संविधान क्या है और क्यों ज़रूरी है?
संविधान किसी राज्य का सबसे ऊँचा क़ानून है। यह बताता है:
- क़ानून कौन बनाता है, शासन कौन करता है और न्याय कौन करता है;
- शक्ति कैसे सीमित और नियंत्रित होती है;
- नागरिकों के क्या अधिकार हैं;
- संविधान ख़ुद कैसे बदला जा सकता है।
इसके पीछे का विचार संविधानवाद है: सरकार तय नियमों से चले, और शासक भी क़ानून के नीचे हो (क़ानून का शासन)। इसका उल्टा निरंकुशता है, जिसमें एक शासक के पास सारी शक्ति होती है और वह किसी को जवाब नहीं देता।
मुख्य शब्द
- संप्रभुता: राज्य की अंतिम शक्ति। उदारवादियों ने कहा यह राष्ट्र या जनता की है, राजा की नहीं।
- लिखित बनाम अलिखित: ज़्यादातर देशों में एक लिखित दस्तावेज़ है; ब्रिटेन कई क़ानूनों और परंपराओं से चलता है।
- प्रदत्त अधिकार-पत्र बनाम पारित संविधान: अधिकार-पत्र राजा की कृपा से मिलता है; संविधान राष्ट्र के प्रतिनिधि बनाते हैं।
- कठोर बनाम लचीला: संशोधन कठिन या आसान।
शासकों पर शुरुआती सीमाएँ (1215–1700)
मैग्ना कार्टा, 1215
अंग्रेज़ सामंतों ने राजा जॉन से एक अधिकार-पत्र मनवाया: राजा पुरानी परंपराओं का आदर करेगा और किसी स्वतंत्र व्यक्ति को बिना क़ानूनी फ़ैसले के जेल या सज़ा नहीं होगी। पहले इसने मुख्यतः सामंतों को बचाया, पर बाद में लोग इसे इस बात का प्रतीक मानने लगे कि राजा भी क़ानून के नीचे है।
पोलिश–लिथुआनियाई राष्ट्रमंडल (1569 से)
लुब्लिन संघ (1569) ने पोलैंड राज्य और लिथुआनिया की ग्रैंड डची को एक शासक और एक संसद, सेम, वाले एक राज्य में जोड़ा, जबकि दोनों की अपनी सेना, ख़ज़ाना और क़ानून रहे। आख़िरी याग्येलोनियन राजा की मृत्यु (1572) के बाद सामंतों (श्लाख़्ता) ने निर्वाचित राजतंत्र बनाया: सभी सामंत राजा चुनने आ सकते थे (स्वतंत्र चुनाव, 1573 से)। हर नए राजा को हेनरिशियन अनुच्छेदों (सेम बुलाने, उसके बिना कर या युद्ध न करने और धार्मिक सहिष्णुता के वचन) और पाक्ता कोंवेंता (व्यक्तिगत वचन) पर हस्ताक्षर करने होते थे। इसे अक्सर "सामंती लोकतंत्र" कहते हैं: लगभग 8–10% लोगों, यानी सामंतों, को राजनीतिक अधिकार थे, जो उस समय के हिसाब से बड़ा हिस्सा था।
इंग्लैंड का अधिकार विधेयक, 1689
गौरवपूर्ण क्रांति के बाद संसद ने घोषणा की कि राजा उसकी सहमति के बिना क़ानून निलंबित नहीं कर सकता, कर नहीं लगा सकता और शांति में सेना नहीं रख सकता। इंग्लैंड संवैधानिक राजतंत्र बन गया।
संविधानों के पीछे प्रबोधन के विचार
- जॉन लॉक: लोगों के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के प्राकृतिक अधिकार हैं; सरकार इन्हें बचाने के लिए, शासितों की सहमति से है।
- मॉन्तेस्क्यू (1748): शक्ति को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में बाँटो ताकि "शक्ति शक्ति को रोके"।
- रूसो: सामाजिक अनुबंध और सामान्य इच्छा; संप्रभुता जनता की है।
