Poland Liceum ogólnokształcące, klasa III Philosophy (extended level)
अध्याय: 2
1. History of philosophy: modern era
Descartes and his followers · Pascal · British empiricism · Kant · Hegel and Mill
- तर्कवाद और अनुभववाद: ज्ञान तर्क से या अनुभव से? – 1600 और 1700 के दशक में यूरोप के विचारकों में बहस हुई कि ज्ञान का स्रोत क्या है। तर्कवादी (देकार्त, स्पिनोज़ा, लाइबनिट्ज़) कहते थे कि सबसे पक्का ज्ञान तर्क (बुद्धि) से आता है और कुछ विचार जन्मजात हैं। देकार्त ने हर चीज़ पर शक किया और एक निश्चित बात पर पहुँचे: "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ"। अनुभववादी (लॉक, बर्कले, ह्यूम) कहते थे कि सारे विचार अनुभव से आते हैं; जन्म के समय मन कोरी पट्टी है। ह्यूम ने दिखाया कि हम कारण को कभी देखते नहीं, सिर्फ़ एक घटना के बाद दूसरी देखते हैं; कारण पर हमारा विश्वास आदत से आता है। बाद में कांट ने दोनों को जोड़ा।
- इमैनुएल कांट: हम क्या जान सकते हैं और हमें क्या करना चाहिए – इमैनुएल कांट (1724–1804) जर्मन दार्शनिक थे। उनके दो बड़े सवाल थे: मैं क्या जान सकता हूँ? मुझे क्या करना चाहिए? ज्ञान के बारे में उन्होंने बुद्धिवाद और अनुभववाद को जोड़ा: ज्ञान के लिए प्रत्यय (concepts) और इंद्रिय-अनुभव दोनों चाहिए। उनके कोपरनिकसी मोड़ में वस्तुएँ हमारे मन के ढाँचे (देश, काल, कारण जैसी श्रेणियाँ) में ढलती हैं। इसलिए हम प्रतीति (phenomena) जानते हैं, चीज़ें अपने-आप में (noumena) नहीं। तर्क ईश्वर, आत्मा या स्वतंत्रता को साबित नहीं कर सकता, पर गणित और विज्ञान संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक (synthetic a priori) ज्ञान देते हैं। नीति में केवल सद्इच्छा (good will) से, कर्तव्य के लिए किया गया काम नैतिक है। निरपेक्ष आदेश कहता है: वही नियम अपनाइए जिसे सब के लिए कानून बना सकें, और इंसान को सदा लक्ष्य मानिए, कभी सिर्फ़ साधन नहीं।
2. History of philosophy: 19th–20th century
Nietzsche and positivism · Phenomenology · Existentialism and other currents · Analytic philosophy
- फ्रेडरिक नीत्शे: पुराने मूल्य तोड़ना, नए मूल्य रचना – फ्रेडरिक नीत्शे (1844–1900) जर्मन विचारक थे जिन्होंने यूरोप के पारंपरिक मूल्यों पर हमला किया। कला में उन्होंने दो शक्तियाँ देखीं: अपोलोनियन (व्यवस्था, रूप) और डायोनिसियन (जंगली ऊर्जा)। "ईश्वर मर चुका है" का अर्थ है कि आधुनिक लोग सच में आस्था से नहीं जीते, इसलिए पुराने मूल्यों का आधार हिल जाता है और शून्यवाद (कुछ मायने नहीं रखता) का ख़तरा आता है। नैतिकता की वंशावली में उन्होंने कहा कि मूल्य इंसानों ने बनाए: स्वामी नैतिकता शक्ति और गर्व को अच्छा कहती थी, दास नैतिकता (जिसे वे ईसाई नैतिकता से जोड़ते थे) द्वेष से विनम्रता को अच्छा कहने लगी। उनका जवाब: शक्ति की इच्छा (बढ़ने की चाह), अतिमानव जो नए मूल्य रचता है, और शाश्वत पुनरावृत्ति। उसी सदी में कॉम्ट का प्रत्यक्षवाद केवल विज्ञान से परखे तथ्यों को मानता था (तीन अवस्थाएँ), जिसे बाद में वियना सर्कल ने आगे बढ़ाया। नीत्शे का परिप्रेक्ष्यवाद ("केवल व्याख्याएँ") फूको और देरिदा जैसे उत्तर-आधुनिक विचारकों की प्रेरणा बना।
- अस्तित्ववाद: आप वही हैं जो आप चुनते हैं – अस्तित्ववाद (Existentialism) 19वीं–20वीं सदी की एक सोच है जो इंसान की ज़िंदगी को देखती है। मुख्य बात: इंसान के लिए अस्तित्व सार से पहले आता है। औज़ार का उद्देश्य पहले तय होता है; इंसान पहले पैदा होता है, फिर अपने चुनावों से खुद को बनाता है। इसलिए हम स्वतंत्र हैं, और इस आज़ादी के साथ चिंता और पूरी ज़िम्मेदारी आती है। यास्पर्स ने बताया कि सीमा-स्थितियाँ (मृत्यु, दुख, संघर्ष, अपराध-बोध) हमें जगाती हैं। भीड़ या किस्मत के पीछे छिपना बुरा विश्वास है; अपने चुनाव अपनाना प्रामाणिकता है। प्रमुख विचारक: कीर्केगार्द, नीत्शे, हाइडेगर, यास्पर्स, सार्त्र, सिमोन द बोउवार, कामू; स्पेनी विचार में उनामुनो और ओर्तेगा इ गासेत।