गणित के पाठ
276 पाठ
- √2, √3 और √5 अपरिमेय हैं: उपपत्ति – परिमेय संख्या को p/q (q ≠ 0) लिख सकते हैं। अपरिमेय को नहीं; उसका दशमलव न खत्म होता है, न दोहराता है। √2 को अपरिमेय सिद्ध करने के लिए मानते हैं कि √2 = p/q (सबसे सरल रूप), तब p² = 2q², फिर p और q दोनों सम निकलते हैं — विरोधाभास। मुख्य तथ्य: अभाज्य संख्या p² को बाँटे तो p को भी बाँटती है।
- अंकगणित की आधारभूत प्रमेय – 1 से बड़ी हर पूर्ण संख्या या तो अभाज्य है, या अभाज्य संख्याओं का गुणनफल — और यह गुणनफल सिर्फ एक ही तरह से बनता है (क्रम बदल सकता है)। यही अंकगणित की आधारभूत प्रमेय है। HCF = सार्व अभाज्यों की सबसे छोटी घातों का गुणनफल; LCM = सभी अभाज्यों की सबसे बड़ी घातों का गुणनफल। दो संख्याओं के लिए HCF × LCM = a × b.
- अंतरिक्ष में कोण: द्विफलक, त्रिफलक और बहुफलक कोण – द्विफलक कोण (dihedral angle) दो अर्ध-समतलों से बनता है जिनका एक किनारा (कोर) उभयनिष्ठ हो। इसे रैखिक कोण से मापते हैं: दोनों फलकों में किनारे पर लंब दो किरणों के बीच का कोण। त्रिफलक कोण में तीन किनारे, तीन फलक कोण α, β, γ और तीन द्विफलक कोण A, B, C होते हैं। नियम: cos α = cos β cos γ + sin β sin γ cos A और sin α / sin A = sin β / sin B = sin γ / sin C। उत्तल बहुफलक कोण के फलक कोणों का जोड़ 360° से कम होता है।
- अंतरिक्ष में रेखाएँ और समतल – दो बिंदु एक रेखा तय करते हैं; एक रेखा पर न पड़ने वाले तीन बिंदु एक समतल। अंतरिक्ष में दो रेखाएँ या तो मिलती हैं, या समांतर हैं, या विषमतलीय। रेखा समतल में पड़ी होती है, उसके समांतर होती है या उसे एक बिंदु पर काटती है; दो समतल समांतर होते हैं या एक रेखा में मिलते हैं। रेखा समतल पर लंब है अगर वह समतल की दो कटती रेखाओं पर लंब हो। अभिलंब n = (a, b, c) से समतल ax + by + cz = d, रेखा r = a + t·u, और बिंदु (x₀, y₀, z₀) से दूरी |ax₀ + by₀ + cz₀ − d| ÷ √(a² + b² + c²)।
- अंतर्गत और परिगत ठोस: जब एक ठोस दूसरे के अंदर बैठता है – जब कोई ठोस दूसरे के अंदर बैठकर उसे खास बिंदुओं पर छूता है, तो वह उसमें अंतर्गत (inscribed) है और बाहर वाला परिगत (circumscribed) है। घन में गोला: r = a/2। घन के बाहर गोला: R = a√3/2। बेलन में गोला: h = 2r। गोले में बेलन: R² = r² + h²/4। शंकु में गोला: ρ = rh/(r + l)। अक्ष से काटकर समतल चित्र बनाइए, हर सवाल त्रिभुज, वर्ग या वृत्त का सवाल बन जाता है।
- अतिपरवलयिक फलन (Hyperbolic Functions) – अतिपरवलयिक फलन eˣ और e⁻ˣ से बनते हैं: cosh x = (eˣ + e⁻ˣ)/2, sinh x = (eˣ − e⁻ˣ)/2, tanh x = sinh x/cosh x। बिंदु (cosh t, sinh t) अतिपरवलय x² − y² = 1 पर रहता है, इसलिए cosh²x − sinh²x = 1। इनके प्रतिलोमों के लघुगणक रूप हैं, जैसे arsinh x = ln(x + √(x² + 1))। इनका अवकलन आसान है (sinh का cosh, cosh का sinh) और ये ∫ 1/√(x² + 1) dx = arsinh x + c जैसे मानक समाकलन देते हैं।
- अधिक कोण के त्रिकोणमितीय अनुपात (0° से 180°) – त्रिज्या 1 वाले वृत्त पर कोण θ पर बिंदु का x = cos θ और y = sin θ होता है। यह 0° से 180° तक हर कोण के लिए चलता है। 90° के बाद बिंदु बाईं ओर होता है, इसलिए cos ऋणात्मक है। sin(180° − θ) = sin θ और cos(180° − θ) = −cos θ। tan θ = sin θ ÷ cos θ, और 90° पर यह परिभाषित नहीं है।
- अनंत श्रेणी (Infinite Series) – अनंत श्रेणी किसी अनुक्रम के पदों को हमेशा जोड़ती जाती है: a₁ + a₂ + a₃ + … इसे हम आंशिक योग Sₙ से समझते हैं। अगर Sₙ किसी एक संख्या S पर टिक जाए तो श्रेणी अभिसारी (convergent) है, वरना अपसारी (divergent)। गुणोत्तर श्रेणी a + ar + ar² + … का योग |r| < 1 होने पर a/(1 − r) होता है। पदों का 0 की ओर जाना ज़रूरी है पर काफ़ी नहीं: हरात्मक श्रेणी 1 + 1/2 + 1/3 + … अपसारी है। nवाँ-पद, p-श्रेणी, तुलना, समाकल, अनुपात और एकांतर परीक्षण बताते हैं कि कौन-सी श्रेणी अभिसारी है।
- अनुकरण (सिमुलेशन) से प्रायिकता का अनुमान – अनुकरण (simulation) यादृच्छिक संख्याओं से किसी संयोग वाली प्रक्रिया की नक़ल करता है, ताकि मुश्किल प्रायिकता का अनुमान लग सके। योजना: प्रश्न लिखो, हर परिणाम को उसकी प्रायिकता के हिसाब से अंक दो, एक प्रयास और घटना तय करो, फिर बहुत सारे प्रयास चलाओ। सापेक्ष बारंबारता (घटना की गिनती ÷ प्रयास) अनुमान है, और प्रयास बढ़ने पर यह सही प्रायिकता के पास आती है (बड़ी संख्याओं का नियम)।
- अनुक्रम और श्रेढ़ियाँ – अनुक्रम संख्याओं की ऐसी सूची है जिसका क्रम तय है। इसका नियम दो तरह से लिखते हैं: पुनरावर्ती (पिछले पद से अगला पद) या स्पष्ट (n-वें पद का सीधा सूत्र)। समांतर श्रेढ़ी (AP) में हर बार वही संख्या जुड़ती है। गुणोत्तर श्रेढ़ी (GP) में हर बार उसी संख्या से गुणा होता है। फ्रैक्टल और हनोई की मीनार में भी यही नियम छिपे हैं।
- अनुक्रम की सीमा: पद आख़िर कहाँ जाते हैं? – अनुक्रम (sequence) की सीमा L तब होती है जब n बहुत बड़ा होने पर उसके पद L के जितने चाहें उतने पास आ जाएँ और पास ही रहें। जो अनुक्रम किसी एक संख्या पर नहीं टिकता, वह अपसारी है। सीमा के नियमों से जोड़, गुणा और भाग की सीमा निकलती है। rⁿ की सीमा |r| < 1 पर 0, r = 1 पर 1 है; बाकी पर अपसारी।
- अनुक्रम तथा श्रेणी: AP, GP, समांतर और गुणोत्तर माध्य – अनुक्रम एक निश्चित क्रम में लिखी संख्याओं की सूची है: a₁, a₂, a₃, … पदों को जोड़ने पर श्रेणी बनती है। समांतर श्रेढ़ी (AP) में हर बार एक ही संख्या d जुड़ती है; aₙ = a + (n − 1)d और Sₙ = n/2[2a + (n − 1)d]। a और b का समांतर माध्य (a + b)/2 है; उनके बीच n समांतर माध्य डालने के लिए d = (b − a)/(n + 1)। गुणोत्तर श्रेढ़ी (GP) में हर बार एक ही संख्या r से गुणा होता है; aₙ = arⁿ⁻¹ और r ≠ 1 पर Sₙ = a(rⁿ − 1)/(r − 1)। यदि |r| < 1 हो तो पद छोटे होते जाते हैं और अनंत योग S∞ = a/(1 − r)। दो धनात्मक संख्याओं का गुणोत्तर माध्य √(ab) है, और n गुणोत्तर माध्य के लिए r = (b/a)^(1/(n+1))। धनात्मक a, b के लिए A ≥ G, बराबरी केवल a = b पर।
- अनुपात और समानुपात – अनुपात a : b एक ही तरह की दो मात्राओं की तुलना है। दोनों भागों को एक ही संख्या से भाग देकर अनुपात सरल करते हैं। किसी राशि को अनुपात में बाँटने के लिए भाग जोड़ो, एक भाग निकालो, फिर गुणा करो। y = k·x हो तो प्रत्यक्ष समानुपात (एक दोगुना, दूसरा दोगुना); x·y = k हो तो व्युत्क्रम समानुपात (एक दोगुना, दूसरा आधा)।
- अनुप्रस्थ काट और घूर्णन ठोस: 2D और 3D आकारों का संबंध – जब कोई समतल किसी ठोस को काटता है तो जो सपाट चेहरा बनता है, उसे अनुप्रस्थ काट (cross-section) कहते हैं। घन से वर्ग, आयत, त्रिभुज, पंचभुज या षट्भुज बन सकता है; बेलन, शंकु या गोले को आड़ा काटो तो वृत्त बनता है। किसी 2D आकार को एक अक्ष के चारों ओर घुमाओ तो घूर्णन ठोस बनता है: आयत से बेलन, समकोण त्रिभुज से शंकु, अर्धवृत्त से गोला। काट से आयतन भी समझ आता है: अगर दो ठोसों के काट हर ऊँचाई पर बराबर क्षेत्रफल के हों, तो उनका आयतन बराबर होता है (कैवेलियरी का सिद्धांत)।
- अपरिमेय संख्याएँ: √2, √3, वर्गमूल सर्पिल और वास्तविक संख्याएँ – अपरिमेय संख्या को p/q के रूप में नहीं लिख सकते। इसका दशमलव न कभी खत्म होता है, न दोहराता है, जैसे √2 = 1.41421356… या π। फिर भी √2 को संख्या रेखा पर ठीक-ठीक दिखा सकते हैं: यह 1 भुजा वाले वर्ग का विकर्ण है। √2 और √3 अपरिमेय हैं, यह हम मानकर सिद्ध करते हैं कि वे सरलतम भिन्न हैं और फिर विरोधाभास पाते हैं। वर्गमूल सर्पिल एक-एक समकोण त्रिभुज जोड़कर √2, √3, √4, √5 … बनाता है। परिमेय और अपरिमेय मिलकर वास्तविक संख्याएँ बनाते हैं; हर आवर्ती दशमलव को वापस p/q में बदल सकते हैं।
- अपरिमेय समीकरण (वर्गमूल वाले समीकरण) – जिस समीकरण में अज्ञात राशि मूल चिह्न के अंदर हो, वह अपरिमेय समीकरण है। इसे हल करने के लिए मूल को अकेला करें, दोनों ओर वर्ग करें, नया समीकरण हल करें और हर उत्तर को मूल समीकरण में रखकर जाँचें। वर्ग करने से फ़ालतू हल आ सकते हैं, इसलिए जाँच ज़रूरी है।
- अभिगृहीत विधि और मॉडलिंग – अभिगृहीत विधि में हम कुछ कथनों से शुरू करते हैं जिन्हें अभिगृहीत (axiom) कहते हैं और बिना सिद्ध किए मानते हैं, साथ में तर्क के साफ़ नियम। बाक़ी सब, यानी प्रमेय, इन्हीं से क़दम-दर-क़दम सिद्ध किया जाता है। अच्छा अभिगृहीत-समूह संगत होता है (कोई विरोधाभास नहीं) और हर अभिगृहीत स्वतंत्र होता है (बाक़ियों से सिद्ध नहीं होता)। मॉडल वह वास्तविक या गणितीय चीज़ है जिसमें सारे अभिगृहीत सही हों। यही विधि अंकगणित (पियानो), ज्यामिति (यूक्लिड, हिल्बर्ट) और प्रायिकता (कोल्मोगोरोव) में लगती है।
- अवकल समीकरण – अवकल समीकरण एक फलन y को उसके अवकलजों से जोड़ता है। इसकी कोटि सबसे ऊँचा अवकलज है और घात उस अवकलज की घात (जब समीकरण अवकलजों में बहुपद हो)। व्यापक हल में स्वेच्छ अचर होते हैं; y(0) = 1 जैसी शर्त उन्हें तय करके विशिष्ट हल देती है। कक्षा 12 में तीन प्रकार के प्रथम कोटि समीकरण हल करते हैं: चर पृथक्करणीय, समघातीय (y = vx रखो) और रैखिक dy/dx + Py = Q (समाकलन गुणक e^∫P dx से गुणा करो)।
- अवकलज (कक्षा 11): ढाल, परिवर्तन की दर और नियम – अवकलज बताता है कि कोई चीज़ एक पल में कितनी तेज़ी से बदल रही है। ग्राफ़ पर यह स्पर्श रेखा की ढाल है। इसे सीमा से निकालते हैं: छोटा कदम h लो, औसत बदलाव निकालो, और h को 0 की ओर ले जाओ। फिर xⁿ, sin x, cos x, योग, अंतर, गुणनफल और भागफल के आसान नियम सीखेंगे।
- अवकलज की मदद से वक्र अनुरेखण – y = f(x) का स्केच बनाने के लिए: प्रांत और अंतःखंड निकालो, f'(x) = 0 से स्थिर बिंदु निकालो, f'(x) के चिह्न से देखो वक्र कहाँ बढ़ता-घटता है, f''(x) से अवतलता और नति परिवर्तन बिंदु निकालो, अनंतस्पर्शी और सिरों का व्यवहार देखो, फिर सब कुछ चिकने वक्र से जोड़ो। उदाहरण: y = x³ − 3x का उच्चिष्ठ (−1, 2), निम्निष्ठ (1, −2) और नति परिवर्तन बिंदु (0, 0) है।
- अवकलज के अनुप्रयोग – अवकलज बताता है कि एक राशि दूसरी के साथ कितनी तेज़ी से बदलती है। इसका चिह्न बताता है कि फलन बढ़ रहा है (f′ > 0, वर्धमान) या घट रहा है (f′ < 0, ह्रासमान)। जहाँ f′ = 0 हो वहाँ स्पर्श रेखा सपाट होती है: ये क्रांतिक बिंदु स्थानीय उच्चिष्ठ या निम्निष्ठ हो सकते हैं, जिन्हें प्रथम अवकलज परीक्षण (चिह्न बदलना) या द्वितीय अवकलज परीक्षण (f″ का चिह्न) से जाँचते हैं। इससे सबसे बड़ा डिब्बा या सबसे सस्ता टैंक जैसे असली सवाल हल होते हैं।
- असतत यादृच्छिक चर का प्रायिकता बंटन – यादृच्छिक चर X किसी प्रयोग के हर परिणाम को एक संख्या में बदलता है। उसका प्रायिकता बंटन हर मान x और उसकी प्रायिकता P(X = x) की सूची है; हर P, 0 और 1 के बीच होता है और सबका जोड़ 1 होता है। माध्य E(X) = Σx·P(x) लंबे समय का औसत (संतुलन बिंदु) है। प्रसरण Var(X) = Σ(x − μ)²P(x) = E(X²) − μ² फैलाव बताता है; σ = √Var। खास मॉडल: एकसमान, द्विपद B(n, p) जिसका माध्य np और प्रसरण np(1 − p), और प्वासों जिसमें माध्य = प्रसरण = λ।
- असमिकाएँ: नियम, अंतराल और हल करने का तरीका – असमिका बताती है कि एक मात्रा दूसरी से बड़ी है या छोटी, इसके लिए <, >, ≤ या ≥ लगाते हैं। संख्या रेखा पर छोटी संख्या बाईं ओर होती है। दोनों पक्षों में एक ही संख्या जोड़ो-घटाओ, या एक ही धनात्मक संख्या से गुणा-भाग करो, तो चिह्न नहीं बदलता। ऋणात्मक संख्या से गुणा या भाग करो तो चिह्न पलट जाता है। उत्तर अक्सर संख्याओं का पूरा समूह होता है, जिसे (−∞, 4] जैसे अंतराल में लिखते हैं। द्विघात असमिका मूलों और ग्राफ़ के आकार से हल होती है। |x| < a का अर्थ है −a < x < a। कुछ असमिकाएँ हर संख्या के लिए सत्य हैं, जैसे x² ≥ 0 और AM–GM असमिका।
- आँकड़ों का निरूपण: बिंदु आलेख, दंड आलेख, आयतचित्र और रेखा आलेख – आलेख संख्याओं की सूची को चित्र बना देता है। बिंदु आलेख में संख्या-रेखा पर हर वस्तु के लिए एक बिंदु लगता है। दंड आलेख अलग-अलग श्रेणियों की तुलना करता है, दंडों के बीच जगह होती है। आयतचित्र (histogram) वर्ग-अंतरालों में बँटे आँकड़े दिखाता है, दंड सटे होते हैं। रेखा आलेख समय के साथ बदलाव दिखाता है। अगर अक्ष 0 से शुरू न हो, पैमाना असमान हो या चित्र ग़लत आकार के हों, तो आलेख भ्रम पैदा कर सकता है।
- आँकड़ों का प्रबंधन: इकट्ठा करो, व्यवस्थित करो, दिखाओ – आँकड़े (डेटा) तथ्यों का समूह हैं, जैसे जवाब, गिनती या माप। आँकड़े गुणात्मक (शब्द) या मात्रात्मक (संख्या) होते हैं; संख्याएँ असतत (गिनी हुई) या सतत (नापी हुई) होती हैं। हम सर्वे, अवलोकन, प्रयोग या पहले से मौजूद स्रोतों से आँकड़े इकट्ठा करते हैं, फिर मिलान चिह्नों से बारंबारता सारणी बनाते हैं। सही आलेख चुनते हैं: तुलना के लिए दंड आलेख, पूरे के हिस्सों के लिए पाई चार्ट, समय के साथ बदलाव के लिए रेखा आलेख, दो चीज़ों के रिश्ते के लिए बिंदु आलेख। कंप्यूटर डेटा को संरचित सारणी या असंरचित पाठ, चित्र और आवाज़ के रूप में रखते हैं।
- आकलन और परिमाण की कोटि – आकलन (एस्टिमेशन) यानी पूर्णांकित संख्याओं से जल्दी निकाला गया समझदारी भरा उत्तर। एक छोटा हिस्सा गिनो, गुणा करो और उत्तर को सही परिशुद्धता तक लिखो। परिमाण की कोटि सबसे पास वाली 10 की घात है, जैसे लगभग 100 के लिए 10²।
- आव्यूह (Matrices): कोटि, प्रकार, परिवर्त, संक्रियाएँ और व्युत्क्रम – आव्यूह संख्याओं का एक डिब्बा है जिसमें संख्याएँ पंक्तियों और स्तंभों में रखी होती हैं। इसकी कोटि = पंक्तियाँ × स्तंभ। शून्य, तत्समक, विकर्ण, अदिश, पंक्ति, स्तंभ और वर्ग आव्यूह इसके खास प्रकार हैं। परिवर्त में पंक्तियाँ स्तंभ बन जाती हैं। Aᵀ = A हो तो सममित, Aᵀ = −A हो तो विषम-सममित। योग जगह-जगह करते हैं, गुणन पंक्ति × स्तंभ से। आव्यूह गुणन क्रमविनिमेय नहीं है (AB प्रायः BA नहीं)। यदि AB = BA = I हो तो B, A का व्युत्क्रम है और वह एक ही (अद्वितीय) होता है।
- इकाई वृत्त: सममिति और आवर्तता – इकाई वृत्त की त्रिज्या 1 है और केंद्र मूल बिंदु पर है। कोण θ पर बिंदु के निर्देशांक (cos θ, sin θ) होते हैं। इस बिंदु के दर्पण प्रतिबिंब π − θ, π + θ और −θ के नियम देते हैं। एक पूरा चक्कर (2π) लगाने पर हम वापस वहीं आते हैं, इसलिए sin और cos हर 2π पर और tan हर π पर दोहराते हैं।
- इष्टतमीकरण: द्विघात फलन से सबसे अच्छा मान खोजना – इष्टतमीकरण (optimisation) का मतलब है सबसे अच्छा मान खोजना: सबसे बड़ा क्षेत्रफल, सबसे ज़्यादा लाभ या सबसे कम खर्च। हम मात्रा को द्विघात फलन के रूप में लिखते हैं; उसके परवलय का शीर्ष सबसे अच्छा मान देता है। y = ax² + bx + c का शीर्ष x = −b/(2a) पर है; a < 0 हो तो अधिकतम, a > 0 हो तो न्यूनतम।
- उन्नत गणित: त्रिकोणमिति, कलन, ज्यामिति और प्रायिकता – उन्नत स्कूली गणित की तीन बड़ी धाराएँ हैं। त्रिकोणमिति और कलन तरंगों और बदलाव का अध्ययन करते हैं: वृत्त से sin θ, अवकलज ढलान के रूप में और समाकलन क्षेत्रफल के रूप में। ज्यामिति आकृतियों और ठोसों को पढ़ती है, जैसे शंकु : गोला : बेलन = 1 : 2 : 3। प्रायिकता और सांख्यिकी संयोग और आँकड़ों को नापती हैं, पासों से लेकर घंटी वक्र तक।
