जोसॉन की शुरुआत: कन्फ़्यूशियाई राज्य
1392 में सेनापति ई सोंग-ग्ये राजा बने और पुराने कोर्यो राज्य का अंत हुआ। 1394 में उन्होंने हानयांग (आज का सियोल) को राजधानी बनाया। जोंग दो-जोन जैसे विचारकों ने नए राज्य को उसके विचार दिए: नव-कन्फ़्यूशियावाद। इसका मतलब है: शासक नैतिक हो, अधिकारी पढ़े-लिखे हों, परिवार में बड़ों का सम्मान हो और अच्छा शासन जनता की देखभाल करे।
जोसॉन ने चीन के मिंग के साथ भी व्यवस्था रखी: वह मिंग दरबार में दूत भेजता और पड़ोसियों से शांति रखता था। राजा सेजोंग (1418-1450) विज्ञान, संगीत और कोरियाई वर्णमाला हंगुल (1446 में घोषित) के लिए प्रसिद्ध हैं।
शासन कैसे चलता था: मंत्रालय, निगरानी और परीक्षा
राजा सबसे ऊपर था, पर वह कुछ भी करने को स्वतंत्र नहीं था। वरिष्ठ मंत्रियों की राज्य-परिषद उसे सलाह देती थी। छह मंत्रालय रोज़ का काम करते थे: कार्मिक (अधिकारी), कर, अनुष्ठान (समारोह व शिक्षा), सेना, दंड (क़ानून) और लोक-निर्माण।
तीन कार्यालय निगरानी करने वालों जैसे थे। वे अधिकारियों की, और राजा तक की, आलोचना कर सकते थे। यह सत्ता पर रोक का तरीक़ा था।
अधिकारी बनने के लिए ग्वाजियो नाम की कठिन लिखित परीक्षा पास करनी पड़ती थी, जो कन्फ़्यूशियाई ग्रंथों पर होती थी। समाज की चार मोटी परतें थीं: यांगबान (विद्वान-अधिकारी), जुंगइन (बीच के लोग, जैसे वैद्य और अनुवादक), आम लोग (ज़्यादातर किसान) और निम्न-स्थिति के लोग (चोनमिन)। असल में परीक्षा देने वाले ज़्यादातर यांगबान परिवारों से आते थे, इसलिए व्यवस्था केवल जन्म से तो ज़्यादा निष्पक्ष थी, पर बराबर नहीं।
हुनगु, सरिम और गुटबाज़ी
राज्य बनाने में मदद करने वाले शुरुआती अधिकारी और उनके परिवार हुनगु (योग्यता-अधिकारी) कहलाते हैं। उनके पास ज़मीन और ऊँचे पद थे। सरिम देहात में रहने वाले नव-कन्फ़्यूशियाई विद्वान थे जो सोवॉन नाम की गाँव की अकादमियाँ चलाते और कहते थे कि शासक और अधिकारी नैतिक नियमों का कड़ाई से पालन करें।
1498 से 1545 के बीच चार दमनों में कई सरिम पद से हटाए गए। पर उनके स्कूल बने रहे, और राजा सोन्जो (1567-1608) के समय उन्होंने दरबार पर क़ब्ज़ा कर लिया। जल्द ही वे आपस में भिड़े, और 1575 में पूर्वी (दोंगइन) और पश्चिमी (सोइन) गुटों में बँट गए। आगे और बँटवारे हुए। गुटबाज़ी जोसॉन की राजनीति की लंबी आदत बन गई।
जापानी और मांचू हमले: कोरिया और पूर्वी एशिया पर असर
1592 में तोयोतोमी हिदेयोशी के नेतृत्व में जापानी सेनाओं ने समुद्र पार कर हमला किया। यह इमजिन युद्ध (1592-1598) है। शुरू में जोसॉन के पास तैयार सैनिक कम थे। एडमिरल ई सुन-सिन ने मज़बूत जहाज़ों (कछुआ-जहाज़ सहित) से समुद्री लड़ाइयाँ जीतीं, गाँव के स्वयंसेवक धर्म-सेना (उइबयोंग) बनकर लड़े, और मिंग चीन ने सैनिक भेजे।
