मिथक से लोगोस तक: दर्शन की शुरुआत
दर्शन (यूनानी फ़िलो = प्रेम, सोफ़िया = ज्ञान) ध्यान से सोचकर बड़े सवाल पूछता है: असली क्या है? हम कैसे जानते हैं? हमें कैसे जीना चाहिए?
पुराने लोग प्रकृति को मिथक से समझाते थे: देवताओं की कहानियाँ। लगभग 600 ई.पू. में पूर्वी भूमध्य सागर के यूनानी व्यापारी नगरों में कुछ विचारकों ने नया रास्ता अपनाया: लोगोस, यानी तर्क वाली व्याख्या जिसे दूसरे जाँच सकें और जिस पर बहस कर सकें। व्यापार, लेखन, कुछ नागरिकों का ख़ाली समय और नगर की बहसों ने इस बदलाव में मदद की।
सुकरात-पूर्व दार्शनिक और आर्खे की खोज
सुकरात से पहले के विचारकों को सुकरात-पूर्व दार्शनिक कहते हैं। वे आर्खे खोज रहे थे: मूल सिद्धांत, सब चीज़ों के पीछे का एक बुनियादी पदार्थ या नियम।
- थेल्स: सब कुछ पानी से (जीवन को इसकी ज़रूरत है; यह ठोस, द्रव, गैस बन सकता है)।
- एनैक्सिमेंडर: असीम (एपेरॉन); एनैक्सिमेनीज़: हवा, गाढ़ी या पतली।
- पाइथागोरस: संख्या और सामंजस्य।
- हेराक्लिटस: सब बहता है; 'एक ही नदी में दो बार पैर नहीं रख सकते'। बदलाव लोगोस के नियम से चलता है; आग इसका प्रतीक है।
- पार्मेनाइडीज़: सच्चा सत् एक है और कभी नहीं बदलता; बदलाव इंद्रियों का भ्रम है। इंद्रियों से ज़्यादा तर्क पर भरोसा करो।
- एम्पेडोक्लीज़: चार तत्व (मिट्टी, पानी, हवा, आग), प्रेम और कलह से मिलते-बिछड़ते।
- डेमोक्रिटस (ल्यूसिपस के साथ): सब कुछ छोटे, न कटने वाले परमाणुओं से बना है जो ख़ाली जगह (शून्य) में चलते हैं।
सोफ़िस्ट और सुकरात
लोकतांत्रिक एथेंस में अच्छा बोलने से वोट और मुक़दमे जीते जाते थे। सोफ़िस्ट (जैसे प्रोटागोरस और गोर्गियास) घूमने वाले शिक्षक थे जो पैसे लेकर मनाने की कला सिखाते थे। प्रोटागोरस ने कहा 'मनुष्य सब चीज़ों का माप है': सच व्यक्ति पर निर्भर है। इसे मानव-केंद्रित मोड़ कहते हैं: दर्शन प्रकृति से हटकर इंसान, क़ानून और मूल्यों पर आया।
सुकरात (लगभग 470–399 ई.पू.) ने कुछ नहीं लिखा और फ़ीस नहीं ली। वे लोगों से साहस या न्याय जैसे शब्दों की परिभाषा पूछते, फिर उनके जवाबों की कमियाँ दिखाते (सुकराती विधि)। वे कहते थे उनकी बुद्धिमानी यही है कि वे जानते हैं कि वे नहीं जानते।
399 ई.पू. में उन पर नगर के देवताओं का सम्मान न करने और युवाओं को बिगाड़ने का आरोप लगा। प्लेटो की अपोलॉजी (बचाव-भाषण) में सुकरात कहते हैं कि उन्हें लोगों से सवाल पूछने का काम मिला है, खुद को सुस्त घोड़े को जगाने वाली मक्खी बताते हैं, रुकने से मना करते हैं, और कहते हैं 'बिना जाँचा जीवन जीने लायक नहीं'। उन्हें मृत्युदंड मिला और उन्होंने ज़हर (हेमलॉक) पिया।
प्लेटो और अरस्तू
प्लेटो (लगभग 427–347 ई.पू.), सुकरात के शिष्य, ने अकादमी बनाई। उनका रूपों का सिद्धांत: जो चीज़ें हम देखते हैं वे बदलती हैं और अधूरी नक़लें हैं; पूर्ण, न बदलने वाले रूप (वृत्त का, न्याय का, शुभ का विचार) ही सचमुच असली हैं, जिन्हें तर्क से जाना जाता है। गुफा की कहानी यही दिखाती है। रिपब्लिक में वे ऐसे न्यायपूर्ण नगर की कल्पना करते हैं जिसे प्रशिक्षित दार्शनिक चलाएँ।
अरस्तू (384–322 ई.पू.), प्लेटो के शिष्य और सिकंदर के शिक्षक, ने लाइसियम बनाया। उन्होंने कहा रूप असली चीज़ों के अंदर ही है, इसलिए हम देखकर सीखते हैं। उन्होंने औपचारिक तर्कशास्त्र बनाया (न्यायवाक्य: सब मनुष्य मरणशील हैं; सुकरात मनुष्य है; इसलिए सुकरात मरणशील है), जानवरों को वर्गों में बाँटा, और नीति (सद्गुण दो अतियों के बीच का 'स्वर्णिम मध्य', लक्ष्य यूडेमोनिया यानी फलता-फूलता जीवन) व राजनीति पर लिखा।
