की शिक्षा (देखिए पाइदेया)।
यूनानी पाइदेया और रोमन ह्यूमैनितास
पाइदेया पूरे व्यक्ति को ढालने का यूनानी आदर्श था: शरीर (व्यायाम), मन (अक्षर, गणित) और चरित्र (संगीत, कविता, नागरिक गुण)। होमर की कविताओं ने वीरों के आदर्श दिए। प्लेटो ने कहा कि शिक्षा आत्मा को सत्य और भलाई की ओर मोड़ती है, और दार्शनिकों को नगर का मार्गदर्शक बनाना चाहा। इसोक्रेटीज़ ने वक्ताओं को सार्वजनिक जीवन के लिए भाषण-कला सिखाई। अरस्तू का मत था कि शिक्षा अच्छी आदतें (सद्गुण) बनाती है और यह राज्य की चिंता है।
रोमनों ने इसे ह्यूमैनितास के रूप में अपनाया: सभ्य, पढ़ा-लिखा, बोलने में कुशल इंसान। लड़का पहले लूदुस (पढ़ना, लिखना, गिनना) जाता, फिर ग्रामाटिकस (साहित्य), फिर वक्ता-शिक्षक (भाषण)। सिसरो ने कई विषय जानने वाले आदर्श वक्ता का चित्र खींचा। क्विन्टिलियन ने शिक्षकों से दयालु होने, प्रशंसा और खेल का उपयोग करने को कहा और समूह में पढ़ाने का पक्ष लिया। सेनेका ने चेताया: हम स्कूल के लिए नहीं, जीवन के लिए सीखते हैं।
आरंभिक ईसाई, मठ और शूरवीर शिक्षा
आरंभिक ईसाई बाइबिल के सहारे आस्था सिखाते थे, नए सीखने वालों के लिए प्रश्नोत्तर-शिक्षा (catechism) के साथ। ऑगस्टीन ने कहा कि शिक्षक ज्ञान को छात्र के भीतर उँडेल नहीं सकता; शब्द सिर्फ़ छात्र की अपनी भीतर की समझ को जगाते हैं।
रोमन साम्राज्य कमज़ोर होने पर मठों ने किताबें और पढ़ाई जीवित रखी। बेनेदिक्त का नियम (लगभग 530) ने दिन को प्रार्थना, काम और अध्ययन की लय दी, और भिक्षु हाथ से पांडुलिपियाँ नक़ल करते थे। बाद में गिरजाघर और दरबार के स्कूल भी जुड़े (जैसे शार्लमेन का दरबारी स्कूल, लगभग 780)।
सामंतों के लिए उद्देश्य अलग था: लड़का पहले सेवक (page), फिर सहायक (squire) बनता, और शूरवीर बनने के लिए घुड़सवारी, हथियार, शिष्टाचार और मान-मर्यादा सीखता; लड़कियाँ गृह-प्रबंध, शिष्टता और कभी-कभी पढ़ना सीखती थीं।
धार्मिक संघ, कस्बे, शिल्प-संघ और विश्वविद्यालयों का जन्म
लगभग 1100 से कस्बे समृद्ध हुए। कम्यून (स्वशासी कस्बे) को ऐसे मुंशी और व्यापारी चाहिए थे जो पढ़-गिन सकें, इसलिए कस्बों के स्कूल खुले। शिल्प-संघ (गिल्ड) कारीगरों के संगठन थे: लड़का प्रशिक्षु बनता, फिर कारीगर-सहायक, फिर अपनी श्रेष्ठ कृति बनाकर उस्ताद। धार्मिक संघों (फ्रांसिस्कन, डोमिनिकन) ने कस्बों में पढ़ाने के लिए स्कूल खोले।
विश्वविद्यालय शिक्षकों और छात्रों के संघ के रूप में शुरू हुए: बोलोनिया (कानून, लगभग 1088) और पेरिस (धर्मशास्त्र, लगभग 1150-1200) प्रसिद्ध शुरुआती हैं। वे उपाधियाँ देते, व्याख्यान और वाद-विवाद करते और कला, कानून, चिकित्सा और धर्मशास्त्र पढ़ाते थे। थॉमस एक्विनास (13वीं सदी) ने आस्था और तर्क को जोड़ा।
मानववादी, छपाई, प्रति-सुधार और आम जनता के स्कूल
मानववादी (1300-1400 के दशक से) शास्त्रीय ग्रंथों, भाषाओं और मानव-अनुभव का अध्ययन चाहते थे और स्वतंत्र, बुद्धिमान, वाक्पटु इंसान गढ़ना चाहते थे। इरैस्मस ने कोमल शिक्षण, अच्छी लैटिन और ग्रंथों को परखकर पढ़ने की माँग की। युवा सामंतों और नागरिकों के लिए मानववादी कॉलेज और स्कूल फैले। छापेखाने (लगभग 1450) ने किताबें सस्ती कीं और पढ़ना आम किया।
सुधार आंदोलन ने बाइबिल को अपनी भाषा में पढ़ने पर बल दिया, इसलिए प्रोटेस्टेंट क्षेत्रों ने बुनियादी पढ़ाई के लिए जन-स्कूल बनाए। जवाब में कैथोलिक प्रति-सुधार ने मज़बूत स्कूल-जाल खड़े किए, जैसे निश्चित पाठ्य-योजना वाले जेसुइट कॉलेज (Ratio Studiorum, 1599)।
कोमेनियस (1592-1670) ने कहा कि सभी बच्चों को, लड़के-लड़कियों, अमीर-गरीब को सीखना चाहिए, और बच्चों के लिए चित्रों वाली किताब Orbis Pictus लिखी: चित्र और असली चीज़ों से सीखना।