बाद में 1627 और 1636 में उत्तर से मांचू सेनाओं ने जोसॉन पर हमला किया। 1637 में जोसॉन को मांचू (जल्द ही छिंग) को ऊपर मानना पड़ा।
असर: खेत, शहर, किताबें और कर के अभिलेख नष्ट हुए; बहुत लोग मरे या भागे। कोरिया के बाहर, युद्ध ने मिंग को कमज़ोर किया, 1644 में छिंग के उभार में मदद की और जापान में तोयोतोमी शासन का अंत हुआ। फिर जोसॉन, छिंग चीन और एदो जापान में लंबी शांति रही।
उत्तर जोसॉन में सुधार: कर-सुधार, वाणिज्य और सिल्हाक
युद्धों के बाद राज्य को पैसा चाहिए था। देदोंगबोप 1608 में शुरू हुआ और लगभग सौ साल में फैला। गाँव कई अलग स्थानीय चीज़ें भेजने की जगह किसान अपनी ज़मीन के आकार के हिसाब से एक कर देने लगे, चावल, कपड़े या सिक्के में। यह ज़्यादा न्यायपूर्ण था और व्यापार आसान हुआ।
खेती सुधरी (धान की रोपाई, नए औज़ार) और वाणिज्य बढ़ा: शहरों में बाज़ार, व्यापारी और ताँबे के सिक्के (1678 से)। कुछ किसान और व्यापारी अमीर हुए।
सिल्हाक का मतलब है "व्यावहारिक विद्या"। यू ह्योंग-वॉन (भूमि-सुधार), पार्क जी-वॉन (व्यापार और औज़ार) और जोंग याक-योंग (शासन-सुधार) जैसे विद्वानों ने केवल पुरानी किताबों की जगह काम के विचार माँगे।
राजा योंगजो (1724-1776) ने गुटों के झगड़े ठंडे करने की कोशिश की और 1750 में सैनिक-कपड़ा कर आधा कर दिया। जोंगजो (1776-1800) ने ग्युजांगगक पुस्तकालय खोला, विद्वानों का स्वागत किया और ह्वासोंग क़िला बनवाया।
सेदो राजनीति और किसान विद्रोह
1800 में जोंगजो के निधन के बाद कई राजा बच्चे थे या कमज़ोर। कुछ ससुराल-परिवार (जैसे आन्दोंग किम वंश) उनके नाम पर शासन करते थे। इसे सेदो राजनीति कहते हैं। अधिकारी पद ख़रीदते और फिर तीन कर-व्यवस्थाओं (ज़मीन, अनाज-ऋण और सैनिक-कपड़ा) से किसानों से ज़्यादा वसूलते।
ग़ुस्सा कर्म में बदला: हॉन्ग ग्योंग-रे का विद्रोह (1811), इमसुल विद्रोह (1862) और दोंगहाक आंदोलन (1860 में चोए जे-उ ने शुरू किया; 1894 में बड़ा किसान युद्ध)। 1800 के दशक में विदेशी जहाज़ों और माँगों का दबाव भी कोरिया पर था। राजवंश 1910 में समाप्त हुआ।
करके देखिए: अपनी जोसॉन समय-रेखा बनाइए
काग़ज़ की एक लंबी पट्टी लीजिए (या 3D का स्लाइडर चलाइए)। बाएँ सिरे पर 1392 और दाएँ सिरे पर 1910 लिखिए। ये तारीख़ें लगाइए: 1392, 1446, 1575, 1592, 1608, 1636, 1750, 1811, 1862, 1894। 1392-1592 नीला, 1592-1636 लाल, 1636-1800 हरा और 1800-1910 नारंगी रंगिए। अनुमान लगाइए: कौन-सा रंग सबसे लंबा है? फिर नापकर जाँचिए। आख़िर में हर लाल या नारंगी तारीख़ के लिए एक कारण और एक नतीजा लिखिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- जोसॉन: 1392 से 1910 = 518 साल
