स्तोलिपिन कौन थे और उन्होंने क्यों क़दम उठाया?
प्योत्र स्तोलिपिन (1862-1911) पहले गवर्नर, फिर गृह मंत्री और जुलाई 1906 से प्रधानमंत्री (मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष) थे। 1905-06 की क्रांति ने देश को हिला दिया था, और किसानों ने कई ज़मींदारों की जागीरें जलाई या क़ब्ज़े में ले ली थीं।
स्तोलिपिन के दो औज़ार थे। पहला, बल: 1906-07 में सैनिक अदालतों ने विद्रोहियों को जल्दी सज़ा दी। दूसरा, सुधार: वे मज़बूत, संपत्ति वाले किसानों का एक वर्ग बनाना चाहते थे जो व्यवस्था का साथ दे और खेती को ज़्यादा उपजाऊ बनाए। इस विचार को अक्सर "मज़बूतों पर दाँव" कहा जाता है।
भूमि सुधार: समुदाय से मुक्ति
समुदाय (कम्यून) में गाँव ज़मीन साझा रखता और हर परिवार को कई पतली पट्टियाँ देता था, जो समय-समय पर दोबारा बाँटी जाती थीं। किसान आसानी से छोड़ नहीं सकते थे, और पट्टियाँ सुधारने की किसी के पास वजह नहीं थी।
9 नवंबर 1906 के आदेश (1910 में क़ानून बना) ने हर किसान को समुदाय छोड़कर अपना हिस्सा निजी संपत्ति के रूप में, एक सघन खेत की तरह, माँगने की छूट दी: खुतोर (गाँव के बाहर खेत-घर) या ओत्रुब (गाँव में रहते हुए एक खेत)। किसान भूमि बैंक ने ज़मीन ख़रीदने के लिए कर्ज़ दिया। 1907 से मोचन-भुगतान रद्द हो गए।
नतीजा: लगभग 1915 तक करीब एक चौथाई किसान परिवार समुदाय छोड़ चुके थे। ज़्यादातर गाँवों में समुदाय बना रहा।
पूर्व में बसावट
राज्य ने भीड़ भरे मध्य इलाक़ों के किसानों को कम आबादी वाले पूर्व, यानी साइबेरिया, स्तेपी और मध्य एशिया में जाने में भी मदद की। उसने सस्ती या मुफ़्त यात्रा (विशेष रेल डिब्बे), कर्ज़ और बड़े खेत दिए। 1906-1914 में लगभग 30 लाख लोग गए। कई सफल हुए और साइबेरिया की खेती और डेयरी का व्यापार बढ़ा। पर कुछ बसने वालों को ख़राब ज़मीन या बिना मदद मिली, और लगभग 5 में से 1 लौट आया।
3 जून 1907 का क़ानून और तीसरी-चौथी दूमा
17 अक्तूबर 1905 के घोषणापत्र ने राज्य दूमा बनाई थी। पहली दूमा (1906) और दूसरी दूमा (1907) ने सरकार की आलोचना की और कुछ ही महीनों में भंग कर दी गईं। 3 जून 1907 को ज़ार ने दूसरी दूमा भंग की और दूमा से पूछे बिना मतदान क़ानून बदल दिया। इसे तीन जून की व्यवस्था कहते हैं।
नए क़ानून में वोट असमान था। मतदाता निर्वाचक चुनते थे, और निर्वाचक सदस्य। एक निर्वाचक लगभग 230 ज़मींदारों की ओर से होता था, पर लगभग 60 000 किसानों और 125 000 मज़दूरों की ओर से। ग़ैर-रूसी इलाक़ों को कम सीटें मिलीं।
- तीसरी दूमा (1907-1912) अपने पूरे पाँच साल चलने वाली अकेली दूमा थी। इसमें नरमपंथी अक्तूबरवादी आगे थे और उसने स्तोलिपिन के भूमि-सुधार और सेना-सुधारों का साथ दिया।
- चौथी दूमा (1912-1917) में भी दक्षिणपंथ और मध्य का दबदबा था, पर सरकार से टकराव ज़्यादा हुआ, ख़ासकर युद्ध में। वह 1917 की क्रांति तक चली।
परिणाम और सुधारों का अंत
