डायस्पोरा और ज़ायोनवाद
डायस्पोरा (diaspora) का अर्थ है किसी जाति का अपनी मातृभूमि से दूर बिखर जाना। यहूदी लगभग दो हज़ार साल से कई देशों में रह रहे थे। यूरोप के बड़े हिस्से में उन्हें भेदभाव और हिंसा झेलनी पड़ी (1880 के दशक में रूस के पोग्रोम और फ़्रांस का ड्रेफ़स मामला)।
ज़ायोनवाद (Zionism) वह आंदोलन है जो इज़राइल की भूमि (ज़ायन) में यहूदी मातृभूमि चाहता था। थियोडोर हर्ज़ल ने 1897 में बासेल में पहली ज़ायोनी कांग्रेस आयोजित की। 1880 के दशक से कई यहूदी लहरों में फ़िलिस्तीन गए, जिन्हें अलियाह कहते हैं। ज़ायोनियों के लिए यह वापसी और बचाव था। वहाँ पहले से रहने वाले अरबों के लिए यह उस ज़मीन पर, जिसे वे अपना घर मानते थे, बढ़ता हुआ नया आंदोलन था।
1900 के आसपास पश्चिम एशिया
1900 के आसपास फ़िलिस्तीन कहलाने वाला इलाका ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। लोग ज़्यादातर अरब मुसलमान थे, साथ में ईसाई अरब समुदाय और एक छोटा यहूदी अल्पसंख्यक। पहले विश्व युद्ध में ओटोमन जर्मन पक्ष में लड़े। ब्रिटेन ने अलग-अलग पक्षों से वादे किए: ओटोमनों के विरुद्ध मदद के लिए अरब नेताओं से (मैकमोहन पत्र, 1915-16), फ़्रांस से साइक्स-पिको योजना में (1916), और ज़ायोनियों से बालफ़ोर घोषणा (1917) में, जिसमें फ़िलिस्तीन में "यहूदी लोगों के राष्ट्रीय घर" का समर्थन था, बशर्ते अन्य समुदायों के अधिकारों को हानि न हो।
युद्ध के बाद राष्ट्र संघ ने ब्रिटेन को फ़िलिस्तीन पर शासन का जनादेश (Mandate, 1920-1948) दिया। यहूदी आप्रवासन बढ़ा, ख़ासकर 1930 के दशक में जब नाज़ी उत्पीड़न बढ़ा, और अरब विरोध-विद्रोह तथा यहूदी सशस्त्र समूह भी उभरे। दोनों समुदायों को लगा कि ब्रिटेन ने वादे तोड़े।
1948 में इज़राइल की स्थापना
दूसरे विश्व युद्ध और होलोकॉस्ट के बाद कई यहूदी बचे हुए लोग फ़िलिस्तीन जाना चाहते थे। ब्रिटेन ने समस्या संयुक्त राष्ट्र को सौंप दी। नवंबर 1947 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 181 पारित किया, जिसमें ज़मीन को एक यहूदी राज्य और एक अरब राज्य में बाँटने और यरुशलम को अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण में रखने की योजना थी। यहूदी नेताओं ने स्वीकार किया। अरब नेताओं ने इसे अन्यायपूर्ण कहकर ठुकराया, क्योंकि लगभग दो-तिहाई लोग अरब थे।
14 मई 1948 को, ब्रिटिश शासन समाप्त होते ही, इज़राइल ने स्वतंत्रता की घोषणा की। पड़ोसी अरब देशों की सेनाएँ आईं और युद्ध 1949 के युद्धविराम समझौतों पर खत्म हुआ। इज़राइल के पास संयुक्त राष्ट्र योजना से ज़्यादा ज़मीन आ गई। इज़राइली इसे स्वतंत्रता संग्राम कहते हैं; फ़िलिस्तीनी इसे नक़बा (विनाश) कहते हैं।
1967 तक के घटनाक्रम
- 1948-49: युद्ध के बाद वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम जॉर्डन के पास और गाज़ा मिस्र के पास रहा।
- 1956, स्वेज़ संकट: मिस्र ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीयकरण किया; इज़राइल, ब्रिटेन और फ़्रांस ने हमला किया; अमेरिका और सोवियत संघ ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर किया।
- 1964: फ़िलिस्तीनियों की ओर से बोलने के लिए फ़िलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) बना।
- जून 1967, छह-दिवसीय युद्ध: बढ़ते तनाव के बाद इज़राइल ने पहले मिस्र पर हमला किया और छह दिन में सिनाई, गाज़ा, वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गोलान की पहाड़ियाँ ले लीं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 242 (नवंबर 1967) ने कब्ज़े वाली ज़मीन से इज़राइली वापसी और सभी राज्यों के लिए शांति व सुरक्षित सीमाओं की माँग की।
