1800 का दशक: महिलाएँ बाहर
1800 के दशक में ज़्यादातर समाज अलग-अलग क्षेत्रों (separate spheres) का विचार मानते थे: पुरुष बाहर की दुनिया (राजनीति, व्यापार) के लिए, महिलाएँ घर और बच्चों के लिए।
- राजनीति: महिलाएँ न वोट दे सकती थीं, न चुनाव लड़ सकती थीं, न ज़्यादातर राजनीतिक क्लबों में जा सकती थीं। जब पुरुषों को वोट मिला, तब भी महिलाएँ छूट गईं।
- क़ानून: कई क़ानूनों में विवाहित महिला पति के अधिकार में थी। उसकी संपत्ति और अक्सर कमाई पर पति का नियंत्रण था।
- शिक्षा: लड़कियों को कम पढ़ाया जाता था; 1800 के अंत तक विश्वविद्यालय महिलाओं के लिए बंद थे।
पुरुषों और महिलाओं के बीच इस असमान शक्ति को पितृसत्ता कहते हैं। उस समय के क़ानून, धर्म, रीति-रिवाज़ और विज्ञान इसका साथ देते थे।
कामकाजी महिलाएँ और गृहिणियाँ
महिलाएँ हमेशा काम करती रहीं। 1800 के दशक में फ़ैक्टरियों के दौर ने तरीक़ा बदला:
- कई ग़रीब महिलाएँ कपड़ा मिलों में, नौकरानी के रूप में, खेतों में और घर बैठे काम करती थीं, पुरुषों से बहुत कम मज़दूरी पर।
- मध्यम वर्ग की महिलाओं से गृहिणी बनने की उम्मीद थी: घर चलाओ, कमाओ मत।
- लगभग सभी महिलाएँ बिना वेतन देखभाल का काम करती थीं: खाना, सफ़ाई, बच्चे, बीमार और बुज़ुर्ग।
महिलाओं की अपनी जगहें भी थीं: बाज़ार, कुएँ-घाट, मंदिर या चर्च के समूह, दान संस्थाएँ, पढ़ने की मंडलियाँ और बाद में महिला क्लब। यहाँ वे मिलती थीं, ख़बरें बाँटती थीं और संगठित होती थीं।
शुरुआती संघर्ष और नारीवाद की पहली लहर
नारीवाद (feminism) का मतलब है यह विश्वास कि महिलाओं और पुरुषों को बराबर अधिकार और मौक़े मिलें, और वे आंदोलन जो इसके लिए काम करते हैं।
- 1790 का दशक: फ़्रांसीसी क्रांति के समय ओलंप द गूज ने महिला अधिकारों की घोषणा लिखी; ब्रिटेन में मैरी वोलस्टोनक्राफ़्ट ने कहा कि लड़कियों को लड़कों जैसी शिक्षा मिले।
- 1848: सेनेका फ़ॉल्स (अमेरिका) की सभा ने वोट समेत बराबर अधिकार माँगे। उसी साल सावित्रीबाई फुले ने पुणे में लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया।
- 1800 का अंत–1930: मताधिकार (वोट) अभियान फैला। न्यूज़ीलैंड ने 1893 में महिलाओं को देश-स्तर पर वोट दिया; 1918 के बाद कई देश आगे आए। स्पेन 1931 में, फ़्रांस 1944 में।
तरीक़े थे सामूहिक कार्रवाई के: याचिकाएँ, अख़बार, जुलूस, हड़ताल, और कुछ समूहों के लिए ध्यान खींचने को क़ानून तोड़ना भी। महिलाओं ने संपत्ति, तलाक़ और डॉक्टरी-वकालत पढ़ने के अधिकार के लिए भी लड़ाई लड़ी।
नारीवाद की लहरें और नई भूमिकाएँ
इतिहासकार आंदोलन को लहरों में बाँटते हैं:
- पहली लहर (लगभग 1848–1930): क़ानूनी अधिकार: वोट, संपत्ति, शिक्षा।
- दूसरी लहर (1960–1980): काम, परिवार और शरीर पर बराबरी। समान वेतन क़ानून; विवाहित महिलाएँ पति की इजाज़त के बिना नौकरी, अनुबंध और बैंक खाता; परिवार नियोजन तक पहुँच। सिमोन द बोउवार जैसी लेखिकाओं ने पूछा कि महिला को "दूसरा" दर्जा क्यों।
- तीसरी लहर (1990 का दशक): महिलाओं के बीच अंतर (वर्ग, नस्ल, जाति, धर्म) और जीने के तरीक़े का चुनाव।
- चौथी लहर (2010 से आज): उत्पीड़न और हिंसा के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया का इस्तेमाल।
दोनों विश्व युद्धों ने भी भूमिकाएँ बदलीं: पुरुष मोर्चे पर थे, तो महिलाओं ने फ़ैक्टरियाँ, खेत और दफ़्तर चलाए और दिखा दिया कि वे ये काम कर सकती हैं।