फ़ायदे: खेती बढ़ी, फ़सल और अनाज का निर्यात बढ़ा, और संपन्न किसानों की एक परत बनी। साइबेरिया में नए खेत बसे।
सीमाएँ: ज़्यादातर किसान समुदायों में रहे, ग़रीब किसान अक्सर अपने खेत बेचकर भूमिहीन हो गए, और कुलीनों की बड़ी जागीरें छुई नहीं गईं। कई किसान अब भी वह ज़मीन चाहते थे। सुधार को शांति और समय चाहिए था।
1 सितंबर 1911 को कीव में स्तोलिपिन को गोली मारी गई और चार दिन बाद उनकी मृत्यु हुई। ज़ार ने उनका रास्ता नहीं निभाया, और 1914 में पहला विश्वयुद्ध शुरू हुआ। सुधार रुक गए। इतिहासकार आज भी बहस करते हैं कि क्या वे क्रांति रोक सकते थे।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- स्तोलिपिन: प्रधानमंत्री जुलाई 1906 – गोली 1 सितंबर 1911 (मृत्यु 5 सितंबर)
- 9 नवंबर 1906 का आदेश: किसान समुदाय छोड़कर सघन खेत (खुतोर / ओत्रुब) के मालिक बन सकते हैं
- 1907 से मोचन-भुगतान रद्द; किसान भूमि बैंक कर्ज़ देता है
- बसावट 1906-14: लगभग 30 लाख लोग पूर्व गए (लगभग 5 में 1 लौटा)
- 3 जून 1907: नया मतदान क़ानून; तीसरी दूमा 1907-12 (पूरा कार्यकाल); चौथी दूमा 1912-17
हल किए गए उदाहरण
1. 90 लाख सामुदायिक परिवारों में से 4 में 1 ने समुदाय छोड़ा। लगभग कितने हुए?
90 लाख ÷ 4 = लगभग 22.5 लाख परिवार (असली संख्या 20 लाख से थोड़ी ऊपर थी)।
2. 1906 के क़ानून ने खेती की कैसे मदद की?
अपना एक सघन खेत रखने वाला किसान मिट्टी सुधार सकता था, नई फ़सल आज़मा सकता था और उधार ले सकता था, क्योंकि फ़ायदा उसी को मिलता। समुदाय में पट्टियाँ हाथ बदलती थीं।
3. तीसरी दूमा अपना कार्यकाल क्यों पूरा कर सकी जबकि पहली दो नहीं?
1907 के मतदान क़ानून ने ज़मींदारों को कहीं ज़्यादा वोट दिए। तीसरी दूमा नरम थी और ज़्यादातर सरकार का साथ देती थी, इसलिए भंग नहीं हुई।
4. दो कारण दीजिए कि सुधार ज़मीन की समस्या क्यों नहीं सुलझा सके।
ज़्यादातर किसान समुदायों में रहे और कुलीनों की बड़ी जागीरें छुई नहीं गईं, इसलिए ज़मीन की भूख बनी रही। साथ ही स्तोलिपिन की मृत्यु और युद्ध ने सुधार रोक दिए।
5. कुछ इतिहासकार 3 जून 1907 को "तख़्तापलट" क्यों कहते हैं?
ज़ार ने अपने आदेश से मतदान क़ानून बदला। अक्तूबर घोषणापत्र ने कहा था कि दूमा के बिना कोई क़ानून पास नहीं होगा, इसलिए कई लोगों ने इसे वादे का उल्लंघन माना।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि स्तोलिपिन ने किसानों को ज़बरदस्ती समुदाय से निकाला। क़ानून ने उन्हें चाहने पर छोड़ने दिया; कई ने रुकना चुना।
- कहना कि समुदाय ख़त्म हो गया। 1915 तक केवल लगभग एक चौथाई परिवारों ने उसे छोड़ा।
- दूमाओं को गड्डमड्ड करना। पहली और दूसरी जल्दी भंग हुईं; तीसरी (1907-12) अकेली अपना कार्यकाल पूरा कर सकी; चौथी 1912-17 चली।
- बसावट को केवल असफलता मानना। ज़्यादातर बसने वाले टिके और साइबेरिया की खेती बढ़ी, हालाँकि लगभग 5 में 1 लौटा।