कारण: लंबे समय के और तुरंत के
1790 के दशक के विभाजनों के बाद से पोलैंड तीन साम्राज्यों में बँटा था। बीच का बड़ा हिस्सा पोलैंड का राज्य (Kingdom of Poland) रूसी ज़ार के अधीन था। 1830-31 के नवंबर विद्रोह की हार के बाद उसकी ज़्यादातर स्वायत्तता छिन गई। लोगों में कड़वाहट रही और गुप्त संगठन आज़ाद राज्य का सपना ज़िंदा रखते रहे।
लंबे समय के कारण: स्वायत्तता का छिनना, कड़ा नियंत्रण, पुरानी हारों की याद, और आज़ादी की चाह जो माता-पिता से बच्चों तक पहुँची। 1856 के बाद ज़ार ने कुछ ढील दी और 1861-62 में वारसॉ में प्रदर्शन बढ़े, जिनसे लोगों का मूड साफ़ दिखा।
तुरंत का कारण: जनवरी 1863 में वारसॉ के अधिकारियों ने नौजवानों की सूची बनाई, जिन्हें अचानक रूसी सेना में भर्ती करना था। इससे गुप्त संगठनों के कई नौजवान दूर हो जाते। उन्होंने विद्रोह चुना।
पोलिश लोगों में दो पक्ष
रेड्स जल्दी और व्यापक विद्रोह और किसानों को ज़मीन चाहते थे। व्हाइट्स ज़्यादा सावधान थे, विदेशी मदद की आस रखते थे और किसानों की माँगें मानने में धीमे थे। 1863 में दोनों साथ चले।
विद्रोही सत्ता और लड़ाई कैसे चली
22 जनवरी 1863 को गुप्त अस्थायी राष्ट्रीय सरकार ने विद्रोह का ऐलान किया। विद्रोहियों के पास कम बंदूकें और कम प्रशिक्षण था। वे खुले मैदान में रूसी सेना का सामना नहीं कर सकते थे।
इसलिए उन्होंने गुरिल्ला युद्ध किया: छोटी टुकड़ियाँ जंगलों में छिपतीं, गश्ती दल या रसद की गाड़ी पर हमला करतीं और गायब हो जातीं। कुल मिलाकर लगभग 1,200 झड़पें हुईं, ज़्यादातर छोटी। अलग-अलग इलाकों में स्थानीय टुकड़ियाँ लड़ीं; हर इलाके के अपने नेता और अपनी कहानियाँ थीं।
विद्रोहियों ने थोड़े समय के लिए तानाशाह (dictator) नाम के सेनापति भी चुने। आखिरी और सबसे जाने-माने रोमुआल्ड ट्राउगुट थे, जिन्होंने 1863 के आखिर में पूरे विद्रोह को बेहतर ढंग से संगठित करने की कोशिश की।
भूमिगत राज्य और उसके नेता
विद्रोह की एक छिपी हुई सरकार थी जो असली राज्य की तरह काम करती थी: आदेश देती, कर लेती, गुप्त डाक और पुलिस चलाती और स्थानीय अधिकारी चुनती। लोग इसे भूमिगत राज्य कहते थे। उसके नेता झूठे नामों से छिपकर रहते और जगह बदलते रहते थे।
रोमुआल्ड ट्राउगुट ने अक्टूबर 1863 से इसे चलाया। अप्रैल 1864 में वे गिरफ़्तार हुए और अगस्त 1864 में वारसॉ में उन्हें फाँसी हुई। इसके बाद विद्रोह का कोई केंद्रीय नेता नहीं बचा और वह खत्म हो गया।
काम करते भूमिगत राज्य का विचार दूसरे विश्व युद्ध में बड़े रूप में लौटा।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
यूरोप के कई लोगों को पोलैंड से सहानुभूति थी। ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रिया ने रूस को कूटनीतिक पत्र भेजे और कहा कि वह 1815 में तय नियमों का सम्मान करे। पर किसी ने सैनिक नहीं भेजे। रूस ने पत्रों को अनसुना किया।
प्रशिया ने रूस की मदद चुनी। फरवरी 1863 में उसने सीमा पर विद्रोहियों को रोकने के लिए सहयोग का समझौता किया। कुछ विदेशी स्वयंसेवक लड़ने आए, पर बहुत कम।
सबक: विद्रोहियों को बाहर से मदद की आस थी, पर बड़ी शक्तियाँ रूस से युद्ध नहीं चाहती थीं।
किसानों को ज़मीन: मुक्ति की तुलना
ज़्यादातर पोलिश लोग किसान थे और जिस ज़मीन पर खेती करते थे, उसके मालिक नहीं थे। उनका साथ तय करता था कि विद्रोह टिकेगा या नहीं। जनवरी 1863 में विद्रोही सरकार ने किसानों को ज़मीन उनकी अपनी संपत्ति के रूप में देने का वादा किया।
ज़ार को किसानों को अपने पक्ष में करना था, इसलिए मार्च 1864 के आदेश ने पोलैंड के राज्य के किसानों को उनकी जोती हुई ज़मीन का मालिक बना दिया और ज़मींदारों के प्रति उनके पुराने कर्तव्य खत्म कर दिए। इससे विद्रोह का साथ देने वाले कुलीनों को चोट पहुँची।
