कांट कौन थे और उन्होंने क्या पूछा?
इमैनुएल कांट 1724 से 1804 तक कोनिग्सबर्ग (प्रशा) में रहे। वे प्रबोधन (Enlightenment) के सबसे बड़े विचारकों में हैं। उनका नारा था: "अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करने का साहस करो।" उन्होंने तीन "आलोचनाएँ" (Critiques) लिखीं। यहाँ आलोचना का अर्थ है ध्यान से जाँचना कि मन की कोई शक्ति क्या कर सकती है और क्या नहीं।
- शुद्ध तर्क की आलोचना (1781): मैं क्या जान सकता हूँ?
- व्यावहारिक तर्क की आलोचना (1788): मुझे क्या करना चाहिए?
- निर्णय-शक्ति की आलोचना (1790): सौंदर्य और प्रयोजन।
नीति के लिए उनकी छोटी किताब नैतिकता की तत्वमीमांसा की आधारशिला (Groundwork, 1785) सबसे ज़्यादा पढ़ी जाती है।
कोपरनिकसी मोड़ और ज्ञान का सिद्धांत
कांट से पहले दो खेमे थे। बुद्धिवादी (देकार्त, लाइबनिज़) कहते थे कि सच्चा ज्ञान केवल तर्क से आता है। अनुभववादी (लॉक, ह्यूम) कहते थे कि सारा ज्ञान इंद्रियों से आता है। ह्यूम ने तो कारण-कार्य पर भी शक किया।
कांट का जवाब: अनुभव के बिना विचार खाली हैं, प्रत्यय के बिना अनुभव अंधे हैं। दोनों साथ चाहिए।
कोपरनिकस ने सूर्य को केंद्र में रखा। कांट ने भी ऐसा ही मोड़ दिया: मन वस्तुओं के हिसाब से नहीं ढलता, वस्तुएँ मन के ढाँचे में ढलती हैं। मन के पास अंतर्ज्ञान के रूप (देश और काल) और श्रेणियाँ (कारण-कार्य, एकता, द्रव्य) हैं। इसीलिए हर अनुभव देश-काल में होता है और कारण-कार्य मानता है।
निर्णयों के प्रकार
- विश्लेषणात्मक: अर्थ से ही सच ("हर त्रिभुज की तीन भुजाएँ होती हैं")।
- संश्लेषणात्मक: नई जानकारी जोड़ता है ("यह कमरा ठंडा है")।
- प्रागनुभविक (a priori): अनुभव से पहले जाना; आनुभविक (a posteriori): अनुभव से जाना।
कांट की खोज: गणित और भौतिकी के मूल नियम संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक हैं, जैसे 7 + 5 = 12 या "हर घटना का कारण होता है"। ये नए भी हैं और पक्के भी, क्योंकि मन के अपने ढाँचे से आते हैं।
तर्क की सीमाएँ: प्रतीति, noumena और तत्वमीमांसा
प्रतीति (phenomena) यानी चीज़ें जैसी हमें देश, काल और श्रेणियों से दिखती हैं। Noumena यानी चीज़ें अपने-आप में, मन से अलग। इनके बारे में सोच सकते हैं, पर जान नहीं सकते।
पुरानी तत्वमीमांसा (metaphysics) आत्मा की अमरता, जगत की शुरुआत और ईश्वर का होना साबित करना चाहती थी। कांट ने दिखाया कि अनुभव से आगे जाकर तर्क विरोधाभासों (antinomies) में फँसता है: दो उल्टे दावे, दोनों साबित होते लगते हैं ("जगत की शुरुआत हुई" और "नहीं हुई")।
इसलिए तत्वमीमांसा विज्ञान जैसा ज्ञान नहीं बन सकती। पर ईश्वर, स्वतंत्रता और अमर आत्मा व्यावहारिक तर्क की मान्यताएँ (postulates) हैं: नैतिक जीवन के लिए इन्हें मानना पड़ता है। कांट ने कहा, आस्था के लिए जगह बनाने हेतु मुझे ज्ञान को सीमित करना पड़ा।
कर्तव्यवादी नीति: सद्इच्छा और कर्तव्य
कर्तव्यवाद (deontology) कामों को नतीजों से नहीं, कर्तव्य और नियम से परखता है। कांट के लिए बिना शर्त अच्छी चीज़ केवल सद्इच्छा (good will) है।
- कर्तव्य के विरुद्ध: ग्राहक को ठगना।
- कर्तव्य के अनुसार पर स्वार्थ से: ग्राहक बचाने के लिए ईमानदारी।
- कर्तव्य से: क्योंकि सही है। केवल इसी का नैतिक मूल्य है।