- उपभोक्ता गणित: कमाना, ख़रीदना और यात्रा करना – उपभोक्ता गणित रोज़ के पैसों का गणित है। सकल वेतन पूरी कमाई है: घंटे की मज़दूरी (घंटे × दर), तय वेतन, कमीशन (बिक्री का %), नग के हिसाब से, टिप, बोनस और ओवरटाइम (अक्सर 1.5 × दर)। आयकर, पेंशन और बीमा जैसी कटौतियाँ कटने के बाद शुद्ध वेतन (हाथ में आने वाला) बचता है। ख़रीदते समय पहले छूट, फिर बिक्री कर (GST या VAT): दाम × (1 − d) × (1 + t)। इकाई दाम = दाम ÷ मात्रा, इससे पैकों की तुलना होती है। छुट्टा देने के लिए ऊपर गिनो। कार में ईंधन (दूरी × लीटर प्रति 100 किमी ÷ 100 × दाम), बीमा (नए चालकों के लिए ज़्यादा), लाइसेंस, क़र्ज़, मरम्मत और पार्किंग का ख़र्च है; हर यात्रा के लिए बस, ट्रेन या हवाई जहाज़ से तुलना करो।
- ऊँचाई और दूरियाँ – दृष्टि रेखा आँख को वस्तु से जोड़ती है। वस्तु ऊपर हो तो दृष्टि रेखा और क्षैतिज रेखा के बीच का कोण उन्नयन कोण है। वस्तु नीचे हो तो यही कोण अवनमन कोण है। वस्तु, ज़मीन और दृष्टि रेखा से समकोण त्रिभुज बनता है, इसलिए tan θ = ऊँचाई ÷ दूरी। चोटी से अवनमन कोण, नीचे से उन्नयन कोण के बराबर होता है। कठिन सवालों में एक भुजा साझा करने वाले दो त्रिभुज होते हैं।
- एक चर वाली रैखिक असमिकाएँ – असमिका दो व्यंजकों की तुलना <, >, ≤ या ≥ से करती है। एक चर की रैखिक असमिका ax + b < c जैसी होती है। इसका हल आम तौर पर एक संख्या नहीं, बल्कि संख्याओं की पूरी श्रेणी होता है। इसे समीकरण की तरह हल करते हैं: दोनों ओर एक ही संख्या जोड़-घटा सकते हैं, और एक ही धनात्मक संख्या से गुणा-भाग कर सकते हैं। ऋणात्मक संख्या से गुणा या भाग करने पर चिह्न उलट जाता है। हल को संख्या रेखा पर दिखाते हैं: < या > के लिए खोखला गोला (सिरा शामिल नहीं), ≤ या ≥ के लिए भरा गोला (सिरा शामिल), और छायांकित भाग सारे हल दिखाता है। −1 ≤ x < 3 जैसी दोहरी असमिका रेखा का एक टुकड़ा देती है। यदि x प्राकृत या पूर्णांक हो, तो केवल उस श्रेणी की पूर्ण संख्याएँ हल हैं।
- एक चर वाले रैखिक समीकरण – एक चर वाले रैखिक समीकरण में एक ही अज्ञात राशि (जैसे x) होती है और उसकी घात 1 होती है, जैसे 2x + 3 = 11। समीकरण एक तराज़ू जैसा है: दोनों पक्ष बराबर हैं। हल करने के लिए दोनों पक्षों पर एक जैसा काम करो (एक ही संख्या जोड़ो, घटाओ, गुणा करो या शून्य के अलावा किसी संख्या से भाग दो), जब तक x अकेला न रह जाए। आख़िर में उत्तर वापस रखकर जाँच ज़रूर करो।
- एलीगेशन (मिश्रण का नियम) और मिश्रण – जब c और d मूल्य (या सांद्रता) वाली दो चीज़ें मिलाई जाती हैं, तो मिश्रण का माध्य मूल्य m इन दोनों के बीच होता है। एलीगेशन का नियम कहता है कि मात्राएँ (सस्ती : महँगी) = (d − m) : (m − c) के अनुपात में होंगी। यह भारित औसत m = (q₁c + q₂d) ÷ (q₁ + q₂) का छोटा तरीका है। बार-बार प्रतिस्थापन में, V इकाई के बर्तन से x इकाई निकालकर n बार पानी भरा जाए, तो बचा मूल द्रव = V(1 − x/V)ⁿ।
- करणी (Radicals) और n-वाँ मूल – किसी संख्या a का n-वाँ मूल वह संख्या है जिसे n बार आपस में गुणा करने पर a मिले। इसे ⁿ√a लिखते हैं और यह a^(1/n) के बराबर है। करणियों को गुणा-भाग कर सकते हैं, पूर्ण घात बाहर निकालकर सरल कर सकते हैं, और हर में मूल हो तो परिमेयीकरण से हटा सकते हैं।
- करणी फलन (वर्गमूल फलन) – करणी फलन में चर x रूट के चिह्न के नीचे होता है। सबसे सरल फलन y = √x है। इसका ग्राफ (0, 0) से शुरू होकर दाएँ-ऊपर जाता है। y = a√(x − p) + q में शुरुआती बिंदु (p, q) है, प्रांत x ≥ p है, और a धनात्मक हो तो परिसर y ≥ q है (a ऋणात्मक हो तो y ≤ q)।
- कलन से गति: वेग, त्वरण और दूरी – अगर स्थिति s(t) है, तो वेग v = ds/dt और त्वरण a = dv/dt है। उल्टी दिशा में, v dt का समाकलन विस्थापन देता है। तय की गई दूरी में |v| लगता है। समतल में चाल = √(x′² + y′²) और वक्र की लंबाई इसी चाल का समाकलन है।
- कला में गणित – कलाकार गणित के तीन बड़े विचार इस्तेमाल करते हैं। सुनहरा अनुपात φ ≈ 1.618 संतुलित आयत और सर्पिल देता है। परिप्रेक्ष्य सपाट चित्र में गहराई लाता है: समानांतर रेखाएँ क्षितिज पर लोप-बिंदु पर मिलती हैं और आकार दूरी के अनुपात में घटता है। फ्रैक्टल वह आकृति है जो अपनी ही छोटी प्रतिलिपियों से बनी हो, जैसे शाखाओं वाला पेड़।
- कला में गणित: संगीत, चित्र, टाइलें, कविता और फ़िल्म – कला में गणित भरा है। संगीत के सुर तार की लंबाई के अनुपात हैं (आधी लंबाई = सप्तक, 2/3 लंबाई = पंचम)। चित्रकार परिप्रेक्ष्य और स्वर्णिम अनुपात इस्तेमाल करते हैं। टाइलें तभी जुड़ती हैं जब कोनों के कोण मिलकर 360° बनें। कविता में ध्वनि का पैटर्न दोहराया जाता है। फ़िल्म में हर सेकंड 24 तस्वीरें होती हैं।
- काई-वर्ग परीक्षण: स्वतंत्रता और समरूपता – काई-वर्ग (χ²) परीक्षण देखता है कि सारणी की गिनतियाँ संयोग से अपेक्षित गिनतियों से बहुत दूर तो नहीं हैं। E = पंक्ति योग × स्तंभ योग ÷ कुल योग, χ² = Σ (O − E)² ÷ E, df = (r − 1)(c − 1)। अगर χ² क्रांतिक मान से बड़ा हो (या p < सार्थकता स्तर), तो H0 (कोई संबंध नहीं) अस्वीकार। 2×2 सारणी में येट्स संशोधन (|O − E| − 0.5)² लेता है।
- कार्तीय तल: निर्देशांक, दूरी और मध्य-बिंदु – दो संख्या रेखाएँ समकोण पर काटें, तो एक सपाट सतह नक्शा बन जाती है, जिसमें हर बिंदु का एक पता (x, y) होता है। अक्ष मूल बिंदु O(0, 0) पर मिलते हैं और तल को चार चतुर्थांशों में बाँटते हैं। दूरी पाइथागोरस से मिलती है: x का अंतर और y का अंतर, दोनों का वर्ग, जोड़ो, फिर वर्गमूल। मध्य-बिंदु में x का औसत और y का औसत लेते हैं। दो छोटी दूरियों का योग सबसे बड़ी दूरी के बराबर हो तो तीनों बिंदु संरेख हैं; और दो छोटी भुजाओं के वर्गों का योग बड़ी भुजा के वर्ग के बराबर हो तो समकोण बनता है।
- काल श्रेणी: चल माध्य, प्रवृत्ति और मौसमी उतार-चढ़ाव – काल श्रेणी (time series) ऐसे आँकड़े हैं जो बराबर समय के अंतर पर लिखे जाते हैं, जैसे हर तिमाही की बिक्री या हर महीने की बारिश। इसे रेखा-ग्राफ़ पर बनाते हैं: समय x-अक्ष पर। असली आँकड़े मौसम के साथ ऊपर-नीचे होते हैं (मौसमी उतार-चढ़ाव), कई सालों की लंबी लहरों में (चक्रीय उतार-चढ़ाव) और थोड़े बेतरतीब ढंग से भी। लंबी दिशा (प्रवृत्ति) देखने के लिए हम चल माध्य (moving average) निकालते हैं: लगातार कुछ मानों का औसत, जैसे तिमाही आँकड़ों के लिए 4 मान। चल माध्य से होकर खींची सबसे ठीक बैठने वाली रेखा प्रवृत्ति रेखा है। मौसमी अंतर = असली मान − प्रवृत्ति मान। प्रवृत्ति में औसत मौसमी अंतर जोड़ने से अनुमान (forecast) मिलता है।
- किसी भी परिमेय घात के लिए व्यापक द्विपद प्रसार – किसी भी परिमेय n के लिए (1 + x)^n = 1 + nx + n(n−1)x²/2! + n(n−1)(n−2)x³/3! + … अगर n धनात्मक पूर्ण संख्या है तो श्रेणी रुक जाती है। वरना यह कभी नहीं रुकती, और तभी सही है जब |x| < 1. (a + bx)^n में पहले a^n बाहर निकालो: a^n(1 + bx/a)^n, जो |bx/a| < 1 के लिए मान्य है। छोटे x पर कुछ पद ही बहुत अच्छा सन्निकट मान देते हैं।
- कोज्या नियम (Law of Cosines) – किसी भी त्रिभुज में c² = a² + b² − 2ab cos C, जहाँ C भुजाओं a और b के बीच का कोण है। C = 90° हो तो cos C = 0 और यह पाइथागोरस बन जाता है। दो भुजाएँ और उनके बीच का कोण (SAS) पता हो तो तीसरी भुजा निकालो; तीनों भुजाएँ (SSS) पता हों तो कोण निकालो: cos C = (a² + b² − c²) ÷ 2ab।
- कोण का समद्विभाजक – कोण का समद्विभाजक वह किरण है जो कोण को दो बराबर भागों में बाँटती है। इस किरण का हर बिंदु कोण की दोनों भुजाओं से बराबर दूर होता है, और जो बिंदु दोनों भुजाओं से बराबर दूर हो वह इसी किरण पर होता है। इसे सिर्फ परकार और पटरी से बनाया जा सकता है।
- क्रमचय और संचय – इस अध्याय का मूल है: बिना सूची बनाए गिनना। गणना का मूल सिद्धांत कहता है: यदि एक काम m तरीकों से और उसके बाद दूसरा n तरीकों से हो सकता है, तो दोनों मिलकर m × n तरीकों से होते हैं। n! (n क्रमगुणित) = 1 × 2 × … × n, और 0! = 1। क्रमचय एक व्यवस्था है, जिसमें क्रम मायने रखता है: n भिन्न वस्तुओं में से r को व्यवस्थित करने के तरीके ⁿPᵣ = n!/(n − r)!। संचय एक चयन है, जिसमें क्रम मायने नहीं रखता: ⁿCᵣ = n!/(r!(n − r)!)। हर चयन को r! तरीकों से सजा सकते हैं, इसलिए ⁿPᵣ = ⁿCᵣ × r!। उपयोगी तथ्य: ⁿCᵣ = ⁿCₙ₋ᵣ और ⁿCᵣ + ⁿCᵣ₋₁ = ⁿ⁺¹Cᵣ। कुछ वस्तुएँ समान हों तो हर दोहराव की संख्या के क्रमगुणित से भाग दें।
- क्रांतिक पथ विश्लेषण (Critical Path Analysis) – बड़ा प्रोजेक्ट कई छोटे कामों (activities) से बनता है। कुछ काम दूसरों के ख़त्म होने का इंतज़ार करते हैं। इन्हें activity-on-node नेटवर्क में दिखाते हैं। आगे की गिनती (forward pass) से हर काम का सबसे जल्दी शुरू होने का समय (ES) मिलता है, पीछे की गिनती (backward pass) से सबसे देर से ख़त्म होने का समय (LF)। फ़्लोट = LS − ES बताता है कि काम कितना खिसक सकता है। जिन कामों का फ़्लोट 0 है, वे क्रांतिक पथ बनाते हैं — सबसे लंबा रास्ता, जो पूरे प्रोजेक्ट का कम-से-कम समय तय करता है। गैंट चार्ट नेटवर्क को समय-रेखा पर पट्टियों में बदलता है, और संसाधन हिस्टोग्राम बताता है कि हर दिन कितने मज़दूर चाहिए। फ़्लोट के अंदर काम खिसकाकर इसे समतल करना संसाधन समतलन (resource levelling) है।
- क्षेत्रफल और परिमाप: हीरोन का सूत्र, वृत्त और त्रिज्यखंड – परिमाप यानी किनारे की कुल लंबाई। क्षेत्रफल यानी अंदर की जगह। जब त्रिभुज की तीनों भुजाएँ पता हों, तो हीरोन का सूत्र बिना ऊँचाई के क्षेत्रफल दे देता है। जिस चतुर्भुज के चारों कोने एक वृत्त पर हों, उसके लिए ब्रह्मगुप्त का सूत्र है। वृत्त का किनारा व्यास का π गुना होता है, और त्रिज्यखंड पूरे वृत्त का एक भाग होता है।
- खंडशः फलन, मापांक फलन और सीढ़ी फलन – खंडशः फलन (piecewise function) अपने प्रांत के अलग-अलग हिस्सों पर अलग-अलग नियम लगाता है। मान निकालने के लिए पहले देखिए x किस अंतराल में है, फिर सिर्फ़ उसी नियम का उपयोग कीजिए। ग्राफ़ पर भरा बिंदु ● मतलब सिरा शामिल (≤, ≥), खाली बिंदु ○ मतलब शामिल नहीं (<, >)। मापांक फलन y = |x| भी खंडशः है: x < 0 पर −x और x ≥ 0 पर x; ग्राफ़ V-आकार, शीर्ष (0, 0)। y = a|x − h| + k में शीर्ष (h, k) पर चला जाता है। सीढ़ी फलन, जैसे ⌊x⌋, ⌈x⌉ या पार्किंग शुल्क, सपाट टुकड़े होते हैं जो पूर्णांकों पर कूदते हैं।
- खेल में गणित – गणित खिलाड़ियों और आयोजकों के काम आता है। चाल v और कोण θ पर फेंकी गेंद R = v² sin 2θ ÷ g दूर जाती है (हवा के बिना 45° पर सबसे अधिक)। माध्य, माध्यिका, बैटिंग एवरेज और स्ट्राइक रेट प्रदर्शन को संक्षेप में बताते हैं। समय-सारिणी में मैच गिने जाते हैं: n टीमों की राउंड रॉबिन में n(n−1)/2 मैच, नॉकआउट में n−1।
- खेल सिद्धांत: जब दूसरे भी चुनें, तब सबसे अच्छा फ़ैसला – खेल सिद्धांत (game theory) ऐसे फ़ैसलों का अध्ययन है जिनमें आपका नतीजा दूसरों के चुनाव पर भी निर्भर हो। पे-ऑफ़ मैट्रिक्स हर चुनाव-जोड़ी पर हर खिलाड़ी का लाभ दिखाता है। अधीन (dominated) रणनीति हमेशा बदतर होती है, उसे हटा दो। नैश संतुलन वह जोड़ी है जहाँ कोई खिलाड़ी अकेले बदलकर फ़ायदा नहीं ले सकता; कैदी की दुविधा दिखाती है कि यह सबके लिए सहयोग से बुरा भी हो सकता है। शून्य-योग खेल में सुरक्षित (मैक्सिमिन/मिनिमैक्स) रणनीतियाँ बराबर हों तो सैडल बिंदु मिलता है; नहीं तो खिलाड़ी मिश्रित रणनीति अपनाते हैं, जो ग्राफ़ की निचली किनारी के सबसे ऊँचे बिंदु से मिलती है।
- गणित का इतिहास – गणित हज़ारों सालों में कई जगहों पर बढ़ा। लोगों ने पहले निशान लगाकर गिनती की। मिस्र और बेबीलोन ने ज़मीन और निर्माण के लिए ज्यामिति इस्तेमाल की, और बेबीलोन 60-60 में गिनता था। थेल्स, पाइथागोरस, यूक्लिड और हाइपेशिया जैसे यूनानी विद्वानों ने ज्यामिति को प्रमाण दिए। भारत ने शून्य वाला स्थानीय मान दिया, बग़दाद के विद्वानों ने बीजगणित बनाया, और ये विचार यूरोप पहुँचे। हर महाद्वीप की महिलाओं और पुरुषों ने, अक्सर अन्यायपूर्ण रुकावटों के बावजूद, गणित को आकार दिया।
- गणित की पहेलियाँ और खेल: हनोई टावर, निम और जादुई वर्ग – पहेलियाँ और खेल गणित के साथ-साथ बढ़े। हनोई टावर में n चकतियों के लिए कम से कम 2^n - 1 चालें लगती हैं, जो दुगना करके एक जोड़ने के विचार से मिलता है। निम खेल में 4 का गुणज छोड़ने वाला जीतता है। 3 × 3 जादुई वर्ग की हर पंक्ति, स्तंभ और विकर्ण का योग 15 होता है। 1736 में यूलर की पुल-पहेली से ग्राफ़ सिद्धांत शुरू हुआ। पहले खेलो, फिर नियम खोजो।
- गणित में तालिका: पढ़ना, बनाना और अनुपात पहचानना – तालिका में दो चरों के मानों के जोड़े लिखे होते हैं। हम उसे पढ़ सकते हैं, पंक्तियों की तुलना कर सकते हैं और ग्राफ़, सूत्र या कहानी से नई तालिका बना सकते हैं। अगर y ÷ x हमेशा बराबर रहे तो सीधा अनुपात है। अगर x × y हमेशा बराबर रहे तो प्रतिलोम अनुपात है।
- गणित में समस्या-समाधान – समस्या वह प्रश्न है जिसकी विधि तुम्हें अभी पता नहीं। अच्छा हल करने वाला चार चरण अपनाता है: समस्या को समझना और परखना, रणनीति (ह्यूरिस्टिक) चुनकर योजना बनाना (चित्र बनाना, छोटे उदाहरण, तालिका, पैटर्न, अनुमान-जाँच, उलटा चलना), योजना पर काम करना, और पीछे देखकर जाँच और विचार करना। n लोगों के हाथ मिलाने की समस्या, जिसका उत्तर n(n−1)/2 है, सारे चरण दिखाती है।
- गणितीय अन्वेषण: अपना गणित प्रश्न पूछना और हल करना – गणितीय अन्वेषण एक छोटा शोध प्रोजेक्ट है जिसमें तुम खुद गणित का प्रश्न पूछते हो और सबूत व तर्क से उसका उत्तर खोजते हो। यह एक चक्र है: साफ़ प्रश्न चुनो, दूसरों ने क्या पाया वह पढ़ो (साहित्य अध्ययन), तरीका तय करो (प्रयोग, केस स्टडी या विकास शोध), काम करके आँकड़े लिखो, गणित से विश्लेषण करो, फिर चिंतन और रिपोर्ट करो। AI उपकरण आँकड़ों और जाँच में मदद कर सकते हैं, पर सोच, ईमानदारी और स्रोत तुम्हारे होने चाहिए।
- गणितीय आगमन द्वारा उपपत्ति – गणितीय आगमन (mathematical induction) से हम सिद्ध करते हैं कि कोई कथन P(n) हर प्राकृत संख्या n के लिए सत्य है। चरण 1 (आधार चरण): दिखाओ कि P(1) सत्य है। चरण 2 (आगमन चरण): मान लो किसी k के लिए P(k) सत्य है, और इससे दिखाओ कि P(k + 1) भी सत्य है। फिर डोमिनो की कतार की तरह P(1) से P(2), P(2) से P(3)… हमेशा के लिए सब सत्य।
- गणितीय तर्क: नियम से सुलझने वाली पहेलियाँ – तर्क के प्रश्न जाँचते हैं कि तुम नियम पहचानकर उसे लगा सकते हो या नहीं। विषम पद: ज़्यादातर चीज़ों का साझा नियम खोजो। न्याय वाक्य: "सभी", "कुछ", "कोई नहीं" के घेरे बनाओ और सिर्फ़ वही मानो जो हर हाल में सच हो। रक्त संबंध: वंश-वृक्ष बनाओ। कूट-लेखन: अक्षर कैसे खिसकते हैं, देखो। छिपे अंक: स्थानीय मान, हासिल और सम-विषम से अंक निकालो।
- गणितीय निदर्शन: गणित से असली दुनिया को समझना – गणितीय मॉडल (mathematical model) एक समीकरण, ग्राफ़ या तालिका है जो किसी असली स्थिति को सरल तरीके से बताती है। मॉडलिंग चक्र: असली समस्या समझो → चर चुनो और मान्यताएँ बनाओ → मॉडल बनाओ (जैसे रैखिक, द्विघात या चरघातांकी) → हल करो और अनुमान लगाओ → असली आँकड़ों से जाँचो → मॉडल सुधारो या उसकी सीमा बताओ। कोई मॉडल पूरी तरह सही नहीं होता; अच्छा मॉडल सरल होता है और काम लायक सही होता है।
- गणितीय प्रक्रियाएँ: अच्छे सवाल हल करने वाले कैसे सोचते हैं – गणितीय प्रक्रियाएँ वे आदतें हैं जो सूत्रों को असली गणित-कौशल बनाती हैं। समस्या हल करना एक चक्र है: समझो, योजना बनाओ, हल करो, पीछे देखकर जाँचो। तर्क और प्रमाण का मतलब है ऐसा कारण देना जो हर बार सही हो, सिर्फ़ एक उदाहरण में नहीं। चिंतन का मतलब है देखना कि उत्तर समझ में आता है या नहीं, अक्सर मोटे अनुमान से। जोड़ना यानी विचारों को आपस में और जीवन से जोड़ना (½ = 50% = आधी क़ीमत)। निरूपण यानी एक बात को कई रूपों में दिखाना: वस्तु, चित्र, संख्या, सारणी, ग्राफ़। उपकरण चुनना यानी काम के हिसाब से मन, काग़ज़, कैलकुलेटर या ग्राफ़ लेना। संप्रेषण यानी साफ़ चरण, इकाई और शब्द लिखना ताकि दूसरे आपकी सोच समझ सकें।
