बड़ा सवाल और उसका समय
ज्ञानमीमांसा दर्शन का वह भाग है जो पूछता है: ज्ञान क्या है और हमें कैसे मिलता है? 1600 के दशक में वैज्ञानिक क्रांति पुरानी बातें बदल रही थी। दूरबीन ने वे चीज़ें दिखाईं जो पुरानी किताबों में नहीं थीं। विचारकों ने पूछा: इतना कुछ गलत निकला, तो भरोसा किस पर करें?
दो बड़े जवाब बने:
- तर्कवाद (बुद्धिवाद): पक्के ज्ञान का मुख्य स्रोत तर्क है। कुछ विचार जन्मजात हैं। गणित इसका आदर्श है।
- अनुभववाद: सारे विचार इंद्रियों के अनुभव से आते हैं। मन में ऐसा कुछ नहीं जो पहले इंद्रियों में न आया हो।
ये दो झुकाव हैं, दो पक्की टीमें नहीं। तर्कवादी भी अनुभव लेते थे और अनुभववादी भी तर्क करते थे। झगड़ा इस पर है कि पहले क्या है और ज़्यादा पक्का क्या है।
देकार्त: संदेह, 'मैं सोचता हूँ' और दो द्रव्य
रेने देकार्त (1596–1650), फ़्रांस के दार्शनिक और गणितज्ञ, ज्यामिति जितना पक्का ज्ञान चाहते थे। उनकी विधि (डिस्कोर्स ऑन मेथड, 1637) के सरल नियम थे: सिर्फ़ वही मानो जो साफ़ और स्पष्ट हो, समस्या को छोटे भागों में तोड़ो, सरल से कठिन की ओर चलो, और जाँचो कि कुछ छूटा नहीं।
विधिपूर्वक संदेह
उन्होंने हर उस बात पर शक करने का फ़ैसला किया जो ज़रा भी गलत हो सकती थी। इसलिए नहीं कि वह गलत थी, बल्कि यह देखने के लिए कि क्या बचता है:
- इंद्रियाँ कभी-कभी धोखा देती हैं (पानी में छड़ी मुड़ी दिखती है)।
- शायद मैं अभी सपना देख रहा हूँ।
- शायद कोई शक्तिशाली दुष्ट दैत्य मुझे गणित में भी धोखा दे रहा है।
'मैं सोचता हूँ'
पर जब मैं शक करता हूँ, तब मैं सोच रहा हूँ। और सोचने के लिए मेरा होना ज़रूरी है। इसलिए: "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ" (लैटिन: कोगिटो, एर्गो सुम)। यह पहली निश्चित बात है।
फिर से बनाना
देकार्त ने तर्क दिया कि उनके मन में एक पूर्ण सत्ता का विचार है, जो अपूर्ण मन से नहीं आ सकता, इसलिए ईश्वर है। पूर्ण ईश्वर धोखा नहीं देगा। इसलिए जो हम साफ़ और स्पष्ट देखते हैं वह सच है, और बाहरी भौतिक दुनिया मौजूद है।
द्वैतवाद
उन्होंने यथार्थ को दो द्रव्यों में बाँटा: मन (सोचता है, जगह नहीं घेरता) और शरीर/पदार्थ (जगह घेरता है, सोचता नहीं)। यह मन–शरीर द्वैतवाद है। इसकी पहेली: अभौतिक मन भौतिक शरीर को कैसे चलाता है?
देकार्त के बाद: स्पिनोज़ा और लाइबनिट्ज़
बारूक स्पिनोज़ा (1632–1677, नीदरलैंड) ने अपनी एथिक्स ज्यामिति की किताब की तरह परिभाषाओं और प्रमाणों से लिखी। उन्होंने कहा कि केवल एक द्रव्य है, जिसे उन्होंने "ईश्वर या प्रकृति" कहा। मन और शरीर उसी एक यथार्थ के दो पहलू हैं, इसलिए द्वैतवाद की पहेली मिट जाती है। स्वतंत्रता यानी यह समझना कि चीज़ें क्यों होती हैं।
गॉटफ्रीड विल्हेम लाइबनिट्ज़ (1646–1716, जर्मनी) ने कैलकुलस भी खोजा। उन्होंने कहा कि दुनिया अनगिनत सरल इकाइयों, चिदणुओं (monads), से बनी है। उन्होंने सत्य को दो भागों में बाँटा: तर्क के सत्य (अनिवार्य, जैसे 2 + 2 = 4) और तथ्य के सत्य (जो अलग भी हो सकते थे, जैसे "आज बारिश हुई")। उनके अनुसार हर तथ्य का कोई पर्याप्त कारण होता है।
तीनों तर्क पर भरोसा करते थे और जन्मजात विचार मानते थे।
ब्रिटिश अनुभववाद: लॉक, बर्कले और ह्यूम
जॉन लॉक (1632–1704)
अपनी किताब मानव बुद्धि पर निबंध (1690) में लॉक ने जन्मजात विचारों का खंडन किया: अगर वे जन्मजात होते तो हर बच्चा उन्हें जानता। जन्म के समय मन कोरी पट्टी (टैबुला रासा) है। विचार संवेदना (पाँच इंद्रियाँ) और चिंतन (अपने सोचने पर ध्यान) से आते हैं। सरल विचार (लाल, मीठा, गोल) मिलकर मिश्र विचार (सेब) बनाते हैं। उन्होंने गुणों को प्राथमिक (आकार, माप, गति: सच में वस्तु में) और द्वितीयक (रंग, स्वाद, गंध: हमारे भीतर बनते हैं) में बाँटा। राजनीति में लॉक ने कहा कि लोगों के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के प्राकृतिक अधिकार हैं और सरकार को जनता की सहमति चाहिए।
जॉर्ज बर्कले (1685–1753)
बर्कले और आगे गए: अगर हम सिर्फ़ विचार जानते हैं, तो आकार भी मन में ही है। वस्तुएँ तभी हैं जब उन्हें देखा (अनुभव किया) जाए: "होना यानी अनुभव किया जाना"। यह प्रत्ययवाद है। जब कोई इंसान नहीं देखता, तब भी चीज़ें रहती हैं क्योंकि ईश्वर हमेशा उन्हें देखता है।
डेविड ह्यूम (1711–1776)
ह्यूम ने मन की सामग्री को प्रभाव (तेज़, सीधे: जो गर्मी आप महसूस करते हैं) और विचार (धुँधली नकल: उस गर्मी की याद) में बाँटा। हर विचार किसी प्रभाव से आना चाहिए। फिर पूछा: कारण का विचार किस प्रभाव से आता है? एक गेंद को दूसरी से टकराते देखिए: आप छूना देखते हैं, फिर गति, बार-बार। कोई छिपी शक्ति नहीं दिखती। यह विश्वास कि पहली ने दूसरी को चलाया, आदत से आता है। इसलिए तर्क से साबित नहीं कर सकते कि कल सूरज उगेगा: यह आगमन (इंडक्शन) की समस्या है। ह्यूम ने स्थायी 'स्व' पर भी शक किया: भीतर देखने पर उन्हें बस बदलते अनुभवों का गट्ठर मिला।
करके देखें: एक पेन दस बार गिराएँ। हर बार आपने असल में क्या देखा, लिखें। क्या आपने कभी 'गुरुत्व' को देखा, या सिर्फ़ एक घटना के बाद दूसरी?
