मुसीबतों के समय के कारण
कई समस्याएँ एक साथ आईं:
- वंश समाप्त हुआ। 1598 में ज़ार फ़्योदोर की मृत्यु पर रुरिक वंश का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। बोरिस गोदुनोव चुने गए, पर प्रतिद्वंद्वी कहते थे कि उनका जन्म-अधिकार नहीं।
- अकाल। 1601 से 1603 में ठंडे मौसम और फ़सल की विफलता से भारी अकाल पड़ा। बहुत से किसान गाँव छोड़ गए और हथियारबंद भगोड़ों की टोलियाँ घूमने लगीं। सरकार की राहत काफ़ी नहीं थी।
- सामाजिक असंतोष। किसान ज़मीन से बँधे थे, बोयार और कुलीन आपस में होड़ करते थे, और कज़ाक, नगरवासी तथा अन्य असंतुष्ट थे। 1603 में खलोपोक की टोली के विद्रोह ने दिखाया कि परेशानी कितनी गहरी थी।
बहुरूपिये और बदलते शासक
1591 में इवान चतुर्थ के आख़िरी पुत्र, छोटे राजकुमार दिमित्री, की मृत्यु हुई थी। अब एक व्यक्ति प्रकट हुआ जिसने कहा कि वह जीवित दिमित्री है। इतिहास उसे झूठा दिमित्री प्रथम कहता है। पोलैंड-लिथुआनिया के कुलीनों और कज़ाकों की मदद से वह मॉस्को की ओर बढ़ा। बोरिस गोदुनोव की अप्रैल 1605 में मृत्यु हो गई, और जून 1605 में वह व्यक्ति मॉस्को में घुसा और उसका राज्याभिषेक हुआ। मई 1606 में बोयारों की साज़िश में वह मारा गया।
बोयार वसीली शुइस्की ज़ार बने (1606 से 1610)। जल्द ही इवान बोलोत्निकोव के नेतृत्व में बड़ा विद्रोह उठा (1606 से 1607), जिसमें किसान, नगरवासी और अन्य जुटे। फिर एक और बहुरूपिया, झूठा दिमित्री द्वितीय, ने मॉस्को के पास तुशिनो में डेरा डाला (1608 से 1610) और ज़ार के साथ-साथ ज़मीन के हिस्सों पर शासन किया। दो सरकारें, दो राजधानियाँ और लगातार लड़ाई।
विदेशी हस्तक्षेप
पड़ोसियों ने कमज़ोरी का लाभ उठाया। 1609 में पोलैंड-लिथुआनिया के राजा सिगिस्मुंड तृतीय ने स्मोलेंस्क का घेरा शुरू किया (वह 1611 में गिरा)। शुइस्की ने दूसरे बहुरूपिये से लड़ने के लिए 1609 में स्वीडन से संधि की और स्वीडिश टुकड़ी ली; बदले में स्वीडन ने बाद में उत्तर-पश्चिम की ज़मीनें लीं और 1611 से नोवगोरोद पर क़ाबिज़ रहा। 1610 में पोलिश सेना क्लुशिनो में जीती और शुइस्की हटा दिए गए। सात बोयारों की परिषद, सेवन बोयार, ने शासन किया और पोलिश टुकड़ी को मॉस्को में आने दिया। कई रूसियों ने इसे अपने राज्य और अपनी आस्था के लिए ख़तरा समझा।
जनसेनाएँ और 1613 की ज़ेम्स्की सोबोर
पैट्रिआर्क गेरमोगेन ने लोगों से प्रतिरोध की अपील की। 1611 में प्रोकोपी ल्यापुनोव के नेतृत्व में पहली जनसेना ने मॉस्को आज़ाद कराने की कोशिश की पर झगड़ों से बिखर गई। 1611 के पतझड़ में निज़नी नोवगोरोद के नगर-प्रधान कुज़मा मिनिन ने नगरवासियों से धन देने और जुड़ने को कहा, और राजकुमार दिमित्री पोझार्स्की सैन्य नेता बने। दूसरी जनसेना ने कई शहरों से लोग जुटाए, 1612 में कूच किया और अक्टूबर के अंत (हमारे कैलेंडर से 4 नवंबर) में मॉस्को आज़ाद कराया।
1613 के आरंभ में मॉस्को में ज़ेम्स्की सोबोर बैठी: चर्च-नेता, कुलीन, नगरवासी, कज़ाक और अन्य। लंबी बातचीत के बाद उसने 16 वर्षीय मिखाइल रोमानोव को चुना, जिनका परिवार पुराने वंश से संबंधित था। जुलाई 1613 में उनका राज्याभिषेक हुआ। रोमानोव वंश ने 1917 तक रूस पर राज किया। शांति धीरे-धीरे आई: स्वीडन (1617) और पोलैंड (1618) से संधियों ने युद्ध समाप्त किए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुसीबतें = वंश का न होना + अकाल (1601 से 1603) + अशांति + विदेशी दबाव
- 1605 झूठा दिमित्री प्रथम; 1606 से 1610 शुइस्की; 1610 सेवन बोयार
- 1609 स्मोलेंस्क का घेरा; 1610 मॉस्को में पोल; 1611 स्वीडन नोवगोरोद पर
- 1611 पहली जनसेना विफल; 1612 दूसरी जनसेना (मिनिन और पोझार्स्की) मॉस्को आज़ाद कराती है
- 1613 ज़ेम्स्की सोबोर मिखाइल रोमानोव (16 वर्ष) को चुनती है
हल किए गए उदाहरण
1. मुसीबतों का समय कितने वर्ष चला (1598 से 1613)?
1613 - 1598 = 15 वर्ष।
2. बहुत से लोगों ने बहुरूपिये पर विश्वास क्यों किया?
वंश समाप्त होने के बाद लोग जन्म से ज़ार चाहते थे, और 1591 में दिमित्री की मृत्यु संदिग्ध थी। "मैं सच्चा राजकुमार हूँ" कहने वाले बहुरूपिये ने उम्मीद दी, ख़ासकर शासकों से नाराज़ लोगों को।
3. दूसरी जनसेना को विशेष क्यों माना जाता है?
इसे कई शहरों के नगरवासियों और नेताओं ने संगठित किया, आम लोगों के जुटाए धन से, किसी एक बड़े सामंत से नहीं। इसने देश की एकता को झगड़ों से ऊपर रखा और मॉस्को आज़ाद कराया।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि मुसीबतों का समय एक युद्ध था। यह कई घटनाएँ थीं: अकाल, बहुरूपिये, विद्रोह, विदेशी हस्तक्षेप।
- झूठे दिमित्री प्रथम (1605 से 1606) को झूठे दिमित्री द्वितीय (तुशिनो का डेरा, 1608 से 1610) से मिलाना।
- यह कहना कि मिखाइल रोमानोव को एक व्यक्ति ने चुना। उन्हें कई समूहों की ज़ेम्स्की सोबोर ने चुना।
- यह सोचना कि पहली जनसेना ने मॉस्को आज़ाद कराया। वह 1611 में विफल रही; दूसरी 1612 में सफल हुई।