- गणितीय संप्रेषण: गणित को साफ़-साफ़ कहना – गणितीय संप्रेषण का मतलब है गणित के विचार ऐसे बताना कि दूसरा व्यक्ति उन्हें समझ और जाँच सके। एक ही स्थिति को शब्दों, प्रतीकों (सूत्र), तालिका या ग्राफ़ में दिखा सकते हैं; हर एक अलग काम के लिए अच्छा है। साफ़ हल में हर पंक्ति में एक कदम, सही प्रतीक और इकाइयाँ होती हैं। अच्छा संप्रेषक ग्राफ़ को परखता भी है और नतीजे प्रश्न, विधि, परिणाम और निष्कर्ष के साथ प्रस्तुत करता है।
- गतिशील ज्यामिति: खींचिए, नापिए और खोजिए – गतिशील ज्यामिति सॉफ़्टवेयर में आप बिंदुओं, रेखाओं और वृत्तों से आकृति बनाते हैं, फिर एक बिंदु खींचते हैं और आकृति आपके बनाए नियमों के साथ चलती है। जो बदलता है वह स्वतंत्र है। जो कभी नहीं बदलता वह ज्यामिति का नियम (अचर) है। कई स्थितियाँ जाँचने से अटकल बनती है, पर पक्का करने के लिए उपपत्ति (प्रमाण) चाहिए।
- ग्राफ़ सिद्धांत: बिंदु, रेखाएँ और नेटवर्क – ग्राफ़ शीर्षों (बिंदुओं) का समूह है जिन्हें किनारे (रेखाएँ) जोड़ते हैं। किसी शीर्ष की घात उसे छूने वाले किनारों की संख्या है, और सभी घातों का योग किनारों का दुगुना होता है। ऑयलर पथ हर किनारे का एक बार उपयोग करता है और तभी संभव है जब 0 या 2 शीर्ष विषम घात के हों। वृक्ष ऐसा जुड़ा ग्राफ़ है जिसमें चक्र नहीं और n − 1 किनारे हैं। भारित ग्राफ़ सड़कें और नेटवर्क दिखाते हैं; क्रुस्कल और प्रिम विधियाँ न्यूनतम विस्तृत वृक्ष ढूँढती हैं।
- ग्राफ़ से समीकरण और असमिकाएँ हल करना – किसी समीकरण का ग्राफ़ उसके सभी हलों का समूह है। f(x) = g(x) हल करने के लिए y = f(x) और y = g(x) बनाइए: जहाँ ये काटते हैं, उन बिंदुओं के x-निर्देशांक हल हैं। f(x) > g(x) उन x पर सही है जहाँ f का ग्राफ़ g के ऊपर है। y > 2x + 1 जैसी दो चर वाली असमिका का हल एक अर्ध-तल है: सीमा रेखा बनाइए (< या > के लिए टूटी, ≤ या ≥ के लिए पूरी) और परीक्षण बिंदु से सही भाग रंगिए। असमिकाओं के निकाय का हल सभी रंगे भागों का साझा भाग है।
- ग्रेडिएंट डिसेंट: सबसे नीचे का बिंदु ढूँढना – ग्रेडिएंट डिसेंट (gradient descent) छोटे-छोटे कदम नीचे की ओर चलकर किसी फलन का न्यूनतम मान ढूँढता है। हर कदम पर: नया x = पुराना x − सीखने की दर × ढलान। दर बहुत बड़ी हो तो गेंद आगे निकल जाती है, बहुत छोटी हो तो बहुत धीरे चलती है। मशीन लर्निंग इसी से अपनी गलती घटाती है।
- घड़ी और कैलेंडर: आकाश और गिनती से समय – हमारे समय की इकाइयाँ आकाश से आई हैं। सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी का एक चक्कर सौर दिन (24 घंटे) है; तारों के सापेक्ष नाक्षत्र दिन (लगभग 23 घं 56 मि)। चंद्रमा की कलाएँ 29.53 दिन में दोहराती हैं (मास)। पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगभग 365.2422 दिन में लगाती है (वर्ष)। कैलेंडर चांद्र, सौर या चांद्र-सौर होते हैं। ग्रेगोरियन लीप वर्ष नियम कैलेंडर को ऋतुओं के साथ रखता है। फिर घड़ी के प्रश्न (कोण = |30H − 5.5M|) और कैलेंडर के प्रश्न (विषम दिन) हल होते हैं।
- घन और घनमूल – किसी संख्या n का घन n × n × n = n³ होता है। यह उतने छोटे ब्लॉक हैं जितने उस घन में लगते हैं जिसके हर किनारे पर n ब्लॉक हों। पूर्ण घन वह पूर्ण संख्या है जो किसी पूर्ण संख्या का घन हो (1, 8, 27, 64, 125 …)। घनमूल ∛ उल्टा काम करता है: ∛64 = 4, क्योंकि 4³ = 64। इसे अभाज्य गुणनखंडों को तीन-तीन के समूह में बाँटकर या अंतिम अंक से अनुमान लगाकर निकालते हैं। 1729 सबसे छोटी संख्या है जो दो घनों के योग के रूप में दो तरह से लिखी जा सकती है।
- घनाभ, बेलन, शंकु, पिरामिड और गोले का पृष्ठीय क्षेत्रफल और आयतन – पृष्ठीय क्षेत्रफल किसी ठोस की बाहरी सतह का कुल क्षेत्रफल है — जैसे उसे लपेटने के लिए कितना कागज़ लगेगा। आयतन अंदर की जगह है — जैसे उसमें कितना पानी आएगा। घनाभ का आयतन = उसमें आने वाले 1 सेमी के घनों की गिनती। शंकु में उसी आधार और ऊँचाई वाले बेलन का एक-तिहाई आता है, और पिरामिड में अपने प्रिज़्म का एक-तिहाई।
- घात फलन: y = a·xⁿ – घात फलन का रूप y = a·xⁿ है, जहाँ a एक संख्या और n एक स्थिर घातांक है। सम पूर्ण घातें (x², x⁴) U आकार बनाती हैं जो y-अक्ष के प्रति सममित है। विषम घातें (x³, x⁵) S आकार बनाती हैं जो मूलबिंदु के प्रति सममित है। n > 0 वाले सभी y = xⁿ (0, 0) और (1, 1) से गुज़रते हैं। ऋणात्मक घात (x⁻¹ = 1/x) में अनंतस्पर्शी होते हैं और x = 0 पर फलन परिभाषित नहीं। भिन्न घात मूल हैं: x^(1/2) = √x, x^(1/3) = ∛x. मूल फलन मिलती घात का प्रतिलोम है।
- घातांक के नियम – घातांक बताता है कि आधार को कितनी बार खुद से गुणा किया गया। एक ही आधार हो तो: गुणा → घातांक जोड़ें, भाग → घटाएँ, घात की घात → गुणा करें। a⁰ = 1, a⁻ⁿ = 1/aⁿ और a^(1/n) = n-वाँ मूल।
- घातांकी फलन (Exponential Functions) – घातांकी फलन का रूप y = a·bˣ है, जहाँ a ≠ 0 शुरुआती मान है और b > 0, b ≠ 1 वृद्धि-गुणक (आधार) है। b > 1 हो तो बढ़ता है, 0 < b < 1 हो तो घटता (क्षय) है। x में 1 बढ़ने पर y को b से गुणा किया जाता है (स्थिर अनुपात), जबकि रैखिक फलन में हर बार एक ही संख्या जुड़ती है। y = bˣ का ग्राफ (0, 1) से गुज़रता है, प्रांत सभी वास्तविक संख्याएँ, परिसर y > 0, और x-अक्ष अनंतस्पर्शी है। सामान्य रूप y = a·b^(k(x − d)) + c इसे खींचता, पलटता और खिसकाता है।
- चक्रवृद्धि ब्याज (Compound Interest) – ब्याज वह अतिरिक्त पैसा है जो किसी का पैसा इस्तेमाल करने के बदले मिलता है। साधारण ब्याज सिर्फ़ शुरुआती रकम (मूलधन) पर लगता है, इसलिए हर साल बराबर बढ़ता है। चक्रवृद्धि ब्याज मूलधन और अब तक मिले ब्याज दोनों पर लगता है, यानी ब्याज पर भी ब्याज। n साल बाद मिश्रधन A = P(1 + r/100)ⁿ। साल में k बार ब्याज जुड़े तो दर r/k और अवधियाँ k × n लें। हर पल ब्याज जुड़े तो A = Pe^(rt)। कीमत घटे (ह्रास) तो A = P(1 − r/100)ⁿ। चक्रवृद्धि वृद्धि एक घातांकी (exponential) वृद्धि है।
- चक्रीय और स्पर्शरेखीय चतुर्भुज – चक्रीय चतुर्भुज के चारों शीर्ष एक ही वृत्त पर होते हैं। इसके सामने के कोणों का योग 180° होता है, और बाहरी कोण सामने वाले भीतरी कोण के बराबर होता है। स्पर्शरेखीय चतुर्भुज के अंदर ऐसा वृत्त होता है जो चारों भुजाओं को छूता है; इसमें सामने की भुजाओं के योग बराबर होते हैं: AB + CD = BC + DA। थेल्स (अंतःखंड) प्रमेय का विलोम बताता है कि कब कोई रेखा त्रिभुज की भुजा के समांतर होगी।
- चतुर्भुज – चतुर्भुज की 4 भुजाएँ और 4 कोण होते हैं, कोणों का जोड़ 360° है। समांतर चतुर्भुज में आमने-सामने की भुजाएँ समांतर और बराबर, सम्मुख कोण बराबर, और विकर्ण एक-दूसरे को आधा-आधा काटते हैं। ये बातें जाँच के तौर पर भी काम आती हैं। त्रिभुज की दो भुजाओं के मध्य-बिंदुओं को मिलाने वाली रेखा तीसरी भुजा के समांतर और उसकी आधी होती है। तीनों माध्यिकाएँ एक बिंदु पर मिलती हैं जो हर माध्यिका को 2 : 1 में बाँटता है।
- चरघातांकी समीकरण और असमिकाएँ – चरघातांकी समीकरण में अज्ञात x घात में होता है, जैसे 2^x = 8। इसे हल करने के तीन तरीके हैं: आधार समान बनाओ, छिपा द्विघात हो तो प्रतिस्थापन करो, या लघुगणक लो। असमिका में आधार 1 से बड़ा हो तो चिह्न वही रहता है, 0 और 1 के बीच हो तो पलट जाता है।
- चरघातांकी, लघुगणकीय और अपरिमेय असमिकाएँ – तीन तरह की असमिकाओं में एक ही विचार है: दो ग्राफ़ की तुलना। घात और लघुगणक में आधार तय करता है कि चिह्न पलटेगा या नहीं (आधार 1 से बड़ा हो तो वही, 0 और 1 के बीच हो तो पलटेगा)। लघुगणक और मूल में पहले प्रांत जाँचना ज़रूरी है, और मूल वाली असमिका में दूसरी ओर के चिह्न का ध्यान रखना पड़ता है।
- चाल, दूरी और समय (समय और कार्य सहित) – चाल = दूरी ÷ समय। km/h को m/s में बदलने के लिए 5/18 से गुणा करो। औसत चाल = कुल दूरी ÷ कुल समय। आमने-सामने चलने पर दूरी दोनों चालों के जोड़ से घटती है, एक दिशा में अंतर से। ट्रेन को अपनी लंबाई भी तय करनी पड़ती है। धारा के साथ चाल = नाव + धारा; विरुद्ध = नाव − धारा। काम और नल भी दर हैं: दरें जोड़ो, रिसाव घटाओ।
- छात्र फिटनेस सर्वे: शुरू से अंत तक डेटा प्रोजेक्ट – सर्वे प्रोजेक्ट के दो भाग हैं। पहले निष्पक्ष तरीके से डेटा इकट्ठा करो: एक सवाल, एक टेस्ट, सबके लिए एक जैसे नियम, इकाई के साथ परिणाम। फिर विश्लेषण करो: क्रम में लगाओ, माध्य, मध्यिका और चतुर्थक निकालो, बॉक्स प्लॉट बनाओ और साफ़ निष्कर्ष व एक ईमानदार सीमा के साथ छोटी रिपोर्ट लिखो।
- जानकारी की गिनती और विश्लेषण – व्यवसाय सांख्यिकी से बहुत सारे उत्तरों को कुछ साफ़ तथ्यों में बदलते हैं। टैली मार्क उत्तर गिनते हैं; बारंबारता तालिका गिनती लिखती है; बार ग्राफ़ उन्हें पट्टियों में दिखाता है। माध्य (औसत), माध्यिका (बीच का मान) और बहुलक (सबसे आम मान) आँकड़ों का सार देते हैं और प्रतिशत हिस्सा और बदलाव दिखाते हैं। औसत से तुलना करके समस्या पहचानो, कारण पूछो, उपाय आज़माओ और फिर जाँचो।
- जानकारी को व्यवस्थित करना और विश्लेषण करना – जानकारी इकट्ठा करने के बाद उसका मतलब निकालना होता है। पहले व्यवस्थित करो: एक साफ़ नियम से समूह बनाओ, गिनो, तालिका या आलेख बनाओ। फिर विश्लेषण करो: समूहों की तुलना करो, बहुलक, माध्य, माध्यिका और परिसर निकालो, और बताओ कि कौन-सा पैटर्न दिखा और क्या सिद्ध नहीं होता।
- ज्या तरंग y = A sin(ωx + φ) – y = A sin(ωx + φ) का ग्राफ एक चिकनी लहर है। A आयाम (ऊँचाई) है, आवर्तकाल T = 2π/ω है, और लहर φ/ω दूरी खिसकती है (φ धनात्मक हो तो बाईं ओर)। इससे झूला, ज्वार, ध्वनि और AC धारा जैसी दोहराने वाली चीज़ों का मॉडल बनता है।
- ज्या नियम (Law of Sines) – किसी भी त्रिभुज में हर भुजा को उसके सामने वाले कोण के sin से भाग दो, तो एक ही संख्या मिलती है: a/sinA = b/sinB = c/sinC = 2R। यहाँ R उस वृत्त की त्रिज्या है जो तीनों शीर्षों से होकर जाता है। जब दो कोण और एक भुजा पता हो (AAS, ASA), या दो भुजाएँ और ऐसा कोण जो उनके बीच न हो (SSA), तब यह नियम लगाओ। SSA में दो, एक या शून्य त्रिभुज बन सकते हैं।
- ज्यामिति की मूल बातें: 2D आकृतियाँ, 3D ठोस, जाल और पैमाना – ज्यामिति आकार, माप और स्थिति का गणित है। 2D (समतल) आकृति में सिर्फ़ लंबाई और चौड़ाई होती है: त्रिभुज, वर्ग, षट्भुज, वृत्त। 3D (ठोस) आकृति में गहराई भी होती है: घन, प्रिज़्म, पिरामिड, बेलन। ठोस के फलक (सपाट सतह), किनारे (जहाँ दो फलक मिलते हैं) और शीर्ष (कोने) होते हैं। जाल (net) एक सपाट पैटर्न है जो मोड़ने पर ठोस बनता है। एक जैसा आकार और एक जैसा माप हो तो आकृतियाँ सर्वांगसम हैं; आकार वही पर माप अलग हो तो समरूप। टेसेलेशन में आकृतियाँ फ़र्श को बिना खाली जगह ढक देती हैं। पैमाना आरेखण असली चीज़ को एक तय गुणक से छोटा या बड़ा दिखाता है।
- ज्यामितीय प्रायिकता: यादृच्छिक बिंदु चुनना – जब किसी आकृति में से एक बिंदु बिल्कुल यादृच्छिक (random) चुना जाए, तो उसके छोटे भाग में गिरने की प्रायिकता = (भाग का माप) ÷ (पूरी आकृति का माप) होती है। माप का मतलब रेखाखंड या चाप के लिए लंबाई और समतल आकृति के लिए क्षेत्रफल है।
- ज्यामितीय मॉडलिंग: असली चीज़ों को सरल ठोसों से समझना – ज्यामितीय मॉडलिंग का मतलब है असली चीज़ को सरल आकारों (घनाभ, बेलन, शंकु, गोला, प्रिज़्म) से बदल देना ताकि हिसाब लगा सकें। चक्र है: असली चीज़ देखो, सरल करो, नापो, आयतन या पृष्ठीय क्षेत्रफल निकालो, फिर असलियत से जाँचो और मॉडल सुधारो। पैमाना k हो तो लंबाई k गुना, क्षेत्रफल k² गुना और आयतन k³ गुना। ज्यामिति प्रकृति और कला के पैटर्न भी समझाती है, जैसे मधुमक्खी के छत्ते के षट्भुज।
- ज्यामितीय रचनाएँ: परकार और पटरी से सटीक चित्र – ज्यामितीय रचना में आकृति सिर्फ़ परकार (compass) और पटरी (सीधी रेखा के लिए) से सटीक बनाई जाती है। मुख्य रचनाएँ: रेखाखंड का लंब समद्विभाजक, कोण का समद्विभाजक, बिंदु से रेखा पर लंब, 60°, 30°, 90° और 45° के कोण, तीन भुजाओं (SSS), दो भुजाओं और बीच के कोण (SAS) या दो कोणों और एक भुजा (ASA) से त्रिभुज, और सम षट्भुज जैसे बहुभुज। ये इसलिए काम करती हैं क्योंकि बराबर चाप बराबर लंबाइयाँ देते हैं, जिनसे सर्वांगसम त्रिभुज बनते हैं।
- ठोस आकृतियाँ: फलक, किनारे, शीर्ष, जाल और दृश्य – ठोस (3D) आकृति में लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई तीनों होती हैं, इसलिए वह जगह घेरती है। हम उसे फलक (सपाट या मुड़ी सतह), किनारे (जहाँ दो फलक मिलते हैं) और शीर्ष (कोने) गिनकर पहचानते हैं। प्रिज़्म के दो बराबर सिरे आयतों से जुड़े होते हैं; पिरामिड का एक आधार होता है और त्रिभुज एक नोक पर मिलते हैं; बेलन, शंकु और गोले की सतह मुड़ी होती है। जाल (net) एक समतल नक्शा है जो मुड़कर ठोस बनता है। ऊपर, सामने और बगल से देखने पर तीन दृश्य मिलते हैं। सपाट फलकों वाले हर ठोस के लिए फलक + शीर्ष − किनारे = 2 (ऑयलर नियम)।
- ठोस के परिच्छेद बनाना: ट्रेस विधि – परिच्छेद वह सपाट आकृति है जो तल से ठोस को काटने पर बनती है। इसे बनाने के लिए एक ही फलक पर पड़े बिंदु जोड़ते हैं; अगर रेखाएँ ठोस के अंदर नहीं मिलतीं तो उन्हें आधार तल तक बढ़ाते हैं। कटने वाले तल और आधार तल की मिलन-रेखा ट्रेस (चिह्न-रेखा) कहलाती है। ट्रेस से परिच्छेद के नए बिंदु मिलते हैं। परिच्छेद की हर फलक पर ज़्यादा से ज़्यादा एक भुजा होती है।
- ठोस ज्यामिति: अंतरिक्ष में बिंदु, रेखाएँ और समतल – ठोस ज्यामिति तीन विमाओं (3D) की आकृतियों का अध्ययन है। एक रेखा पर न पड़ने वाले तीन बिंदु एक समतल तय करते हैं। अंतरिक्ष में दो रेखाएँ समांतर, प्रतिच्छेदी या विषमतलीय (skew, किसी एक तल में नहीं) हो सकती हैं। रेखा समतल में पड़ी हो सकती है, उसे काट सकती है या उसके समांतर हो सकती है; वह समतल पर लंब है अगर वह समतल की दो प्रतिच्छेदी रेखाओं पर लंब हो। अंतरिक्ष के कोण समतल पर प्रक्षेप लेकर समकोण त्रिभुज से निकाले जाते हैं।
- ठोसों का आयतन: प्रिज़्म, पिरामिड और छिन्नक – आयतन वह जगह है जो कोई ठोस घेरता है, जिसे इकाई-घनों से गिना जाता है। प्रिज़्म या समांतर षट्फलक का आयतन V = आधार का क्षेत्रफल × ऊँचाई। पिरामिड का आयतन V = ⅓ × आधार क्षेत्रफल × ऊँचाई। छिन्नक (ऊपर से कटा पिरामिड) का आयतन V = h/3 × (B₁ + B₂ + √(B₁B₂))। सब एक ही विचार से निकलते हैं: पतली परतों को जोड़ना।
- ठोसों का पृष्ठ क्षेत्रफल और समरूपता: अंतरिक्ष में होमोथेटी – केंद्र O और अनुपात k वाली होमोथेटी (माप-परिवर्तन) हर बिंदु को O से k गुना दूरी पर भेज देती है। हर लंबाई k गुनी, हर पृष्ठ क्षेत्रफल k² गुना और हर आयतन k³ गुना हो जाता है, जबकि कोण और आकार वही रहते हैं। पृष्ठ क्षेत्रफल: बेलन 2πr(h + r), शंकु πr(l + r), गोला 4πr²। शंकु या पिरामिड को आधार के समान्तर समतल से काटने पर छोटा समरूप ठोस मिलता है।
- ठोसों के परिच्छेद (Sections of Solids) – जब कोई तल (plane) किसी ठोस को काटता है, तो जो सपाट आकृति बनती है उसे परिच्छेद या अनुप्रस्थ काट (cross-section) कहते हैं। परिच्छेद की भुजाएँ उतनी होती हैं जितने फलकों से तल गुज़रता है। घन से त्रिभुज, चतुर्भुज (वर्ग, आयत), पंचभुज या षट्भुज मिल सकता है। पिरामिड को आधार के समांतर काटें तो आधार की छोटी प्रति मिलती है। तकनीकी ड्राइंग में सेक्शन केवल कटा फलक दिखाता है; कट (सेक्शनल व्यू) उसके पीछे की चीज़ें भी दिखाता है।