- राजधानी: हानयांग (सियोल), 1394 से
- शासन: राजा + राज्य-परिषद + छह मंत्रालय + तीन कार्यालय (निगरानी) + ग्वाजियो परीक्षा
- समाज की परतें: यांगबान, जुंगइन, आम लोग, चोनमिन
- हुनगु = शुरुआती योग्यता-अधिकारी; सरिम = गाँव के नव-कन्फ़्यूशियाई विद्वान; सोवॉन = उनकी अकादमियाँ
- इमजिन युद्ध = 1592-1598 (जापान); मांचू हमले = 1627 और 1636
- देदोंगबोप = ज़मीन पर एक कर, चावल, कपड़े या सिक्के में (1608 से)
- सिल्हाक = व्यावहारिक विद्या; सेदो राजनीति = 1800 के बाद ससुराल-परिवारों का राज
हल किए गए उदाहरण
1. जोसॉन कितने साल चला? इमजिन युद्ध से पहले का दौर लंबा है या बाद का?
1910 - 1392 = 518 साल। युद्ध से पहले: 1592 - 1392 = 200 साल। बाद में: 1910 - 1592 = 318 साल। इसलिए इमजिन युद्ध के बाद का दौर लंबा है।
2. समझाइए कि तीन कार्यालय और ग्वाजियो कन्फ़्यूशियाई विचारों को कैसे दिखाते थे।
कन्फ़्यूशियाई सोच कहती है कि शासक नैतिक और अधिकारी विद्वान हों। तीन कार्यालय राजा और अधिकारियों की आलोचना कर सकते थे, इसलिए सत्ता पर रोक थी। ग्वाजियो कन्फ़्यूशियाई ग्रंथों का ज्ञान जाँचती थी, इसलिए अधिकारी विद्या से चुने जाते थे। दोनों का लक्ष्य अच्छा, नैतिक शासन है।
3. देदोंगबोप से कर ज़्यादा न्यायपूर्ण कैसे हुआ?
पहले गाँवों को कई तरह की स्थानीय चीज़ें भेजनी पड़ती थीं और अधिकारी व बिचौलिए ज़्यादा ले लेते थे। देदोंगबोप में ज़मीन के आकार के हिसाब से चावल, कपड़े या सिक्के में एक कर माँगा गया। ज़्यादा ज़मीन वाले ज़्यादा देते, छोटे किसान कम, और धोखाधड़ी की गुंजाइश घटी।
4. सेदो राजनीति को 1862 के इमसुल विद्रोह से जोड़ने वाली कारण-नतीजा कड़ी बनाइए।
बाल राजा -> ससुराल-परिवार का राज -> पद बिकते हैं -> अधिकारी किसानों से ज़्यादा कर वसूलते हैं -> किसान क़र्ज़ में और ग़ुस्से में -> 1862 के इमसुल विद्रोह।
आम गलतियाँ
- सरिम और हुनगु को दो देश या दो धर्म समझना। दोनों जोसॉन के भीतर के अधिकारी-विद्वान थे; वे सत्ता और नैतिकता पर बहस करते थे।
- दो हमलों को मिला देना। 1592 जापान (इमजिन युद्ध, समुद्र से); 1627 और 1636 मांचू (उत्तर से)।
- यह कहना कि जोसॉन में केवल राजा शासन करता था। मंत्रालय और तीन निगरानी कार्यालय उसकी शक्ति सीमित करते थे।
- सिल्हाक को कला की शैली समझना। इसका मतलब ज़मीन, व्यापार, औज़ार और शासन की व्यावहारिक विद्या है।