सुकरात का जीवन और उनका नैतिक रुख़
सुकरात लगभग 470 से 399 ई.पू. तक एथेंस में रहे। पिता पत्थर तराशते थे और माँ दाई थीं। वे पैदल सैनिक के रूप में लड़े और शांत, बहादुर माने जाते थे। वे अपनी मर्ज़ी से ग़रीब रहे और आराम की परवाह कम करते थे।
उन्होंने कुछ नहीं लिखा। हम उन्हें उनके शिष्य प्लेटो के संवादों, ज़ेनोफ़न और अरिस्टोफ़ेनीज़ के एक हास्य नाटक से जानते हैं। ये चित्र अलग-अलग हैं, इसलिए विद्वान "सुकराती समस्या" की बात करते हैं: असली सुकरात ने ठीक-ठीक क्या कहा, यह जानना कठिन है।
सोफ़िस्ट और सुकरात
सोफ़िस्ट (जैसे प्रोटागोरस, गोर्गियास) घूमते-फिरते शिक्षक थे। वे वाक्-कला (लोगों को मनाने की कला) सिखाते और फ़ीस लेते थे। कई कहते थे कि सच और सही व्यक्ति या नगर पर निर्भर है (सापेक्षवाद)। बाहर से सुकरात भी वैसे ही लगते थे, क्योंकि वे भी खुले में बहस करते थे। पर वे पैसे नहीं लेते थे, और उन्हें जीत नहीं, सच चाहिए था। उनका मानना था कि "न्याय क्या है?" का असली उत्तर है, चाहे हमें अभी न मिला हो।
उनका नैतिक रुख़: कभी ग़लत मत करो, चाहे तुम्हारे साथ ग़लत हो; अन्याय करने से अन्याय सहना बेहतर है।
"स्वयं को जानो" और सुकराती पद्धति
डेल्फ़ी में अपोलो के मंदिर पर लिखा था "स्वयं को जानो"। सुकरात के एक मित्र ने देववाणी से पूछा कि क्या कोई उनसे ज़्यादा ज्ञानी है; उत्तर था नहीं। सुकरात ने नेताओं, कवियों और कारीगरों से बात करके इसे जाँचा। हर कोई मानता था कि वह ज़रूरी बातें जानता है, पर समझा नहीं पाता था। सुकरात ने निष्कर्ष निकाला: "मैं जानता हूँ कि मैं नहीं जानता", और यही छोटा पर सच्चा ज्ञान है।
इसलिए आत्म-चिंतन पहले आता है: दूसरों को परखने से पहले अपनी मान्यताएँ जाँचो। प्लेटो की अपोलॉजी में वे कहते हैं कि बिना जाँचा-परखा जीवन इंसान के जीने लायक नहीं।
पद्धति कैसे काम करती है (एलेंकस)
- पूछो: "X क्या है?" (साहस, न्याय, धर्मपरायणता)।
- सामने वाला एक परिभाषा देता है।
- सुकरात एक उल्टा उदाहरण ढूँढते हैं या दिखाते हैं कि परिभाषा उसकी दूसरी मान्यताओं से टकराती है।
- व्यक्ति उलझन (अपोरिया) मानता है और बेहतर परिभाषा देता है।
वे व्यंग्य (ऐसे दिखाना कि वे कुछ नहीं जानते) का भी प्रयोग करते थे, और अपने काम को मायूटिक्स, यानी "दाई का काम" कहते थे: दूसरों के भीतर पहले से मौजूद विचारों को जन्म देने में मदद।
साइकी, आरेटे और डाइमोनियन
साइकी का अर्थ है आत्मा। सुकरात के लिए यह असली "मैं" है, जो सोचता और चुनता है। शरीर, धन और नाम कम ज़रूरी हैं। एथेंस के लोगों को उनकी मुख्य सलाह थी: अपनी आत्मा की देखभाल करो और उसे जितना हो सके अच्छा बनाओ।
आरेटे का अर्थ है श्रेष्ठता या सद्गुण। चाकू का आरेटे है अच्छा काटना; इंसान का आरेटे है अच्छा जीना: बुद्धिमान, न्यायी, साहसी और संयमी होना। सुकरात मानते थे कि ये सब सद्गुण असल में एक ही हैं, क्योंकि हर एक के लिए अच्छाई का ज्ञान चाहिए।
डाइमोनियन एक "दैवी संकेत" था, भीतर की आवाज़ जो सुकरात बचपन से सुनते थे। यह कभी नहीं बताती थी कि क्या करो; केवल ग़लत क़दम से पहले रुकने की चेतावनी देती थी। यह आज की "अंतरात्मा" के क़रीब है।
नैतिक बौद्धिकतावाद: सद्गुण ही ज्ञान है
नैतिक बौद्धिकतावाद का मतलब है सद्गुण ही ज्ञान है। तीन जुड़े विचार:
- अगर तुम सच में जानते हो कि अच्छा क्या है, तो तुम वही करोगे।
- कोई जानबूझकर ग़लत नहीं करता; ग़लती अज्ञान से होती है, बुरी चीज़ को अच्छी समझ लेने से।
- सद्गुण से सच्चा सुख (यूडेमोनिया) मिलता है, इसलिए सद्गुणी व्यक्ति ही सुखी है।
इसलिए एक तरह से सद्गुण सिखाया जा सकता है, लोगों को समझाकर। बाद में अरस्तू ने इसकी आलोचना की: लोग कभी-कभी सही जानते हुए भी कमज़ोर इच्छाशक्ति (अक्रेसिया) से ग़लत करते हैं। यह बहस आज भी चल रही है।