- ठोसों के लंबकोणीय दृश्य – लंबकोणीय (orthographic) दृश्य किसी ठोस को एक दिशा से बिल्कुल सीधा देखने पर दिखता है, बिना परिप्रेक्ष्य के। तीन मुख्य दृश्य हैं: सामने का दृश्य (उन्नयन), ऊपर का दृश्य (योजना) और पार्श्व दृश्य (बगल का उन्नयन)। हर दृश्य एक माप छिपा देता है, इसलिए आकार तय करने के लिए आम तौर पर तीनों चाहिए। दृश्य एक तय क्रम में रखे जाते हैं: प्रथम कोण प्रक्षेप (योजना सामने के दृश्य के नीचे; भारत, यूरोप, ISO) या तृतीय कोण प्रक्षेप (योजना ऊपर; अमेरिका)। दिखने वाले किनारे मोटी सतत रेखा, छिपे किनारे टूटी रेखा, और केंद्र रेखाएँ शृंखला रेखा से बनती हैं। जाल वह समतल आकृति है जो मुड़कर ठोस बनती है, और अनुप्रस्थ काट ठोस को काटने पर दिखने वाली सतह है।
- डेटा सफ़ाई: आउटलायर, लापता मान और सामान्यीकरण – असली डेटा गड़बड़ होता है। विश्लेषण से पहले हम उसकी सफ़ाई करते हैं: आउटलायर (अजीब मान) ढूँढकर ठीक करना, लापता मान (भरना या हटाना) सँभालना और संख्याओं को सामान्यीकृत (पुनः पैमाने पर) करना ताकि अलग-अलग माप ठीक से तुलना हो सकें। इसे डेटा प्रीप्रोसेसिंग कहते हैं।
- ढाल क्षेत्र, ऑयलर विधि और लॉजिस्टिक मॉडल – अवकल समीकरण dy/dx = f(x, y) हर बिंदु पर ढाल बताता है। उन ढालों की छोटी रेखाएँ बनाने से ढाल क्षेत्र बनता है, और हल-वक्र उन रेखाओं के साथ चलते हैं। ऑयलर विधि सीधे कदमों में चलती है: yₙ₊₁ = yₙ + h·f(xₙ, yₙ)। लॉजिस्टिक मॉडल dP/dt = kP(1 − P/K) में वृद्धि P = K/2 पर सबसे तेज़ है और P अंत में K पर रुकता है। वायु प्रतिरोध के साथ गिरती वस्तु, m dv/dt = mg − bv, सीमांत वेग v_t = mg/b की ओर जाती है।
- तर्क और उपपत्ति: गणितज्ञ कैसे दिखाते हैं कि कोई बात हमेशा सत्य है – उपपत्ति (proof) सही कारणों की ऐसी कड़ी है जो दिखाती है कि कथन हर स्थिति में सत्य है। कथन सत्य या असत्य होता है; 'यदि P तो Q' (P ⇒ Q) का अर्थ है P होने पर Q ज़रूर होगा, पर उसका विलोम Q ⇒ P ग़लत भी हो सकता है। P ⇔ Q का अर्थ दोनों दिशाएँ सही। मुख्य विधियाँ: प्रत्यक्ष उपपत्ति (ज्ञात तथ्यों से क़दम-दर-क़दम, जैसे विषम संख्या 2n + 1); सभी स्थितियाँ जाँचकर उपपत्ति; प्रति-उदाहरण से खंडन (एक असफल स्थिति दावे को गिरा देती है); विरोधाभास से उपपत्ति (उल्टा मानकर असंभव तक पहुँचना)। ज्यामितीय उपपत्ति में हर पंक्ति का कारण लिखा जाता है (समांतर रेखाएँ, सर्वांगसम और समरूप त्रिभुज)। विश्लेषणात्मक उपपत्ति निर्देशांक लेती है; संश्लेषणात्मक उपपत्ति शुद्ध ज्यामिति।
- तार्किक विवेचन (Logical Reasoning) – तार्किक विवेचन यानी तथ्यों (आधार-वाक्यों) से किसी निष्कर्ष तक ऐसे पहुँचना जिसे जाँचा जा सके। कथन या तो सत्य होता है या असत्य। कथनों को नहीं, और, या, यदि…तो और यदि और केवल यदि से जोड़ते हैं, और सत्यता सारणी बताती है कि परिणाम कब सत्य है। निगमन (deduction) में अगर आधार सत्य हों और रूप वैध हो तो निष्कर्ष सत्य होना ही चाहिए (मोडस पोनेंस, मोडस टोलेंस, न्यायवाक्य)। 'सभी', 'कोई नहीं', 'कुछ' वाले न्यायवाक्य वेन आरेख से जाँचे जाते हैं। आगमन (induction) और सादृश्य उदाहरणों से सामान्य बात तक जाते हैं: निष्कर्ष केवल संभावित होता है। प्रत्यक्ष उपपत्ति ज्ञात बातों से कदम-दर-कदम चलती है; अप्रत्यक्ष उपपत्ति उल्टा मानकर विरोधाभास तक पहुँचती है। तर्कदोष लुभावने पर गलत तर्क हैं।
- तीन लंबों की प्रमेय – अगर PO किसी तल पर लंब है, OH उस तल की रेखा l पर लंब है और H रेखा l पर है, तो PH भी l पर लंब होता है। इससे हम अंतरिक्ष में दूरियाँ निकालते हैं। बिंदु से तल की दूरी लंब PO की लंबाई है। बिंदु से रेखा की दूरी PH है, जो समकोण त्रिभुज POH से मिलती है: PH² = PO² + OH²। दो समांतर तलों के बीच की दूरी किसी भी उभयनिष्ठ लंब की लंबाई है, और यह हर जगह बराबर होती है।
- त्रिकोणमितीय अनुपात (sin, cos, tan) – समकोण त्रिभुज में एक न्यून कोण θ चुनो। θ के सामने वाली भुजा लंब (सम्मुख), θ को छूने वाली छोटी भुजा आधार (आसन्न), और सबसे लंबी भुजा कर्ण। sin θ = लंब/कर्ण, cos θ = आधार/कर्ण, tan θ = लंब/आधार। cosec, sec, cot इनके उल्टे हैं। ये अनुपात सिर्फ़ कोण पर निर्भर हैं, त्रिभुज के आकार पर नहीं। 0°, 30°, 45°, 60°, 90° की टेबल याद करो।
- त्रिकोणमितीय फलन: रेडियन, इकाई वृत्त, ग्राफ़ और सर्वसमिकाएँ – एक रेडियन वह कोण है जिसका चाप त्रिज्या के बराबर हो, इसलिए π रेडियन = 180°। इकाई वृत्त पर कोण x वाला बिंदु P = (cos x, sin x) है, जिससे sin²x + cos²x = 1 मिलता है और sin, cos हर वास्तविक संख्या के लिए बन जाते हैं। चारों चतुर्थांशों में चिह्न 'All, Sin, Tan, Cos' से याद रखो; sin x और cos x हर 2π पर दोहराते हैं और −1 से 1 के बीच रहते हैं। cos(A + B) = cos A cos B − sin A sin B जैसे सूत्रों से tan(A + B), cot(A + B), योग-गुणनफल, द्विगुण और त्रिगुण कोण सूत्र निकलते हैं।
- त्रिकोणमितीय सर्वसमिकाएँ – सर्वसमिका वह समीकरण है जो हर मान्य कोण के लिए सही हो। कर्ण 1 वाले समकोण त्रिभुज पर पाइथागोरस से: sin²A + cos²A = 1। cos²A से भाग देने पर 1 + tan²A = sec²A (A ≠ 90°)। sin²A से भाग देने पर 1 + cot²A = cosec²A (A ≠ 0°)। इनसे एक अनुपात से दूसरा निकालते हैं और दूसरे कथन सिद्ध करते हैं।
- त्रिज्यखंड और वृत्तखंड का क्षेत्रफल – त्रिज्यखंड वृत्त का पिज़्ज़ा जैसा टुकड़ा है: क्षेत्रफल = θ/360 × πr²। उसका किनारा चाप है: लंबाई = θ/360 × 2πr। वृत्तखंड = त्रिज्यखंड − अंदर का त्रिभुज।
- त्रिभुज के गुण और उसके केन्द्र – हर त्रिभुज के तीनों कोणों का योग 180° होता है। त्रिभुज के चार ख़ास केन्द्र हैं। माध्यिकाएँ केन्द्रक G पर मिलती हैं, जो हर माध्यिका को 2 : 1 में बाँटता है। लंब समद्विभाजक परिकेन्द्र O पर मिलते हैं — यह शीर्षों से गुज़रने वाले वृत्त का केन्द्र है। कोण समद्विभाजक अंतःकेन्द्र I पर मिलते हैं — यह भुजाओं को छूने वाले अंदर के वृत्त का केन्द्र है। शीर्षलंब लंबकेन्द्र H पर मिलते हैं। O, G, H एक ही रेखा — यूलर रेखा — पर होते हैं।
- त्रिभुज: प्रकार, भुजाएँ, माध्यिका और ऊँचाई – त्रिभुज एक बंद आकृति है जिसकी 3 भुजाएँ, 3 शीर्ष (कोने) और 3 कोण होते हैं। तीनों कोणों का योग हमेशा 180° होता है। भुजाओं के आधार पर त्रिभुज समबाहु (तीनों भुजाएँ बराबर), समद्विबाहु (दो बराबर) या विषमबाहु (कोई बराबर नहीं) होता है। कोणों के आधार पर वह न्यून कोण (सब कोण 90° से छोटे), समकोण (एक कोण 90°) या अधिक कोण (एक कोण 90° से बड़ा) होता है। किन्हीं दो भुजाओं का योग तीसरी भुजा से बड़ा होना चाहिए: यह त्रिभुज असमिका है। माध्यिका शीर्ष को सामने की भुजा के मध्य से जोड़ती है, कोण समद्विभाजक कोण को बराबर दो भागों में बाँटता है और ऊँचाई 90° पर सीधी नीचे आती है। धक्का देने पर त्रिभुज का आकार नहीं बदलता, इसलिए पुल, छत और टावर में वही सबसे मज़बूत आकार है।
- त्रिभुजों की सर्वांगसमता – दो त्रिभुज सर्वांगसम (congruent) होते हैं जब एक को दूसरे पर रखने से वह पूरा ढक जाए: तीनों भुजाएँ और तीनों कोण बराबर। छहों भाग जाँचने की ज़रूरत नहीं। SAS, SSS, ASA, AAS या RHS में से कोई एक नियम काफ़ी है। SSA काफ़ी नहीं है। समद्विबाहु त्रिभुज में बराबर भुजाओं के सामने के कोण बराबर होते हैं, और इसका उल्टा भी सच है।
- त्रिविमीय ज्यामिति – आकाश में रेखा एक बिंदु और एक दिशा से तय होती है। दिक्-कोसाइन l, m, n के लिए l² + m² + n² = 1; इनके समानुपाती संख्याएँ दिक्-अनुपात हैं, दो बिंदुओं से (x₂ − x₁, y₂ − y₁, z₂ − z₁)। सदिश समीकरण r = a + λb, कार्तीय (x − x₁)/a = (y − y₁)/b = (z − z₁)/c। दो रेखाओं के बीच कोण: cosθ = |b₁·b₂|/(|b₁||b₂|)। आकाश में दो रेखाएँ समांतर, प्रतिच्छेदी या विषमतलीय होती हैं। विषमतलीय रेखाओं के बीच न्यूनतम दूरी d = |(a₂ − a₁)·(b₁ × b₂)|/|b₁ × b₂|; समांतर के लिए d = |b × (a₂ − a₁)|/|b|; d = 0 तो रेखाएँ मिलती हैं।
- त्रिविमीय ज्यामिति का परिचय (कक्षा 11) – अंतरिक्ष में मूल O से होकर तीन परस्पर लंब अक्ष x, y, z लेते हैं। हर दो अक्ष एक निर्देशांक तल बनाते हैं: XY (z = 0), YZ (x = 0), ZX (y = 0)। तीनों तल अंतरिक्ष को आठ अष्टांशों में बाँटते हैं, जिनकी पहचान x, y, z के चिह्नों से होती है। बिंदु P(x, y, z) तक x-अक्ष पर x, फिर y के समांतर y, फिर z के समांतर z चलकर पहुँचते हैं। x-अक्ष पर बिंदु (x, 0, 0), XY-तल पर (x, y, 0)। दूरी PQ = √((x₂ − x₁)² + (y₂ − y₁)² + (z₂ − z₁)²)।
- द मुआवर प्रमेय और इकाई के मूल – सम्मिश्र संख्या को उसकी लंबाई r और कोण θ से लिख सकते हैं: z = r(cos θ + i sin θ) = re^{iθ}। गुणा करने पर लंबाइयाँ गुणा होती हैं और कोण जुड़ते हैं। इसलिए zⁿ = rⁿ(cos nθ + i sin nθ) — यही द मुआवर प्रमेय है। इससे घात जल्दी निकलती है, cos nθ और sin nθ के सूत्र मिलते हैं, और किसी भी संख्या के n मूल मिलते हैं। 1 के n मूल इकाई वृत्त पर बराबर दूरी पर, सम बहुभुज के कोनों पर बैठते हैं।
- दो चरों वाले रैखिक समीकरण युग्म – a₁x + b₁y = c₁ और a₂x + b₂y = c₂ जैसे दो समीकरण दो सीधी रेखाएँ बनाते हैं। जो (x, y) दोनों को सही करे, वह इन रेखाओं का मिलने का बिंदु है। रेखाएँ काटें तो एक हल, समांतर हों तो कोई हल नहीं, और एक-दूसरे पर पड़ी हों तो अनंत हल। हल ग्राफ से, प्रतिस्थापन से या विलोपन से निकालते हैं।
- दो वृत्त: स्थिति और उभयनिष्ठ स्पर्श रेखाएँ – त्रिज्याएँ r1 और r2 तथा केंद्रों की दूरी d वाले दो वृत्तों की पाँच स्थितियाँ हैं। अलग: d > r1 + r2, 4 उभयनिष्ठ स्पर्श रेखाएँ। बाहर से स्पर्श: d = r1 + r2, 3 रेखाएँ। काटते हुए: |r1 − r2| < d < r1 + r2, 2 रेखाएँ और 2 उभयनिष्ठ बिंदु। अंदर से स्पर्श: d = |r1 − r2|, 1 रेखा। एक दूसरे के अंदर: d < |r1 − r2|, कोई नहीं। स्पर्श बिंदु केंद्रों को मिलाने वाली रेखा पर होता है।
- दो-तरफ़ा सारणी (Two-Way Table) – दो-तरफ़ा सारणी दो श्रेणीगत चरों की गिनती एक साथ दिखाती है: एक चर पंक्तियों में, दूसरा स्तंभों में। पंक्ति और स्तंभ के योग सीमांत योग हैं। खाने को कुल योग से भाग दो तो संयुक्त सापेक्ष बारंबारता; उसकी पंक्ति (या स्तंभ) के योग से भाग दो तो सशर्त सापेक्ष बारंबारता। अगर समूहों के सशर्त प्रतिशत बहुत अलग हों, तो चरों में संबंध है।
- द्विघात असमिकाएँ – द्विघात असमिका पूछती है कि ax² + bx + c कहाँ शून्य से ऊपर (> 0) या नीचे (< 0) है। मूल निकालें, परवलय की कल्पना करें और ग्राफ़ से उत्तर पढ़ें। a > 0 हो तो वक्र मूलों के बीच शून्य से नीचे और बाहर शून्य से ऊपर होता है। वास्तविक मूल न हों (D < 0) तो वक्र हमेशा x-अक्ष के एक ही ओर रहता है।
- द्विघात त्रिपद का गुणनखंडन – x² + 5x + 6 जैसे द्विघात त्रिपद को दो कोष्ठकों के गुणनफल (x + 2)(x + 3) के रूप में लिखा जा सकता है। x² + bx + c के लिए ऐसी दो संख्याएँ खोजो जिनका गुणनफल c और योग b हो। ax² + bx + c के लिए ऐसी दो संख्याएँ खोजो जिनका गुणनफल a × c और योग b हो, मध्य पद तोड़ो और उभयनिष्ठ गुणनखंड निकालो। अंत में फैलाकर जाँच करो।
- द्विघात फलन और उनके ग्राफ़ – द्विघात फलन (quadratic function) y = ax² + bx + c है, जहाँ a ≠ 0। इसका ग्राफ़ U-आकार का वक्र होता है जिसे परवलय (parabola) कहते हैं। a > 0 हो तो वक्र ऊपर खुलता है और उसका एक सबसे निचला बिंदु होता है; a < 0 हो तो नीचे खुलता है और सबसे ऊँचा बिंदु होता है। यह मोड़ बिंदु शीर्ष (vertex) है, x = −b/2a पर। शीर्ष रूप y = a(x − h)² + k में शीर्ष (h, k) है।
- द्विघात फलन का अधिकतम और न्यूनतम मान – परवलय का सबसे ऊँचा या सबसे नीचा बिंदु शीर्ष होता है। a > 0 हो तो शीर्ष न्यूनतम है; a < 0 हो तो अधिकतम। जब x केवल p ≤ x ≤ q में रखा जाए, तो दोनों सिरों के मान की तुलना कीजिए, और शीर्ष का मान भी (यदि शीर्ष अंदर हो)। सबसे बड़ा मान अधिकतम और सबसे छोटा मान न्यूनतम है।
- द्विघात समीकरण – जिस समीकरण में x की सबसे बड़ी घात 2 हो, वह द्विघात समीकरण है: ax² + bx + c = 0, जहाँ a ≠ 0। इसके ज़्यादा से ज़्यादा दो मूल होते हैं। मूल निकालने के दो तरीक़े: गुणनखंड (मध्य पद को तोड़कर) या सूत्र x = (−b ± √(b² − 4ac)) / 2a। विविक्तकर D = b² − 4ac बताता है: D > 0 तो दो अलग वास्तविक मूल, D = 0 तो दो बराबर मूल, D < 0 तो कोई वास्तविक मूल नहीं।
- द्विपद बंटन (Binomial Distribution) – एक ही हाँ/ना वाला प्रयोग n बार दोहराओ, हर बार स्वतंत्र रूप से और हर बार सफलता की प्रायिकता p बराबर। तब सफलताओं की संख्या X द्विपद बंटन B(n, p) मानती है: P(X = k) = ⁿCₖ pᵏ qⁿ⁻ᵏ, जहाँ q = 1 − p। माध्य np और प्रसरण npq होता है।
- धन पूर्णांक घातांक के लिए द्विपद प्रमेय – द्विपद यानी दो पदों वाला व्यंजक, जैसे a + b। द्विपद प्रमेय बताता है कि किसी भी धन पूर्णांक n के लिए (a + b)ⁿ को बार-बार गुणा किए बिना कैसे खोलें: (a + b)ⁿ = ⁿC₀aⁿ + ⁿC₁aⁿ⁻¹b + ⁿC₂aⁿ⁻²b² + … + ⁿCₙbⁿ। कुल n + 1 पद होते हैं। हर पद में a की घात 1 घटती और b की घात 1 बढ़ती है, और दोनों घातों का योग हमेशा n रहता है। गुणांक ⁿCᵣ पास्कल त्रिभुज की पंक्ति n की संख्याएँ हैं, जहाँ हर संख्या ऊपर की दो संख्याओं का योग है। (r + 1)वाँ पद Tᵣ₊₁ = ⁿCᵣ aⁿ⁻ʳ bʳ है। यह पैटर्न भारत में बहुत पहले ज्ञात था (पिंगल का मेरु प्रस्तार), फ़ारस और चीन में भी, और बाद में पास्कल ने इसका विस्तार से अध्ययन किया। प्रमेय की उपपत्ति ⁿCᵣ₋₁ + ⁿCᵣ = ⁿ⁺¹Cᵣ की मदद से गणितीय आगमन से होती है।
- ध्रुवीय निर्देशांक (Polar Coordinates) – ध्रुवीय निर्देशांक में बिंदु की स्थिति एक स्थिर बिंदु (ध्रुव) से दूरी r और एक स्थिर किरण (आरंभिक रेखा) से वामावर्त घूमे कोण θ से बताई जाती है। बदलने के लिए x = r cosθ, y = r sinθ, और वापस r² = x² + y², tanθ = y/x (चतुर्थांश देखकर)। r = f(θ) से वृत्त, कार्डियॉइड, गुलाब और सर्पिल बनते हैं। ढाल dy/dx = (dy/dθ)/(dx/dθ), क्षेत्रफल = ½∫r²dθ।
- नियमित समतल आकृतियों का प्रक्षेप – समतल आकृति के दो दृश्य बनाते हैं: फर्श (HP) पर ऊपरी दृश्य और दीवार (VP) पर सामने का दृश्य। HP पर सपाट रखी आकृति का ऊपरी दृश्य असली आकार होता है। जब आकृति HP पर टिके किनारे के सहारे कोण θ से झुकती है, तो ऊपरी दृश्य की गहराई = गहराई × cos θ और सामने के दृश्य की ऊँचाई = गहराई × sin θ हो जाती है; चौड़ाई नहीं बदलती।
- निरपेक्ष मान और अंतराल – निरपेक्ष मान |x|, संख्या x की 0 से दूरी है, इसलिए यह कभी ऋणात्मक नहीं होता। |x - a|, x और a के बीच की दूरी है। |x - a| = b हल करने पर x = a + b या x = a - b मिलता है। अंतराल संख्या रेखा का एक टुकड़ा है। गोल कोष्ठक में सिरा शामिल नहीं होता, चौकोर कोष्ठक में शामिल होता है।
- निर्देशांक ज्यामिति: दूरी सूत्र और विभाजन सूत्र – समतल पर हर बिंदु का एक पता होता है (x, y)। A(x₁, y₁) और B(x₂, y₂) के बीच की दूरी d = √[(x₂ − x₁)² + (y₂ − y₁)²] है; यह x-अंतर और y-अंतर पर पाइथागोरस ही है। जो बिंदु P, AB को अंदर से m : n में बाँटे, वह P = ((mx₂ + nx₁)/(m + n), (my₂ + ny₁)/(m + n)) है। m = n हो तो P मध्य-बिंदु है।
- निर्देशांक प्रमाण: निर्देशांकों से ज्यामिति सिद्ध करना – निर्देशांक प्रमाण में हम आकृति को ग्रिड पर रखते हैं और बीजगणित से उसके तथ्य सिद्ध करते हैं। दूरी सूत्र से लंबाई, मध्य-बिंदु सूत्र से समद्विभाजन, और ढलान से समांतर (बराबर ढलान) या लंब (ढलानों का गुणनफल −1) सिद्ध होता है। वृत्त के लिए: बिंदु (x, y) केंद्र (h, k) और त्रिज्या r वाले वृत्त पर तभी है जब (x − h)² + (y − k)² = r²; पूर्ण वर्ग बनाकर उलझा समीकरण इसी रूप में आता है।