सापेक्ष आदेश (hypothetical: "नंबर चाहिए तो पढ़ो") और निरपेक्ष आदेश (categorical: बिना किसी "अगर" के, सब पर लागू) अलग हैं। नैतिकता अपनी बुद्धि से आनी चाहिए: इसे स्वायत्तता (autonomy) कहते हैं। बाहरी दबाव या इच्छा से चलना परायत्तता (heteronomy) है।
निरपेक्ष आदेश के दो मुख्य सूत्र
आधारशिला के दूसरे अध्याय में कांट कई सूत्र देते हैं। दो मुख्य हैं:
- सार्वभौम नियम: केवल उसी निजी नियम (maxim) पर चलो जिसे तुम साथ-साथ सब के लिए कानून बनाना चाह सको।
- मानवता: अपने और दूसरों में मानवता को सदा लक्ष्य मानो, कभी केवल साधन नहीं।
हल किया उदाहरण, झूठा वादा: नियम: "पैसे चाहिए तो लौटाने का वादा करूँगा, जबकि लौटाऊँगा नहीं।" सब यही करें तो कोई वादे पर भरोसा नहीं करेगा, चाल चलेगी ही नहीं। नियम खुद को नष्ट कर देता है। साथ ही, उधार देने वाला सिर्फ़ साधन बना। इसलिए मना है।
तीसरा सूत्र, लक्ष्यों का राज्य, कहता है: ऐसे समाज के कानून बनाने वाले सदस्य की तरह चलो जहाँ हर कोई लक्ष्य है।
आलोचना
आलोचक कहते हैं कि कर्तव्य टकरा सकते हैं (सच बनाम जान बचाना), नियम बहुत कठोर हैं, और नतीजे भी मायने रखते हैं। उपयोगितावादी नतीजों से परखते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- ज्ञान = इंद्रिय-अनुभव + मन के प्रत्यय
- अंतर्ज्ञान के रूप: देश, काल; श्रेणियाँ: कारण, एकता, द्रव्य…
- प्रतीति = जैसी दिखती हैं (ज्ञेय); noumena = अपने-आप में (अज्ञेय)
- संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक: नया और पक्का (7 + 5 = 12)
- निरपेक्ष आदेश 1: वही नियम अपनाओ जो सार्वभौम कानून बन सके
- निरपेक्ष आदेश 2: मानवता को सदा लक्ष्य मानो, कभी केवल साधन नहीं
- सापेक्ष आदेश = "अगर X चाहिए तो Y करो"; निरपेक्ष = बिना अगर के "Y करो"
हल किए गए उदाहरण
1. नियम जाँचिए: "जल्दी हो तो मैं लाइन तोड़ दूँगा।"
सब पर लागू कीजिए: अगर जल्दी में हर कोई लाइन तोड़े (और जल्दी तो सबको होती है), तो लाइन ही नहीं बचेगी। नियम सार्वभौम नहीं बन सकता, परीक्षा 1 में फ़ेल। लाइन में खड़े लोग सिर्फ़ रुकावट माने गए, परीक्षा 2 में भी फ़ेल।
2. वर्गीकरण कीजिए: (क) "हर अविवाहित पुरुष अविवाहित है" (ख) "मुंबई में बारिश हो रही है" (ग) "हर परिवर्तन का कारण होता है"।
(क) विश्लेषणात्मक प्रागनुभविक: अर्थ से सच। (ख) संश्लेषणात्मक आनुभविक: अनुभव से नई जानकारी। (ग) संश्लेषणात्मक प्रागनुभविक: नई जानकारी पर पक्की, क्योंकि कारण मन की श्रेणी है।
3. एक डॉक्टर ग़रीब मरीज़ की मदद सिर्फ़ इसलिए करती है क्योंकि कैमरा चल रहा है। कांट के अनुसार नैतिक मूल्य?
काम कर्तव्य के अनुसार है, पर कर्तव्य से नहीं; मकसद नाम कमाना है। इसलिए नैतिक मूल्य नहीं, हालाँकि काम ग़लत भी नहीं। अगर वह बिना कैमरे के भी, सही मानकर मदद करे, तो नैतिक मूल्य होगा।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि कांट नतीजों से परखते थे; वे नियम (maxim) और मकसद (कर्तव्य) से परखते थे।
- "लोगों को साधन मत बनाओ" कहना; कांट कहते हैं केवल साधन मत बनाओ। दुकानदार से सम्मान से ब्रेड खरीदना ठीक है।
- यह मानना कि noumena होते ही नहीं; कांट कहते हैं सोच सकते हैं, जान नहीं सकते।
- सापेक्ष ("अगर…") और निरपेक्ष (बिना शर्त) आदेश को मिला देना।