प्रबोधन, बचपन और शिक्षा का अधिकार
प्रबोधन (1700 के दशक) ने तर्क पर भरोसा किया और कहा कि हर इंसान सीख सकता है, इसलिए शिक्षा अधिकार है और राज्य का कर्तव्य। लॉक (1693) ने बच्चे के मन को कोरी स्लेट जैसा बताया जिस पर अनुभव लिखता है, और स्वास्थ्य व अच्छी आदतों पर बल दिया। रूसो (एमील, 1762) ने कहा कि बच्चे छोटे बड़े नहीं हैं: वे चरणों में बढ़ते हैं और स्वाभाविक जिज्ञासा और अनुभव से सबसे अच्छा सीखते हैं। यही बचपन की खोज है, एक विशेष उम्र के रूप में।
19वीं सदी: शिक्षाशास्त्र, प्रत्यक्षवाद और राज्य के स्कूल
पेस्टालोज़ी ने ग़रीब बच्चों को हाथ से करके और प्रेम से पढ़ाया: सिर, हृदय और हाथ। फ्रोबेल ने खेल और 'उपहारों' (ब्लॉक और गेंद) के साथ किंडरगार्टन (1837) बनाया। इटली में रोस्मिनी ने शिक्षा को व्यक्ति के नैतिक विकास और स्वतंत्रता से जोड़ा। राज्यों ने व्यवस्थाएँ बनाईं: इटली के कासाती कानून (1859) ने राज्य की शिक्षा खड़ी की, और बाद के कानूनों ने प्राथमिक स्कूल अनिवार्य किया।
प्रत्यक्षवाद (कॉम्ट और उनके अनुयायी) मानता था कि ज्ञान प्रेक्षण और विज्ञान पर टिके, इसलिए स्कूलों में विज्ञान को ज़्यादा जगह मिली, प्रयोग होने लगे और शिक्षा का विज्ञान बनने लगा। दुर्खाइम (1858-1917) ने शिक्षा को वह तरीका माना जिससे समाज नई पीढ़ी को साझा मूल्य और कौशल देता है: शिक्षा के समाजशास्त्र की शुरुआत।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समय-रेखा: घर -> प्राचीन स्कूल -> मठ -> विश्वविद्यालय (लगभग 1100) -> छपाई और मानववादी (लगभग 1450) -> प्रबोधन (1700 के दशक) -> राज्य के स्कूल (1800 के दशक)
- यूनानी पाइदेया = शरीर + मन + चरित्र
- मध्यकालीन हुनर का रास्ता: प्रशिक्षु -> कारीगर-सहायक -> उस्ताद
- मुख्य विचार: रूसो - बचपन एक चरण है; पेस्टालोज़ी - सिर, हृदय, हाथ; फ्रोबेल - खेल से सीखना
हल किए गए उदाहरण
1. प्लेटो, क्विन्टिलियन और रूसो को एक-एक विचार से मिलाइए।
प्लेटो: शिक्षा आत्मा को सत्य और भलाई की ओर मोड़ती है। क्विन्टिलियन: दयालुता से पढ़ाओ, प्रशंसा और खेल का उपयोग करो। रूसो: बचपन अपना चरण है; अनुभव से सीखो।
2. रोमन साम्राज्य कमज़ोर होने पर मठ ज्ञान के केंद्र क्यों बने?
किताबें और शिक्षक रखने वाली दूसरी संस्थाएँ कम थीं। भिक्षु पांडुलिपियाँ हाथ से नक़ल करते और नए भिक्षुओं व स्थानीय लड़कों को पढ़ाते थे, इसलिए ज्ञान बचा रहा।
3. शिल्प-संघ किसी युवा को कैसे प्रशिक्षित करता था?
पहले वह उस्ताद के साथ प्रशिक्षु बनकर काम करता, फिर काम के पैसे पाने वाला कारीगर-सहायक बनता, और श्रेष्ठ कृति बनाकर उस्ताद बन जाता।
4. छपाई ने शिक्षा को कैसे बदला?
किताबें सस्ती हुईं, इसलिए ज़्यादा लोग उन्हें रख और पढ़ सकते थे, और शिक्षक कई स्कूलों में एक ही पाठ्य-पुस्तक इस्तेमाल कर सकते थे। साक्षरता और स्कूल बढ़े।
5. कोमेनियस के स्कूली विचार में नया क्या था?
यह कि सभी बच्चे, अमीर-गरीब, लड़के-लड़कियाँ, चित्रों और असली चीज़ों से, क्रमवार चरणों में सीखें।
6. 1859 में इटली में राज्य के स्कूलों का कानून बना। यह किस सदी के रुझान को दिखाता है?
19वीं सदी के उस रुझान को जिसमें राज्य स्कूल-व्यवस्था बनाते हैं और प्राथमिक शिक्षा को सार्वजनिक कर्तव्य मानते हैं।
आम गलतियाँ
- सोचना कि स्कूल हमेशा सबके लिए थे। इतिहास के ज़्यादातर समय में सिर्फ़ कुछ लड़के पढ़ते थे।
- ह्यूमैनितास (रोमन, सुसंस्कृत व्यक्ति) और मानववाद (पुनर्जागरण का आंदोलन जो शास्त्रीय ग्रंथ पढ़ता था) को मिला देना।
- मानना कि विश्वविद्यालय राज्य ने बनाए। शुरुआती विश्वविद्यालय शिक्षकों और छात्रों के संघों से उभरे।
- तारीख़ों को ठीक-ठीक मान लेना। दौरों के लिए 'लगभग' कहिए; पहले दौरों का क्रम सीखिए।