तेल संकट: दाम इतना क्यों बढ़ा
1945 के बाद दुनिया सस्ते तेल पर चलती थी। कार, जहाज़, बिजलीघर और कारख़ाने सब तेल इस्तेमाल करते थे। ज़्यादातर तेल पश्चिम एशिया के कुछ देशों से आता था।
अक्तूबर 1973 में पश्चिम एशिया में युद्ध हुआ। कुछ तेल-उत्पादक देशों ने सप्लाई घटा दी और कुछ देशों को तेल बेचना बंद कर दिया। कुछ ही महीनों में तेल का दाम लगभग 4 गुना हो गया। यह पहला तेल संकट (oil crisis) था। 1979 में ईरान में सरकार बदली, सप्लाई फिर घटी और दाम फिर बढ़े: दूसरा तेल संकट।
असर: पेट्रोल की लाइनें, हर चीज़ महँगी, कारख़ाने धीमे, और कई अमीर देशों में स्टैगफ़्लेशन (दाम बढ़ते हैं पर नौकरियाँ नहीं)। युद्ध के बाद की लंबी तेज़ तरक़्क़ी का दौर ख़त्म हो गया।
जापान ने तेल के झटके का जवाब कैसे दिया
जापान के पास अपना तेल लगभग नहीं है, इसलिए उसे बड़ी चोट लगी। उसके जवाब के तीन हिस्से थे:
- ऊर्जा बचाओ: कारख़ाने और कारें कम ईंधन वाली बनाई गईं। छोटी, कम ईंधन खाने वाली कारें पूरी दुनिया में पसंद की गईं।
- उद्योग बदलो: भारी, ज़्यादा ऊर्जा खाने वाले उद्योग (इस्पात, जहाज़) से साफ़ और ऊँचे हुनर वाले उद्योग (इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनें, रोबोट) की ओर।
- बाहर ज़्यादा बेचो: निर्यात से अर्थव्यवस्था बढ़ती रही।
तरक़्क़ी 1960 के दशक से धीमी हुई, पर जापान कई देशों से जल्दी सँभला। बाद में 1980 के दशक में पैसों का एक उफान (बबल) आया और 1990 के शुरू में फूट गया। इसके बाद कई साल धीमी बढ़त रही।
एशिया का विकास: चार "टाइगर" और दूसरे
1960 के दशक से दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांगकांग और सिंगापुर बहुत तेज़ी से बढ़े। इन्हें चार एशियाई टाइगर कहते हैं। इनका नुस्ख़ा मिलता-जुलता था:
- बहुत लोगों को पढ़ाओ और हुनर सिखाओ।
- दूसरे देशों के लिए सामान बनाने वाले कारख़ाने लगाओ (निर्यात आधारित विकास)।
- खूब बचत और निवेश करो; सरकार और कंपनियाँ मिलकर योजना बनाएँ।
बाद में मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया और 1978 के बाद चीन ने अपने सुधारों से यही राह पकड़ी। जापान ने पैसे, कारख़ाने और तकनीक से मदद की। 1997 में एशिया का वित्तीय संकट आया और कई अर्थव्यवस्थाएँ हिलीं, पर ज़्यादातर सँभल गईं। दुनिया के उत्पादन का केंद्र एशिया की ओर खिसक गया।
शीत युद्ध का अंत
शीत युद्ध दो गुटों की लंबी होड़ थी: एक का नेता अमेरिका, दूसरे का सोवियत संघ (USSR)। यह ख़त्म क्यों हुआ?