दूसरे हिस्सों से तुलना:
- प्रशिया का हिस्सा: 1807 से 1820 के दशक तक के सुधारों ने भूदासता खत्म की, पर किसानों को अक्सर पैसे या कुछ ज़मीन से कीमत चुकानी पड़ी।
- ऑस्ट्रिया का हिस्सा (गैलिसिया): भूदासता 1848 में खत्म हुई।
- रूसी हिस्सा: ज़मीन का मालिकाना 1864 में मिला, विद्रोह के सीधे जवाब के रूप में।
दमन, निर्वासन और साइबेरिया
1864 के बाद रूस ने पूरे समाज को सज़ा दी। नेताओं को फाँसी हुई, हज़ारों लोगों को जेल, कठोर श्रम या दूर साइबेरिया में निर्वासन मिला, और भाग लेने वालों की जागीरें ज़ब्त हुईं। पोलैंड के राज्य ने अपना अलग नाम और संस्थाएँ खो दीं। दफ़्तरों और स्कूलों में पोलिश की जगह रूसी आ गई और चर्च पर कड़ी निगरानी हुई।
निर्वासित लोग, जिन्हें सिबिराचि (Sybiracy) कहते हैं, महीनों पैदल या सफ़र करके पहुँचे। कुछ खदानों में, कुछ गाँवों में काम करते थे। उनके पत्र, संस्मरण और गीत पोलिश स्मृति का हिस्सा बन गए।
आधुनिक पोलिश राष्ट्र के लिए इसका महत्व
विद्रोह हार गया, पर उसने पोलिश लोगों की सोच बदल दी। दो बड़े बदलाव आए।
- किसान राष्ट्र का हिस्सा बने। 1864 के बाद किसानों के पास ज़मीन थी और वे धीरे-धीरे राष्ट्रीय जीवन से जुड़े।
- नया तरीका: जैविक कार्य (organic work)। लेखकों और विचारकों ने कहा: जो युद्ध जीत नहीं सकते उसे मत लड़ो; स्कूल, व्यापार, विज्ञान और संस्कृति बनाओ। इसे प्रत्यक्षवाद (positivism) कहते हैं।
विद्रोह, उसके नायकों और निर्वासितों की याद मज़बूत रही। 1918 में जब पोलैंड फिर आज़ाद हुआ, तो यह याद भी लोगों के तैयार होने का एक कारण थी।
करके देखो
अंदाज़ा लगाओ, फिर 3D में जाँचो: किस चरण में नली सबसे ज़्यादा भरी है? ज़मीन के टुकड़े किस चरण में दिखते हैं? पाँच डिब्बों की कारण-परिणाम श्रृंखला बनाओ (दबाव, भर्ती, गुरिल्ला युद्ध, किसानों की ज़मीन, दमन) और हर कड़ी पर एक तीर का नाम लिखो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- 22 जनवरी 1863: विद्रोह की शुरुआत
- पोलिश लोगों में रेड्स (उग्र) और व्हाइट्स (सावधान)
- रोमुआल्ड ट्राउगुट: अक्टूबर 1863 से नेता; अगस्त 1864 में फाँसी
- मार्च 1864: ज़ार का आदेश, पोलैंड के राज्य के किसानों को ज़मीन
- मुख्य शब्द: गुरिल्ला युद्ध, भूमिगत राज्य, दमन, सिबिराचि, जैविक कार्य
हल किए गए उदाहरण
1. जनवरी विद्रोह का एक लंबे समय का और एक तुरंत का कारण बताओ।
लंबे समय का: 1831 के बाद पोलिश स्वायत्तता का छिनना और आज़ादी की चाह। तुरंत का: जनवरी 1863 में पोलिश नौजवानों की अचानक सेना में भर्ती।
2. विद्रोहियों ने गुरिल्ला तरीका क्यों अपनाया?
वे कम थे, हथियार कम थे और खुले युद्ध का प्रशिक्षण नहीं था। जंगलों में छिपी छोटी टुकड़ियाँ हमला करके गायब हो सकती थीं, इसलिए बड़ी रूसी सेना उन्हें आसानी से नहीं पकड़ पाती थी।
3. ज़ार ने 1864 में किसानों को ज़मीन क्यों दी?
किसानों को विद्रोह और उसका नेतृत्व करने वाले कुलीनों से दूर करने के लिए। अगर किसान ज़ार की वजह से ज़मीन के मालिक बनते तो वे विद्रोहियों के नहीं, ज़ार के साथ रहते।
आम गलतियाँ
- नवंबर विद्रोह (1830-31) और जनवरी विद्रोह (1863-64) को आपस में मिला देना।
- यह सोचना कि बड़ी शक्तियों ने पोलैंड की मदद के लिए सेनाएँ भेजीं। उन्होंने सिर्फ़ कूटनीतिक पत्र भेजे।
- यह कहना कि विद्रोही एक बड़ी सेना बनकर लड़े। वे कई छोटी टुकड़ियों में लड़े।
- भूल जाना कि किसानों का ज़मीन सुधार विद्रोह पर रूस का जवाब था, सिर्फ़ पोलिश विचार नहीं।