पर्यावरण नीतिशास्त्र क्या है?
पर्यावरण नीतिशास्त्र (environmental ethics) नीतिशास्त्र का वह हिस्सा है जो पूछता है कि हमें प्रकृति से कैसा बर्ताव करना चाहिए: हवा, पानी, ज़मीन, पौधे, जानवर और हमारे बाद आने वाले लोग।
1970 के दशक में प्रदूषण, कटते जंगल और मिटती प्रजातियों ने लोगों को पूछने पर मजबूर किया: क्या प्रकृति सिर्फ़ संसाधनों का गोदाम है? या उसका अपना मूल्य है?
- साधन-मूल्य (instrumental value): चीज़ कीमती है क्योंकि काम आती है (जंगल से लकड़ी)।
- आंतरिक मूल्य (intrinsic value): चीज़ अपने आप में कीमती है (जंगल अच्छा है, चाहे कोई उपयोग न करे)।
- नैतिक स्थिति (moral status): ऐसा होना जिसके हितों का हमें ध्यान रखना पड़े।
मानव-केंद्रित दृष्टि
मानव-केंद्रवाद (anthropocentrism) कहता है सिर्फ़ इंसानों की नैतिक स्थिति है। प्रकृति का मूल्य इतना ही है कि लोगों को उसकी ज़रूरत है।
- कठोर रूप: इंसान के फ़ायदे के लिए प्रकृति का खुलकर उपयोग।
- नरम (समझदार) रूप: प्रकृति को सावधानी से बचाओ, क्योंकि साफ़ हवा, पानी और स्थिर जलवायु इंसानों को आज और कल चाहिए।
कई पश्चिमी विचारक (जैसे देकार्त, जो जानवरों को मशीन मानते थे, और कांट, जिन्होंने कहा जानवरों पर क्रूरता ग़लत है मुख्यतः क्योंकि यह इंसान को क्रूर बनाती है) इसी ओर झुके थे। आलोचक कहते हैं यह प्रकृति को दुकान जैसा मानता है।
जानवर: कल्याण और अधिकार
बेंथम ने पूछा: सवाल यह नहीं कि वे सोच सकते हैं या नहीं, सवाल है "क्या वे दुख झेल सकते हैं?" इसे संवेदनवाद (sentientism) कहते हैं: जो भी दर्द महसूस करे, वह मायने रखता है।
- पशु कल्याण (पीटर सिंगर): जानवर का दुख इंसान के वैसे ही दुख के बराबर गिना जाए। जानवरों का उपयोग हो सकता है, पर दर्द घटाना ज़रूरी है (बेहतर फ़ार्म, कम परीक्षण, प्रयोगशाला में 3R: बदलो, घटाओ, सुधारो)। सिर्फ़ दूसरी प्रजाति होने से बुरा बर्ताव करना प्रजातिवाद (speciesism) है।
- पशु अधिकार (टॉम रीगन): जानवर "जीवन के कर्ता" हैं जिनके अधिकार हैं। उन्हें कभी सिर्फ़ साधन नहीं बनाया जा सकता, चाहे दर्द कम हो।
भारतीय जुड़ाव: जैन, बौद्ध और हिंदू विचार में अहिंसा, और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51A(g) (जीवों के प्रति दया का कर्तव्य) पशु-देखभाल का समर्थन करते हैं।
जीव-केंद्रित और पारिस्थितिकी-केंद्रित दृष्टि
- जीव-केंद्रवाद (biocentrism): हर जीव, पौधे और सूक्ष्मजीव भी, का आंतरिक मूल्य है। अल्बर्ट श्वाइत्ज़र ने इसे जीवन के प्रति श्रद्धा कहा; पॉल टेलर ने कहा हर जीव का अपना भला है।
- पारिस्थितिकी-केंद्रवाद (ecocentrism): सबसे ज़रूरी पूरे तंत्र हैं: प्रजातियाँ, नदियाँ, जंगल, ज़मीन। एल्डो लियोपोल्ड की भूमि नैतिकता: कोई काम सही है जब वह जीव-समुदाय की अखंडता, स्थिरता और सुंदरता बचाए।
- गहन पारिस्थितिकी (deep ecology, आर्ने नेस): हर जीवन को फलने-फूलने का बराबर हक़; इंसान सादगी से जिएँ और असर घटाएँ।
फ़र्क: जीव-केंद्रवादी हर पेड़ की चिंता करता है; पारिस्थितिकी-केंद्रवादी कुछ पेड़ कटने दे सकता है अगर पूरा जंगल स्वस्थ रहे।
प्रकृति पर पूर्वी और पश्चिमी दृष्टि
- कई पश्चिमी परंपराएँ (ख़ासकर आधुनिक विज्ञान और उद्योग) प्रकृति को इंसान से अलग, जानने, वश में करने और उपयोग की चीज़ मानती रहीं। इससे बड़े आविष्कार हुए, पर प्रदूषण भी।
- कई पूर्वी परंपराएँ इंसान को एक पूरे का हिस्सा मानती हैं: ताओवाद प्राकृतिक राह पर चलना सिखाता है (वू वेई, ज़बरदस्ती नहीं); बौद्ध धर्म कहता है सब चीज़ें एक-दूसरे पर निर्भर हैं; कन्फ़्यूशियस विचार आकाश, धरती और लोगों में सामंजस्य चाहता है; भारतीय विचार वसुधैव कुटुम्बकम् और पवित्र नदियों, पेड़ों, उपवनों की बात करता है।
- हर महाद्वीप के आदिवासी समुदाय अक्सर ज़मीन को संपत्ति नहीं, रिश्तेदार मानते हैं।
