उपभोक्ता समाज क्या है?
उपभोक्ता समाज वह है जिसमें बहुत-सा सामान ख़रीदना सामान्य जीवन और अर्थव्यवस्था का हिस्सा हो। 1945 के बाद यह अमेरिका, यूरोप और जापान में फैला, और बाद में भारत, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे कई देशों में। कई कारण साथ आए: बड़े पैमाने के उत्पादन ने सामान सस्ता किया, मज़दूरी और उधार (क्रेडिट) बढ़े, विज्ञापन ने नई चाहतें बनाईं, और कार, फ़्रिज, टीवी और प्लास्टिक जैसी चीज़ें आम हुईं। कुछ निर्माता ऐसा सामान भी बनाते थे जो जल्दी घिस जाए या फ़ैशन से बाहर हो जाए, जिससे बिक्री बढ़ती है। 1950 के आसपास से ऊर्जा, सामग्री और कचरे में आई तेज़ बढ़त को इतिहासकार ग्रेट एक्सेलेरेशन (महा-त्वरण) कहते हैं।
पर्यावरण की क़ीमत: प्रदूषण और कचरा
ज़्यादा बनाने और ख़रीदने का मतलब था प्रकृति से ज़्यादा संसाधन लेना और ज़्यादा कचरा लौटाना। वायु प्रदूषण कोयले के धुएँ, कारख़ानों और गाड़ियों से आया। दिसंबर 1952 में लंदन में कोहरे और कोयले के धुएँ का घना धुँधलका हज़ारों मौतों से जोड़ा गया। जल प्रदूषण कारख़ानों के कचरे और सीवेज से आया; 1969 में अमेरिका की कुयाहोगा नदी तेल के कारण जल उठी। जापान में कारख़ाने के कचरे के पारे से मिनामाता रोग हुआ। प्लास्टिक और पैकेजिंग के रूप में कचरा जमा हुआ, जो बहुत धीरे सड़ता है। कोयला, तेल और गैस जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) भी निकली, जो धरती को गरम करती है।
भारत में भोपाल गैस रिसाव (1984) ने बिना कड़े सुरक्षा-नियमों के उद्योग का ख़तरा दिखाया, और कई बड़े शहर आज भी गाड़ियों, धूल, उद्योग और पराली जलाने से सर्दी के स्मॉग झेलते हैं।
लोगों का जवाब: आंदोलन, क़ानून और संधियाँ
- किताबें और आंदोलन। रेचल कार्सन की साइलेंट स्प्रिंग (1962) ने कीटनाशकों से वन्यजीवों के मरने की चेतावनी दी। 22 अप्रैल 1970 के पहले अर्थ डे पर अमेरिका में लाखों लोग सड़कों पर आए।
- क़ानून। ब्रिटेन ने धुँधलके के बाद 1956 में स्वच्छ वायु अधिनियम बनाया। अमेरिका ने 1970 में पर्यावरण संरक्षण एजेंसी बनाई और कड़ा स्वच्छ वायु अधिनियम पास किया। भारत ने 1986 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम बनाया।
- संधियाँ। स्टॉकहोम का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (1972) पर्यावरण को दुनिया के एजेंडे पर लाया। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) ने ओज़ोन परत को नुक़सान पहुँचाने वाले रसायन चरणबद्ध ढंग से बंद किए, और यह सफल रहा। पेरिस समझौता (2015) धरती के गरम होने को सीमित करने का लक्ष्य रखता है।
- रोज़ का बदलाव। पुनर्चक्रण, बोतलों की जमानत-वापसी, साफ़ गाड़ियाँ और "घटाओ, दोबारा इस्तेमाल करो, पुनर्चक्रण करो"।
क्या समस्या हल हो गई? स्थानीय सुधार और वैश्विक सीमाएँ