- नृजातीय गणित: पैटर्न और इमारतों में गणित – नृजातीय गणित वह गणित है जो लोग अपनी संस्कृति में इस्तेमाल करते हैं: बुनाई, फ़र्श के नक़्शे, निर्माण, नापना और गिनना। ज़्यादातर पैटर्न एक छोटे आकार पर तीन चालों से बनते हैं: खिसकाना (स्थानांतरण), शीशा (परावर्तन) और घुमाना (घूर्णन)। n-गुना घूर्णन वाला आकार हर 360° ÷ n पर ख़ुद से मिलता है। सिर्फ़ समबाहु त्रिभुज, वर्ग और सम षट्भुज अकेले फ़र्श भर सकते हैं, क्योंकि उनके कोण एक बिंदु पर 360° बनाते हैं।
- परावर्तन से सबसे छोटा रास्ता – A और B सीधी सड़क के एक ही तरफ़ हैं। A से सड़क छूकर B जाना है। B को सड़क के पार पलटकर B′ बनाओ। सबसे छोटा रास्ता A से B′ तक सीधी रेखा है। यह रेखा सड़क को जहाँ काटे, वही सबसे अच्छा रुकने का बिंदु P है। कारण: सड़क पर हर P के लिए PB = PB′, इसलिए AP + PB = AP + PB′ और सीधी रेखा सबसे छोटी होती है।
- परिकल्पना परीक्षण (Hypothesis Testing) – परिकल्पना परीक्षण नमूने (sample) से पूरी जनसंख्या के बारे में किसी दावे को जाँचता है। शुरुआत शून्य परिकल्पना H₀ (कोई बदलाव नहीं, जैसे p = 0.5) और वैकल्पिक परिकल्पना H₁ (जो हमें शक है, जैसे p > 0.5) से होती है। सार्थकता स्तर चुनो, जैसे 5%। अगर H₀ सच हो तो हमारा नतीजा (या उससे भी चरम) कितना संभव है, यही p-मान है। p-मान स्तर से कम हो या नतीजा क्रांतिक क्षेत्र में हो, तो H₀ अस्वीकार। वरना H₀ अस्वीकार करने का पर्याप्त प्रमाण नहीं। टाइप I त्रुटि: सच्ची H₀ को अस्वीकार करना; टाइप II: झूठी H₀ को अस्वीकार न करना।
- परिक्रमण ठोस (Solids of Revolution) – जब कोई सपाट आकृति किसी सीधी रेखा (अक्ष) के चारों ओर पूरा 360° घूमती है, तो जो 3D आकृति बनती है उसे परिक्रमण ठोस कहते हैं। आयत से बेलन, समकोण त्रिभुज से शंकु, अर्धवृत्त से गोला और समलंब से छिन्नक बनता है। इनके आयतन हैं V = πr²h, ⅓πr²h, ⁴⁄₃πr³ और ⅓πh(R² + Rr + r²)। कलन में वक्र y = f(x) को x-अक्ष पर घुमाने से V = π∫y² dx।
- परिमेय ग्राफ़, शांकव और असमिकाएँ – y = (ax + b)/(cx + d) बनाने के लिए देखो हर कहाँ शून्य है (ऊर्ध्वाधर अनंतस्पर्शी), दूर जाकर a/c क्या है (क्षैतिज अनंतस्पर्शी) और अक्षों को कहाँ काटता है। द्विघात/द्विघात के लिए y = k रखकर विविक्तकर से निकालो कि y कौन-से मान ले सकता है। शांकव y² = 4ax, x²/a² + y²/b² = 1 और x²/a² − y²/b² = 1 सरल बदलाव (x → x − p, x → x/s) से खिसकते और खिंचते हैं। परिमेय और बहुपद असमिकाएँ क्रांतिक मानों और चिह्न जाँच से हल होती हैं, अज्ञात चिह्न वाली राशि से गुणा करके कभी नहीं।
- परिमेय फलन: ग्राफ़, अनंतस्पर्शी और स्केच बनाना – परिमेय फलन एक बहुपद को दूसरे बहुपद से भाग देकर बनता है, जैसे y = (2x + 1)/(x − 1)। जहाँ हर (नीचे वाला) शून्य हो, वहाँ फलन परिभाषित नहीं। वहाँ ग्राफ़ ऊर्ध्वाधर अनंतस्पर्शी के साथ ऊपर-नीचे भागता है। दूर जाकर वह क्षैतिज या तिरछे अनंतस्पर्शी के पास टिक जाता है।
- परिमेय संख्याएँ: संख्या रेखा, सघनता और दशमलव – जिस संख्या को p/q के रूप में लिख सकें, जहाँ p और q पूर्णांक हों और q शून्य न हो, उसे परिमेय संख्या कहते हैं। जैसे 3/4, −5/3, 7 (= 7/1), 0.25 (= 1/4)। p/q को संख्या रेखा पर दिखाने के लिए हर इकाई को q बराबर टुकड़ों में काटो और 0 से p टुकड़े चलो। किन्हीं दो परिमेय संख्याओं के बीच हमेशा एक और परिमेय संख्या होती है (उनका औसत), इसलिए बीच में अनगिनत संख्याएँ हैं। परिमेय संख्या का दशमलव या तो खत्म हो जाता है (सांत) या कोई हिस्सा बार-बार दोहराता है (असांत आवर्ती)।
- परिवर्तन की दर: कितनी तेज़ी से बदलता है? – परिवर्तन की दर बताती है कि इनपुट में एक इकाई बदलने पर आउटपुट कितना बदलता है। ग्राफ़ ऊपर जा सकता है (बढ़ता हुआ), नीचे आ सकता है (घटता हुआ) या किसी सबसे ऊँचे या सबसे नीचे बिंदु पर मुड़ सकता है। दो इनपुट a और b के बीच बदलाव नापने के लिए इनपुट का बदलाव Δx = b − a और आउटपुट का बदलाव Δy = f(b) − f(a) निकालते हैं। औसत परिवर्तन दर Δy ÷ Δx होती है, यानी दोनों बिंदुओं से गुज़रती सीधी रेखा (छेदक रेखा) की ढलान। अंतर की सारणी बताती है कि बदलाव एकसमान है (बराबर अंतर, रैखिक) या तेज़ होता जा रहा है (बढ़ते अंतर, जैसे चरघातांकी)। जब दोनों बिंदु बहुत पास आ जाएँ, तो औसत दर ग्राफ़ की उस बिंदु पर ढलान बन जाती है। अनुक्रम नियम से बनी संख्याओं की सूची है: पुनरावर्ती सूत्र पिछले पद से अगला पद देता है और सीधा सूत्र किसी भी पद को सीधे देता है।
- पाइथागोरस प्रमेय – किसी भी समकोण त्रिभुज में सबसे लंबी भुजा (कर्ण) का वर्ग बाकी दो भुजाओं के वर्गों के योग के बराबर होता है: a² + b² = c²।
- पुनरावृत्ति संबंध (Recurrence Relations) – पुनरावृत्ति संबंध एक नियम है जो अनुक्रम का अगला पद पिछले पद (या पदों) से बनाता है, जैसे u(n+1) = u(n) + 3, u(0) = 2। हमेशा दो चीज़ें चाहिए: नियम और पहला पद। u(n+1) = u(n) + d समांतर अनुक्रम देता है, u(n+1) = r·u(n) गुणोत्तर। u(n+1) = a·u(n) + b, जब −1 < a < 1, स्थिर बिंदु b ÷ (1 − a) पर टिक जाता है।
- पूर्णांक और चिह्न वाली संख्याएँ – पूर्णांक यानी पूरी संख्याएँ और उनकी ऋणात्मक संख्याएँ: …, −3, −2, −1, 0, 1, 2, 3, …। संख्या रेखा पर दाएँ जाने पर संख्या बढ़ती है। धनात्मक जोड़ो तो दाएँ, ऋणात्मक जोड़ो तो बाएँ चलो। किसी संख्या को घटाना उसकी उल्टी संख्या जोड़ने जैसा है। गुणा और भाग में: एक जैसे चिह्न → धन, अलग चिह्न → ऋण। यही नियम −2.5 जैसी दशमलव संख्याओं पर भी चलते हैं।
- पूर्णांक और भिन्न की संक्रियाएँ – व्यंजक को तय क्रम में हल करें: कोष्ठक, घात, फिर × और ÷ (बाएँ से दाएँ), फिर + और − (बाएँ से दाएँ)। पूर्णांक जोड़ने के लिए शून्य-जोड़े (+1 और −1) काटें; घटाने के लिए विपरीत को जोड़ें। गुणा-भाग में समान चिह्न → धन, अलग चिह्न → ऋण। भिन्न जोड़ने-घटाने के लिए समान हर चाहिए; गुणा में अंश × अंश और हर × हर; भाग में रखो-बदलो-उलटो। समानुपात में दो अनुपात बराबर होते हैं, इसलिए अज्ञात मान इकाई दर से निकलता है।
- पृष्ठीय क्षेत्रफल और आयतन: ठोसों का संयोजन – बहुत सी चीज़ें दो सरल ठोसों को जोड़कर बनती हैं, जैसे बेलन के ऊपर शंकु। पृष्ठीय क्षेत्रफल सिर्फ़ बाहर की सतह है, इसलिए जोड़ वाला छिपा हिस्सा नहीं गिनते। आयतन अंदर की जगह है, इसलिए हिस्सों के आयतन सीधे जोड़ देते हैं।
- प्रकीर्ण आरेख (स्कैटर प्लॉट) और संबंध – स्कैटर प्लॉट संख्याओं के जोड़ों को ग्रिड पर बिंदुओं की तरह दिखाता है, हर व्यक्ति या वस्तु के लिए एक बिंदु। बिंदुओं का पैटर्न संबंध बताता है: धनात्मक (दोनों साथ बढ़ते हैं), ऋणात्मक (एक बढ़ता है, दूसरा घटता है) या कोई नहीं। हम क्लस्टर (बिंदुओं के झुंड), आउटलायर (बाकी से दूर बिंदु) और पैटर्न सीधी रेखा (रैखिक) है या वक्र (अरैखिक), यह भी देखते हैं।
- प्रकीर्णन की माप: परिसर, माध्य विचलन, प्रसरण और मानक विचलन – प्रकीर्णन का मतलब है फैलाव: मान बीच (केंद्र) से कितनी दूर हैं। परिसर = सबसे बड़ा − सबसे छोटा। माध्य विचलन = माध्य (या माध्यिका) से औसत दूरी। प्रसरण = माध्य से दूरियों के वर्गों का औसत। मानक विचलन = √प्रसरण। वर्गीकृत आँकड़ों में हर पद को बारंबारता f से गुणा करते हैं।
- प्रक्षेप (Projection): केंद्रीय, समांतर और लंबकोणीय – प्रक्षेप यानी 3D वस्तु को सीधी किरणों की मदद से एक सपाट सतह पर बनाना। अगर सारी किरणें एक बिंदु (दीपक, आँख) से निकलें तो केंद्रीय प्रक्षेप: छवि का आकार दूरी से बदलता है। अगर किरणें समांतर हों (धूप) तो समांतर प्रक्षेप: आकार दूरी पर निर्भर नहीं। अगर समांतर किरणें पर्दे पर 90° पर पड़ें तो लंबकोणीय प्रक्षेप: पर्दे के समांतर फलक असली माप में दिखता है। इंजीनियर लंबकोणीय दृश्य बनाते हैं, कलाकार परिप्रेक्ष्य।
- प्रतिचयन: प्रतिदर्श से पूरी समष्टि को जानना – समष्टि (population) वह पूरा समूह है जिसके बारे में हम जानना चाहते हैं; प्रतिदर्श (sample) उसका छोटा भाग है जिसे हम सच में जाँचते हैं। अच्छा प्रतिदर्श यादृच्छिक रूप से चुना जाता है ताकि वह पूरी समष्टि जैसा दिखे। सरल यादृच्छिक प्रतिचयन में सबको बराबर मौका; स्तरीकृत में हर समूह से सही हिस्सा; क्रमबद्ध में हर k-वाँ सदस्य। अलग-अलग प्रतिदर्श थोड़े अलग उत्तर देते हैं (प्रतिचयन-विचलन), पर बड़े प्रतिदर्श कम डगमगाते हैं (बड़ी संख्याओं का नियम)। पक्षपाती प्रतिदर्श कितना भी बड़ा हो, ग़लत उत्तर देता है।
- प्रतिज्ञप्ति तर्कशास्त्र: वाक्यों से वैध तर्क तक – प्रतिज्ञप्ति तर्कशास्त्र ऐसे वाक्यों का अध्ययन है जो सत्य या असत्य हों, और उन्हें जोड़ने वाले शब्दों का: नहीं (¬), और (∧), या (∨), यदि…तो (→), यदि और केवल यदि (↔)। सत्यता सारणी सत्य-मानों के सभी संभव मेल लिखती है। तर्क वैध है जब कोई पंक्ति सभी आधार-वाक्यों को सत्य और निष्कर्ष को असत्य न बनाए। मोडस पोनेन्स और मोडस टोलेन्स जैसे वैध रूप प्राकृतिक निगमन के नियम बनते हैं।
- प्रतिदर्श बंटन (Sampling Distribution) और केंद्रीय सीमा प्रमेय – नमूने से निकाली संख्या (जैसे नमूना माध्य x̄ या नमूना अनुपात p̂) हर नमूने में थोड़ी बदलती है। अगर हम बहुत सारे नमूने लें और हर बार यह संख्या लिखें, तो जो पैटर्न बनता है वह उसका प्रतिदर्श बंटन है। इसका केंद्र असली मान (μ या p) होता है, फैलाव मानक त्रुटि (माध्य के लिए σ/√n, अनुपात के लिए √(p(1−p)/n)) होता है, और केंद्रीय सीमा प्रमेय के अनुसार बड़ा n होने पर इसका आकार लगभग सामान्य (घंटी जैसा) हो जाता है।
- प्रतिलोम त्रिकोणमितीय फलन (कक्षा 12) – sin x, cos x जैसे फलन बार-बार दोहराते हैं, इसलिए पूरे R पर एकैकी नहीं हैं और उनका प्रतिलोम नहीं बनता। हम हर फलन का एक टुकड़ा (मुख्य मान शाखा) चुनते हैं जहाँ वह एकैकी और आच्छादक हो। उस टुकड़े पर प्रतिलोम बनता है: y = sin⁻¹x यानी sin y = x, जहाँ y ∈ [−π/2, π/2]। प्रतिलोम का ग्राफ शाखा का रेखा y = x में दर्पण प्रतिबिंब है। मुख्य परिसर: sin⁻¹ [−π/2, π/2], cos⁻¹ [0, π], tan⁻¹ (−π/2, π/2), cot⁻¹ (0, π), sec⁻¹ [0, π] − {π/2}, cosec⁻¹ [−π/2, π/2] − {0}।
- प्रतिलोम फलन (Inverse Functions) – प्रतिलोम फलन वह काम उलटा कर देता है जो फलन करता है. अगर f, a को b बनाता है, तो f⁻¹, b को वापस a बनाता है. निकालने के लिए y = f(x) लिखो, x और y की जगह बदलो, फिर y के लिए हल करो. f⁻¹ का ग्राफ़, f के ग्राफ़ का रेखा y = x में दर्पण-प्रतिबिंब होता है. सिर्फ़ एकैकी (one-to-one) फलन का प्रतिलोम होता है; नहीं तो पहले डोमेन सीमित करो (जैसे x ≥ 0 के साथ x² का प्रतिलोम √x).
- प्रतिशत – प्रतिशत का अर्थ है "100 में से", इसलिए x% = x/100। किसी राशि का x% निकालने के लिए उसे x/100 से गुणा करें। प्रतिशत परिवर्तन = (परिवर्तन ÷ मूल) × 100। r% बढ़ाने के लिए (1 + r/100) से, r% घटाने के लिए (1 − r/100) से गुणा करें। क्रमागत परिवर्तनों में गुणकों को गुणा करते हैं। उल्टे प्रतिशत में नए मान को गुणक से भाग देते हैं।
- प्रसामान्य बंटन (Normal Distribution) – प्रसामान्य बंटन एक सतत, सममित, घंटी जैसा बंटन है जो माध्य μ (केंद्र) और मानक विचलन σ (फैलाव) से तय होता है: X ~ N(μ, σ²)। माध्य = माध्यिका = बहुलक। लगभग 68% मान μ से 1σ के भीतर, 95% 2σ के भीतर और 99.7% 3σ के भीतर होते हैं। किसी भी मान को मानक स्कोर z = (x − μ)/σ में बदलते हैं, जो N(0, 1) का पालन करता है; प्रायिकता वक्र के नीचे का क्षेत्रफल है, जिसे तालिका या कैलकुलेटर से Φ(z) के रूप में पढ़ते हैं।
- प्रस्ताव और प्रतिबंध: गणित के पीछे का तर्क – प्रस्ताव (कथन) वह वाक्य है जो या तो सत्य हो या असत्य। प्रस्तावों को NOT, AND, OR, यदि…तो और यदि और केवल यदि से जोड़ते हैं। 'यदि p तो q' सिर्फ़ तब असत्य है जब p सत्य और q असत्य हो। इसका प्रतिधनात्मक 'यदि q नहीं तो p नहीं' हमेशा उसी सत्य-मान का होता है। p ⇒ q हो तो p पर्याप्त और q आवश्यक है। 'x > 3' जैसा विधेय (predicate) तब प्रस्ताव बनता है जब x तय हो या 'सभी के लिए' / 'कोई है' जोड़ा जाए।
- प्राचल वाले समीकरण और असमिकाएँ – प्राचल एक अक्षर (जैसे a) है जो एक निश्चित संख्या दर्शाता है, पर हमें पता नहीं कि कौन-सी। हम पूछते हैं "a के किन मानों पर समीकरण के 0, 1, 2 या अधिक हल हैं?"। ग्राफ़ विधि में समीकरण को f(x) = a लिखते हैं और रेखा y = a को वक्र y = f(x) पर खिसकाते हैं।
- प्राचलिक समीकरण: वक्र, ढाल और चाप लंबाई – प्राचलिक रूप में x और y दोनों को एक तीसरे चर t से लिखा जाता है, जिसे प्राचल (parameter) कहते हैं। t के हर मान से एक बिंदु मिलता है, और t बदलने पर बिंदु एक वक्र बनाता है। t हटाकर कार्तीय समीकरण मिलता है, dy/dx = (dy/dt)/(dx/dt) से ढाल, और t समय हो तो चाल और चाप लंबाई।
- प्रायिकता का परिचय: पैमाना, प्रयोग, प्रतिदर्श समष्टि और वृक्ष आरेख – प्रायिकता 0 से 1 के बीच की एक संख्या है जो बताती है कि कोई बात होने की कितनी संभावना है। 0 मतलब कभी नहीं होगी, 1 मतलब ज़रूर होगी। इसे हम प्रयोग कई बार करके (आनुभविक प्रायिकता) या सारे संभव परिणाम लिखकर (प्रतिदर्श समष्टि) और चाहे गए परिणाम गिनकर निकाल सकते हैं। जब दो चीज़ें साथ हों, तो वृक्ष आरेख और सारणी परिणाम लिखने में मदद करते हैं।
- प्रायिकता: एक घटना की संभावना – प्रायिकता बताती है कि कोई बात होने की कितनी संभावना है, 0 से 1 तक की एक संख्या में। जब सारे परिणाम समप्रायिक हों, तब P(घटना) = अनुकूल परिणामों की संख्या ÷ कुल परिणामों की संख्या। असंभव घटना की प्रायिकता 0 और निश्चित घटना की 1 होती है।
- प्रायिकता: घटनाएँ, घटनाओं का बीजगणित और अभिगृहीत – घटना प्रतिदर्श समष्टि S का कोई भी उपसमुच्चय है। घटनाओं A और B से नई घटनाएँ बनती हैं: A नहीं (A′), A और B (A ∩ B), A या B (A ∪ B)। कोई साझा परिणाम न हो तो घटनाएँ परस्पर अपवर्जी, और मिलकर पूरा S बनाएँ तो निःशेष। अभिगृहीत: हर P(E) ≥ 0, P(S) = 1, और परस्पर अपवर्जी A, B के लिए P(A ∪ B) = P(A) + P(B)। इनसे P(A′) = 1 − P(A) और P(A ∪ B) = P(A) + P(B) − P(A ∩ B) मिलते हैं।
- प्रिज़्म, बेलन, पिरामिड, शंकु, गोले और गोलीय खंड का आयतन – आयतन किसी ठोस के अंदर की जगह है, जिसे घन इकाइयों में गिनते हैं। प्रिज़्म और बेलन: आधार का क्षेत्रफल × ऊँचाई। पिरामिड और शंकु: उसका एक तिहाई। गोला: (4/3)πr³, जो अपने बेलन का 2/3 है। k ऊँचाई वाले गोलीय खंड का आयतन πk²(3r − k)/3 है। सबका कारण एक ही है: हर ऊँचाई पर परतों का क्षेत्रफल बराबर, तो आयतन बराबर (कावालिएरी का विचार)।
- प्वासों बंटन (Poisson Distribution) – प्वासों बंटन यह गिनता है कि तय समय या जगह में कितनी घटनाएँ होती हैं, जब वे यादृच्छिक रूप से, एक-दूसरे से स्वतंत्र और स्थिर औसत दर λ से आती हैं। P(X = k) = e^(−λ) λ^k / k!। इसका माध्य और प्रसरण दोनों λ होते हैं। जब n बड़ा और p छोटा हो तो यह द्विपद बंटन का आसान रूप भी है, λ = np।
- फलन अध्ययन: आवर्तता, एकदिष्टता, चरम मान और अंतराल पर अधिकतम-न्यूनतम – फलन का अध्ययन करने के लिए चार प्रश्न पूछते हैं। क्या ग्राफ़ दोहराता है (आवर्तकाल T, जहाँ f(x + T) = f(x))? कहाँ ऊपर या नीचे जाता है (ढलान का चिह्न)? कहाँ मुड़ता है (ढलान शून्य, जिससे स्थानीय अधिकतम या न्यूनतम मिलता है)? और चुने हुए अंतराल [a, b] पर सबसे बड़ा और सबसे छोटा मान कौन-सा है (दोनों सिरे और अंदर के मोड़ बिंदु जाँचिए)?