दर्शन और नागरिकता: मुक़दमा, और अस्पेशिया
सुकरात ख़ुद को डंक मारने वाली मक्खी कहते थे, जो आलसी घोड़े (एथेंस) को डंक मारकर जगाए रखती है। 399 ई.पू. में उन पर आरोप लगा कि वे नगर के देवताओं का सम्मान नहीं करते और युवाओं को बिगाड़ते हैं। लगभग 500 नागरिकों की जूरी ने उन्हें दोषी पाया। उन्होंने न माफ़ी माँगी, न दर्शन छोड़ा, और उन्हें हेमलॉक विष पीने की सज़ा मिली।
प्लेटो के क्रिटो में मित्र उन्हें भगाने की पेशकश करते हैं। वे मना कर देते हैं: उन्होंने पूरी ज़िंदगी एथेंस के क़ानून माने हैं, अब नहीं तोड़ेंगे। यह उनके नागरिक के विचार को दिखाता है: खुलकर सवाल करो, पर अपने वचन निभाओ और बदले में कभी ग़लत मत करो।
अस्पेशिया और यूनानी चिंतन में स्त्रियाँ
एथेंस में स्त्रियों के सार्वजनिक अधिकार बहुत कम थे। फिर भी नेता पेरिक्लीज़ की साथी मिलेटस की अस्पेशिया अपनी बुद्धि के लिए प्रसिद्ध थीं। प्लेटो के संवादों में सुकरात कहते हैं कि उन्होंने भाषण-कला उनसे सीखी, और प्रेम के बारे में ज्ञान का श्रेय एक बुद्धिमान स्त्री डायोटिमा को देते हैं। ये आवाज़ें याद दिलाती हैं कि स्त्रियाँ यूनानी चिंतन का हिस्सा थीं, चाहे इतिहास ने उन्हें कम दर्ज किया।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- एलेंकस: दावा → उल्टा उदाहरण → उलझन (अपोरिया) → बेहतर दावा
- "मैं जानता हूँ कि मैं नहीं जानता" = विवेकपूर्ण अज्ञान
- सद्गुण = ज्ञान; ग़लत काम = अज्ञान
- साइकी = आत्मा; आरेटे = सद्गुण/श्रेष्ठता; डाइमोनियन = भीतरी चेतावनी
- मायूटिक्स = विचार बाहर लाने की 'दाई' पद्धति
- यूडेमोनिया = सच्चा सुख, फलता-फूलता जीवन
हल किए गए उदाहरण
1. इस दावे पर सुकराती पद्धति लगाइए: 'दोस्त वह है जो मेरी हर बात से सहमत हो।'
उल्टा उदाहरण: सच्चा दोस्त आपको ग़लती से रोकने के लिए असहमत हो सकता है, और चापलूस आपका फ़ायदा उठाने के लिए हाँ में हाँ मिला सकता है। तो दावा ग़लत है। बेहतर दावा: 'दोस्त वह है जो मेरा भला चाहता है।' फिर इसे भी जाँचिए।
2. सुकरात ने देववाणी के उत्तर को सही क्यों माना?
दूसरे मानते थे कि वे ज़रूरी बातें जानते हैं पर समझा नहीं पाते थे। सुकरात जानते थे कि वे नहीं जानते। अपने अज्ञान की यह ईमानदार समझ ही उनका ज्ञान था।
3. एक छात्र जानते हुए कि नकल ग़लत है, होमवर्क नकल करता है। सुकरात इसे कैसे समझाएँगे?
वे कहेंगे कि छात्र सच में नहीं जानता कि अच्छा क्या है: वह ग़लती से मानता है कि नकल उसके लिए बेहतर है। अगर वह अपनी आत्मा को होने वाले नुकसान को सच में समझे, तो ऐसा नहीं करेगा।
4. सुकरात प्रोटागोरस जैसे सोफ़िस्ट से कैसे अलग थे?
सोफ़िस्ट फ़ीस लेते, मनाने की कला सिखाते और कहते थे कि सच व्यक्ति पर निर्भर है। सुकरात फ़ीस नहीं लेते, स्वयं सच चाहते थे और मानते थे कि न्याय और सद्गुण के असली उत्तर हैं।
5. सुकरात जेल से क्यों नहीं भागे?
उन्होंने पूरे जीवन एथेंस के क़ानून स्वीकार किए थे। भागना ग़लत का बदला ग़लत से देना होता, जो उनके अनुसार हमेशा आत्मा को नुकसान पहुँचाता है।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि सुकरात ने किताबें लिखीं। उन्होंने कुछ नहीं लिखा; हम उन्हें प्लेटो, ज़ेनोफ़न और अरिस्टोफ़ेनीज़ से जानते हैं।
- सुकरात को सोफ़िस्ट कहना। वे भी खुले में बहस करते थे, पर पैसे नहीं लेते थे और जीत नहीं, सच खोजते थे।
- यह सोचना कि 'मैं जानता हूँ कि मैं नहीं जानता' का अर्थ है वे कुछ भी नहीं जानते थे। इसका अर्थ है वे अपने ज्ञान की सीमा के प्रति ईमानदार थे।
- डाइमोनियन को आदेश देने वाला देवता समझना। वह केवल रुकने की चेतावनी देता था, कभी नहीं बताता था कि क्या करो।