खेती का विकास
कामाकुरा और मुरोमाची काल में किसानों ने लोहे के औज़ार, बैल और घोड़े से चलने वाले हल, सिंचाई के लिए पानी के पहिए और घास व राख की खाद इस्तेमाल करनी शुरू की। कई जगह वे साल में दो फ़सलें उगाते थे, पहले चावल और फिर गेहूँ या जौ। उपज बढ़ी, ज़्यादा लोगों को खाना मिला और किसानों के पास बेचने को कुछ बचा।
व्यापार, बाज़ार और संघों का विकास
गाँवों और मंदिर-क़स्बों में निश्चित दिनों पर बाज़ार लगने लगे, पहले महीने में लगभग तीन दिन और बाद में अक्सर। कारीगर कपड़ा, काग़ज़, लोहे का सामान और साके बनाते थे। व्यापारी और कारीगर किसी कुलीन या मंदिर की सुरक्षा में ज़ा नाम के संघ बनाते थे, ताकि अपना धंधा बचाएँ और प्रतिस्पर्धा से बचें। मिंग चीन के तांबे के सिक्के आम पैसा बन गए और साहूकार (दोसो और साकाया) अमीर हुए। हाकाता, साकाई और ह्योगो जैसे बंदरगाह व्यस्त हुए।
स्वशासी गाँव (सो)
किनाई क्षेत्र में ग्रामीणों ने सो बनाए, यानी अपने द्वारा चलाया गया गाँव का संगठन। वे बैठकें (योरिआई) करते, बुज़ुर्ग चुनते, गाँव के नियम (ओकिते) लिखते, पानी और जंगल की ज़मीन बाँटते, स्वामी को मिलकर कर देते और अपनी सज़ाएँ तय करते थे। इस तरह आम लोग नियम बनाने में शामिल हुए।
स्वशासी क़स्बे
अमीर व्यापारी क़स्बे भी ख़ुद चलते थे। साकाई को दस धनी व्यापारियों की सभा चलाती थी। हाकाता में भी ऐसी सभा थी। वे शांति रखते, दीवारें और खाइयाँ बनाते और बिना ताक़तवर स्वामी के क़स्बों को व्यापार के लिए खुला रखते थे। जब बाद में ताक़तवर सरदार उभरे तो उनकी स्वतंत्रता ख़त्म हुई।
आम लोगों के विद्रोह
इक्की ("एक मन") शपथ से जुड़ा समूह था। 1428 में किसान, गाड़ीवान और क़स्बे के लोग शोचो विद्रोह (त्सुची-इक्की) में उठे और कर्ज़ माफ़ी (तोकुसेई) माँगी। उन्होंने साहूकारों पर हमला किया और कर्ज़ के काग़ज़ जलाए। यामाशिरो (1485) में ग्रामीणों ने लड़ते दाइम्यो को इलाक़े से निकाल दिया और आठ साल ख़ुद शासन किया, और कागा (1488) में एक बौद्ध आस्था के अनुयायी उठे और लगभग सौ साल राज किया।
योद्धाओं और आम लोगों की संस्कृति
कितायामा संस्कृति (लगभग 1400, योशिमित्सु) स्वर्ण मंडप (किंकाकु) में दिखती है, जो दरबार और योद्धा रुचि का मेल है। हिगाशियामा संस्कृति (लगभग 1480, योशिमासा) सादी और शांत है, जो रजत मंडप (गिनकाकु) में दिखती है। शोइन कमरे में तातामी चटाइयाँ, खिसकने वाले दरवाज़े और आला होता है, जो जापानी घर की बुनियाद है। ज़ेन भिक्षु चाय सभा, फूल सजाना, पत्थर और रेत के बाग़ और स्याही चित्र (सुइबोकुगा) लाए, सेस्शू जैसे कलाकारों के साथ।
गाँवों और मंदिरों से नो (कान'आमी और ज़ेआमी का धीमा मुखौटा नाटक) और क्योगेन (मज़ेदार छोटे नाटक), रेंगा (कई लोगों की जुड़ी कविता) और छोटी चित्र-कहानियाँ (ओतोगीज़ोशी) आईं। आम लोगों को त्योहार और लोक-नृत्य भी पसंद थे। इस तरह योद्धा और आम लोगों की संस्कृति मिल गई।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- खेती: लोहे के औज़ार + बैल/घोड़े + पानी के पहिए + राख खाद + साल में दो फ़सलें = ज़्यादा उपज
- ज़ा = व्यापारियों/कारीगरों का संघ; दोसो = साहूकार
- सो = स्वशासी गाँव (योरिआई सभा, ओकिते नियम); साकाई और हाकाता = स्वशासी क़स्बे
- इक्की = शपथ से जुड़ा समूह; शोचो विद्रोह 1428 = कर्ज़ माफ़ी की माँग
- कितायामा (स्वर्ण मंडप) और हिगाशियामा (रजत मंडप, शोइन) संस्कृति; नो, क्योगेन, स्याही चित्र, चाय
हल किए गए उदाहरण
1. बेहतर खेती से व्यापार कैसे बढ़ा?
लोहे के औज़ार, पानी, खाद और दो फ़सलों से उपज बढ़ी। किसानों के पास बेचने को अतिरिक्त अनाज था, इसलिए बाज़ार और कारीगरी बढ़ी।
2. ग्रामीणों ने "सो" क्यों बनाया?
पानी, जंगल और कर मिलकर सँभालने, अपनी रक्षा करने और अपने नियमों व बैठकों (योरिआई) से झगड़े निपटाने के लिए।
3. 1428 में किसान और क़स्बाई लोग क्यों उठे?
साहूकारों का भारी कर्ज़ और अन्यायपूर्ण माँगों ने उन्हें एक साथ (इक्की) उठकर कर्ज़ माफ़ी माँगने पर मजबूर किया।
4. दो उदाहरणों से दिखाओ कि मुरोमाची संस्कृति में योद्धा, ज़ेन और आम लोगों की पसंद मिली।
स्याही चित्र और चाय सभा ज़ेन भिक्षुओं से आईं और योद्धाओं को पसंद थीं। नो और क्योगेन गाँव और मंदिर के नाटकों से बढ़े और आम लोगों व शोगुनों दोनों ने सराहे।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि सभी आम लोग आज़ाद थे। कई अब भी भारी कर देते और कर्ज़दार थे; स्वशासन किनाई क्षेत्र में सबसे मज़बूत था।
- कितायामा (स्वर्ण मंडप, योशिमित्सु) और हिगाशियामा (रजत मंडप, योशिमासा) में गड़बड़ी।
- यह मानना कि इक्की का मतलब हमेशा हिंसा है। पहले यह शपथ से जुड़ा समूह है।
- भूल जाना कि बाज़ार और तांबे के सिक्के साथ बढ़े; सिक्के ज़्यादातर मिंग चीन से आए।