- फलन के गुण: ग्राफ़ को कहानी की तरह पढ़ें – फलन हर इनपुट x के लिए ठीक एक आउटपुट f(x) देता है। ग्राफ़ से हम प्रांत (कौन-से x चल सकते हैं), परिसर (कौन-से y मिलते हैं), शून्यक (जहाँ f(x) = 0), धनात्मक-ऋणात्मक अंतराल, वर्धमान-ह्रासमान भाग, अधिकतम-न्यूनतम मान और यह पढ़ते हैं कि फलन सम है (y-अक्ष पर दर्पण) या विषम (मूलबिंदु पर आधा घुमाव)।
- फलन के रूप में आव्यूह: रैखिक रूपांतरण – 2×2 आव्यूह एक फलन है: सदिश अंदर, नया सदिश बाहर। पहला स्तंभ बताता है ⟨1, 0⟩ कहाँ जाएगा, दूसरा बताता है ⟨0, 1⟩ कहाँ जाएगा। सारणिक ad − bc बताता है क्षेत्रफल कितना गुना हुआ; यह शून्य न हो तो प्रतिलोम आव्यूह बदलाव उल्टा कर देता है। संक्रमण आव्यूह इसी नियम से हर साल हिस्सों का बदलना दिखाते हैं।
- फलन: इनपुट, नियम, आउटपुट – फलन (function) ऐसा नियम है जो हर इनपुट के लिए ठीक एक आउटपुट देता है। इसे f(x) लिखते हैं। f(a) को a का प्रतिबिंब (image) कहते हैं; जो इनपुट कोई दिया हुआ आउटपुट दे, वह पूर्व-प्रतिबिंब (preimage) है। फलन को शब्दों, सारणी, सूत्र या ग्राफ़ से दिखा सकते हैं। ग्राफ़ ऊपर जा सकता है (वर्धमान), नीचे जा सकता है (ह्रासमान), और उसका सबसे ऊँचा (अधिकतम) या सबसे नीचा (न्यूनतम) बिंदु हो सकता है।
- फलन: संयुक्त, प्रतिलोम और मानक ग्राफ़ – फलन (function) एक नियम है जो हर मान्य इनपुट को ठीक एक आउटपुट देता है। मान्य इनपुट का समुच्चय प्रांत (domain) और आउटपुट का समुच्चय परिसर (range) है। g(f(x)) का मतलब है पहले f, फिर g। प्रतिलोम फलन f⁻¹, f का काम उल्टा कर देता है और उसका ग्राफ़ रेखा y = x में f के ग्राफ़ की दर्पण-छवि होता है। सिर्फ़ एकैकी (one-to-one) फलन का प्रतिलोम होता है।
- फलनों का रूपांतरण – रूपांतरण (transformation) मूल फलन y = f(x) के ग्राफ़ को बदलता है, पर उसका बुनियादी आकार नहीं। फलन के बाहर जोड़ने से ग्राफ़ ऊपर-नीचे जाता है: f(x) + k यानी k ऊपर। कोष्ठक के अंदर का बदलाव क्षैतिज और उलटा होता है: f(x − h) यानी h दाएँ। बाहर गुणा, a·f(x), ऊर्ध्वाधर खिंचाव है (a < 0 हो तो x-अक्ष में पलटता है)। अंदर गुणा, f(bx), क्षैतिज रूप से 1/b गुना दबाता है (b < 0 हो तो y-अक्ष में पलटता है)। सब मिलाकर: y = a·f(b(x − h)) + k, और मूल का बिंदु (0, 0) पहुँचता है (h, k) पर।
- फ्रैक्टल और सियरपिंस्की त्रिभुज – फ्रैक्टल ऐसा पैटर्न है जो एक ही नियम को बार-बार दोहराकर बनता है, इसलिए उसका छोटा हिस्सा पूरे जैसा दिखता है। इसे स्व-समानता कहते हैं। सियरपिंस्की त्रिभुज में हर बार हर त्रिभुज का बीच वाला भाग हटाते हैं: त्रिभुजों की संख्या 1, 3, 9, 27 … (3ⁿ) होती है और बचा क्षेत्रफल हर बार 3/4 गुना हो जाता है।
- बड़ी संख्याओं का नियम (Law of Large Numbers) – किसी यादृच्छिक प्रयोग को बार-बार दोहराओ तो किसी घटना की आपेक्षिक बारंबारता उसकी प्रायिकता p के और पास आती जाती है। ठीक-ठीक कहें तो किसी भी छोटी दूरी ε के लिए, बारंबारता (या नमूना माध्य) के असली मान से ε से ज़्यादा दूर होने की प्रायिकता, प्रयासों की संख्या n बढ़ने पर 0 की ओर जाती है। चेबीशेव असमिका सीमा देती है: P(|X̄ − μ| ≥ ε) ≤ σ² ÷ (nε²)।
- बहुपद और परिमेय समीकरण हल करना – बहुपद समीकरण p(x) = 0 हल करने का मतलब है: y = p(x) का वक्र x-अक्ष से कहाँ मिलता है। त्रिघात या चतुर्घात में: अचर पद के भाजकों से एक मूल अनुमान लगाओ, उससे भाग दो, फिर बचा हुआ हल करो। x⁴ − 5x² + 4 = 0 जैसे द्विवर्गी समीकरण t = x² से द्विघात बन जाते हैं। परिमेय समीकरण P(x)/Q(x) = 0 में P(x) = 0 और Q(x) ≠ 0 चाहिए। असमिकाओं के लिए चिह्न सारणी।
- बहुपद के मूल और बहुपद सर्वसमिकाएँ – बहुपद के मूल पता हों तो उसके गुणांक तय हो जाते हैं, और उलटा भी। ax³ + bx² + cx + d = 0 के मूल α, β, γ हों तो: α + β + γ = −b/a, αβ + βγ + γα = c/a और αβγ = −d/a (विएता के सूत्र)। इनसे बिना हल किए मूलों वाले व्यंजक निकलते हैं, और प्रतिस्थापन से ऐसे नए समीकरण बनते हैं जिनके मूल बदले हुए (रूपांतरित) हों। बहुपद सर्वसमिका वह समीकरण है जो चर के हर मान के लिए सच हो; इसे एक पक्ष को फैलाकर या गुणनखंड करके दूसरे पक्ष तक पहुँचाकर सिद्ध करते हैं।
- बहुपद फलन और उनके ग्राफ़ – बहुपद फलन y = aₙxⁿ + … + a₁x + a₀ है जिसमें घातें पूर्ण संख्याएँ हैं। घात n और अग्र गुणांक aₙ अंत व्यवहार तय करते हैं। हर वास्तविक शून्यक r से गुणनखंड (x − r) मिलता है; विषम बहुलता वाले शून्यक पर ग्राफ़ x-अक्ष पार करता है, सम बहुलता पर छूकर लौटता है। घात n के बहुपद के अधिकतम n वास्तविक शून्यक और अधिकतम n − 1 घुमाव बिंदु होते हैं; सम्मिश्र गिनें तो ठीक n शून्यक। दो बिंदुओं के बीच औसत परिवर्तन दर छेदक रेखा का ढाल है।
- बहुपद विभाजन, हॉर्नर विधि और मूल – बहुपद a·xⁿ जैसे पदों का योग होता है। बहुपदों को जोड़ा और गुणा किया जा सकता है, और शेषफल के साथ भाग भी: p = q·d + r, जहाँ r की घात d से कम होती है। (x − a) से भाग करने का तेज़ तरीका हॉर्नर विधि है, और शेषफल ठीक p(a) होता है (बेज़ू प्रमेय)। यदि p(a) = 0 तो a मूल है और (x − a) गुणनखंड है। मूलों और गुणांकों को वियेत संबंध जोड़ते हैं।
- बहुपद: शून्यक और गुणांक – ax² + bx + c जैसे बहुपद की एक घात (सबसे बड़ी घात) होती है। शून्यक x का वह मान है जिस पर बहुपद 0 हो जाए। ग्राफ पर शून्यक वे x-निर्देशांक हैं जहाँ वक्र y = p(x), x-अक्ष से मिलता है। घात n वाले बहुपद के अधिक से अधिक n शून्यक होते हैं। ax² + bx + c के शून्यक α, β हों तो α + β = −b/a और αβ = c/a.
- बहुपदों का गुणन – बहुपदों का गुणा करने के लिए पहले के हर पद को दूसरे के हर पद से गुणा करो (बंटन नियम), फिर समान पद जोड़ो। गुणांक आपस में गुणा होते हैं; एक ही अक्षर की घातें जुड़ती हैं (x² · x³ = x⁵)। टाइलों का आयत हर गुणनफल दिखाता है: (x + 2)(x + 3) = x² + 3x + 2x + 6 = x² + 5x + 6। बहुपद को एकपदी से भाग देने के लिए हर पद को अलग-अलग भाग दो।
- बहुपदों का परिचय – बीजीय व्यंजक 3x², −5x, 7 जैसे पदों से बनता है। जब चर (x) की हर घात पूर्ण संख्या (0, 1, 2, …) हो, तो वह बहुपद है। सबसे बड़ी घात को बहुपद की घात कहते हैं। घात 1 वाले बहुपद y = ax + b रैखिक कहलाते हैं। ये हर कदम पर बराबर बढ़ने या घटने वाली चीज़ें दिखाते हैं। a ढाल है (हर कदम का बदलाव) और b y-अंतःखंड (शुरुआती मान)।
- बहुफलक: प्रिज़्म, पिरामिड और प्लेटोनिक ठोस – बहुफलक (polyhedron) ऐसा बंद ठोस है जिसकी पूरी सतह समतल बहुभुजों (फलकों) से बनी हो। फलक किनारों पर मिलते हैं और किनारे शीर्षों पर। प्रिज़्म के दो बराबर समांतर आधार होते हैं; पिरामिड का एक आधार और त्रिभुज जो शीर्ष-बिंदु पर मिलते हैं; छिन्नक (frustum) वह पिरामिड है जिसका ऊपरी भाग आधार के समांतर तल से काट दिया गया हो। हर उत्तल बहुफलक के लिए ऑयलर सूत्र V − E + F = 2 सही है। सम (प्लेटोनिक) बहुफलक ठीक पाँच हैं।
- बहुभुज और उसके कोणों का योग – बहुभुज सीधी भुजाओं से बनी बंद आकृति है। विकर्ण वह रेखा है जो दो ऐसे कोनों को जोड़ती है जो पास-पास नहीं हैं। n भुजाओं वाले बहुभुज में एक कोने से बने विकर्ण उसे (n − 2) त्रिभुजों में बाँट देते हैं। हर त्रिभुज के कोणों का योग 180° होता है, इसलिए उत्तल बहुभुज के कोणों का योग (n − 2) × 180° होता है। सम बहुभुज का हर कोण (n − 2) × 180° ÷ n होता है।
- बहुभुजों का क्षेत्रफल और सूत्र क्यों सही हैं – क्षेत्रफल आकृति के अंदर की समतल जगह है, जिसे वर्ग इकाइयों में गिना जाता है। आयत का क्षेत्रफल आधार × ऊँचाई है। काटकर और खिसकाकर देखने पर पता चलता है कि समांतर चतुर्भुज का क्षेत्रफल भी आधार × ऊँचाई है, त्रिभुज उसका आधा है (½ × आधार × ऊँचाई), समचतुर्भुज अपने विकर्णों पर बने आयत का आधा है (½ × d₁ × d₂), और समलंब ऐसे समांतर चतुर्भुज का आधा है जिसका आधार (a + b) है: ½ × (a + b) × h। इकाइयाँ वर्ग से बदलती हैं: 1 m² = 10 000 cm²।
- बिंदुपथ: नियम मानने वाले बिंदु का रास्ता – बिंदुपथ (locus) उन सभी बिंदुओं का समूह है जो एक नियम मानते हैं, और कोई दूसरा बिंदु नहीं। एक बिंदु से तय दूरी = वृत्त। दो बिंदुओं से बराबर दूरी = लंब समद्विभाजक। दो कटती रेखाओं से बराबर दूरी = कोण समद्विभाजक। दो बिंदुपथ जहाँ मिलते हैं, वहाँ दोनों नियम सच होते हैं, जैसे परिवृत्त का केंद्र। जिन बिंदुओं से AB एक तय कोण पर दिखे, वे एक चाप पर होते हैं।
- बीजीय व्यंजक: चर, पद और सरलीकरण – बीजीय व्यंजक में अक्षर (चर) और संख्याएँ +, −, × और ÷ से जुड़े होते हैं, जैसे 3x + 2। चर एक ऐसी संख्या के लिए खड़ा है जो बदल सकती है। व्यंजक पदों से बनता है (3x और 2)। 3x में 3 गुणांक है; बिना अक्षर वाला पद, जैसे 2, अचर पद है। समान पदों का अक्षर वाला भाग बिल्कुल एक जैसा होता है (3x और 5x) और वे जुड़ सकते हैं; असमान पद (3x और 2, या x और x²) नहीं जुड़ते। प्रतिस्थापन यानी अक्षर की जगह संख्या रखकर मान निकालना। विस्तार कोष्ठक हटाता है: a(b + c) = ab + ac। गुणनखंडन उल्टा है: उभयनिष्ठ गुणनखंड बाहर निकालना। सूत्र एक व्यंजक है जो दूसरी राशियों से एक राशि देता है, और सर्वसमिका अक्षर के हर मान पर सही होती है।
- बीजीय सर्वसमिकाओं की खोज – सर्वसमिका (identity) ऐसा समीकरण है जो अक्षरों के हर मान के लिए सही हो। चित्र से इन्हें साबित करते हैं: भुजा (a + b) का वर्ग a², ab, ab और b² में बँटता है, इसलिए (a + b)² = a² + 2ab + b². ऐसे ही (a − b)², a² − b² = (a + b)(a − b), (x + a)(x + b), (a + b + c)² और (a + b)³ मिलते हैं। उल्टा पढ़ें तो ये गुणनखंड, तेज़ गणना और परिमेय व्यंजक सरल करने में मदद करती हैं।
- बॉन्ड का मूल्यांकन – बॉन्ड किसी सरकार या कंपनी को दिया गया ऋण है। यह हर अवधि में तय कूपन (कूपन दर × अंकित मूल्य) देता है और परिपक्वता पर अंकित मूल्य लौटाता है। इसकी आज की उचित कीमत इन सब भुगतानों का बाज़ार प्रतिफल r पर वर्तमान मूल्य है: P = C × [1 − (1 + r)⁻ⁿ] ÷ r + F ÷ (1 + r)ⁿ। बाज़ार प्रतिफल कूपन दर से कम हो तो बॉन्ड प्रीमियम पर, बराबर हो तो सममूल्य पर, और ज़्यादा हो तो डिस्काउंट पर बिकता है। कीमत और प्रतिफल हमेशा उलटी दिशा में चलते हैं।
- भारतीय संख्यांकन पद्धति – भारतीय पद्धति में दाएँ से पहले 3 अंकों के बाद अल्पविराम लगता है, फिर हर 2 अंकों के बाद: इकाई, हज़ार, लाख, करोड़। 1 लाख = 1,00,000 = 100 हज़ार; 1 करोड़ = 1,00,00,000 = 10 मिलियन। अंतरराष्ट्रीय पद्धति में हर 3 अंकों पर अल्पविराम लगता है: हज़ार, मिलियन, बिलियन। शून्य और स्थानीय मान का विचार भारत से दुनिया में फैला।
- भिन्न: चारों संक्रियाएँ आसान भाषा में – भिन्न किसी पूरे का हिस्सा है, जिसे बराबर टुकड़ों में बाँटा गया हो। नीचे की संख्या (हर) बताती है कि पूरा कितने टुकड़ों में बँटा है; ऊपर की संख्या (अंश) बताती है कि हमने कितने टुकड़े लिए। तुल्य भिन्न एक ही मात्रा के अलग नाम हैं (3/4 = 6/8)। जोड़ने-घटाने से पहले हर बराबर करो। गुणा में ऊपर × ऊपर, नीचे × नीचे। भाग में पहली भिन्न रखो, ÷ को × बनाओ और दूसरी को उलट दो। यही नियम दशमलव और ऋणात्मक संख्याओं पर भी लगते हैं, और BODMAS बताता है कि पहले कौन-सी क्रिया करनी है। उलटी संक्रिया से हर उत्तर जाँच सकते हो।
- भिन्नात्मक (परिमेय) समीकरण – भिन्नात्मक या परिमेय समीकरण में अज्ञात x किसी भिन्न के हर में होता है। पहले वे मान लिखिए जिनसे कोई हर शून्य हो जाए: ये मना हैं। फिर हर पद को सबसे छोटे सार्व हर (LCM) से गुणा करके भिन्न हटाइए और बचे समीकरण को हल कीजिए (अक्सर रैखिक या द्विघात)। अंत में हर मूल जाँचिए: जो मूल मना मान हो, वह बाहरी मूल है और हटा दिया जाता है। नाव-धारा और मिलकर काम करने जैसे दर वाले प्रश्न भी इसी तरह हल होते हैं।
- मतदान का गणित – वोट गिनने का हर तरीका एक नियम है, और नियम बदलने से विजेता बदल सकता है। एक जैसी पसंद-सूचियों से सबसे ज़्यादा वोट (प्लूरैलिटी), रनऑफ़ (सबसे कम वाले को हटाकर दोबारा गिनती) और बोर्डा गिनती (हर स्थान के अंक) तीन अलग विजेता दे सकते हैं। कॉन्डोर्से विजेता हर उम्मीदवार को आमने-सामने हराता है, पर वह हमेशा नहीं होता। तीन या ज़्यादा उम्मीदवारों के लिए कोई तरीका पूरी तरह सही नहीं है।
- मात्रक रूपांतरण: एक प्रणाली के अंदर और दो प्रणालियों के बीच – किसी माप को दूसरी इकाई में बदलने के लिए रूपांतरण गुणक (conversion factor) से गुणा या भाग करते हैं। मीट्रिक प्रणाली में हर सीढ़ी (km, hm, dam, m, dm, cm, mm) 10 गुना की है। मीट्रिक और इंपीरियल के बीच तय गुणक हैं: 1 इंच = 2.54 cm, 1 मील ≈ 1.609 km, 1 पाउंड ≈ 0.454 kg। पहले अनुमान लगाइए, फिर बदलिए और जाँचिए कि उत्तर समझदारी भरा है।
- माध्यमान प्रमेय और रोल का प्रमेय – अगर फलन [a, b] पर संतत और (a, b) पर अवकलनीय है, तो a और b के बीच कम से कम एक बिंदु c ऐसा है जहाँ स्पर्श रेखा की ढलान औसत ढलान के बराबर होती है: f'(c) = (f(b) − f(a)) / (b − a)। रोल का प्रमेय इसका विशेष रूप है, जब f(a) = f(b) हो और f'(c) = 0 मिले।
- मानसिक गणित: तेज़ और सही गणना – मानसिक गणित यानी रोज़ की गणनाएँ दिमाग़ में या बहुत कम पंक्तियों में जल्दी और सही करना। दो संख्याओं की तुलना अंतर से या अनुपात से करो। प्रतिशत बदलाव को गुणक बनाओ: +20% यानी × 1.2, −20% यानी × 0.8। लगातार बदलावों के गुणक आपस में गुणा होते हैं, इसलिए +20% फिर −20% का नतीजा × 0.96 है, × 1 नहीं। +p% को पलटने के लिए गुणक का व्युत्क्रम लो। 10 की घात, इकाई बदलना, (a + b)² = a² + 2ab + b², (a + b)(a − b) = a² − b², सूत्र में एक अक्षर को अकेला करना और यह नियम याद रखो कि गुणनफल तभी शून्य होता है जब कोई गुणनखंड शून्य हो।
- मूल फलनों के ग्राफ़ और ग्राफ़ से समीकरण हल करना – ग्राफ़ वे सारे बिंदु (x, y) दिखाता है जिनमें y = f(x)। पाँच आकार बार-बार आते हैं: परवलय y = x², घन वक्र y = x³, आधा परवलय y = √x, V आकार y = |x| और अतिपरवलय y = k/x। हर एक का प्रांत, परिसर, सममिति, कहाँ बढ़ता-घटता है और अक्षों को कहाँ काटता है, यह सीखो। फिर ग्राफ़ से समीकरण (जहाँ ग्राफ़ कटें) और असमिका (जहाँ एक ग्राफ़ दूसरे से ऊपर हो) हल करो।
- मैक्लॉरिन और टेलर श्रेणी – मैक्लॉरिन श्रेणी किसी फलन को कभी न ख़त्म होने वाले बहुपद के रूप में लिखती है: f(x) = f(0) + f′(0)x + f″(0)x²/2! + … । x = 0 के पास कुछ ही पद वक्र की बहुत अच्छी नकल करते हैं। eˣ, sin x, cos x, ln(1+x) और (1+x)ⁿ की मानक श्रेणियाँ और उनका वैधता परास याद रखना ज़रूरी है। टेलर श्रेणी यही काम किसी भी बिंदु a के आसपास करती है। श्रेणी से कठिन सीमाएँ भी आसान हो जाती हैं।
- मॉड्यूलर अंकगणित: शेषफल और सर्वांगसमता – यूक्लिड विभाजन किसी भी पूर्णांक a को a = n × q + r लिखता है, जहाँ 0 ≤ r < n। शेषफल r को "a mod n" कहते हैं। दो संख्याएँ मॉड्यूलो n सर्वांगसम (a ≡ b mod n) हैं जब उनका शेषफल समान हो, यानी n, a − b को विभाजित करे। सर्वांगसमताओं को जोड़, घटा, गुणा और घात कर सकते हैं, इसलिए बड़ी संख्याओं का शेषफल छोटी संख्याओं से निकलता है। घातों के शेषफल चक्र में दोहराते हैं।
