Spain 2º Bachillerato History of Philosophy
अध्याय: 3
1. From the origins of Western philosophy in Greece to the end of Antiquity
Historicity of philosophical problems and methods · The birth of philosophy in Greece · Presocratics and the problem of reality · Sophists and Socrates · Plato and Aristotle on knowledge and reality · Anthropology in classical philosophy · Classical ethics and eudaimonia · Plato and Aristotle on politics · Hellenistic philosophy
- प्राचीन दर्शन: पहले सवालों से स्टोइकवाद तक – दर्शन (फ़िलॉसफ़ी) का अर्थ है 'ज्ञान से प्रेम'। लगभग 600 ई.पू. में यूनानी विचारकों ने प्रकृति को मिथक की बजाय तर्क (लोगोस) से समझाना शुरू किया। सुकरात-पूर्व दार्शनिकों ने मूल तत्व (आर्खे) खोजा: पानी, हवा, आग, न बदलने वाला सत् या परमाणु। फिर सोफ़िस्ट और सुकरात इंसानी जीवन की ओर मुड़े; सुकरात को सवाल पूछने के लिए मृत्युदंड मिला (प्लेटो की 'अपोलॉजी' में)। प्लेटो ने रूपों का सिद्धांत दिया; अरस्तू ने अवलोकन से तर्कशास्त्र और विज्ञान बनाया। बाद में स्टोइक, एपिक्यूरियन, सिनिक और सिसरो-सेनेका जैसे रोमनों ने पूछा कि अच्छा, शांत जीवन कैसे जिएँ।
- सुकरात: सवाल पूछने वाले दार्शनिक – सुकरात (लगभग 470–399 ई.पू.) एथेंस में रहते थे और उन्होंने कुछ नहीं लिखा। पैसे लेने वाले सोफ़िस्टों से अलग, वे सच खोजने के लिए मुफ़्त में लोगों से सवाल पूछते थे। वे कहते थे कि उनका ज्ञान बस इतना है कि वे जानते हैं कि वे नहीं जानते, और 'स्वयं को जानो' उनका जीवन-कार्य था। उनकी पद्धति किसी परिभाषा को उल्टे उदाहरण से जाँचती है जब तक बेहतर परिभाषा न मिले। उन्होंने सिखाया कि आत्मा (साइकी) की देखभाल सबसे ज़रूरी है, अच्छे जीवन के लिए सद्गुण (आरेटे) चाहिए, और सद्गुण ही ज्ञान है: कोई जानबूझकर ग़लत नहीं करता। उन्हें एक भीतरी चेतावनी की आवाज़ (डाइमोनियन) सुनाई देती थी। 399 ई.पू. में एथेंस ने उन्हें मृत्युदंड दिया; उन्होंने दर्शन छोड़ने की बजाय क़ानून मानकर मरना चुना।
- प्लेटो और अरस्तू: वास्तविक क्या है, इसके दो उत्तर – प्लेटो (लगभग 427–347 ई.पू.) ने सिखाया कि सच्ची वास्तविकता पूर्ण, अपरिवर्तनशील प्रत्ययों (Forms) का लोक है, आत्मा अमर है और सीखना पुनःस्मरण है। उनके शिष्य अरस्तू (384–322 ई.पू.) ने प्रत्ययों को धरती पर उतारा: हर वस्तु पदार्थ + रूप है, परिवर्तन संभाव्यता का वास्तविक बनना है, और आत्मा जीवित शरीर का रूप है।
- सद्गुण नीतिशास्त्र: अच्छा इंसान कैसे बनें – सद्गुण नीतिशास्त्र पूछता है "मुझे कैसा इंसान बनना चाहिए?", सिर्फ़ "कौन-सा नियम मानूँ?" नहीं। हर कर्म में इरादा, साधन, कर्म और परिणाम होते हैं। सुकरात ने सिखाया कि सद्गुण ज्ञान है। प्लेटो ने आत्मा के तीन हिस्सों (बुद्धि, उत्साह, इच्छा) को चार मूल सद्गुणों से जोड़ा: प्रज्ञा, साहस, संयम और न्याय। अरस्तू ने कहा कि हर लक्ष्य अंत में यूडेमोनिया (अच्छा जीवन) की ओर जाता है, और हर नैतिक सद्गुण दो दोषों के बीच का स्वर्णिम मध्य है, जो आदत से बनता है और व्यावहारिक बुद्धि से पहचाना जाता है।
