सोचने के तरीक़े क्यों चाहिए
रोज़ हम चुनते हैं: बाँटें या नहीं, सच बोलें या नहीं, मदद करें या अनदेखा करें। कुछ चुनाव आसान हैं। कुछ कठिन हैं क्योंकि दो अच्छी बातें आपस में खिंचती हैं।
विचारकों ने साफ़ सोचने के तरीक़े दिए हैं ताकि हम सिर्फ़ भावना नहीं, कारण भी दे सकें। दो जाने-माने तरीक़े हैं: परिणाम और कर्तव्य।
परिणाम-आधारित सोच
यह नज़रिया कहता है: जो काम अच्छा नतीजा लाए वही सही है। हम देखते हैं कि किस पर असर पड़ेगा और कितना, फिर वह विकल्प चुनते हैं जिसमें भला सबसे ज़्यादा और नुकसान सबसे कम हो।
इसका प्रसिद्ध रूप उपयोगितावाद (utilitarianism) है (जेरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल): वह काम चुनो जो अधिकतम लोगों का अधिकतम भला करे।
- ताक़त: यह व्यावहारिक है और सबके बारे में सोचती है।
- कमज़ोरी: यह कुछ लोगों के अधिकारों को अनदेखा कर सकती है और नतीजे हमेशा पहले से पता नहीं होते।
कर्तव्य-आधारित सोच
यह नज़रिया कहता है: कुछ काम अपने-आप में सही या ग़लत हैं, इरादे (हम क्यों करते हैं) और कर्तव्य (हम कौन-सा नियम मानते हैं) की वजह से। वादा निभाओ। सच बोलो। इंसान को इंसान समझो, औज़ार नहीं।
विचारक इमैनुएल कांट ने एक कसौटी दी: क्या हर कोई हमेशा यह नियम मान सकता है? अगर नहीं, तो वह काम ग़लत है। और किसी इंसान को सिर्फ़ अपने लक्ष्य का साधन मत बनाओ।
- ताक़त: यह हर इंसान की रक्षा करती है और पक्के नियम देती है।
- कमज़ोरी: नियम आपस में टकरा सकते हैं और नियम पर अड़े रहने से कभी बुरा नतीजा भी हो सकता है।
दोनों साथ और करके देखिए
असली जीवन में हम दोनों का उपयोग करते हैं। पूछिए: क्या होगा? किसे चोट लगेगी? कौन-सा कर्तव्य या वादा जुड़ा है? क्या मैं यह नियम सबके लिए मानूँगा? जब जवाब मिल जाएँ तो चुनाव साफ़ होता है। जब टकराएँ तो रुकिए, दूसरों से बात कीजिए और कारण बताइए।
करके देखिए: एक असली चुनाव लीजिए (जैसे, नक़ल की बात शिक्षक को बताएँ?)। नतीजे के चश्मे से एक पंक्ति और कर्तव्य के चश्मे से एक पंक्ति लिखिए। फिर फ़ैसला कीजिए और कारण कहिए। 3D में स्लाइडर चलाकर तराज़ू और नियम-पट्टी देखिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- परिणाम-आधारित: सही काम = प्रभावित लोगों के लिए सबसे अच्छा कुल नतीजा
- उपयोगितावाद: अधिकतम लोगों का अधिकतम भला
- कर्तव्य-आधारित: सही काम = सही नियम या इरादा, नतीजा कुछ भी हो
- कांट की कसौटी: "क्या हर कोई हमेशा यह नियम मान सकता है?"
- अच्छा फ़ैसला = नतीजे और कर्तव्य दोनों देखो, फिर कारण बताओ
हल किए गए उदाहरण
1. कक्षा का कोष 25 बच्चों को पसंद यात्रा पर लगे या 5 की पसंद के उपहार पर। नतीजे की सोच क्या चुनेगी?
यात्रा, क्योंकि उससे ज़्यादा लोगों का भला होता है। शर्त यह कि किसी के साथ अन्याय न हो।
2. आपने दोस्त से मिलने का वादा किया, पर तभी मज़ेदार पार्टी शुरू हो गई। कर्तव्य की सोच क्या कहेगी?
वादा निभाओ। वादा एक कर्तव्य है और पार्टी में ज़्यादा मज़ा हो तब भी वह सही रहता है।
3. दबंग से झूठ बोलकर दोस्त को छुपाना। दोनों नज़रियों की तुलना कीजिए।
नतीजे की नज़र: झूठ दोस्त को बचाता है, इसलिए ठीक हो सकता है। कर्तव्य की नज़र: झूठ बोलना अपने-आप में ग़लत है। दोनों टकराते हैं, इसलिए सोच-समझकर सच पर सुरक्षित जवाब खोजना चाहिए।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि परिणाम-सोच का मतलब है "अंत भला तो सब साधन ठीक"। न्यायपूर्ण सोच लोगों के अधिकार भी बचाती है।
- यह मानना कि कर्तव्य-सोच नतीजों की परवाह नहीं करती। वह लोगों की परवाह करती है, पर नियम पहले आता है।
- यह मानना कि सिर्फ़ एक चश्मा सही है। अच्छे फ़ैसले दोनों से बनते हैं।
- सिर्फ़ भावना से फ़ैसला करना, कारण दिए बिना।