पोलैंड का राज्य: संविधान, अर्थव्यवस्था, स्कूल और संस्कृति
1815 में वियना कांग्रेस (नेपोलियन की हार के बाद यूरोप की बड़ी शक्तियों की बैठक) ने पोलैंड का राज्य बनाया, जिसे अक्सर कांग्रेस पोलैंड कहते हैं। उसका राजा रूस का ज़ार था, जिसका प्रतिनिधि वारसॉ में वायसराय था। सेना का कमान ग्रैंड ड्यूक कॉन्स्टेंटाइन के पास थी।
- शासन-व्यवस्था: लिखित संविधान, जो उस समय के सबसे उदार संविधानों में था। दो सदनों वाली संसद सेम क़ानून बनाती थी, पर उसकी बैठकें छोटी होती थीं और राजा बहुत-सी बातें अनसुनी कर सकता था। पद पोलिश लोगों के पास थे और सरकारी भाषा पोलिश थी।
- सेना: अलग पोलिश सेना, पोलिश अफ़सरों के साथ।
- अर्थव्यवस्था: वित्त मंत्री ल्यूबेत्स्की ने बजट सुधारा, पोलिश बैंक (1828) बनाया और खानों, कारख़ानों और नहरों की मदद की। कपड़ा उद्योग बढ़ा।
- स्कूल और संस्कृति: वारसॉ विश्वविद्यालय (1816), कई स्कूल और विद्वत-समितियाँ। कवि, वैज्ञानिक और कलाकार पोलिश में काम करते थे।
नवंबर विद्रोह के कारण
कई कारण मिल गए थे।
- टूटा संविधान: 1819 से सेंसरशिप शुरू हुई, गुप्त पुलिस लोगों पर नज़र रखने लगी और सेम की खुली बहस सीमित हुई। ज़ार धीरे-धीरे निरंकुश शासक की तरह चलने लगा।
- गुप्त संगठन: युवा अफ़सरों, छात्रों और दूसरों ने गुप्त समितियाँ बनाईं जो पूरी आज़ादी का सपना देखती थीं।
- विदेश के उदाहरण: 1830 की जुलाई क्रांति में फ़्रांस में और फिर बेल्जियम में लोगों ने विद्रोह से अधिकार जीते।
- सेना पर ख़तरा: ज़ार इन क्रांतियों को कुचलने के लिए पोलिश सेना भेजना चाहता था। सैनिक यह नहीं चाहते थे।
29 नवंबर 1830 की रात वारसॉ के अफ़सर-स्कूल के कैडेटों ने, पियोत्र विसोत्स्की के नेतृत्व में, बेलवेदर महल और शस्त्रागार पर हमला किया। वारसॉ के लोग उनके साथ आ गए।
लड़ाई का क्रम और स्वरूप
शुरुआती नेता ज़ार से बातचीत की उम्मीद रखते थे। 25 जनवरी 1831 को सेम ने घोषणा की कि ज़ार अब पोलैंड का राजा नहीं है, और युद्ध तय हो गया। फ़रवरी में रूसी सेना घुसी। पोलिश लोग नियमित युद्ध लड़े, यानी दो सेनाओं के बीच, गुरिल्ला युद्ध नहीं। ग्रोखोव की लड़ाई (फ़रवरी 1831) ख़ूनी और बराबरी की थी। ओस्त्रोलेंका (मई 1831) में पोलिश सेना हारी।
पोलिश लोगों को मुश्किल क्यों हुई? रूसी सेना बहुत बड़ी थी। दूसरी शक्तियों ने सहानुभूति के बावजूद मदद नहीं की। नेताओं में मतभेद था, और ज़्यादातर किसानों को ज़मीन का वादा नहीं मिला था, इसलिए विद्रोह जन-आंदोलन नहीं बन सका। दोनों सेनाओं में हैज़ा भी फैला। वारसॉ 8 सितंबर 1831 को गिर गया।
विद्रोह के परिणाम
हार भारी थी।
