लोग क्यों छोड़ते हैं: संघर्ष, दमन और जबरन प्रवास
इतिहासकार पहले पूछते हैं: इस समूह ने अपना देश क्यों छोड़ा?
- संघर्ष: समूहों या देशों के बीच युद्ध, गृहयुद्ध, जातीय हिंसा।
- दमन: धर्म, भाषा या राजनीतिक विचारों के लिए सज़ा।
- अधिकारों से इनकार: वोट नहीं, ज़मीन रखने का हक नहीं, नागरिकता छिनना।
- जबरन प्रवास: लोगों को जाने पर मजबूर करना, जैसे 1972 में युगांडा से निकाले गए एशियाई (बहुत से भारतीय मूल के), 1947 के विभाजन में उजड़े लोग, कई युद्धों के शरणार्थी, और पहले की सदियों में दास व्यापार।
- आर्थिक धक्का: अकाल (1840 के दशक का आयरिश अकाल), गरीबी, ज़मीन की कमी।
उन्होंने नई ज़मीन क्यों चुनी: सामाजिक और आर्थिक खिंचाव
- आर्थिक: रेल, खेत, खदान, मिलों में काम; बाद में अस्पतालों, दफ़्तरों और तकनीक में। सस्ती या मुफ़्त ज़मीन ने 1890–1910 के दशकों में यूक्रेन और दूसरी जगहों के किसानों को उत्तरी अमेरिका के घास के मैदानों (प्रेयरी) की ओर खींचा।
- सामाजिक: पहले से वहाँ परिवार, धार्मिक आज़ादी, सुरक्षा, स्कूल।
- शृंखला प्रवास: पहले प्रवासी चिट्ठियाँ, पैसा और टिकट भेजते हैं; रिश्तेदार और पड़ोसी पीछे आते हैं। दशकों में पूरे गाँव का जाल बदल सकता है।
- सरकारी भर्ती: कुछ देशों ने सिर्फ़ चुने हुए देशों से बसने वालों या कामगारों के लिए विज्ञापन दिए।
पहुँचना और चुनौतियाँ: अन्यायपूर्ण कानून और संस्थागत नस्लवाद
बहुत से समूहों के सामने ऐसे कानून थे जो नस्ल या मूल के कारण असमान व्यवहार करते थे (संस्थागत नस्लवाद)।
- सिर कर (head tax): कनाडा ने सिर्फ़ चीनी प्रवासियों से शुल्क लिया, 1903 में बढ़कर 500 डॉलर; फिर 1923 के चीनी आप्रवास कानून ने 1947 तक चीनी लोगों का आना लगभग बंद कर दिया।
- "सीधी यात्रा" नियम (1908): प्रवासियों को अपने देश से सीधे जहाज़ से आना था, जो भारत से लगभग असंभव था, इसलिए भारतीय रुक गए।
- कोमागाटा मारू (1914): ब्रिटिश भारत के 376 यात्री दो महीने वैंकूवर बंदरगाह में रुके रहे; सिर्फ़ लगभग 20 को उतरने दिया गया।
- युद्धकालीन नज़रबंदी: दूसरे विश्व युद्ध में लगभग 21,000 जापानी मूल के कनाडाई और 1,20,000 जापानी मूल के अमेरिकी अपने घरों से हटाए गए।
समुदाय बनाना, योगदान और नागरिकता
- सामुदायिक संस्थाएँ: गुरुद्वारे, मंदिर, चर्च, मस्जिद और सिनेगॉग; अख़बार; भाषा स्कूल; आपसी मदद और सांस्कृतिक संघ।
- योगदान: रेल और खेत बनाना, व्यवसाय, खाना और संगीत, खेल, विज्ञान, चिकित्सा, राजनीति और सैन्य सेवा।
- अधिकार पाना: कनाडा में चीनी और दक्षिण एशियाई मूल के लोगों को 1947 में और जापानी मूल के लोगों को 1949 में संघीय वोट मिला। आप्रवास में नस्ल वाले नियम 1962–67 में खत्म हुए।