तर्कवाद और अनुभववाद आमने-सामने, और कांट का पुल
| तर्कवाद | अनुभववाद | |
|---|---|---|
| मुख्य स्रोत | तर्क | इंद्रिय अनुभव |
| जन्मजात विचार? | हाँ | नहीं, कोरी पट्टी |
| ज्ञान का आदर्श | गणित, निगमन | अवलोकन, आगमन |
| विचारक | देकार्त, स्पिनोज़ा, लाइबनिट्ज़ | लॉक, बर्कले, ह्यूम |
| कमज़ोरी | हवा में महल बना सकता है | संशयवाद तक पहुँच सकता है |
इमैनुएल कांट (1724–1804) ने कहा कि ह्यूम ने उन्हें जगा दिया। उनका जवाब: सारा ज्ञान अनुभव से शुरू होता है, पर सारा अनुभव से आता नहीं। मन अपने भीतर के ढाँचे (स्थान, काल, कारण) देता है जो हर अनुभव को आकार देते हैं। छोटे में: अनुभव के बिना विचार खाली हैं, और विचार के बिना अनुभव अंधा है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- तर्कवाद: तर्क पहले; जन्मजात विचार (देकार्त, स्पिनोज़ा, लाइबनिट्ज़)
- अनुभववाद: अनुभव पहले; कोरी पट्टी (लॉक, बर्कले, ह्यूम)
- कोगिटो: "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ"
- विधिपूर्वक संदेह: इंद्रियाँ → सपना → दुष्ट दैत्य
- लॉक: सरल विचार → मिश्र विचार; प्राथमिक और द्वितीयक गुण
- बर्कले: होना यानी अनुभव किया जाना
- ह्यूम: प्रभाव → विचार; कारण = बार-बार साथ दिखना + आदत
हल किए गए उदाहरण
1. दुष्ट दैत्य धोखा दे तब भी देकार्त "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ" पर शक क्यों नहीं कर सके?
धोखा खाने के लिए कोई धोखा खाने वाला होना चाहिए। शक करना भी सोचना है, इसलिए शक करते समय शक करने वाला मौजूद है।
2. इन्हें तर्कवादी या अनुभववादी दावे में बाँटें: (क) "बच्चा जन्म से जानता है कि कोई चीज़ एक साथ हो और न हो, ऐसा नहीं हो सकता।" (ख) "जन्म से नेत्रहीन व्यक्ति को लाल रंग का विचार नहीं हो सकता।"
(क) तर्कवादी: जन्मजात तार्किक विचार। (ख) अनुभववादी: लाल का कोई प्रभाव नहीं मिला, इसलिए लाल का विचार नहीं (लॉक और ह्यूम ने ऐसे उदाहरण दिए)।
3. ह्यूम से समझाइए कि रोज़ सुबह दाना पाने वाली मुर्गी कल के बारे में गलत क्यों हो सकती है।
मुर्गी ने कई बार सूरज उगने के बाद दाना देखा है और आदत से उम्मीद करती है। पर बीते दिनों का दोहराव भविष्य को साबित नहीं करता; किसी दिन किसान किसी और कारण से आता है। आगमन उम्मीद देता है, निश्चितता नहीं।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि तर्कवादी अनुभव को नहीं मानते थे। वे अनुभव लेते थे, पर सबसे पक्के सत्य तर्क से मानते थे।
- कोगिटो का अर्थ "मैं सोचता हूँ, इसलिए मुझे होना चाहिए" लेना। यह निश्चितता का दावा है: जब तक मैं सोचता हूँ, मैं हूँ।
- बर्कले और ह्यूम को मिला देना: बर्कले कहते हैं चीज़ें विचार हैं जिन्हें ईश्वर बनाए रखता है; ह्यूम कारण, स्व और बाहरी दुनिया के प्रमाण पर शक करते हैं।
- यह मानना कि ह्यूम ने कहा कारण होते ही नहीं। उन्होंने कहा तर्क अनिवार्य संबंध साबित नहीं कर सकता; विश्वास आदत से आता है।