- राजनीतिक दर्शन: राज्य, शक्ति और न्याय – राजनीतिक दर्शन साथ रहने के बड़े सवाल पूछता है: राज्य क्यों चाहिए? कौन-सी शक्ति सही (वैध) है? न्याय क्या है? लोगों को कितनी स्वतंत्रता और समानता मिले? सामाजिक अनुबंध के विचारक (हॉब्स, लॉक, रूसो) राज्य को एक समझौता मानते हैं। प्लेटो और अरस्तू ने आदर्श राज्य और सरकार के रूप बताए; सिसरो ने गणराज्य को क़ानून के तहत जनता की साझी संपत्ति कहा। रॉल्स, मिल और कई परंपराओं के विचारक (कन्फ़्यूशियस, कौटिल्य, उबुंटू) स्वतंत्रता, समानता, संपत्ति और समुदाय को तौलने में मदद करते हैं।
2. From the Middle Ages to European modernity
Medieval philosophy · Faith and reason · The birth of European modernity · Rationalism and empiricism: Descartes and Hume · Modern metaphysical debate · Origin of society and power: social contract
- मध्यकालीन दर्शन: ऑगस्टीन से ओकम तक आस्था और तर्क – मध्यकालीन दर्शन लगभग 400 से 1450 ई. तक का है। इसका बड़ा प्रश्न था कि आस्था (धर्म जो सिखाता है) और तर्क (जो हम सोचकर जान सकते हैं) आपस में कैसे मेल खाते हैं। ऑगस्टीन ने सिखाया कि सत्य भीतर मिलता है, ईश्वर के प्रकाश से, और आस्था समझ खोजती है। बोएथियस ने यूनानी तर्कशास्त्र आगे पहुँचाया। इब्न सीना, इब्न रुश्द और मैमोनिडीज़ जैसे इस्लामी और यहूदी विचारकों ने अरस्तू को गहराई से पढ़ा, और उनका काम लैटिन अनुवादों से यूरोप पहुँचा। नए विश्वविद्यालयों में स्कॉलैस्टिसिज़्म ने सावधान प्रश्न-उत्तर पद्धति अपनाई। एंसेल्म ने सबसे महान संभव सत्ता के विचार से ईश्वर के लिए तर्क दिया। थॉमस एक्विनास ने अरस्तू को ईसाई आस्था से जोड़ा: तर्क और आस्था एक घर की दो मंज़िलें हैं, और तर्क दिखा सकता है कि पहला कारण है (पाँच मार्ग)। 1300 के दशक में विलियम ऑफ़ ओकम ने सरल व्याख्या पर ज़ोर दिया (ओकम का उस्तरा), और आस्था व तर्क अलग होने लगे, जिससे पुनर्जागरण और आधुनिक विज्ञान का रास्ता खुला।
- वैज्ञानिक क्रांति: विज्ञान ने विचारों को परखना कैसे सीखा – लगभग 1540 से 1700 के बीच यूरोप के विचारकों ने प्रकृति को समझने का तरीका बदल दिया। कोपरनिकस ने सूर्य को केंद्र में रखा, गैलीलियो ने दूरबीन से सबूत जुटाए, केप्लर ने पाया कि कक्षाएँ दीर्घवृत्त हैं, और न्यूटन ने एक ही गुरुत्व नियम से आसमान और धरती दोनों को समझाया। बेकन और देकार्त ने अवलोकन, प्रयोग, तर्क और गणित पर टिकी नई विधि बताई। यही वैज्ञानिक क्रांति है।
