समाज की परतें
लोग वर्गों में बँटे थे: ऐसे समूह जिनके अपने कर्तव्य और अधिकार थे।
- ज़ार: शासक। रोमानोव वंश 1613 में मिखाइल से शुरू हुआ।
- बोयार और चर्च: पुराने अमीर परिवार और पादरी। बोयार, ज़ार की परिषद बोयार दूमा में बैठते थे।
- सेवा-कुलीन (द्वोर्यानी): सेना में ज़ार की सेवा करते और बदले में ज़मीन पाते।
- नगरवासी (पोसाद): व्यापारी और कारीगर जो कर देते थे।
- किसान: सबसे बड़ा समूह। वे खेती करते और राज्य तथा अपने मालिकों को देते।
1649 का क़ानून-संग्रह (सोबोर्नोये उलोज़ेनिये)
1648 में मॉस्को के नमक-दंगे ने दिखाया कि लोग करों और अन्यायी अधिकारियों से नाराज़ थे। ज़ार अलेक्सेई मिखाइलोविच ने ज़ेम्स्की सोबोर से नए पूरे क़ानूनों का संग्रह तैयार करवाया। 1649 में यह पास होकर छपा: सोबोर्नोये उलोज़ेनिये। यह 1830 के दशक तक रूस का मुख्य क़ानून रहा।
- किसान: भागे किसान को खोजने की “तय वर्षों” की सीमा ख़त्म हो गई। भगोड़े को कभी भी वापस लाया जा सकता था। दासता वंशानुगत बनी: दासों के बच्चे भी दास होते।
- नगरवासी: अपनी नगर-बस्ती (पोसाद) से बँधे, बिना जगह खोए जा नहीं सकते थे। कुलीनों और चर्च की “श्वेत बस्तियाँ”, जो नगर-कर नहीं देती थीं, कर के दायरे में आईं।
- कुलीनों को ज़मीन और अपने किसानों पर मज़बूत अधिकार मिले।
- चर्च: एक विशेष दफ़्तर चर्च की अदालतों और ज़मीन पर नज़र रखता था, और क़ानून ने चर्च को नई ज़मीन-भेंट सीमित की।
- ज़ार को व्यवस्था का रक्षक बताया गया। उसके विरुद्ध अपराधों को बहुत कठोर सज़ा मिलती।
ज़ेम्स्की सोबोर: देश की परिषदें
ज़ेम्स्की सोबोर ज़ार द्वारा बुलाई गई सभा थी। इसमें बोयार दूमा, चर्च के नेता और सेवा-कुलीनों व नगरवासियों के चुने हुए लोग होते। आज की संसद जैसा मतदान नहीं था, पर इसकी सलाह मानी जाती थी।
- 1613: सोबोर ने मिखाइल रोमानोव को ज़ार चुना।
- 1649: सोबोर ने क़ानून-संग्रह पास किया।
- 1653: सोबोर वाम-तट यूक्रेन को ज़ार के अधीन लेने पर सहमत हुआ। यह आख़िरी पूरा सोबोर था।
- 1684: आख़िरी छोटा सोबोर बैठा।
इसके बाद ज़ार और उसके दफ़्तर (जिन्हें प्रिकाज़ी कहते थे) अकेले फ़ैसले लेते।
निरंकुशता का मज़बूत होना और जनता का ग़ुस्सा
निरंकुशता का मतलब है कि ज़ार की शक्ति किसी परिषद या अपने से ऊपर के क़ानून से सीमित नहीं। 1600 के दशक में ज़ार बढ़ते हुए प्रिकाज़ी (दफ़्तरों) और सेवा-कुलीनों पर ज़्यादा, और बोयार दूमा व सोबोर पर कम टिकने लगा। 1666 में पैट्रिआर्क निकॉन को हटाने से चर्च भी ज़ार के अधीन आया।
लोग हमेशा यह मानते नहीं थे: नमक-दंगा (1648), ताँबा-दंगा (1662) और कज़ाक नेता स्तेपान रज़िन का बड़ा विद्रोह (1670–71) सब करों, दासता और अन्यायी शासन के विरुद्ध ग़ुस्से के सबूत हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- वर्ग (ऊपर से नीचे): ज़ार → बोयार और पादरी → सेवा-कुलीन → नगरवासी → किसान
- 1649: सोबोर्नोये उलोज़ेनिये = दासता वंशानुगत और असीमित; नगरवासी अपनी बस्ती से बँधे
- सोबोर: 1613 (ज़ार चुना), 1649 (क़ानून), 1653 (यूक्रेन), 1684 (आख़िरी)
- ज़्यादा प्रिकाज़ी और कम सोबोर = मज़बूत निरंकुशता
हल किए गए उदाहरण
1. पहले रोमानोव को चुनने वाले सोबोर और क़ानून-संग्रह पास करने वाले सोबोर के बीच कितने साल बीते?
1649 − 1613 = 36 साल।
2. एक किसान 1640 में भागा और 1655 में मिला। 1649 के क़ानून के हिसाब से क्या उसे वापस ले जाया जा सकता था?
हाँ। 1649 के क़ानून ने “तय वर्षों” की सीमा ख़त्म कर दी, इसलिए भगोड़े को कभी भी लौटाया जा सकता था।
3. 1649 के क़ानून ने किन समूहों को किस जगह से बाँधा?
किसान अपने मालिक की ज़मीन से बँधे, और नगरवासी अपनी नगर-बस्ती (पोसाद) से।
4. समझाओ कि इतिहासकार क्यों कहते हैं कि 1600 के दशक में निरंकुशता मज़बूत हुई।
सोबोर कम होते गए, आख़िरी 1684 में। ज़ार अपने दफ़्तरों (प्रिकाज़ी) और सेवा-कुलीनों से शासन करने लगा, और 1666 में चर्च के नेता निकॉन को भी हटा दिया गया। इसलिए ज़ार को सीमित करने वाले समूह कम हुए।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि 1649 के क़ानून ने किसानों को आज़ाद किया। उसने उलटा किया: दासता को वंशानुगत और असीमित बनाया।
- ज़ेम्स्की सोबोर को आज की चुनी हुई संसद समझना। यह ज़ार द्वारा सलाह के लिए बुलाई परिषद थी।
- सालों में गड़बड़: मिखाइल 1613 में चुना गया, क़ानून 1649, आख़िरी पूरा सोबोर 1653, आख़िरी बैठक 1684।
- नगरवासियों को भूलना: क़ानून ने उन्हें भी उनकी बस्ती से बाँधा।