विद्रोह क्यों शुरू हुआ? कारण
1700 के उत्तरार्ध में रूस के आम लोगों का जीवन कठिन था। भूदास (वे किसान जो ज़मींदार के होते थे) हफ़्ते में कई दिन ज़मींदार के लिए काम करते या उसे पैसे देते थे। ज़मींदार उन्हें सज़ा दे सकते थे, यहाँ तक कि दूर भेज सकते थे, और भूदास उनकी शिकायत नहीं कर सकते थे। उराल में बहुत लोग लोहे और तांबे के कारख़ानों में काम करते थे, अक्सर ज़बरदस्ती और बहुत कम मज़दूरी पर।
याइक कज़ाक, जो याइक नदी (आज की उराल) पर रहते थे, आज़ाद सैनिक बस्तियों के लोग थे। राज्य उनका स्वशासन घटा रहा था और उन पर अफ़सर बैठा रहा था। इस इलाक़े के दूसरे लोग, जैसे बश्कीर, डरते थे कि उनकी ज़मीन शहरों, क़िलों और कारख़ानों के लिए ली जा रही है।
इस तरह कई समूह थे, हर एक का अपना ग़ुस्सा, और सब चाहते एक ही चीज़ थे: राज्य और ज़मींदारों का कम दबाव।
पुगाचेव और उसकी पुकार (1773)
येमेल्यान पुगाचेव डॉन कज़ाक था, जो सेना में रह चुका था और फिर देश में भटकता रहा। सितंबर 1773 में वह याइक कज़ाकों के पास गया और बोला कि वह ज़ार पीटर तृतीय है, यानी कैथरीन द्वितीय का पति, जिसे गद्दी से हटाया गया था और जिसकी 1762 में मृत्यु हो गई थी। यह झूठ था, पर बहुत लोग एक "अच्छे ज़ार" पर विश्वास करना चाहते थे।
उसने "आदेश" जारी किए जिनमें ज़मीन, आज़ादी, कज़ाक अधिकार और भूदास प्रथा के अंत का वादा था। उसने अफ़सरों और परिषद वाला शिविर बनाया। वह आम लोगों की भाषा में बोलता था, इसलिए भीड़ उसके पास आई।
कौन जुड़ा और कैसे फैला
पहले अनुयायी याइक कज़ाक थे। जल्दी ही विद्रोह कई लोगों का आंदोलन बन गया: बश्कीर (सलावत युलाएव जैसे नेताओं के साथ), तातार, कल्मीक, चुवाश, मारी और अन्य, उराल के कारख़ाना मज़दूर और बहुत से भूदास।
अक्तूबर 1773 से विद्रोहियों ने क़िले वाले शहर ओरेनबर्ग को घेरा, लगभग छह महीने तक, पर उसे ले न सके। 1774 के वसंत में सरकारी सेना ने उन्हें हराया, पर पुगाचेव बच निकला, पश्चिम गया और वोल्गा के किनारे बढ़ा। जुलाई 1774 में उसके लोगों ने कज़ान का बड़ा हिस्सा जला दिया। वोल्गा के पास के कई भूदास अपने ज़मींदारों के विरुद्ध उठ खड़े हुए।
हार, अंत और परिणाम
राज्य ने तोपों और अच्छे सेनापतियों के साथ नियमित सेना भेजी। विद्रोही सेना बड़ी थी पर कम प्रशिक्षित और कम हथियारों वाली थी। अगस्त 1774 में निचली वोल्गा के पास पुगाचेव हार गया। उसके अपने कुछ कज़ाक अफ़सरों ने उसे सौंप दिया। जनवरी 1775 में मॉस्को में उसे मृत्युदंड दिया गया।
परिणाम। भूदास प्रथा ख़त्म नहीं हुई; कुलीनों को ख़तरा लगा और राज्य सख़्त हो गया। 1775 में कैथरीन द्वितीय ने स्थानीय शासन में सुधार किया और देश को छोटे प्रांतों में बाँटा, जिनमें ज़्यादा अफ़सर और सैनिक थे। नदी याइक का नाम उराल रखा गया और याइक कज़ाक उराल कज़ाक कहलाए, ताकि विद्रोह की याद मिट जाए। इस युद्ध ने दिखाया कि भूदास प्रथा भारी अशांति पैदा कर सकती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- 1773 (सितंबर): याइक पर पुगाचेव की पुकार
- अक्तूबर 1773 से मार्च 1774: ओरेनबर्ग की घेराबंदी (लगभग 6 महीने)
- जुलाई 1774: कज़ान जला
- जनवरी 1775: पुगाचेव को मृत्युदंड; याइक का नाम उराल
हल किए गए उदाहरण
1. पुगाचेव ने ख़ुद को पीटर तृतीय क्यों कहा?
पीटर तृतीय एक ज़ार थे जिन्हें हटाया गया था और जिनकी 1762 में मृत्यु हो गई थी। बहुत लोगों को आशा थी कि कोई "अच्छा ज़ार" आज़ादी देगा, इसलिए उनके नाम से लोगों ने पुगाचेव पर भरोसा किया। यह दावा झूठा था।
2. विद्रोह में जुड़े तीन समूहों के नाम बताइए और कारण भी।
याइक कज़ाक (स्वशासन गया), बश्कीर और अन्य लोग (ज़मीन खोने का डर), उराल के कारख़ाना मज़दूर और भूदास (कठिन काम और कम आज़ादी)।
3. विद्रोह के हारने के दो कारण दीजिए।
विद्रोही प्रशिक्षित नहीं थे और उनके पास कम हथियार थे, जबकि नियमित सेना के पास प्रशिक्षण और तोपें थीं। साथ ही विद्रोहियों के पास पक्की योजना और नेतृत्व नहीं था और उनके अपने अफ़सरों ने पुगाचेव को सौंप दिया।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि पुगाचेव सच में पीटर तृतीय था। पीटर तृतीय 1762 में मर गए थे; दावा झूठा था।
- कहना कि केवल किसान शामिल थे। कज़ाक, बश्कीर, तातार, कारख़ाना मज़दूर और भूदास सभी जुड़े।
- तिथियाँ मिला देना। युद्ध 1773 से 1775 तक चला; कज़ान जुलाई 1774 में जला।
- मानना कि विद्रोह से भूदास प्रथा ख़त्म हो गई। ऐसा नहीं हुआ; पकड़ और कड़ी हो गई।