ये विचार उदारवाद का मूल बने: व्यक्तिगत अधिकार, क़ानून के सामने बराबरी, संसद, लिखित संविधान और मुक्त बाज़ार।
पहले लिखित संविधान (1787–1812)
संयुक्त राज्य अमेरिका, 1787
आज भी लागू सबसे पुराना लिखित राष्ट्रीय संविधान। शक्तियों के पृथक्करण और नियंत्रण-संतुलन वाला संघीय गणराज्य; 1791 में अधिकार विधेयक जोड़ा गया।
18वीं सदी का राष्ट्रमंडल और 3 मई का संविधान, 1791
1700 के दशक में सैक्सन राजाओं के समय राष्ट्रमंडल कमज़ोर था: लिबेरुम वेटो से एक अकेला प्रतिनिधि पूरी सेम भंग कर सकता था, और पड़ोसी शक्तियाँ दख़ल देती थीं। पहले विभाजन (1772) के बाद सुधारकों ने चार-वर्षीय सेम (1788–1792) चलाई। 3 मई 1791 को इसने यूरोप का पहला आधुनिक लिखित राष्ट्रीय संविधान पारित किया: लिबेरुम वेटो और स्वतंत्र चुनाव ख़त्म (गद्दी वंशानुगत बनी), शक्तियों का पृथक्करण, नगरवासियों को कुछ अधिकार, और किसानों को क़ानून का संरक्षण। विरोधियों और विदेशी सेनाओं ने 1792 में इसे पलट दिया और 1795 तक राज्य बँटकर मिट गया, पर संविधान सुधार का प्रतीक बना रहा।
फ़्रांस, 1791
मानव और नागरिक अधिकारों की घोषणा (1789) के बाद फ़्रांस के पहले संविधान ने राजा को संवैधानिक राजा बनाया और न्यूनतम कर देने वाले "सक्रिय नागरिकों" को वोट दिया।
स्पेन, काडिज़ 1812
नेपोलियन से युद्ध के दौरान लिखे काडिज़ संविधान (उपनाम "ला पेपा") ने राष्ट्र की संप्रभुता, शक्तियों का पृथक्करण, एक-सदनी संसद (कोर्तेस), पुरुषों का व्यापक अप्रत्यक्ष मताधिकार और क़ानून के सामने बराबरी घोषित की। 1814 में इसे रद्द किया गया, पर यह दक्षिणी यूरोप और लैटिन अमेरिका के उदारवादियों का आदर्श बना।
19वीं सदी के उदार शासन और लोकतंत्र की राह
19वीं सदी के यूरोप में शासक और उदारवादी संविधानों पर लड़ते रहे। आम प्रकार:
- प्रदत्त अधिकार-पत्र (जैसे फ़्रांस 1814, स्पेन 1834): ज़्यादातर शक्ति राजा के पास।
- नरम उदार संविधान: राजा और संसद की साझा संप्रभुता, संपत्ति-आधारित मताधिकार (सिर्फ़ संपत्ति या कर वाले पुरुष), दो सदन।
- प्रगतिशील या लोकतांत्रिक संविधान: राष्ट्र की संप्रभुता, ज़्यादा अधिकार, और सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार (फ़्रांस 1848, स्पेन 1869)।
एक देश के क्रम का उदाहरण: रोमानिया
1866: बेल्जियम के नमूने पर संवैधानिक राजतंत्र, संपत्ति-आधारित वोट। 1923: सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार और ज़्यादा अधिकार। 1938: सत्तावादी शाही संविधान। 1948 और 1965: साम्यवादी संविधान जिनमें अधिकार सिर्फ़ काग़ज़ पर थे। 1991: संवैधानिक अदालत वाला लोकतांत्रिक, संसदीय गणराज्य (2003 में संशोधित)। कई देशों में उदार, सत्तावादी और लोकतांत्रिक संविधानों के बीच ऐसा ही टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता दिखता है।
लोकतंत्र की ओर