महिलाओं से जुड़े स्रोत: सरकारी रिकॉर्ड अक्सर महिलाओं को नज़रअंदाज़ करते थे, इसलिए इतिहासकार डायरी, चिट्ठियाँ, गीत, तस्वीरें, अदालती मामले और मौखिक इतिहास (साक्षात्कार) भी देखते हैं।
आज की बराबरी: हिंसा और साझी देखभाल
संयुक्त राष्ट्र की संधि CEDAW (1979) देशों से महिलाओं के प्रति भेदभाव ख़त्म करने को कहती है, और 1995 के बीजिंग सम्मेलन ने कहा कि महिला अधिकार मानव अधिकार हैं। भारत में संविधान (1950) ने शुरू से ही हर वयस्क को बराबर वोट दिया और लिंग के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाई।
- हिंसा रोकना: घरेलू हिंसा, कार्यस्थल और सार्वजनिक जगहों पर उत्पीड़न के ख़िलाफ़ क़ानून; हेल्पलाइन और आश्रय; स्कूल में सम्मान और सहमति की सीख; पुरुषों और लड़कों का आवाज़ उठाना।
- साझी देखभाल: बिना वेतन देखभाल का ज़्यादातर काम अब भी महिलाएँ करती हैं। माता-पिता दोनों के लिए छुट्टी, बाल देखभाल केंद्र और घर में पुरुषों का बराबर हिस्सा, ताकि दोनों काम भी करें और देखभाल भी।
बाक़ी अंतर: वेतन का अंतर, ऊँचे पदों और संसद में कम महिलाएँ, और हिंसा। लैंगिक समानता सबके लिए अच्छी है: परिवार, अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र के लिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- नारीवाद: यह विचार और आंदोलन कि महिलाओं और पुरुषों को बराबर अधिकार और मौक़े मिलें
- मताधिकार (suffrage): वोट देने का अधिकार
- अलग-अलग क्षेत्र: पुरुष सार्वजनिक जीवन में, महिलाएँ घर में (1800 का विचार)
- पितृसत्ता: ऐसी व्यवस्था जिसमें ज़्यादातर शक्ति पुरुषों के पास हो
- पहली लहर = वोट व क़ानूनी अधिकार; दूसरी = काम, वेतन, परिवार; तीसरी/चौथी = विविधता, हिंसा, देखभाल
- बिना वेतन देखभाल का काम: खाना, सफ़ाई, देखभाल जो ज़रूरी है पर जिसका पैसा नहीं मिलता
हल किए गए उदाहरण
1. 1800 के दशक में विवाहित महिला अक्सर अपनी कमाई क्यों नहीं रख पाती थी?
कई क़ानून पत्नी को पति के अधिकार में रखते थे, इसलिए परिवार की संपत्ति और उसकी कमाई पर पति का नियंत्रण था।
2. मताधिकार आंदोलन के दो तरीक़े बताओ।
संसद को याचिकाएँ और सार्वजनिक जुलूस। और भी: अख़बार, सभाएँ, भूख हड़ताल, ध्यान खींचने को क़ानून तोड़ना।
3. विश्व युद्धों ने महिलाओं की भूमिका कैसे बदली?
पुरुष युद्ध में थे, तो महिलाओं ने फ़ैक्टरियाँ, परिवहन, खेत और दफ़्तर चलाए। इससे साबित हुआ कि वे 'पुरुषों के' काम कर सकती हैं, और 1918 के बाद कई देशों में वोट मिला।
4. नारीवाद की पहली और दूसरी लहर में क्या फ़र्क़ है?
पहली ने वोट और संपत्ति जैसे क़ानूनी अधिकार दिलाए। दूसरी ने रोज़ की असमानता पर ध्यान दिया: वेतन, नौकरी, पारिवारिक क़ानून और अपने शरीर पर अधिकार।
5. इतिहासकार महिलाओं को समझने के लिए डायरी और मौखिक इतिहास क्यों देखते हैं?
सरकारी रिकॉर्ड ज़्यादातर पुरुषों ने लिखे और महिलाओं के जीवन को छोड़ दिया। निजी स्रोतों से महिलाओं का अपना अनुभव सुनाई देता है।
आम गलतियाँ
- सोचना कि 20वीं सदी से पहले महिलाएँ काम नहीं करती थीं। ज़्यादातर महिलाएँ हमेशा काम करती थीं, पर अक्सर बिना वेतन या कम वेतन पर।
- सोचना कि सब जगह महिलाओं को वोट एक साथ मिला। तारीख़ें बहुत अलग हैं: न्यूज़ीलैंड 1893, फ़्रांस 1944, स्विट्ज़रलैंड 1971।
- सोचना कि नारीवाद का मतलब है महिलाएँ पुरुषों से बेहतर हैं। इसका मतलब है दोनों के लिए बराबर अधिकार और मौक़े।
- सोचना कि क़ानून बराबर हैं तो बराबरी पूरी हो गई। वेतन, देखभाल के काम और सुरक्षा में अंतर अब भी हैं।