हेलेनिस्टिक और रोमन दर्शन
- सिनिक (डायोजनीज़): प्रकृति के अनुसार जियो, लगभग कुछ मत रखो, नाम-शोहरत की परवाह मत करो। डायोजनीज़ एक बड़े मटके में रहते थे।
- स्टोइक (सिटियम के ज़ेनो, फिर रोमन सेनेका, एपिक्टेटस और मार्कस ऑरेलियस): संसार तर्क से चलता है; घटनाएँ हमारे बस में नहीं, पर अपने निर्णय हमारे बस में हैं; सद्गुण ही सच्चा भला है; सब मनुष्यों में तर्क है, इसलिए सब 'विश्व-नागरिक' हैं।
- एपिक्यूरियन (एपिक्यूरस; रोमन कवि ल्यूक्रेशियस): लक्ष्य शांत सुख (अटाराक्सिया, चिंता से मुक्ति) है, सादे जीवन और दोस्ती से; संसार परमाणुओं से बना है, इसलिए देवताओं या मृत्यु से मत डरो।
- संशयवादी (पिर्हो): शांति के लिए निर्णय रोक कर रखो।
सिसरो (106–43 ई.पू.) ने यूनानी विचारों को लैटिन में अनुवाद किया, दर्शन के लिए लैटिन शब्द बनाए और इसे जीवन व सार्वजनिक कर्तव्य का मार्गदर्शक बताया। रोम के रास्ते ये ग्रंथ बाद के यूरोप तक पहुँचे; इरास्मस (लगभग 1500) जैसे मानवतावादियों ने इन्हें फिर पढ़ा। उनके सवाल आज भी हमारे हैं: अच्छा जीवन क्या है, क्या हम भावनाओं पर काबू कर सकते हैं, क्या क़ानून प्रकृति के अनुसार हों?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- दर्शन = ज्ञान से प्रेम (फ़िलो + सोफ़िया)
- मिथक → लोगोस: कहानी से तर्क वाली व्याख्या
- आर्खे = मूल सिद्धांत (पानी, हवा, आग, सत्, परमाणु)
- सुकराती विधि = सवाल → परिभाषा → उल्टा उदाहरण → बेहतर परिभाषा
- न्यायवाक्य: सब A, B हैं; C एक A है; इसलिए C, B है
- स्टोइक: घटनाएँ नहीं, निर्णय काबू करो। एपिक्यूरियन: अटाराक्सिया (शांति)
हल किए गए उदाहरण
1. 'पानी' ग़लत होने पर भी थेल्स को पहला दार्शनिक क्यों कहते हैं?
उन्होंने प्रकृति को देवताओं की बजाय प्राकृतिक कारण से समझाया, जिस पर लोग बहस कर सकते थे। उत्तर से ज़्यादा तरीक़ा (लोगोस) मायने रखता था।
2. बदलाव पर हेराक्लिटस और पार्मेनाइडीज़ की तुलना कीजिए।
हेराक्लिटस: सब कुछ हर समय बदलता है; बदलाव ही संसार का नियम है। पार्मेनाइडीज़: असली सत् बदल नहीं सकता; इंद्रियों को दिखने वाला बदलाव भ्रम है।
3. डेमोक्रिटस का परमाणु आज के परमाणु से कैसे मिलता और कैसे अलग है?
मिलता: छोटे कण जो सब कुछ बनाते हैं और ख़ाली जगह में चलते हैं। अलग: उनका परमाणु तर्क से किया अनुमान था और न टूटने वाला माना गया; आज के परमाणु प्रयोग से मिले और उनके भी हिस्से हैं।
4. 'साहस यानी कभी पीछे न हटना' पर सुकराती विधि लगाइए।
सवाल: दुश्मन को फँसाने के लिए पीछे हटने वाला सैनिक क्या कायर है? नहीं। तो परिभाषा ग़लत हुई। बेहतर: साहस यानी डर लगने पर भी सही काम करना।
5. साहस पर अरस्तू का स्वर्णिम मध्य लगाइए।
बहुत कम = कायरता; बहुत ज़्यादा = दुस्साहस। साहस इन दोनों के बीच है, अच्छी समझ से चुना हुआ।
6. आपकी बस देर से आई। एक स्टोइक और एक एपिक्यूरियन जवाब दीजिए।
स्टोइक: बस मेरे बस में नहीं; मेरी प्रतिक्रिया है, तो मैं शांत रहकर समय का उपयोग करूँ। एपिक्यूरियन: बेकार चिंता से बचो; इंतज़ार में दोस्त से बात जैसा कोई सादा सुख लो।
आम गलतियाँ
- सोचना कि सुकरात-पूर्व दार्शनिक सुकरात के बाद आए। 'पूर्व' यानी पहले।
- सोफ़िस्ट और सुकरात को एक मानना। सोफ़िस्ट फ़ीस लेकर मनाना सिखाते थे; सुकरात बिना फ़ीस सच खोजते थे।
- सोचना कि एपिक्यूरियन मौज-मस्ती चाहते थे। एपिक्यूरस का मतलब शांत, सादा सुख और दर्द-चिंता से मुक्ति था।
- कहना कि प्लेटो और अरस्तू सहमत थे। प्लेटो ने असली रूप इस दुनिया से परे रखे; अरस्तू ने रूप को चीज़ों के अंदर माना और अवलोकन पर भरोसा किया।