इंसान: दर्शन का कर्ता भी और विषय भी
मानवशास्त्र (anthropology) का अर्थ है इंसान का अध्ययन। जीवविज्ञान और समाज-विज्ञान प्रयोग और आँकड़ों से इंसान को पढ़ते हैं। दार्शनिक मानवशास्त्र गहरा सवाल पूछता है: इंसान आख़िर है क्या, और किसी ज़िंदगी को इंसानी क्या बनाता है?
यहाँ इंसान कर्ता (सोचने और पूछने वाला) भी है और विषय (जिसके बारे में सोचा जाए) भी। हम खुद से बाहर निकलकर खुद को नहीं देख सकते, इसलिए यह सवाल ख़ास है।
मुख्य शब्द: मानव स्वभाव (जो सब इंसानों में साझा है), सार (essence, जो किसी चीज़ के होने के लिए ज़रूरी है), व्यक्ति (जिसमें 'मैं' हो और जो ज़िम्मेदार हो सके)।
क्या इंसान दूसरे पशुओं से अलग है?
प्रकार का फ़र्क: कुछ दार्शनिक कहते हैं इंसान अलग तरह का प्राणी है। कई पशु तय माहौल में मुख्य रूप से सहज-वृत्ति (instinct) से चलते हैं। इंसान "अधूरा" पैदा होता है, उसकी तय वृत्तियाँ कम हैं, इसलिए उसे सीखना पड़ता है। हमारी दुनिया खुली है: हम रुककर 'क्यों' पूछ सकते हैं, योजना बना सकते हैं, आविष्कार कर सकते हैं।
मात्रा का फ़र्क: दूसरे, डार्विन के विकासवाद के आधार पर, कहते हैं कि हम भी पशु हैं। चिंपैंज़ी औज़ार चलाते हैं, कौए पहेली सुलझाते हैं, हाथी शोक मनाते दिखते हैं। फ़र्क कम-ज़्यादा है, पूरा नहीं।
यह नैतिकता के लिए अहम है: पशुओं और प्रकृति से हमारा बर्ताव इस पर निर्भर है कि रेखा कहाँ खींचें।
इंसान: एक विवेकशील प्राणी
अरस्तू ने इंसान को विवेकशील प्राणी (rational animal) कहा: ऐसा पशु जो तर्क (लोगोस, जिसका अर्थ वाणी भी है) का उपयोग कर सके। तर्क से हम दलील देते हैं, अवधारणाएँ बनाते हैं, अच्छा-बुरा परखते हैं और क़ानून वाले समुदाय में रहते हैं।
बाद में कांट ने कहा कि तर्क से हम अपने नैतिक नियम खुद बनाते हैं (स्वायत्तता), इसलिए हर व्यक्ति की गरिमा है।
आलोचना: मनोविज्ञान दिखाता है कि भावनाएँ, आदतें और अचेतन मन (फ़्रायड) अक्सर हमें चलाते हैं। नवजात शिशु या गंभीर बीमारी वाले लोग कम तर्क करते हैं, फिर भी पूरी तरह इंसान हैं। इसलिए विवेक अहम शक्ति है, पर पूरी कहानी नहीं।
शरीर और मन: एक चीज़ या दो?
द्वैतवाद (देकार्त): इंसान दो अलग चीज़ों से बना है, पदार्थ का शरीर और अभौतिक सोचने वाला मन। समस्या: कोई अभौतिक चीज़ हाथ को कैसे हिलाए?
एकत्ववाद / भौतिकवाद: सिर्फ़ एक चीज़ है। मन वही है जो जीवित दिमाग और शरीर करते हैं। दिमाग पर शोध गहरा संबंध दिखाता है: दिमाग को चोट लगे तो याददाश्त या व्यक्तित्व बदल जाता है।
आज यह विज्ञान और तकनीक से जुड़ता है: अगर मन दिमाग की क्रिया है, तो क्या कंप्यूटर या रोबोट का भी मन हो सकता है? क्या इंप्लांट और AI बदल देंगे कि इंसान क्या है?
सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वतंत्र: अधूरा इंसान
- सामाजिक प्राणी: हम दूसरों के बीच ही 'हम' बनते हैं। भाषा, परिवार और दोस्त हमारी सोच गढ़ते हैं। अरस्तू ने हमें राजनीतिक (सामुदायिक) प्राणी भी कहा।
- सांस्कृतिक प्राणी: तय वृत्तियाँ कम होने से संस्कृति (औज़ार, रीति-रिवाज, भाषा, कला) वह कमी भरती है। संस्कृति हमारा "दूसरा स्वभाव" है।
- स्वतंत्र और अधूरा: सार्त्र जैसे अस्तित्ववादियों ने कहा अस्तित्व सार से पहले आता है: इंसान का कोई तय नुस्ख़ा नहीं; हम पहले होते हैं, फिर अपने चुनावों से खुद को बनाते हैं, और उनके लिए ज़िम्मेदार हैं।
कई विचारक इन नज़रियों को मिलाते हैं। इंसान एक साथ प्राकृतिक, विवेकशील, सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वतंत्र प्राणी हो सकता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- दार्शनिक मानवशास्त्र = इंसान क्या है, इसका अध्ययन
- कर्ता = जो पूछता है; विषय = जिसे जाँचा जाए
- सहज-वृत्ति = जन्म से मिला तय व्यवहार
- विवेकशील प्राणी = तर्क और वाणी वाला पशु (अरस्तू)
- द्वैतवाद = मन और शरीर दो चीज़ें; एकत्ववाद = एक ही चीज़
- अस्तित्व सार से पहले = हम चुनावों से खुद को बनाते हैं (सार्त्र)
- संस्कृति = समूह का सीखा हुआ जीवन-ढंग जो आगे सिखाया जाता है
हल किए गए उदाहरण
1. एक चिड़िया बिना सीखे हर साल एक जैसा घोंसला बनाती है। एक छात्र नए तरह का घर डिज़ाइन करता है। यह इंसान के किस नज़रिये को दिखाता है?
चिड़िया तय दुनिया में सहज-वृत्ति से चलती है। इंसान खुली दुनिया में सीखकर आविष्कार करता है। यह इस नज़रिये का समर्थन करता है कि इंसान प्रकार में अलग है, उसकी दुनिया खुली है और संस्कृति है।
2. कोई कहता है: "मेरा मन मेरी आत्मा है और शरीर के बिना भी रहेगा।" यह कौन-सा नज़रिया है?
द्वैतवाद: मन और शरीर दो अलग चीज़ें हैं जो अलग हो सकती हैं।
3. एक वैज्ञानिक कहता है: "याददाश्त दिमाग के जोड़ों में रहती है; दिमाग खराब तो याददाश्त गई।" यह किसका समर्थन है?
एकत्ववाद (भौतिकवाद): मन वही है जो दिमाग करता है।
4. "अस्तित्व सार से पहले आता है" उदाहरण से समझाओ।
चाकू बनने से पहले ही काटने के लिए सोचा जाता है: उसका सार पहले आता है। इंसान बिना तय मकसद के पैदा होता है और अपने चुनावों से डॉक्टर, कलाकार या किसान बनता है। पहले अस्तित्व, फिर सार।
आम गलतियाँ
- दार्शनिक मानवशास्त्र को सांस्कृतिक मानवशास्त्र (समुदायों का क्षेत्र-अध्ययन) समझ लेना। यह पूछता है कि इंसान क्या है, सिर्फ़ यह नहीं कि समूह कैसे जीते हैं।
- कहना कि "इंसान में कोई सहज-वृत्ति नहीं"। कुछ हैं (चूसना, डर); दावा यह है कि तय वृत्तियाँ कम हैं।
- द्वैतवाद को "भूत-प्रेत में विश्वास" मान लेना। यह मन और पदार्थ पर एक गंभीर विचार है, पक्ष-विपक्ष के तर्कों के साथ।
- सोचना कि एक नज़रिया ही सही है और बाकी गलत। कई दार्शनिक कई नज़रिये मिलाते हैं।