- तर्कवाद और अनुभववाद: ज्ञान तर्क से या अनुभव से? – 1600 और 1700 के दशक में यूरोप के विचारकों में बहस हुई कि ज्ञान का स्रोत क्या है। तर्कवादी (देकार्त, स्पिनोज़ा, लाइबनिट्ज़) कहते थे कि सबसे पक्का ज्ञान तर्क (बुद्धि) से आता है और कुछ विचार जन्मजात हैं। देकार्त ने हर चीज़ पर शक किया और एक निश्चित बात पर पहुँचे: "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ"। अनुभववादी (लॉक, बर्कले, ह्यूम) कहते थे कि सारे विचार अनुभव से आते हैं; जन्म के समय मन कोरी पट्टी है। ह्यूम ने दिखाया कि हम कारण को कभी देखते नहीं, सिर्फ़ एक घटना के बाद दूसरी देखते हैं; कारण पर हमारा विश्वास आदत से आता है। बाद में कांट ने दोनों को जोड़ा।
- तत्वमीमांसा: असल में वास्तविक क्या है? – तत्वमीमांसा (metaphysics) दर्शन का वह हिस्सा है जो पूछता है कि दुनिया सबसे गहरे स्तर पर कैसी है। सत्तामीमांसा (ontology) पूछती है कि क्या-क्या अस्तित्व में है: मूर्त चीज़ें, संख्या जैसी अमूर्त चीज़ें, या दोनों। तत्वमीमांसा द्रव्य और गुण, परिवर्तन और पहचान (थीसियस का जहाज़), मन और शरीर (द्वैतवाद, भौतिकवाद, प्रत्ययवाद), काल और कार्य-कारण, और स्वतंत्र इच्छा बनाम नियतिवाद पर सोचती है। ब्रह्मांड, प्रकृति और जीवन के बड़े सवाल भी इसी में आते हैं। पारमेनाइडीज़, हेराक्लिटस, प्लेटो, अरस्तू, देकार्त, ह्यूम, कांट और भारत के न्याय व अद्वैत वेदांत ने अलग-अलग उत्तर दिए।
- सामाजिक समझौता सिद्धांत: लोग सरकार की बात क्यों मानते हैं? – सामाजिक समझौता सिद्धांत कहता है कि सरकार की ताक़त लोगों के आपसी समझौते से आती है, ईश्वर या बल से नहीं। विचारक एक 'प्राकृतिक अवस्था' की कल्पना करते हैं जिसमें कोई सरकार नहीं, फिर पूछते हैं कि लोग किस बात पर सहमत होंगे। हॉब्स: सुरक्षा के लिए लगभग सारी ताक़त एक शक्तिशाली शासक को। लॉक: सीमित सरकार जो जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति की रक्षा करे, वरना लोग उसे बदल सकते हैं। रूसो: पूरी जनता संप्रभु है और 'सामान्य इच्छा' से कानून बने।
3. From modernity to postmodernity
The Enlightenment project · Kant's critical philosophy · Ethics of happiness and ethics of duty · Critiques of capitalism and totalitarianism · Nietzsche and postmodernism · Analytic philosophy and language · Existentialism and Spanish thought · Contemporary feminism: Simone de Beauvoir
- ज्ञानोदय (प्रबोधन युग) – ज्ञानोदय (लगभग 1680–1800) यूरोप का एक आंदोलन था जिसने कहा कि दुनिया को समझने और समाज चलाने में सिर्फ़ परंपरा नहीं, तर्क और सबूत काम में लाओ। यह वैज्ञानिक क्रांति से निकला। लॉक, मॉन्टेस्क्यू, वॉल्टेयर, रूसो, कांट और मैरी वॉल्स्टनक्राफ़्ट जैसे विचारकों ने प्राकृतिक अधिकार, शक्तियों का बँटवारा, बोलने और धर्म की आज़ादी और जनता की सहमति से सरकार की बात की। विचार किताबों, अख़बारों, सैलूनों और विश्वकोश से फैले। कुछ राजाओं ने सुधार किए (प्रबुद्ध निरंकुशता); इन विचारों ने अमेरिकी (1776) और फ़्रांसीसी (1789) क्रांति और बाद में भारत समेत दुनिया भर के सुधारकों को प्रेरणा दी।
