Netherlands VWO 6 (eindexamenjaar) Philosophy
अध्याय: 2
1. Philosophy of science
Key concepts and main views on science · Scientific knowledge · Science and society
- विज्ञान की प्रकृति: वैज्ञानिक ज्ञान कैसे बनता और बदलता है – विज्ञान जानने का एक तरीका है जो ऐसे साक्ष्य पर टिका है जिसे कोई भी जाँच सकता है। वैज्ञानिक प्रेक्षण करते हैं, अनुमान लगाते हैं, ऐसे विचार परखते हैं जो गलत भी साबित हो सकें, और दूसरे विशेषज्ञों से अपना काम जँचवाते हैं। नियम बताते हैं क्या होता है; सिद्धांत बताते हैं क्यों। वैज्ञानिक ज्ञान भरोसेमंद है पर हमेशा बदलाव के लिए खुला, और कभी-कभी देखने का पूरा ढाँचा (प्रतिमान) ही बदल जाता है।
2. Exam topic: the human being, science and technology
Issue 1: what is a human being? · Issue 2: how do science and technology change our self-image? · Issue 3: does technology change what we are? · Issue 4: blurring boundaries
- दार्शनिक मानवशास्त्र: इंसान क्या है? – दार्शनिक मानवशास्त्र पूछता है कि इंसान क्या है। इंसान पूछने वाला भी है और जिसे जाँचा जाता है वह भी (कर्ता और विषय)। विचारक हमारी तुलना पशुओं से करते हैं: कुछ को गहरा फ़र्क दिखता है (विवेक, भाषा, खुली दुनिया), कुछ को सिर्फ़ मात्रा का। मुख्य नज़रिये इंसान को विवेकशील प्राणी, शरीर और मन का मेल (द्वैतवाद) या एक ही जीवित सत्ता (एकत्ववाद), सामाजिक और सांस्कृतिक प्राणी, और अस्तित्ववादियों के अनुसार स्वतंत्र, अधूरा प्राणी मानते हैं जो अपने चुनावों से खुद को बनाता है। विज्ञान और तकनीक (विकासवाद, दिमाग पर शोध, AI) यह सवाल बार-बार खोलते हैं।
- मन का दर्शन: मन और शरीर कैसे जुड़े हैं? – मन का दर्शन पूछता है कि मन क्या है और शरीर से कैसे जुड़ा है। द्वैतवाद (देकार्त) कहता है मन और शरीर दो अलग चीज़ें हैं, पर तब सवाल उठता है कि वे एक-दूसरे पर असर कैसे डालते हैं। भौतिकवाद कहता है मन दिमाग़ की गतिविधि है। चेतना हमारा भीतरी अनुभव है, एक टॉर्च जैसी। अचेतन (फ्रायड) में इच्छाएँ, यादें और आदतें हैं जिनका हमें पता नहीं होता। साथ के सवाल: समय के साथ मैं वही कैसे रहता हूँ, भावनाएँ क्या हैं, और क्या मशीन सोच सकती है।
- तकनीक का दर्शन: औज़ार हमारे साथ क्या करते हैं – तकनीक वह तरीका है जिससे इंसान औज़ार बनाकर दुनिया बदलता है। दार्शनिक पूछते हैं: क्या औज़ार सिर्फ़ हमारी ताक़त बढ़ाते हैं, या प्रकृति और ख़ुद को देखने का नज़रिया भी बदलते हैं? क्या तकनीकी प्रगति हमेशा असली प्रगति है? क्या हम मशीनें चलाते हैं या वे हमें? और इंसान व मशीन की सीमा कहाँ है?