20वीं सदी में ज़्यादातर देशों ने महिलाओं को वोट दिया (जैसे न्यूज़ीलैंड 1893, 1918 के बाद कई यूरोपीय देश) और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अपनाया। नए संविधानों में सामाजिक अधिकार (शिक्षा, काम, स्वास्थ्य) और संवैधानिक अदालतें जुड़ीं। भारत के संविधान (1950) ने पहले ही चुनाव से हर वयस्क को वोट दिया।
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मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- संविधान: शक्ति, सीमाओं और अधिकारों का सर्वोच्च क़ानून
- निरंकुशता: शासक क़ानून से ऊपर; संविधानवाद: शासक क़ानून के नीचे
- शक्तियों का पृथक्करण: विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका
- संपत्ति-आधारित मताधिकार: सिर्फ़ संपत्ति वाले या करदाता वोट दें
- सार्वभौमिक मताधिकार: सभी वयस्क नागरिक वोट दें
- संवैधानिक राजतंत्र: संविधान से सीमित राजा
- संसदीय राजतंत्र: राजा प्रतीक; सरकार संसद को जवाबदेह
- लिबेरुम वेटो: एक प्रतिनिधि पूरी सेम रोक सकता था (1791 में ख़त्म)
हल किए गए उदाहरण
1. एक राजा जनता को कुछ अधिकारों वाला दस्तावेज़ देता है पर उसे ख़ुद बदलने का अधिकार रखता है। यह अधिकार-पत्र है या संविधान? क्यों?
प्रदत्त अधिकार-पत्र। यह राजा की इच्छा से आया है, राष्ट्र के प्रतिनिधियों से नहीं, इसलिए संप्रभुता राजा के पास रहती है।
2. 1791 में सुधारकों ने लिबेरुम वेटो क्यों ख़त्म किया?
क्योंकि एक प्रतिनिधि पूरे सेम सत्र और उसके सारे क़ानून रद्द कर सकता था, इसलिए राज्य न कर लगा पाता, न सेना बना पाता, न सुधार कर पाता। विदेशी शक्तियाँ प्रतिनिधियों को घूस देकर इसका इस्तेमाल करवाती थीं।
3. एक देश में पहले सिर्फ़ तय कर देने वाले पुरुष वोट देते हैं। बाद में 21 साल से ऊपर का हर पुरुष, और उसके बाद हर वयस्क। तीनों चरणों के नाम बताइए।
संपत्ति-आधारित मताधिकार → सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार → सार्वभौमिक (वयस्क) मताधिकार।
4. शक्तियों का पृथक्करण व्यवहार में: संसद क़ानून पास करती है, सरकार उसे लागू करती है, और अदालत कहती है कि यह नागरिकों के अधिकार तोड़ता है। किस अंग ने क्या किया?
संसद = विधायिका (क़ानून बनाया); सरकार = कार्यपालिका (लागू किया); अदालत = न्यायपालिका (संविधान से जाँचा और रोका)।
आम गलतियाँ
- कहना कि मैग्ना कार्टा ने लोकतंत्र बनाया। इसने मुख्यतः सामंतों और चर्च को बचाया; इसका लंबा महत्व यह विचार था कि शासक क़ानून के नीचे है।
- पोलिश–लिथुआनियाई निर्वाचित राजतंत्र को सबके लिए लोकतंत्र कहना। सिर्फ़ सामंतों (लगभग दसवें हिस्से) को राजनीतिक अधिकार थे।
- संवैधानिक और संसदीय राजतंत्र को मिला देना। पहले में राजा के पास अब भी असली शक्ति है; दूसरे में राजा मुख्यतः प्रतीक है।
- सोचना कि लिखित संविधान का मतलब हमेशा लोकतंत्र है। सत्तावादी और साम्यवादी राज्यों के भी लिखित संविधान थे जिनके अधिकारों का आदर नहीं हुआ।