- इमैनुएल कांट: हम क्या जान सकते हैं और हमें क्या करना चाहिए – इमैनुएल कांट (1724–1804) जर्मन दार्शनिक थे। उनके दो बड़े सवाल थे: मैं क्या जान सकता हूँ? मुझे क्या करना चाहिए? ज्ञान के बारे में उन्होंने बुद्धिवाद और अनुभववाद को जोड़ा: ज्ञान के लिए प्रत्यय (concepts) और इंद्रिय-अनुभव दोनों चाहिए। उनके कोपरनिकसी मोड़ में वस्तुएँ हमारे मन के ढाँचे (देश, काल, कारण जैसी श्रेणियाँ) में ढलती हैं। इसलिए हम प्रतीति (phenomena) जानते हैं, चीज़ें अपने-आप में (noumena) नहीं। तर्क ईश्वर, आत्मा या स्वतंत्रता को साबित नहीं कर सकता, पर गणित और विज्ञान संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक (synthetic a priori) ज्ञान देते हैं। नीति में केवल सद्इच्छा (good will) से, कर्तव्य के लिए किया गया काम नैतिक है। निरपेक्ष आदेश कहता है: वही नियम अपनाइए जिसे सब के लिए कानून बना सकें, और इंसान को सदा लक्ष्य मानिए, कभी सिर्फ़ साधन नहीं।
- फ्रेडरिक नीत्शे: पुराने मूल्य तोड़ना, नए मूल्य रचना – फ्रेडरिक नीत्शे (1844–1900) जर्मन विचारक थे जिन्होंने यूरोप के पारंपरिक मूल्यों पर हमला किया। कला में उन्होंने दो शक्तियाँ देखीं: अपोलोनियन (व्यवस्था, रूप) और डायोनिसियन (जंगली ऊर्जा)। "ईश्वर मर चुका है" का अर्थ है कि आधुनिक लोग सच में आस्था से नहीं जीते, इसलिए पुराने मूल्यों का आधार हिल जाता है और शून्यवाद (कुछ मायने नहीं रखता) का ख़तरा आता है। नैतिकता की वंशावली में उन्होंने कहा कि मूल्य इंसानों ने बनाए: स्वामी नैतिकता शक्ति और गर्व को अच्छा कहती थी, दास नैतिकता (जिसे वे ईसाई नैतिकता से जोड़ते थे) द्वेष से विनम्रता को अच्छा कहने लगी। उनका जवाब: शक्ति की इच्छा (बढ़ने की चाह), अतिमानव जो नए मूल्य रचता है, और शाश्वत पुनरावृत्ति। उसी सदी में कॉम्ट का प्रत्यक्षवाद केवल विज्ञान से परखे तथ्यों को मानता था (तीन अवस्थाएँ), जिसे बाद में वियना सर्कल ने आगे बढ़ाया। नीत्शे का परिप्रेक्ष्यवाद ("केवल व्याख्याएँ") फूको और देरिदा जैसे उत्तर-आधुनिक विचारकों की प्रेरणा बना।
- अस्तित्ववाद: आप वही हैं जो आप चुनते हैं – अस्तित्ववाद (Existentialism) 19वीं–20वीं सदी की एक सोच है जो इंसान की ज़िंदगी को देखती है। मुख्य बात: इंसान के लिए अस्तित्व सार से पहले आता है। औज़ार का उद्देश्य पहले तय होता है; इंसान पहले पैदा होता है, फिर अपने चुनावों से खुद को बनाता है। इसलिए हम स्वतंत्र हैं, और इस आज़ादी के साथ चिंता और पूरी ज़िम्मेदारी आती है। यास्पर्स ने बताया कि सीमा-स्थितियाँ (मृत्यु, दुख, संघर्ष, अपराध-बोध) हमें जगाती हैं। भीड़ या किस्मत के पीछे छिपना बुरा विश्वास है; अपने चुनाव अपनाना प्रामाणिकता है। प्रमुख विचारक: कीर्केगार्द, नीत्शे, हाइडेगर, यास्पर्स, सार्त्र, सिमोन द बोउवार, कामू; स्पेनी विचार में उनामुनो और ओर्तेगा इ गासेत।