- यांग हुई (पास्कल) त्रिभुज – यांग हुई त्रिभुज में सबसे ऊपर 1 होता है। नीचे की हर संख्या, ऊपर की दो संख्याओं का जोड़ होती है और किनारे सब 1 होते हैं। पंक्ति n से (a + b)ⁿ के गुणांक मिलते हैं। जैसे पंक्ति 4 (1 4 6 4 1) से (a + b)⁴ = a⁴ + 4a³b + 6a²b² + 4ab³ + b⁴। हर पंक्ति सममित है और उसका जोड़ 2ⁿ है। यूरोप में इसे पास्कल त्रिभुज और भारत में मेरु प्रस्तार कहते हैं।
- यादृच्छिक चर और प्रायिकता बंटन – यादृच्छिक चर (random variable) X किसी संयोग वाले प्रयोग के हर परिणाम को एक संख्या देता है। असतत (discrete) यादृच्छिक चर अलग-अलग मान लेता है; उसका प्रायिकता बंटन हर मान x और उसकी प्रायिकता P(X = x) बताता है, जिनका जोड़ 1 होता है। माध्य (प्रत्याशित मान) E(X) = Σ x·P(x) है। प्रसरण Var(X) = E(X²) − [E(X)]² फैलाव मापता है, और मानक विचलन इसका वर्गमूल है।
- युगपत समीकरण – युगपत समीकरण वे दो या ज़्यादा समीकरण हैं जो एक ही समय पर सही होने चाहिए। उनका हल वे मान हैं जो हर समीकरण में ठीक बैठें। ग्राफ़ पर हर हल वह बिंदु है जहाँ ग्राफ़ मिलते हैं। एक रेखा और एक वक्र हो तो रेखा को वक्र में रखें (प्रतिस्थापन); द्विघात समीकरण बनेगा, जिसका विविक्तकर बताएगा कि 2, 1 या 0 हल हैं। तीन रैखिक समीकरणों में एक-एक करके चर हटाएँ।
- यूक्लिड की ज्यामिति: परिभाषाएँ, अभिगृहीत और पाँच अभिधारणाएँ – ज्यामिति की शुरुआत मिस्र, भारत और मेसोपोटामिया में ज़मीन और वेदियाँ नापने से हुई। भारत के शुल्बसूत्रों (जैसे बौधायन) में रस्सी से वर्ग बनाने, वर्ग को दुगना करने और विकर्ण के नियम दिए गए। लगभग 300 ई.पू. में अलेक्ज़ेंड्रिया के यूक्लिड ने ज्यामिति को तर्क की एक कड़ी बना दिया: कुछ परिभाषाओं, सामान्य-समझ वाले अभिगृहीतों और पाँच अभिधारणाओं से शुरू करो, और बाकी सब सिद्ध करो। पाँचवीं अभिधारणा बताती है कि दो रेखाएँ कब मिलती हैं, और इसी से समांतर रेखाओं का विचार आता है।
- रूपांतरण: आकृति को खिसकाना, पलटना, घुमाना और बड़ा करना – रूपांतरण किसी आकृति को नई जगह ले जाता है। स्थानांतरण उसे खिसकाता है, परावर्तन दर्पण रेखा में पलटता है, घूर्णन एक केंद्र के चारों ओर घुमाता है, और आवर्धन माप बदलता है। पहले तीन में माप और आकार वही रहते हैं (सर्वांगसम प्रतिबिंब)। आवर्धन में आकार वही, माप बदलता है (समरूप प्रतिबिंब)। हर एक का आसान निर्देशांक नियम है।
- रेखाएँ और कोण: रैखिक युग्म, शीर्षाभिमुख कोण और समांतर रेखाएँ – एक ही बिंदु से निकली दो किरणों के बीच का घुमाव कोण है। सीधी रेखा पर बने दो आसन्न कोणों का योग 180° होता है (रैखिक युग्म)। दो रेखाएँ काटें तो आमने-सामने के कोण बराबर होते हैं। तिर्यक रेखा दो समांतर रेखाओं को काटे तो संगत कोण बराबर, एकांतर अंतः कोण बराबर, और एक ही ओर के अंतः कोणों का योग 180° होता है। उल्टी बात भी सच है, और ऐसी बातें हम विरोधाभास से सिद्ध कर सकते हैं: उल्टा मान लो और दिखाओ कि इससे कुछ असंभव निकलता है।
- रैखिक ग्राफ़: सीधी रेखा और y = mx + c – रैखिक ग्राफ़ एक सीधी रेखा होता है। इसका समीकरण y = mx + c है। m प्रवणता (ढलान) है: चढ़ाई ÷ चाल। c y-अंतःखंड है: रेखा y-अक्ष को जहाँ काटती है। जिन रेखाओं का m बराबर हो, वे समांतर होती हैं। अगर m₁ × m₂ = −1 हो, तो रेखाएँ लंब होती हैं। दो रेखाएँ जहाँ कटती हैं, वह बिंदु दोनों समीकरणों का हल है। रोज़ के ग्राफ़ में प्रवणता एक दर (जैसे चाल) होती है और ग्राफ़ के नीचे का क्षेत्रफल कुल मात्रा (जैसे दूरी)।
- रैखिक प्रोग्रामन (कक्षा 12): ग्राफ से सबसे अच्छा उत्तर खोजो – रैखिक प्रोग्रामन से हम कुछ नियम मानते हुए सबसे ज़्यादा लाभ या सबसे कम खर्च निकालते हैं। नियम सीधी रेखा वाली असमिकाएँ होती हैं, जिन्हें व्यवरोध (constraints) कहते हैं। सब व्यवरोध मिलकर अनुमत बिंदुओं का एक क्षेत्र बनाते हैं, यही सुसंगत क्षेत्र (feasible region) है। लक्ष्य Z = ax + by (उद्देश्य फलन) हमेशा इस क्षेत्र के किसी कोने पर सबसे अच्छा होता है। इसलिए: रेखाएँ खींचो, सही तरफ़ रंगो, कोने निकालो, हर कोने को Z में रखो और सबसे बड़ा या छोटा चुनो। क्षेत्र खुला (अपरिबद्ध) हो तो एक बार जाँच ज़रूर करो।
- रैखिक फलन (Linear Functions) – रैखिक फलन में x के हर 1 बढ़ने पर y में हमेशा एक बराबर मात्रा जुड़ती है। इसका नियम y = mx + c है (कहीं f(x) = mx + b भी लिखते हैं)। m ढाल है: ऊपर ÷ आगे, यानी x में 1 बढ़ने पर y का बदलाव। c, y-अंतःखंड है: x = 0 पर y का मान। इसका ग्राफ़ हमेशा सीधी रेखा होता है।
- रैखिक बीजगणित: सदिश समष्टि और रैखिक मैप – सदिश समष्टि तीरों का ऐसा समूह है जिन्हें जोड़ा और खींचा जा सकता है। रैखिक संचयन a·u + b·w से नए सदिश बनते हैं और उन सबका समूह स्पैन (span) कहलाता है। आधार (basis) सबसे छोटा स्वतंत्र समूह है जो पूरी समष्टि तक पहुँचा दे; उसकी संख्या विमा (dimension) है। मैट्रिक्स एक रैखिक मैप है: उसके स्तंभ बताते हैं कि आधार-तीर कहाँ जाते हैं।
- रैखिक समाश्रयण और न्यूनतम वर्ग रेखा – रैखिक समाश्रयण जोड़े वाले आँकड़ों (x, y) के लिए सबसे अच्छी सीधी रेखा ŷ = a + bx ढूँढता है। किसी असली बिंदु और रेखा के बीच का अंतर अवशिष्ट (residual) है: e = y − ŷ। न्यूनतम वर्ग रेखा वह है जिसमें अवशिष्टों के वर्गों का योग सबसे कम हो। ढाल b = Sxy ÷ Sxx और रेखा हमेशा माध्य बिंदु (x̄, ȳ) से गुज़रती है। इससे x से y का अनुमान लगाते हैं, पर सिर्फ़ आँकड़ों की सीमा के अंदर। मज़बूत संबंध का मतलब यह नहीं कि x ही y का कारण है।
- रैखिकीकरण, अस्पष्ट वक्र और सदिश फलनों का अवकलज – किसी चिकने वक्र को बहुत पास से देखो तो वह सीधी रेखा जैसा लगता है — यही उसकी स्पर्श रेखा है। L(x) = f(a) + f′(a)(x − a) से x = a के पास जल्दी अनुमान मिलता है। x² + y² = 25 जैसे वक्रों में दोनों तरफ अवकलन करके dy/dx निकालते हैं; अंश शून्य हो तो क्षैतिज, हर शून्य हो तो ऊर्ध्वाधर स्पर्श रेखा। चलते बिंदु r(t) = (x(t), y(t)) का वेग r′(t) और चाल |r′(t)| है। nवें पद का परीक्षण: अगर पद 0 की ओर नहीं जाते, तो श्रेणी अपसारी है।
- रोज़ की ज़िंदगी में गणित – गणित रोज़ की संख्याओं को फ़ैसलों में बदल देता है। दाम को एक ही नाप पर लाओ (100 ग्राम का दाम), ग्राफ़ पढ़ने से पहले उसका अक्ष देखो, ख़बर के प्रतिशत से पूछो "कितने में से?", और देखो कि नर्स से किसान तक सब पेशे यही कुछ औज़ार इस्तेमाल करते हैं।
- रोज़ के काम में गणित: इकाई मूल्य, कुल कीमत और बचे पैसे – दुकान और काम की जगह पर रोज़ चारों संक्रियाएँ (जोड़, घटाव, गुणा, भाग) काम आती हैं। पैक की कीमत को चीज़ों की संख्या से भाग दें, तो इकाई मूल्य (एक की कीमत) मिलता है। इकाई मूल्य को मात्रा से गुणा करें, तो कुल कीमत मिलती है। दिए हुए पैसों में से कुल कीमत घटाएँ, तो बचे पैसे मिलते हैं। सबसे सस्ता सौदा जानने के लिए इकाई मूल्य की तुलना करें: जो छोटा है, वही सस्ता है।
- लघुगणक (Logarithm) – लघुगणक बताता है कि कौन-सी घात चाहिए। log_b x = y का मतलब b^y = x। जैसे log₂ 8 = 3, क्योंकि 2³ = 8। लघुगणक गुणा को जोड़ में बदल देता है: log(ab) = log a + log b, log(a/b) = log a − log b, log(aⁿ) = n log a। आधार 10 = साधारण लघुगणक, आधार e = प्राकृतिक लघुगणक (ln)। आधार बदल सकते हैं: log_b x = log x ÷ log b।
- वक्र और सतह: वक्र को घुमाकर सतह बनाना – वक्र उन बिंदुओं का पथ है जो किसी नियम पर चलते हैं। वक्र को अक्ष के चारों ओर घुमाओ तो वह एक सतह बनाता है। तिरछी सीधी रेखा से शंकु, परवलय से कटोरा (परवलयज) और अतिपरवलय से कूलिंग टावर (अतिपरवलयज) बनता है। किसी ऊँचाई पर काटने से एक वृत्त मिलता है जिसकी त्रिज्या वक्र से आती है।
- वर्गमूल: वर्ग बनाओ, उसकी भुजा खोजो – किसी संख्या n का वर्गमूल वह संख्या है जिसे खुद से गुणा करने पर n मिले। √25 = 5, क्योंकि 5 × 5 = 25। n टाइलों को वर्ग में जमाओ: भुजा ही वर्गमूल है। पूर्ण वर्ग (1, 4, 9, 16, …) के वर्गमूल पूर्ण संख्याएँ हैं। बाकी वर्गमूल अपरिमेय होते हैं और दो पूर्ण संख्याओं के बीच आते हैं; उनका अनुमान लगाते हैं या उन्हें सरल करते हैं, जैसे √50 = 5√2।
- वार्षिकी (Annuity) और मॉर्टगेज – वार्षिकी (annuity) बराबर समय के अंतर पर दी गई बराबर रकम की किस्तों की श्रृंखला है। मॉर्टगेज घर या ज़मीन खरीदने का बड़ा ऋण है, जिसे वार्षिकी की तरह किस्तों में चुकाया जाता है। हर किस्त के दो हिस्से होते हैं: ब्याज (उधार की कीमत) और मूलधन (जो ऋण घटाता है)। शुरू में किस्त का ज़्यादातर हिस्सा ब्याज होता है, बाद में ज़्यादातर मूलधन। परिशोधन तालिका (amortization table) हर किस्त का ब्याज, मूलधन और बचा बकाया दिखाती है। किस्त PMT = PV × i ÷ (1 − (1 + i)^−n)। ऊँची दर, लंबी अवधि या साल में कम किस्तें, तीनों कुल ब्याज बढ़ाते हैं।
- वार्षिकी: बराबर किस्तें, भावी मूल्य और वर्तमान मूल्य – वार्षिकी (annuity) बराबर समय-अंतर पर दी गई बराबर किस्तों की श्रृंखला है, जैसे हर महीने की बचत या ऋण की किस्त। हर किस्त चक्रवृद्धि ब्याज कमाती है, इसलिए किस्तें गुणोत्तर श्रेणी बनाती हैं। साधारण वार्षिकी (हर अवधि के अंत में किस्त) का भावी मूल्य: FV = P[(1+i)ⁿ − 1]/i। वर्तमान मूल्य: PV = P[1 − (1+i)⁻ⁿ]/i। ऋण की राशि सभी किस्तों के वर्तमान मूल्य के बराबर होती है।
- वास्तविक संख्याओं के अंतराल – अंतराल (interval) दो सिरों के बीच की सभी वास्तविक संख्याएँ हैं। चौकोर कोष्ठक [ ] का मतलब सिरा शामिल है, गोल कोष्ठक ( ) का मतलब सिरा शामिल नहीं। [a, b] संवृत है, (a, b) विवृत है, [a, b) और (a, b] अर्ध-विवृत हैं। अंतराल कभी खत्म न होने वाले भी हो सकते हैं, जैसे [1, ∞), पर ∞ पर हमेशा गोल कोष्ठक लगता है। संख्या रेखा पर भरा बिंदु = शामिल, खोखला बिंदु = शामिल नहीं। सर्वनिष्ठ (A ∩ B) वह भाग है जो दोनों में है; संघ (A ∪ B) वह है जो कम से कम एक में है।
- विनिमय दर: एक मुद्रा को दूसरी में बदलना – मुद्रा वह पैसा है जो कोई देश या देशों का समूह इस्तेमाल करता है। विनिमय दर एक मुद्रा की दूसरी मुद्रा में क़ीमत है, जैसे 1 USD = 83 INR। दूसरी मुद्रा में बदलने के लिए दर से गुणा करें, वापस बदलने के लिए भाग दें। बैंक और मुद्रा बदलने वाले विदेशी मुद्रा ऊँची दर पर बेचते और नीची दर पर ख़रीदते हैं, साथ में कमीशन ले सकते हैं, इसलिए हर अदला-बदली में थोड़ा घाटा होता है। दरें माँग और पूर्ति से बदलती हैं। मुद्रा की मूल्य-वृद्धि हो तो आयात सस्ता, निर्यात महँगा; मूल्य-ह्रास हो तो उल्टा। दर बदलने पर लोगों और कंपनियों को लाभ या हानि होती है।
- विभाज्यता: गुणज, भाजक, म.स. और ल.स. – a, b से विभाज्य है जब a = b × k हो (k पूर्ण संख्या): तब b, a का भाजक (गुणनखंड) है और a, b का गुणज। हर पूर्ण संख्या a = b × q + r लिखी जा सकती है, जहाँ 0 ≤ r < b (शेषफल सहित भाग); r = 0 हो तो b, a को पूरा बाँटता है। अंकों को देखकर 2, 3, 4, 5, 6, 8, 9, 10 और 11 से विभाज्यता जाँच सकते हैं। म.स. (महत्तम समापवर्तक, HCF/GCD) अभाज्य गुणनखंडों या यूक्लिड विधि से निकलता है; ल.स. (लघुत्तम समापवर्त्य, LCM) सबसे छोटा साझा गुणज है, और म.स. × ल.स. = a × b। जिनका म.स. 1 हो, वे सहअभाज्य हैं।
- विश्वास्यता अंतराल (Confidence Interval) – विश्वास्यता अंतराल किसी अज्ञात जनसंख्या संख्या (माध्य μ या अनुपात p) के लिए मानने लायक मानों की एक सीमा है, जो एक नमूने से निकाली जाती है। इसका रूप है: अनुमान ± त्रुटि सीमा, जहाँ त्रुटि सीमा = क्रांतिक मान × मानक त्रुटि। 95% स्तर का मतलब है कि यह तरीका लगभग 95% नमूनों में असली मान को पकड़ लेता है। ज़्यादा भरोसा चाहिए तो अंतराल चौड़ा होगा; नमूना बड़ा हो तो पतला। अगर कोई दावा अंतराल के बाहर है, तो आँकड़े उस दावे के ख़िलाफ़ सबूत देते हैं।
- वृत्त और स्पर्श रेखाएँ: कैसे बनाएँ और क्यों काम करता है – स्पर्श रेखा (tangent) वृत्त को एक ही बिंदु पर छूती है और उस बिंदु की त्रिज्या पर लंब (90°) होती है। बाहर के बिंदु P से दो बराबर स्पर्श रेखाएँ खिंचती हैं, हर एक की लंबाई √(D² - r²) है। दो वृत्तों की ज़्यादा से ज़्यादा चार साझा स्पर्श रेखाएँ हो सकती हैं। चाप से दो रेखाओं को चिकना जोड़ा जाता है और बदलते केंद्रों वाले चाप सर्पिल बनाते हैं। बिंदु की घात कहती है कि P से जाने वाली हर रेखा पर PA x PB = D² - r²। मूलाक्ष वह सीधी रेखा है जिसके हर बिंदु की दोनों वृत्तों से घात बराबर होती है।
- वृत्त का समीकरण – वृत्त उन बिंदुओं का समूह है जो केंद्र (h, k) से एक तय दूरी r पर हों। दूरी सूत्र से इसका समीकरण (x − h)² + (y − k)² = r² है; केंद्र मूलबिंदु पर हो तो x² + y² = r²। कोष्ठक खोलने पर x² + y² + Dx + Ey + F = 0 मिलता है, जिसका केंद्र (−D/2, −E/2) और r² = D²/4 + E²/4 − F है। केंद्र से रेखा की दूरी d, r से कम, बराबर या ज़्यादा हो तो रेखा वृत्त से 2, 1 या 0 बिंदुओं पर मिलती है। दो वृत्तों की तुलना उनके केंद्रों की दूरी से होती है।
- वृत्त की स्पर्श रेखा – स्पर्श रेखा वह रेखा है जो वृत्त को सिर्फ़ एक बिंदु पर छूती है। उस बिंदु पर वह त्रिज्या से 90° का कोण बनाती है। बाहर के एक बिंदु से खींची गई दोनों स्पर्श रेखाएँ हमेशा बराबर होती हैं।
- वृत्त प्रमेय (Circle Theorems) – वृत्त प्रमेय कोणों के कुछ ऐसे नियम हैं जो हर वृत्त में हमेशा सही रहते हैं। केंद्र पर बना कोण परिधि पर बने कोण का दोगुना होता है। अर्धवृत्त में बना कोण 90° होता है। एक ही खंड के कोण बराबर होते हैं। चक्रीय चतुर्भुज के आमने-सामने के कोणों का योग 180° होता है। स्पर्शरेखा त्रिज्या से 90° बनाती है, बाहर के एक बिंदु से खींची दो स्पर्शरेखाएँ बराबर होती हैं, और स्पर्शरेखा-जीवा का कोण एकांतर खंड के कोण के बराबर होता है।
- वृत्त: जीवा, स्पर्श रेखा और त्रिभुज के वृत्त – वृत्त उन सब बिंदुओं का समूह है जो केंद्र से एक तय दूरी (त्रिज्या) पर हों। जीवा उस पर दो बिंदुओं को जोड़ती है; सबसे लंबी जीवा व्यास है। रेखा वृत्त को दो बिंदुओं पर काट सकती है (छेदक), एक पर छू सकती है (स्पर्श रेखा) या मिल ही न सकती है। स्पर्श रेखा त्रिज्या पर लंब होती है। हर त्रिभुज का एक अंतःवृत्त और एक परिवृत्त होता है।
- वृत्त: जीवाएँ और कोण – जीवा वृत्त के दो बिंदुओं को मिलाती है। लंबी जीवा केंद्र पर बड़ा कोण बनाती है, और बराबर जीवाएँ बराबर कोण। केंद्र से जीवा पर डाला लंब उसे आधा करता है, और बराबर जीवाएँ केंद्र से बराबर दूरी पर होती हैं। कोई चाप केंद्र पर जो कोण बनाता है, वह वृत्त के बाकी हिस्से के किसी भी बिंदु पर बने कोण का दोगुना होता है, इसलिए अर्धवृत्त का कोण 90° है। चक्रीय चतुर्भुज के सम्मुख कोणों का जोड़ 180° होता है।
- वृत्त: परिधि, π और क्षेत्रफल – वृत्त के चारों ओर की दूरी उसकी परिधि है: C = π × d = 2πr। उसके अंदर की जगह उसका क्षेत्रफल है: A = πr²। परिधि को व्यास से भाग दो तो जो संख्या मिलती है, वही π है। यह हर वृत्त के लिए लगभग 3.14 होती है, चाहे वृत्त छोटा हो या बड़ा।
- वृद्धि के मॉडल: पुनरावर्ती अनुक्रम और y' = ay + b – वृद्धि का मॉडल बताता है कि कोई मात्रा चरण-दर-चरण कैसे बदलती है: u(n+1) = a·u(n) + b। b = 0 हो तो गुणोत्तर, a = 1 हो तो समांतर। 0 < a < 1 हो तो अनुक्रम स्थिर बिंदु L = b/(1 − a) की ओर जाता है। सतत रूप y' = ay + b है, जिसका हल y = C·e^(ax) − b/a है। यूलर विधि y' = f(y) को फिर चरणों में बदलती है और लॉजिस्टिक मॉडल सीमा के पास वृद्धि धीमी कर देता है।