- सोवियत अर्थव्यवस्था धीमी थी और हथियारों का ख़र्च बहुत था।
- पूर्वी यूरोप के लोग आज़ादी और बेहतर जीवन चाहते थे।
- 1985 से नए सोवियत नेता गोर्बाचेव ने खुलेपन और सुधारों की छूट दी और गुट को ताक़त से रोकने की कोशिश नहीं की।
मुख्य तारीख़ें: 1989 बर्लिन की दीवार खुली और पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारें गिरीं। 1990 जर्मनी फिर एक देश बना। 1991 USSR टूटकर 15 देश बन गया। दुनिया अब दो गुटों में बँटी नहीं रही।
लोकतंत्रीकरण और जापान के लिए इसका मतलब
लोकतंत्रीकरण (democratisation) यानी कोई देश चुनी हुई सरकार, बोलने की आज़ादी और क़ानून के राज की ओर बढ़ता है। यह कई लहरों में फैला: 1980 के दशक में लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्से, 1980-90 के दशक के अंत में दक्षिण कोरिया और ताइवान, और 1989 के बाद पूर्वी यूरोप। हर जगह यह आसान नहीं रहा; कुछ जगहों पर फिर ताक़तवर शासक आ गए।
जापान के लिए शीत युद्ध के अंत का मतलब नई ज़िम्मेदारियाँ था। 1991 के खाड़ी युद्ध में लोगों ने पूछा कि दुनिया की शांति के लिए जापान को क्या करना चाहिए। 1992 में एक क़ानून बना, जिससे जापान संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में (बिना लड़े) लोग भेज सकता था। बाज़ार और खुले और एशिया से व्यापार बढ़ा।
आज़माओ: तेल का दाम और ऊर्जा की बचत
3D में आख़िरी चरण पर जाओ। तेल का स्लाइडर 1 से 4 तक ले जाओ और कार की लागत बढ़ती देखो। अब "ऊर्जा प्रति कार" का स्लाइडर घटाओ। क्या लागत फिर पहले जितनी हो सकती है? जापान ने यही किया था। घर पर: अपने घर का पेट्रोल या गैस का बिल देखो और ईंधन बचाने का एक तरीक़ा लिखो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य तारीख़ें: 1973 पहला तेल संकट · 1979 दूसरा तेल संकट · 1989 बर्लिन की दीवार खुली · 1991 USSR का अंत
- 1973-74 में तेल का दाम: लगभग 4 गुना
- चार एशियाई टाइगर: दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांगकांग, सिंगापुर
- निर्यात आधारित विकास: दूसरों के लिए सामान बनाओ, कमाओ, फिर निवेश करो
- लोकतंत्रीकरण: चुनी हुई सरकार, बोलने की आज़ादी और क़ानून के राज की ओर बढ़ना
हल किए गए उदाहरण
1. 1972 में तेल 3 डॉलर प्रति बैरल है। 1974 में 12 डॉलर है। दाम कितने गुना बढ़ा?
12 ÷ 3 = 4। दाम 4 गुना हो गया।
2. एक कार कारख़ाना हर कार पर 2 इकाई ऊर्जा लगाता है। नई बनावट के बाद 1 इकाई। ऊर्जा का उपयोग कितने प्रतिशत घटा?
घटाव 2 - 1 = 1 इकाई है, कुल 2 में से। 1 ÷ 2 = 50 प्रतिशत।
3. शीत युद्ध ख़त्म होने के दो कारण बताओ।
एक: सोवियत अर्थव्यवस्था हथियारों की होड़ का बोझ नहीं सह सकी। दो: पूर्वी यूरोप के लोगों ने आज़ादी माँगी और गोर्बाचेव ने उन्हें ताक़त से नहीं रोका।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि तेल संकट तेल ख़त्म होने से आया। असल में सप्लाई घटाई गई और दाम उछल गए।
- सोचना कि सब एशियाई अर्थव्यवस्थाएँ एक ही तरह बढ़ीं। टाइगर सामान बाहर बेचकर बढ़े; हर देश की अपनी नीतियाँ थीं।
- कहना कि शीत युद्ध किसी बड़े युद्ध से ख़त्म हुआ। यह ज़्यादातर बिना लड़ाई के, सुधार और जनआंदोलन से ख़त्म हुआ।
- तारीख़ें मिलाना: बर्लिन की दीवार 1989 में खुली, पर USSR 1991 में टूटा।