1991 से पहले दुनिया कैसी थी?
1945 से 1991 तक दुनिया दो ध्रुवों वाली थी: दो महाशक्तियाँ और उनके गुट। देशों को किसी एक ओर झुकना पड़ता था या अलग रहना पड़ता था। यही शीत युद्ध था: विचारों, हथियारों और जासूसी की लंबी होड़, पर दोनों के बीच सीधा बड़ा युद्ध नहीं हुआ।
ध्रुव यानी शक्ति का केंद्र। शक्ति का मतलब है धन, सेना, तकनीक और साथी देशों को साथ लाने की ताक़त।
1991: शीत युद्ध का अंत
1980 के दशक के अंत में सोवियत अर्थव्यवस्था कमज़ोर थी और लोग बदलाव चाहते थे। 1989 में पूर्वी यूरोप की कई सरकारें गिरीं। 1991 में सोवियत संघ 15 देशों में बँट गया। वारसा संधि वाला सैन्य संगठन भी ख़त्म हुआ।
- दोनों महाशक्तियों के बीच सीधे युद्ध के बिना शीत युद्ध ख़त्म हुआ।
- एक ही महाशक्ति बची। इस छोटे दौर को एकध्रुवीय क्षण कहते हैं।
- कई देश अब अपने साथी और बाज़ार ख़ुद चुन सकते थे।
बहुध्रुवीकरण: शक्ति के कई केंद्र
शक्ति एक जगह नहीं टिकी। बहुध्रुवीकरण का मतलब है शक्ति का कई केंद्रों में फैलना।
- यूरोपीय संघ ने कई यूरोपीय देशों को एक बड़े बाज़ार में जोड़ा।
- चीन सुधारों के बाद बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था बना।
- भारत, रूस, जापान और आसियान (दस दक्षिण-पूर्व एशियाई देश) का भी वज़न बढ़ा।
- संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन (WTO) और क्षेत्रीय संगठन देशों को साझा नियमों से बात करने और व्यापार करने में मदद करते हैं।
अब कोई एक देश अकेला पूरी दुनिया का फ़ैसला नहीं कर सकता।
क्षेत्रीय संघर्ष और नए ख़तरे
शीत युद्ध के अंत से पूरी शांति नहीं आई। दो गुटों का पुराना दबाव हटा तो स्थानीय झगड़े खुलकर सामने आए।
- क्षेत्रीय संघर्ष एक इलाक़े के भीतर की लड़ाइयाँ हैं, जो अक्सर ज़मीन, संसाधन, पहचान या सत्ता को लेकर होती हैं। उदाहरण: 1990 के दशक में यूगोस्लाविया के टूटने के युद्ध, मध्य-पूर्व और अफ़्रीका के कुछ हिस्सों के संघर्ष।
- नए ख़तरे जैसे आतंकवाद, हैकिंग, महामारी और जलवायु परिवर्तन सीमाएँ पार कर जाते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र कुछ इलाक़ों में शांति-सैनिक भेजता है ताकि लड़ने वाले अलग रहें। भारत ने कई सालों में बहुत शांति-सैनिक भेजे हैं।
शांति और विकास: दोनों कैसे बनें
आज ज़्यादातर देश कहते हैं कि शांति और विकास हमारे समय के दो मुख्य विषय हैं। शांत देश बढ़ सकता है, और बढ़ता देश युद्ध में ज़्यादा खोता है।
- व्यापार और निवेश देशों को जोड़ते हैं (वैश्वीकरण)।
- संयुक्त राष्ट्र और क्षेत्रीय संगठनों में बातचीत से कई विवाद बिना युद्ध के सुलझते हैं।
- साझा लक्ष्य जैसे साफ़ हवा, स्वास्थ्य और न्यायपूर्ण विकास के लिए कई देशों को मिलकर काम करना पड़ता है।
- कमियाँ अब भी हैं: अमीर और ग़रीब देश अलग गति से बढ़ते हैं और कुछ संघर्ष अब भी खुले हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- शीत युद्ध की दुनिया = 2 ध्रुव (दो महाशक्तियाँ और उनके गुट)
- एकध्रुवीय = 1 ध्रुव (लगभग 1991 से 2000 के शुरुआती वर्ष)
- बहुध्रुवीय = कई ध्रुव (यूरोपीय संघ, चीन, रूस, भारत, आसियान आदि)
- शांति और विकास = व्यापार + बातचीत + साझा नियम
हल किए गए उदाहरण
1. दो वाक्यों में समझाइए कि 1991 विश्व इतिहास का मोड़ क्यों है।
1991 में सोवियत संघ टूट गया, इसलिए शीत युद्ध का एक पक्ष ही नहीं रहा। दो ध्रुव वाली दुनिया ख़त्म हुई और दुनिया पहले एक मज़बूत ध्रुव और फिर कई शक्ति-केंद्रों की ओर गई।
2. एक तालिका में पाँच शक्ति-केंद्र हैं: अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन, रूस, भारत। दुनिया एकध्रुवीय दिखती है या बहुध्रुवीय? कारण बताइए।
बहुध्रुवीय। दो से ज़्यादा केंद्रों का धन, व्यापार या हथियारों में सचमुच वज़न है और कोई एक अकेला सब कुछ तय नहीं कर सकता।
3. शीत युद्ध ख़त्म होने के बाद भी कोई क्षेत्रीय संघर्ष खुला क्यों रह सकता है? दो कारण दीजिए।
पहला, ज़मीन, संसाधन या पहचान को लेकर पुरानी दुश्मनी बड़ी होड़ ख़त्म होने से नहीं मिटी। दूसरा, कोई महाशक्ति दोनों पक्षों पर रुकने का दबाव नहीं डाल रही थी और लड़ने वालों को हथियार या मदद कई जगह से मिल सकती थी।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि शीत युद्ध किसी बड़े युद्ध से ख़त्म हुआ। यह सुधारों, विरोध-प्रदर्शनों और सोवियत संघ के टूटने से ख़त्म हुआ, सीधे युद्ध से नहीं।
- एकध्रुवीय और बहुध्रुवीय को मिला देना। एक = एक शक्ति-केंद्र, बहु = कई।
- यह मानना कि 1991 के बाद दुनिया पूरी तरह शांत हो गई। क्षेत्रीय संघर्ष और आतंकवाद जारी रहे।
- यह सोचना कि बहुध्रुवीय का मतलब सब देश बराबर हैं। केंद्रों का आकार और ताक़त अलग-अलग है।