पृष्ठभूमि: नव संस्कृति आंदोलन
1911 की क्रांति के बाद गणराज्य कमज़ोर था, और कई विचारकों का मानना था कि चीन की गहरी समस्या विचारों और आदतों में है। 1915 में छन तुशिउ ने पत्रिका न्यू यूथ (शिन छिंगनियन) शुरू की। हू शी, लू शुन और ली ताचाओ जैसे लेखक जुड़े। यही नव संस्कृति आंदोलन है।
- "मिस्टर डेमोक्रेसी" और "मिस्टर साइंस": आंदोलन ने कहा कि चीन को लोकतंत्र और विज्ञान चाहिए।
- रोज़ की भाषा: उन्होंने कठिन शास्त्रीय चीनी की जगह बोलचाल की भाषा (पाइह्वा) में लिखने का आग्रह किया, ताकि ज़्यादा लोग पढ़-लिख सकें।
- पुरानी आदतों पर सवाल: उन्होंने पारिवारिक रीतियों, महिलाओं की स्थिति और परीक्षा-आधारित पुरानी शिक्षा पर कठिन सवाल उठाए।
साई य्वानपेई के नेतृत्व में पेइचिंग विश्वविद्यालय इन विचारों का केंद्र बना। छात्रों की एक पीढ़ी कार्रवाई के लिए तैयार थी।
चार मई का घटनाक्रम
चीन 1917 में पहले विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की ओर से शामिल हुआ और यूरोप में मज़दूर भेजे। लोगों को आशा थी कि शांति वार्ता में शानतुंग के जर्मन अधिकार लौटा दिए जाएँगे। पर 1919 के पेरिस शांति सम्मेलन में शक्तियों ने उन्हें जापान को देने पर सहमति दी, और कुछ चीनी अधिकारी पहले ही जापान से सौदे कर चुके थे।
4 मई 1919 को पेइचिंग के 13 कॉलेजों के 3,000 से ज़्यादा छात्र थ्येनआनमन पर जमा हुए और शहर में मार्च किया। उनके नारे विदेश में चीन के अधिकार बचाने और घर में गद्दारों को सज़ा देने की माँग करते थे। कुछ छात्र अधिकारी साओ रूलिन के घर गए और उसमें आग लगा दी; पुलिस ने दर्जनों छात्रों को गिरफ़्तार किया।
गिरफ़्तारियों से समर्थन की लहर उठी। कई शहरों के छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया। 5 जून से शंघाई में मज़दूर हड़ताल पर गए और दुकानदारों ने दुकानें बंद कीं, इसलिए आंदोलन राष्ट्रीय बन गया। सरकार ने छात्रों को छोड़ा, तीन अधिकारियों (साओ रूलिन, चांग चोंगशियांग और लू चोंगयू) को हटाया, और पेरिस में चीन के प्रतिनिधिमंडल ने वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए।
चार मई का महत्त्व
चार मई को आम तौर पर मोड़ माना जाता है:
- जन-देशभक्ति आंदोलन: छात्र, दुकानदार और मज़दूर पहली बार एक राष्ट्रीय मुद्दे पर साथ आए।
- मंच पर मज़दूर: शंघाई की हड़ताल ने दिखाया कि शहरी मज़दूर राजनीतिक ताकत हो सकते हैं।
- नए विचार फैले: रोज़ की भाषा में लेखन, नई विचारधाराएँ और मार्क्सवाद, अराजकतावाद तथा उदारवाद जैसे विचार खूब पढ़े गए।
- नए संगठन: छन तुशिउ और ली ताचाओ जैसे कुछ बुद्धिजीवियों ने 1921 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी बनाने में मदद की। 1924 में सुन यात-सेन की मदद से गुओमिंदांग का पुनर्गठन हुआ।
इतिहासकार बहस करते हैं कि कितना श्रेय नव संस्कृति आंदोलन को है और कितना विरोध प्रदर्शन को, पर सब मानते हैं कि इसने आधुनिक चीन की राजनीति और संस्कृति की दिशा बदली।
करके देखिए
कॉपी में "तीन परतों" का चार्ट बनाइए: विचारों की परत (1915), ग़ुस्से की परत (मई 1919) और कार्रवाई की परत। हर परत में रंग भरिए और एक तारीख़ लिखिए। फिर 3D में तीन बटन दबाकर परिणाम देखिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- तारीख़ें: 1915 न्यू यूथ; 4 मई 1919 छात्र मार्च; 5 जून 1919 शंघाई हड़ताल; 1921 कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना।
- मुख्य लोग: छन तुशिउ, हू शी, लू शुन, ली ताचाओ, साई य्वानपेई।
- मुख्य शब्द: पाइह्वा = रोज़ की लिखित भाषा; नव संस्कृति = नए विचारों का आंदोलन।
- संख्याएँ: 3,000 से ज़्यादा छात्र; 13 कॉलेज; 3 अधिकारी बर्खास्त।
हल किए गए उदाहरण
1. शानतुंग के फ़ैसले से इतना ग़ुस्सा क्यों फैला?
चीन युद्ध में जीतने वाले पक्ष में था और अपने क्षेत्र की वापसी की आशा करता था, पर जर्मनी के अधिकार जापान को मिल गए। लोगों ने इसे चीन की स्वतंत्रता का अपमान माना।
2. चार मई के विरोध के दो परिणाम बताइए।
तीन अधिकारी बर्खास्त हुए और चीनी प्रतिनिधिमंडल ने शांति संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए। साथ ही मज़दूर और व्यापारी राजनीति में आए और नए विचार फैले।
3. नव संस्कृति आंदोलन ने चार मई की तैयारी कैसे की?
उसने लोकतंत्र और राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी जैसे विचार उठाए और छात्रों को चर्चा और कार्रवाई की आदत दी, इसलिए शानतुंग का फ़ैसला आने पर वे तैयार थे।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि चार मई ने सीधे कम्युनिस्ट पार्टी शुरू की। उसने हालात बनाए; पार्टी 1921 में बनी।
- 4 मई 1919 (छात्र) और 5 जून 1919 (मज़दूर हड़ताल) की तारीख़ें मिला देना।
- यह सोचना कि नव संस्कृति आंदोलन 1919 में शुरू हुआ। यह लगभग 1915 में शुरू हुआ।
- यह कहना कि चीन ने वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर किए। उसके प्रतिनिधिमंडल ने मना कर दिया।