- निवारण (redress): औपचारिक माफ़ी और भुगतान, जैसे जापानी मूल के कनाडाई लोगों को (1988), चीनी सिर कर के लिए (2006) और कोमागाटा मारू के लिए (2016)।
- पीढ़ियाँ: पहली पीढ़ी ज़्यादातर विरासत की संस्कृति रखती है; बच्चे और पोते-पोतियाँ अक्सर दोनों संस्कृतियाँ मिलाते हैं।
करके देखो: किसी बड़े रिश्तेदार या पड़ोसी से बात करो। पूछो: आपका परिवार कहाँ से आया? क्यों आया? शुरू में क्या मुश्किल था? कौन-सी परंपराएँ अब भी चलती हैं? जवाबों को धकेलना, खींचना, चुनौती और योगदान में बाँटो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- जातीय समूह: साझी संस्कृति और साझे मूल के एहसास वाले लोग
- धकेलने वाला कारण: जो लोगों को अपने देश से बाहर करे
- खींचने वाला कारण: जो लोगों को नए देश की ओर बुलाए
- जबरन प्रवास: हिंसा, कानून या आपदा से लोगों को जाने पर मजबूर करना
- शृंखला प्रवास: पहले प्रवासी रिश्तेदारों और पड़ोसियों को बुलाते हैं
- सिर कर (head tax): हर व्यक्ति पर लगा शुल्क, चीनी प्रवासियों के खिलाफ़ इस्तेमाल
- संस्थागत नस्लवाद: कानूनों या नियमों में लिखा असमान व्यवहार
- निवारण (redress): पुराने अन्याय के लिए सरकारी माफ़ी या भुगतान
हल किए गए उदाहरण
1. इन्हें धकेलने या खींचने वाले कारणों में बाँटो: (क) अकाल, (ख) मुफ़्त खेती की ज़मीन, (ग) धार्मिक उत्पीड़न, (घ) नौकरी के प्रस्ताव वाला चचेरा भाई।
(क) धकेलने वाला (आर्थिक), (ख) खींचने वाला (आर्थिक), (ग) धकेलने वाला (दमन), (घ) खींचने वाला (सामाजिक, शृंखला प्रवास)।
2. 1908 का "सीधी यात्रा" नियम भारत का नाम लिए बिना भारतीयों को कैसे रोकता था?
चरण 1: नियम में अपने देश से सीधी समुद्री यात्रा ज़रूरी थी। चरण 2: उस समय भारत से कनाडा कोई जहाज़ सीधा नहीं जाता था। चरण 3: इसलिए भारतीय यह शर्त पूरी नहीं कर सकते थे। यह संस्थागत नस्लवाद है: कानून दिखने में निष्पक्ष, पर बाहर रखने के लिए बना।
3. 1903 में एक चीनी प्रवासी पर सिर कर 500 डॉलर था। रेल मज़दूर लगभग 1 डॉलर रोज़ कमाता था। कर लगभग कितने दिन की मज़दूरी के बराबर था?
500 डॉलर ÷ 1 डॉलर रोज़ = लगभग 500 काम के दिन, यानी लगभग दो साल का काम। इससे पता चलता है कि कानून ने प्रवास कितना कठिन बनाया।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि सारे प्रवासी अपनी मर्ज़ी से गए। बहुतों को निकाला गया या सख्त, अन्यायपूर्ण प्रवेश कानून झेलने पड़े।
- किसी जातीय समूह को एक जैसा मानना। समूह के अंदर लोग वर्ग, धर्म, क्षेत्र और पीढ़ी से अलग होते हैं।
- यह सोचना कि नस्लवादी कानून हर जगह बहुत पहले खत्म हो गए। आप्रवास के कई नस्ल-आधारित नियम 1960 के दशक तक चले।
- प्रवासियों को सिर्फ़ पीड़ित समझना। उन्होंने संगठन बनाए, विरोध किया, समुदाय बनाए और देश को आकार दिया।