यरुशलम का दर्जा और शरणार्थी
यरुशलम यहूदियों (पश्चिमी दीवार), ईसाइयों (होली सेपल्कर चर्च) और मुसलमानों (अल-अक़्सा मस्जिद और डोम ऑफ़ द रॉक) के लिए पवित्र है। संयुक्त राष्ट्र योजना इसे अंतरराष्ट्रीय रखना चाहती थी। 1967 के बाद इज़राइल ने पूर्वी हिस्सा ले लिया और बाद में पूरे शहर को अपनी राजधानी घोषित किया। फ़िलिस्तीनी पूर्वी यरुशलम को अपने भावी राज्य की राजधानी बनाना चाहते हैं। ज़्यादातर देश कहते हैं कि इसका अंतिम दर्जा बातचीत से तय होना चाहिए।
शरणार्थी: 1948-49 में लगभग सात लाख फ़िलिस्तीनी घर छोड़कर गए या निकाले गए। वंशजों समेत आज उनकी संख्या लाखों-करोड़ों में है। फ़िलिस्तीनी "वापसी के अधिकार" की माँग करते हैं; इज़राइल कहता है कि वापसी से उसका यहूदी राज्य का स्वरूप खत्म हो जाएगा। इन्हीं वर्षों में कई यहूदी परिवार अरब देशों से भी निकले। ये दोनों प्रश्न अब भी सबसे कठिन हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समय-रेखा: 1897 ज़ायोनी कांग्रेस → 1917 बालफ़ोर → 1947 संयुक्त राष्ट्र योजना → 1948 इज़राइल और युद्ध → 1967 छह-दिवसीय युद्ध
- कारण → परिणाम: उत्पीड़न → ज़ायोनवाद → आप्रवासन → स्थानीय अरबों से टकराव → ब्रिटिश वापसी → संयुक्त राष्ट्र योजना → युद्ध → शरणार्थी
- मुख्य शब्द: डायस्पोरा, ज़ायोनवाद, अलियाह, जनादेश, नक़बा, विभाजन, कब्ज़ा, शरणार्थी
हल किए गए उदाहरण
1. 19वीं सदी के अंत में ज़ायोनी आंदोलन क्यों बढ़ा?
यूरोप में यहूदियों को भेदभाव और हिंसा झेलनी पड़ी (जैसे रूस के पोग्रोम) और हर जगह राष्ट्रवाद बढ़ रहा था। ज़ायोनियों ने तय किया कि केवल अपनी मातृभूमि ही यहूदियों को सुरक्षित रखेगी।
2. बालफ़ोर घोषणा में क्या कहा गया और दोनों पक्ष उसका हवाला क्यों देते हैं?
उसमें फ़िलिस्तीन में 'यहूदी लोगों के राष्ट्रीय घर' का समर्थन था, साथ में कहा गया कि मौजूदा समुदायों के अधिकारों को हानि न पहुँचे। ज़ायोनी पहले भाग का हवाला देते हैं, फ़िलिस्तीनी दूसरे भाग का और ब्रिटेन के अरबों से किए पहले वादों का।
3. संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव 181 में क्या था और दोनों पक्षों ने क्या किया?
उसमें एक यहूदी और एक अरब राज्य और यरुशलम पर अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण का सुझाव था। यहूदी नेताओं ने स्वीकार किया; अरब नेताओं ने ठुकराया।
4. इज़राइली और फ़िलिस्तीनी 1948 को अलग शब्दों में क्यों बताते हैं?
इज़राइलियों के लिए यह स्वतंत्रता संग्राम, एक राज्य का जन्म था। फ़िलिस्तीनियों के लिए यह नक़बा था, क्योंकि लगभग सात लाख लोगों के घर छूटे। एक ही साल, उल्टे अनुभव।
5. 1967 में क्या बदला?
छह दिन में इज़राइल ने सिनाई, गाज़ा, वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गोलान की पहाड़ियाँ ले लीं। लाखों फ़िलिस्तीनी इज़राइली नियंत्रण में आ गए और पूरा यरुशलम इज़राइली नियंत्रण में हो गया।
आम गलतियाँ
- संघर्ष को केवल धार्मिक मानना। यह मुख्यतः एक ही ज़मीन पर दो राष्ट्रीय आंदोलनों का संघर्ष है, जिसमें धर्म भी जुड़ गया।
- केवल एक पक्ष की कहानी सुनाना। 'इज़राइली कहते हैं' और 'फ़िलिस्तीनी कहते हैं' जैसे शब्द इस्तेमाल कीजिए।
- तारीखें गड़बड़ाना: 1917 बालफ़ोर, 1947 संयुक्त राष्ट्र योजना, 1948 इज़राइल की स्थापना।
- यह कहना कि संघर्ष 1948 में शुरू हुआ। इसकी जड़ें 1800 के दशक के अंत तक जाती हैं।