ये मोटी प्रवृत्तियाँ हैं, नियम नहीं: हर संस्कृति में प्रकृति के सावधान और लापरवाह दोनों उपयोग मिलते हैं।
भावी पीढ़ियाँ और सतत विकास
आज के हमारे काम (ईंधन जलाना, भूजल खींचना, प्लास्टिक फेंकना) उन लोगों पर असर डालेंगे जो अभी पैदा नहीं हुए। पीढ़ियों के बीच न्याय कहता है कि रहने लायक धरती पर उनका भी उचित हक़ है।
सतत विकास यानी आज की ज़रूरतें ऐसे पूरी करना कि भावी पीढ़ियाँ अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें (ब्रंटलैंड रिपोर्ट, 1987)। हान्स योनास ने इसे ज़िम्मेदारी का आदेश कहा: ऐसे जियो कि धरती पर सच्चा मानव जीवन चलता रहे।
व्यावहारिक नियम: सावधानी का सिद्धांत (गंभीर नुक़सान संभव हो तो पूरे सबूत से पहले ही सावधानी) और "प्रदूषक भुगतान करे"।
नैतिक टकराव: असली उदाहरण
- बाँध और जंगल: बाँध पानी और बिजली देता है, पर जंगल और गाँव डुबो देता है। अलग दृष्टियाँ अलग जवाब देती हैं; उचित प्रक्रिया में स्थानीय लोग शामिल हों।
- पशु परीक्षण: दवाएँ जान बचाती हैं, पर जानवर दुख सहते हैं। कल्याण दृष्टि: 3R अपनाओ; अधिकार दृष्टि: बंद करो।
- जलवायु परिवर्तन: अमीर देशों ने पहले ज़्यादा CO₂ छोड़ी; ग़रीब देशों को अभी विकास चाहिए। कौन ज़्यादा घटाए? (साझी पर अलग-अलग ज़िम्मेदारी)
- वन्यजीव बनाम किसान: संरक्षित हाथी या तेंदुए फ़सल या लोगों को नुक़सान पहुँचा सकते हैं। हल: मुआवज़ा, गलियारे और समुदाय की भागीदारी।
परीक्षा टिप: दृष्टियों के नाम लिखिए, कम-से-कम दो को उदाहरण पर लगाइए, और संतुलित निष्कर्ष दीजिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मानव-केंद्रित: सिर्फ़ इंसानों की नैतिक स्थिति; प्रकृति = साधन-मूल्य
- संवेदनवादी: दर्द महसूस करने वाले सब मायने रखते हैं (कल्याण: सिंगर; अधिकार: रीगन)
- जीव-केंद्रित: हर जीव का आंतरिक मूल्य (श्वाइत्ज़र, टेलर)
- पारिस्थितिकी-केंद्रित: पूरे तंत्र मायने रखते हैं (लियोपोल्ड, गहन पारिस्थितिकी)
- सतत विकास: भावी पीढ़ी को नुक़सान दिए बिना आज की ज़रूरतें
हल किए गए उदाहरण
1. एक कंपनी फ़ैक्टरी के लिए जंगल काटना चाहती है। मानव-केंद्रित और पारिस्थितिकी-केंद्रित विचारक क्या कहेंगे?
मानव-केंद्रित: नौकरियों और उत्पादों को साफ़ हवा-पानी के नुक़सान से तौलो; इंसान को ज़्यादा फ़ायदा हो तो सावधानी से अनुमति दो। पारिस्थितिकी-केंद्रित: जंगल-तंत्र का अपना मूल्य है; काटने से जीव-समुदाय की अखंडता टूटेगी, इसलिए दूसरी जगह ढूँढो।
2. डेयरी फ़ार्म के उदाहरण से पशु कल्याण और पशु अधिकार का फ़र्क बताइए।
कल्याण: अगर गायों को अच्छा चारा, जगह मिले और बेवजह दुख न हो, तो डेयरी ठीक हो सकती है। अधिकार: गायें "जीवन की कर्ता" हैं, उन्हें दूध की मशीन की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए; कठोर अधिकारवादी ऐसा उपयोग नहीं मानते।
3. पवित्र उपवन की परंपरा पर्यावरण नीतिशास्त्र में कहाँ बैठती है?
गाँव वाले जंगल के टुकड़े को पवित्र मानकर नहीं काटते। यह सामंजस्य (पूर्वी/आदिवासी) दृष्टि है और इसका नतीजा पारिस्थितिकी-केंद्रित है: झरने, दुर्लभ पौधे और जानवर भावी पीढ़ी के लिए बचते हैं।
4. जलवायु परिवर्तन पीढ़ियों के बीच न्याय का मुद्दा क्यों है?
ग्रीनहाउस गैसें बरसों हवा में रहती हैं। आज के चुनाव उन लोगों के लिए लू, बाढ़ और समुद्र-स्तर बढ़ाएँगे जो अभी पैदा नहीं हुए और आज विरोध नहीं कर सकते। न्याय कहता है उनके लिए उत्सर्जन घटाओ।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि मानव-केंद्रवाद हमेशा प्रकृति नष्ट करता है। समझदार मानव-केंद्रवाद इंसान के भले के लिए प्रकृति बचाता है।
- पशु कल्याण (दुख घटाओ) और पशु अधिकार (सिर्फ़ साधन मत बनाओ) को एक मान लेना।
- जीव-केंद्रित (हर जीव) और पारिस्थितिकी-केंद्रित (पूरा तंत्र) को मिला देना।
- कहना कि पूरा पूर्व प्रकृति बचाता है और पूरा पश्चिम नुक़सान करता है। ये मोटी प्रवृत्तियाँ हैं, नियम नहीं।