कई अमीर देशों में 1970 के बाद क़ानूनों, फ़िल्टरों और सीवेज-संयंत्रों से धुआँ और नदियों का प्रदूषण घटा। कुछ प्रदूषण उन देशों में चला भी गया जहाँ अब सामान बनता है। पर कुल खपत, कचरा और CO₂ बढ़ते रहे। अर्थशास्त्री विलगाव (डीकपलिंग) की बात करते हैं: ऐसी तरक़्क़ी जिसमें संसाधनों के उपयोग और प्रदूषण में उतनी ही बढ़त ज़रूरी न हो। कुछ लोग चक्रीय अर्थव्यवस्था (दोबारा इस्तेमाल और मरम्मत) और टिकाऊ उपभोग (कम ख़रीदो, बेहतर ख़रीदो) की माँग करते हैं। यह कहानी बताती है कि क़ानून काम करते हैं, पर उन्हें हमारी ख़रीदारी की रफ़्तार के साथ चलना पड़ता है।
खुद करके देखिए: अपनी दस चीज़ों की सूची बनाइए और लिखिए कि आपके दादा-दादी के पास ये कब होती होंगी। फिर 3D लैब में साल 1900 से 2020 तक चलाइए और वह साल ढूँढ़िए जब स्थानीय प्रदूषण घटना शुरू होता है पर कचरे की पट्टी चढ़ती रहती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य शब्द: उपभोक्ता समाज, बड़े पैमाने का उत्पादन, इस्तेमाल करो और फेंको संस्कृति, ग्रेट एक्सेलेरेशन
- कारण → असर: सस्ता सामान → ज़्यादा ख़रीदारी → ज़्यादा कचरा और प्रदूषण → विरोध → क़ानून
- क़ानूनों से स्थानीय प्रदूषण घट सकता है, जबकि दुनिया का कचरा और CO₂ बढ़ सकते हैं
- प्रतिशत परिवर्तन = (नया − पुराना) ÷ पुराना × 100
- तीन R: घटाओ (Reduce), दोबारा इस्तेमाल करो (Reuse), पुनर्चक्रण करो (Recycle)
हल किए गए उदाहरण
1. लैब के चित्रात्मक सूचकांक में ख़रीदा सामान 1950 में 2.5 से 2000 में 8 हो गया। यह कितने गुना बड़ा है?
8 ÷ 2.5 = 3.2 गुना।
2. एक परिवार 1900 में साल में लगभग 4 नई चीज़ें ख़रीदता था और आज 60 ख़रीदता है। प्रतिशत बढ़त निकालिए।
(60 − 4) ÷ 4 × 100 = 56 ÷ 4 × 100 = 1400%।
3. एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक की बोतल 10 मिनट चलती है और सैकड़ों साल में सड़ती है। यह पाठ का कौन-सा विचार दिखाती है, और बेहतर चुनाव क्या है?
यह इस्तेमाल करो और फेंको संस्कृति दिखाती है। बेहतर चुनाव दोबारा भरने वाली बोतल (पुनः उपयोग) है, जो कचरा घटाती है।
4. 1952 के लंदन के धुँधलके की कहानी क्रम में लगाइए: स्वच्छ वायु अधिनियम 1956; हज़ारों मौतें; कोहरा और कोयले का धुआँ मिलना।
कोहरा और कोयले का धुआँ मिला → हज़ारों मौतें → स्वच्छ वायु अधिनियम 1956, जिसने शहरों में कोयला जलाना सीमित किया।
5. 1975 के बाद एक अमीर देश में स्थानीय वायु प्रदूषण घटा, फिर भी उसका CO₂ ऊँचा रहा। एक कारण बताइए।
क़ानून और फ़िल्टर धुएँ और गंदे पानी पर केंद्रित थे, पर CO₂ हमारे बनाए-ख़रीदे हर सामान की ऊर्जा से आती है, इसलिए खपत बढ़ती रहे तो वह भी बढ़ती है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि प्रदूषण 1945 से ही शुरू हुआ। 1800 के दशक में भी शहर धुएँ से भरे थे। 1945 के बाद उसका पैमाना तेज़ी से बढ़ा।
- यह मानना कि क़ानूनों ने पूरी समस्या हल कर दी। स्थानीय प्रदूषण अक्सर घटा, पर कचरा और CO₂ बढ़ते रहे।
- "सिर्फ़ अमीर देश प्रदूषण करते हैं" कहना। अब कई देश प्रदूषण करते हैं, और अमीर देश भी दूसरी जगह बना सामान मँगाते हैं।
- लैब के सूचकांक को असली आँकड़ा मान लेना। यह रुझान दिखाने वाला चित्र है, नापी हुई संख्याएँ नहीं।