- 1832 के ऑर्गेनिक स्टैचू ने संविधान की जगह ले ली। सेम और पोलिश सेना भंग हो गईं और राज्य रूस से और कसकर बाँध दिया गया।
- वारसॉ विश्वविद्यालय और कई स्कूल बंद कर दिए गए। विद्रोहियों की जागीरें ज़ब्त हुईं।
- हज़ारों अफ़सर, लेखक और नेता देश छोड़ गए। यह महान प्रवासन है, ज़्यादातर फ़्रांस की ओर। निर्वासन में मित्स्केविच जैसे कवियों ने ऐसी रचनाएँ लिखीं जिन्होंने आज़ादी का सपना ज़िंदा रखा।
- विद्रोह ने दिखाया कि विदेशी मदद और किसानों को साथ लिए बिना बहादुरी काफ़ी नहीं। यह एक प्रतीक भी बना, नारे के साथ: "हमारी और तुम्हारी आज़ादी के लिए"।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- 1815: वियना कांग्रेस ने पोलैंड का राज्य बनाया
- 29 नवंबर 1830: वारसॉ में विद्रोह शुरू
- 25 जनवरी 1831: सेम ने ज़ार को पद से हटाया
- फ़रवरी 1831: ग्रोखोव की लड़ाई
- 8 सितंबर 1831: वारसॉ का पतन
- 1832: ऑर्गेनिक स्टैचू, संविधान और सेना का अंत
हल किए गए उदाहरण
1. 1815 में पोलैंड के राज्य के पास अपनी दो चीज़ें बताओ।
जैसे अपना संविधान और सेम (संसद), अपनी सेना, सरकारी भाषा पोलिश, और अपने स्कूल तथा विश्वविद्यालय।
2. विद्रोह के दो कारण बताओ।
ज़ार ने संविधान तोड़ा (सेंसरशिप, गुप्त पुलिस), और फ़्रांस-बेल्जियम की 1830 की क्रांतियों की ख़बर ने विद्रोहियों को हिम्मत दी। पोलिश सेना को उन क्रांतियों के ख़िलाफ़ भेजने की योजना ने भी युवा अफ़सरों को कदम उठाने पर मजबूर किया।
3. विद्रोह किसने और कहाँ शुरू किया?
पियोत्र विसोत्स्की के नेतृत्व में युवा अफ़सरों और कैडेटों ने 29 नवंबर 1830 की रात वारसॉ में शुरू किया।
4. विद्रोह की हार के दो कारण बताओ।
रूसी सेना बहुत बड़ी थी और किसी विदेशी राज्य ने मदद नहीं की। साथ ही नेताओं में मतभेद था और किसानों को साथ नहीं लिया गया।
5. 1832 में पोलैंड के राज्य में क्या बदला?
ऑर्गेनिक स्टैचू ने संविधान की जगह ली। सेम और पोलिश सेना भंग कर दी गईं।
6. महान प्रवासन क्या था और क्यों महत्त्वपूर्ण है?
हार के बाद हज़ारों पोलिश अफ़सरों, लेखकों और नेताओं का विदेश (मुख्यतः फ़्रांस) जाना। निर्वासन में उन्होंने पोलिश संस्कृति और आज़ादी की आशा को ज़िंदा रखा।
आम गलतियाँ
- यह समझना कि पोलैंड का राज्य पूरी तरह आज़ाद था। उसका संविधान और अपनी सेना थी, पर राजा रूस का ज़ार था।
- नवंबर विद्रोह (1830-31) को जनवरी विद्रोह (1863) से मिला देना। ये अलग हैं, और बाद का है।
- कहना कि विद्रोह सिर्फ़ एक घटना से शुरू हुआ। यह कई कारणों का लंबा जमाव था और ऊपर से एक चिंगारी।
- इसे गुरिल्ला युद्ध समझना। 1831 में दो नियमित सेनाओं ने आमने-सामने की लड़ाइयाँ लड़ीं।