- वैज्ञानिक संकेतन (मानक रूप) – वैज्ञानिक संकेतन में हर संख्या को a × 10ⁿ लिखते हैं, जहाँ 1 ≤ a < 10 और n एक पूर्णांक है। बड़ी संख्या में दशमलव बाईं ओर खिसकता है और n धनात्मक होता है। छोटी संख्या में दशमलव दाईं ओर खिसकता है और n ऋणात्मक होता है। गुणा करने के लिए आगे की संख्याएँ गुणा करें और घातें जोड़ें; भाग में आगे की संख्याएँ भाग दें और घातें घटाएँ; फिर a को 1 और 10 के बीच कर दें। किलो (10³), मेगा (10⁶), मिली (10⁻³), माइक्रो (10⁻⁶), नैनो (10⁻⁹) जैसे उपसर्ग 10 की घातों के ही नाम हैं।
- व्युत्क्रम विचरण (प्रतिलोम समानुपात) – दो राशियाँ व्युत्क्रम रूप से बदलती हैं जब उनका गुणनफल वही रहता है: x × y = k, यानी y = k/x। x दोगुना हो तो y आधा हो जाता है। y = k/x (k > 0) का ग्राफ़ एक वक्र है जिसे अतिपरवलय (hyperbola) कहते हैं; यह दोनों अक्षों के पास जाता है पर उन्हें कभी नहीं छूता।
- शंकु परिच्छेद (कक्षा 11): वृत्त, परवलय, दीर्घवृत्त और अतिपरवलय – द्वि-शंकु को समतल से काटने पर वृत्त, दीर्घवृत्त, परवलय या अतिपरवलय बनता है; शीर्ष से कटे तो बिंदु, रेखा या रेखा-युग्म (अपभ्रष्ट)। वृत्त: (x − h)² + (y − k)² = r²। परवलय y² = 4ax: नाभि (a, 0), नियता x = −a, नाभिलंब 4a, e = 1। दीर्घवृत्त x²/a² + y²/b² = 1: c² = a² − b², e = c/a < 1, नाभिलंब 2b²/a, PF₁ + PF₂ = 2a। अतिपरवलय x²/a² − y²/b² = 1: c² = a² + b², e > 1, |PF₁ − PF₂| = 2a।
- शाब्दिक प्रश्न: बीजगणित से हल करना – शाब्दिक प्रश्न एक कहानी होती है जिसमें कोई संख्या छिपी रहती है। बीजगणित की विधि के चार कदम हैं: अज्ञात को अक्षर से नाम दो, कहानी को समीकरण में बदलो, समीकरण हल करो और उत्तर को कहानी में रखकर जाँचो। यही चार कदम संख्या, आयु, चाल, काम और आकृति के प्रश्नों में चलते हैं, और दो अज्ञात या द्विघात समीकरण वाले प्रश्नों में भी।
- शेषफल प्रमेय और गुणनखंड प्रमेय – जब बहुपद p(x) को (x − a) से भाग देते हैं, तो शेषफल p(a) होता है। यानी लंबा भाग किए बिना, बस x = a रखो। अगर p(a) = 0 है, तो शेषफल 0 है और (x − a), p(x) का गुणनखंड है। इसे गुणनखंड प्रमेय कहते हैं।
- संख्या के आधार: दस, दो और साठ के समूह – आधार उस समूह का आकार है जिसमें हम गिनते हैं। आधार 10 में दस-दस के गट्ठर बनते हैं, इसलिए हर स्थान अपने दाएँ वाले से 10 गुना होता है: इकाई, दहाई, सैकड़ा। आधार b में स्थान 1, b, b², b³ … होते हैं और सिर्फ़ 0 से b − 1 तक के अंक लगते हैं। कंप्यूटर आधार 2 (बाइनरी, अंक 0 और 1) में काम करता है। समय और कोण आज भी प्राचीन बेबीलोन का आधार 60 मानते हैं: 60 सेकंड का एक मिनट, 60 मिनट का एक घंटा।
- संख्या बोध: बड़ी संख्याएँ, छोटी संख्याएँ और वर्गमूल – संख्या बोध का मतलब है संख्या कितनी बड़ी है यह महसूस करना, तुलना करना और जल्दी अनुमान लगाना। हर स्थान अपने दाएँ वाले से 10 गुना है, इसलिए बहुत बड़ी और बहुत छोटी संख्याएँ 10 की घात से लिखी जाती हैं (वैज्ञानिक संकेतन: a × 10ⁿ, जहाँ 1 ≤ a < 10)। सभी वास्तविक संख्याएँ — पूर्ण, ऋणात्मक, भिन्न, दशमलव और √2 जैसी अपरिमेय — एक ही संख्या रेखा पर क्रम में होती हैं। वर्गमूल का अनुमान दो पास वाले पूर्ण वर्गों से लगाते हैं। भिन्न, दशमलव और प्रतिशत एक ही मात्रा के तीन रूप हैं।
- संख्यात्मक विधियाँ: मूल और क्षेत्रफल कदम-दर-कदम – कुछ समीकरण और क्षेत्रफल किसी आसान सूत्र से नहीं निकलते। संख्यात्मक विधियाँ आसान कदमों को बार-बार दोहराकर उत्तर के जितना चाहो उतना पास पहुँचती हैं: चिह्न परिवर्तन जाँचो, अंतराल आधा करो (समद्विभाजन), स्पर्शरेखा पर फिसलो (न्यूटन-रैफ़सन), x = g(x) दोहराओ (स्थिर-बिंदु पुनरावृत्ति), क्षेत्रफल के लिए समलंब जोड़ो, और ढलान पर छोटे कदम चलो (ऑयलर)।
- संगीत में गणित – ध्वनि एक तरंग है। उसकी आवृत्ति f (हर्ट्ज़ में) ही तारत्व (सुर की ऊँचाई) है और आवर्तकाल T = 1 / f। 1 : 2 अनुपात की लंबाई वाले तार एक सप्तक का अंतर देते हैं, 2 : 3 पंचम का। पियानो के एक सप्तक में 12 बराबर सीढ़ियाँ होती हैं, हर सीढ़ी 2^(1/12) = 1.0595 गुना। ताल एक आवर्त को भिन्नों में बाँटती है, जैसे 3 + 3 + 2 = 8 मात्राएँ।
- संबंध एवं फलन (कक्षा 12) – समुच्चय A पर संबंध R, A × A से चुनी गई जोड़ियों (a, b) का कोई भी समूह है। अगर हर तत्व खुद से संबंधित हो तो R स्वतुल्य है। अगर (a, b) के साथ हमेशा (b, a) भी हो तो सममित है। अगर (a, b) और (b, c) के साथ हमेशा (a, c) भी हो तो संक्रामक है। तीनों गुण हों तो तुल्यता संबंध; यह A को अलग-अलग तुल्यता वर्गों में बाँट देता है। फलन f: A → B, A के हर तत्व को B का ठीक एक तत्व देता है। अलग इनपुट का अलग आउटपुट हो तो एकैकी, B का हर तत्व आउटपुट बने तो आच्छादक, और दोनों हों तो एकैकी आच्छादी (bijective)।
- संबंध एवं फलन: कार्तीय गुणन, प्रांत, परिसर और ग्राफ़ – क्रमित युग्म (a, b) में पहला और दूसरा स्थान तय है, इसलिए (1, 2) ≠ (2, 1)। कार्तीय गुणन A × B उन सब युग्मों (a, b) का समुच्चय है जिनमें a ∈ A, b ∈ B; n(A × B) = n(A) × n(B)। A × B का कोई भी उपसमुच्चय A से B में संबंध है। पहले अवयवों का समुच्चय प्रांत, दूसरे अवयवों का परिसर, और पूरा B सहप्रांत है। फलन ऐसा संबंध है जिसमें A के हर अवयव का ठीक एक प्रतिबिंब हो। हम अचर, तत्समक, बहुपद, परिमेय, मापांक, चिह्न, घातांकी, लघुगणकीय और महत्तम पूर्णांक फलन और उनके ग्राफ़ पढ़ते हैं, और फलनों को जोड़ना, घटाना, गुणा और भाग करना सीखते हैं।
- संयुक्त इकाइयाँ: चाल, घनत्व, प्रति इकाई मूल्य और दूसरी दरें – संयुक्त इकाई (compound unit) दो इकाइयों को जोड़कर बनती है, जैसे मीटर प्रति सेकंड (m/s) या ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर (g/cm³)। "प्रति" का मतलब है "हर एक में"। दर बताती है कि एक मात्रा का कितना हिस्सा दूसरी मात्रा की एक इकाई में आता है। चाल = दूरी ÷ समय, घनत्व = द्रव्यमान ÷ आयतन, प्रति इकाई मूल्य = दाम ÷ मात्रा। इकाई बदलते समय ऊपर और नीचे की इकाई अलग-अलग बदलो।
- संयुक्त घटनाएँ, वृक्ष आरेख और सप्रतिबंध प्रायिकता – जब दो चीज़ें होती हैं, तो हर परिणाम प्रतिदर्श समष्टि, तालिका, वेन आरेख या वृक्ष आरेख में लिखो। वृक्ष की शाखाओं पर गुणा करो (गुणन नियम) और जो रास्ते चाहिए उन्हें जोड़ो। अगर पहली घटना दूसरी को बदल दे तो घटनाएँ आश्रित हैं, जैसे बिना वापस डाले निकालना। सप्रतिबंध प्रायिकता P(A | B) वह संभावना है कि A हो, जब पता है कि B हो चुका: P(A | B) = P(A और B) ÷ P(B)।
- संयुक्त फलनों के ग्राफ़ और समीकरणों के ज्यामितीय चित्र – कोष्ठक के अंदर का बदलाव ग्राफ़ को बगल में खिसकाता है; बाहर का बदलाव ऊपर, नीचे खिसकाता या पलटता है। |f(x)| x-अक्ष के नीचे का भाग ऊपर पलट देता है और f(|x|) दायाँ भाग बाईं ओर कॉपी करता है। x और y का समीकरण भी चित्र बनाता है, जैसे वृत्त या हीरा, और वह फलन का ग्राफ़ तभी है जब हर ऊर्ध्वाधर रेखा उसे एक ही बार काटे।
- सदिश बीजगणित – सदिश (vector) में माप (परिमाण) और दिशा दोनों होते हैं। 3D में a = xî + yĵ + zk̂ लिखते हैं। लंबाई |a| = √(x² + y² + z²)। दिक्-कोसाइन l = x/|a|, m = y/|a|, n = z/|a| और l² + m² + n² = 1। सदिश सिर-से-पूँछ (त्रिभुज नियम) या घटक-दर-घटक जुड़ते हैं। ka लंबाई को k गुना करता है, k ऋण हो तो दिशा उल्टी। AB को m : n में बाँटने वाले बिंदु का स्थिति सदिश अंतः (mb + na)/(m + n) और बाह्य (mb − na)/(m − n)। अदिश गुणनफल a·b = |a||b|cosθ एक संख्या है। सदिश गुणनफल a×b दोनों पर लंब नया सदिश है; इसकी लंबाई समांतर चतुर्भुज का क्षेत्रफल है।
- सदिश-मान फलन – सदिश की लंबाई और दिशा होती है और इसे घटकों में लिखते हैं, जैसे ⟨3, 2⟩। सदिश-मान फलन p(t) = ⟨x(t), y(t)⟩ हर t के लिए एक स्थिति सदिश देता है, इसलिए इसका सिरा एक रास्ता बनाता है। वेग सदिश ⟨x′(t), y′(t)⟩ रास्ते की दिशा में होता है और उसकी लंबाई चाल है।
- सदिश: स्तंभ सदिश, जोड़, गुणा और प्रमाण – सदिश में आकार और दिशा दोनों होते हैं। ग्रिड पर इसे स्तंभ सदिश (ऊपर आड़ा, नीचे खड़ा) लिखते हैं। सदिश सिरे से पूँछ जोड़कर, यानी हिस्से जोड़कर, जोड़े जाते हैं; किसी संख्या से गुणा करके लंबे या उल्टे किए जाते हैं। लंबाई पाइथागोरस से निकलती है। ज्यामिति में किसी भी रास्ते को ज्ञात सदिशों के योग से लिखकर समांतरता या मध्यबिंदु सिद्ध करते हैं।
- सप्रतिबंध प्रायिकता, गुणन नियम और स्वतंत्र घटनाएँ – सप्रतिबंध प्रायिकता का मतलब है: जब हमें पहले से पता हो कि घटना B हो चुकी है, तब A का मौका। B के बाहर के सारे परिणाम हटाओ और फिर से गिनो: P(A|B) = P(A ∩ B) ÷ P(B)। इसी से गुणन नियम मिलता है: P(A ∩ B) = P(B)·P(A|B)। अगर B जानकर A का मौका न बदले, तो घटनाएँ स्वतंत्र हैं और P(A ∩ B) = P(A)·P(B)।
- सम बहुफलकों की सममिति – ठोस की सममिति वह चाल है जो उसे ठीक उसकी अपनी रूपरेखा पर वापस बिठा दे। सम बहुफलकों में दर्पण-तल, घूर्णन अक्ष और (चतुष्फलक को छोड़कर सबमें) सममिति केंद्र होता है। चतुष्फलक: 6 तल, अक्ष 4×3-गुना और 3×2-गुना, केंद्र नहीं। घन और अष्टफलक: 9 तल, अक्ष 3×4-गुना, 4×3-गुना, 6×2-गुना, केंद्र है। द्वादशफलक और विंशतिफलक: 15 तल, अक्ष 6×5-गुना, 10×3-गुना, 15×2-गुना, केंद्र है।
- सम बहुभुज और उनके वृत्त – सम बहुभुज (regular polygon) की सभी भुजाएँ बराबर और सभी कोण बराबर होते हैं। हर सम बहुभुज का एक केंद्र O होता है, सभी शीर्षों से गुज़रने वाला परिवृत्त (त्रिज्या R) और हर भुजा को छूने वाला अंतर्वृत्त (त्रिज्या r, जिसे शीर्षलंब/एपोथम कहते हैं)। n भुजाओं और भुजा a के लिए: केंद्रीय कोण = 360°/n, अंतः कोण = (n − 2)·180°/n, R = a / (2 sin(180°/n)), r = a / (2 tan(180°/n)), क्षेत्रफल = ½ · परिमाप · r। खास स्थितियाँ: त्रिभुज R = a/√3, r = a/(2√3); वर्ग R = a/√2, r = a/2; षट्भुज R = a, r = a√3/2।
- समकोण त्रिभुज (Right Triangles) – समकोण त्रिभुज में एक कोण 90° का होता है। उसके सामने की भुजा कर्ण है; बाकी दो भुजाएँ पाद हैं। इसके दोनों न्यून कोणों का योग 90° होता है। कर्ण की माध्यिका कर्ण की आधी होती है। अगर एक कोण 30° हो तो उसके सामने का पाद कर्ण का आधा होता है। दो समकोण त्रिभुज HL, LL, LA या HA से सर्वांगसम होते हैं।
- सममिति: दर्पण रेखा, केंद्र और समद्विभाजक – जब किसी आकृति का एक भाग दूसरे भाग की बिल्कुल नक़ल हो, तो वह सममित है। रेखा (अक्षीय) सममिति में नक़ल एक रेखा के पार दर्पण प्रतिबिंब होती है। बिंदु (केंद्रीय) सममिति में आकृति को एक केंद्र के चारों ओर आधा चक्कर (180°) घुमाने पर वही आकृति मिलती है। रेखाखंड का लंब समद्विभाजक और कोण का समद्विभाजक भी सममित रेखाएँ हैं, इसलिए उन पर हर बिंदु दो चीज़ों से बराबर दूर होता है।
- समरूप त्रिभुज – दो आकृतियाँ समरूप होती हैं जब उनका आकार (shape) एक जैसा हो, भले नाप अलग हो। दो त्रिभुज समरूप हैं अगर उनके संगत कोण बराबर हों और संगत भुजाएँ एक ही अनुपात में हों। आधारभूत समानुपातिकता प्रमेय (BPT): त्रिभुज की एक भुजा के समांतर रेखा बाकी दो भुजाओं को एक ही अनुपात में बाँटती है; इसका विलोम भी सही है। समरूपता AA, SSS या SAS से सिद्ध होती है।
- समलंब चतुर्भुज: प्रकार और मध्य रेखा – समलंब चतुर्भुज (trapezium) चार भुजाओं की ऐसी आकृति है जिसकी एक जोड़ी भुजाएँ समानांतर होती हैं। इन्हें आधार कहते हैं। बाकी दो भुजाएँ पाद (legs) हैं। समद्विबाहु समलंब में दोनों पाद बराबर होते हैं और एक आधार के दोनों कोण बराबर होते हैं। समकोण समलंब में एक पाद आधारों पर लंबवत होता है। मध्य रेखा दोनों पादों के मध्य-बिंदुओं को जोड़ती है, आधारों के समानांतर होती है और उसकी लंबाई दोनों आधारों के योग की आधी होती है: m = (a + b) ÷ 2।
- समांतर प्रक्षेपण, विषमतलीय रेखाएँ और ठोसों के परिच्छेद – अंतरिक्ष में जो दो रेखाएँ कभी नहीं मिलतीं और समांतर भी नहीं हैं, वे विषमतलीय हैं। समांतर प्रक्षेपण (सूरज की छाया) रेखा को रेखा में, समांतर रेखाओं को समांतर रेखाओं में बदलता है, एक रेखा पर खंडों का अनुपात और मध्य बिंदु बचाता है, पर लंबाई और कोण बदल देता है; इसलिए त्रिभुज का चित्र कोई भी त्रिभुज हो सकता है और वर्ग का चित्र कोई भी समांतर चतुर्भुज। केंद्रीय प्रक्षेपण (लैंप) में समांतरता नहीं बचती। ठोस का परिच्छेद वह बहुभुज है जहाँ तल उसे काटता है; उसकी भुजाएँ उन फलकों पर होती हैं जिन्हें तल काटता है, और तल दो समांतर फलकों को समांतर रेखाओं में काटता है। चतुष्फलक के परिच्छेद त्रिभुज या चतुर्भुज होते हैं; समानांतर षट्फलक के षट्भुज तक।
- समांतर श्रेढ़ी – समांतर श्रेढ़ी (AP) संख्याओं की ऐसी सूची है जिसमें हर अगला पद पिछले पद में एक ही निश्चित संख्या d (सार्व अंतर) जोड़कर बनता है। पहला पद a हो तो n-वाँ पद aₙ = a + (n − 1)d और पहले n पदों का योग Sₙ = n/2 [2a + (n − 1)d] = n/2 (a + l), जहाँ l अंतिम पद है।
- समाकलन – समाकलन अवकलन को उलट देता है: अगर F′(x) = f(x), तो ∫f(x) dx = F(x) + C। हम मानक सूत्रों, प्रतिस्थापन (अंदर वाले हिस्से को u मानना), आंशिक भिन्न (भिन्न को तोड़ना) और खंडशः समाकलन (∫u dv = uv − ∫v du) से समाकलन करते हैं। निश्चित समाकल ∫ₐᵇ f(x) dx, a से b तक वक्र के नीचे का चिह्नित क्षेत्रफल है, और मूल प्रमेय के अनुसार यह F(b) − F(a) के बराबर है।
- समाकलन यानी संचय: रीमान योग से आयतन तक – निश्चित समाकल किसी दर को जोड़ता है। क्षेत्र को पतले आयतों में काटो (रीमान योग), आयतों को और पतला करो, तो योग सटीक क्षेत्रफल बन जाता है। इसी विचार से कुल बदलाव, औसत मान, विस्थापन और दूरी, और घुमाकर या टुकड़े जोड़कर बने ठोस का आयतन निकलता है।
- समाकलनों के अनुप्रयोग: वक्रों के नीचे क्षेत्रफल – वक्र y = f(x), x-अक्ष और रेखाओं x = a, x = b से घिरा क्षेत्रफल ∫ₐᵇ |f(x)| dx है: ऊँचाई y और चौड़ाई dx वाली पतली खड़ी पट्टियाँ जोड़ते हैं। x = g(y) रूप वाले वक्रों के लिए क्षैतिज पट्टियाँ लेते हैं। सममिति से काम बचता है: वृत्त, परवलय या दीर्घवृत्त का एक हिस्सा निकालो और गुणा करो। त्रिज्या r के वृत्त का क्षेत्रफल πr² और अर्ध-अक्ष a, b वाले दीर्घवृत्त का πab।
- समानुपात संबंध – दो राशियाँ सीधे समानुपाती हैं अगर y = k·x हो (अनुपात y/x कभी नहीं बदलता) और व्युत्क्रमानुपाती हैं अगर y = k/x हो (गुणनफल x·y कभी नहीं बदलता)। कोई सीधी रेखा तभी समानुपाती है जब वह मूल बिंदु से गुज़रे। बहुत से नियम घात संबंध y = c·xⁿ होते हैं: x को f गुना करने पर y, fⁿ गुना हो जाता है।
- समीकरण निकाय और समतुल्य निकाय – निकाय समीकरणों का ऐसा समूह है जिसमें सभी समीकरण एक साथ सत्य होने चाहिए। दो निकाय समतुल्य तब होते हैं जब उनके हल बिल्कुल एक जैसे हों। समीकरण बदलना, किसी समीकरण को शून्य के अलावा संख्या से गुणा करना, और एक समीकरण में दूसरे का गुणज जोड़ना, ये तीनों निकाय को समतुल्य रखते हैं। इसलिए हम हल खोए बिना निकाय को आसान बना सकते हैं।
- समुच्चय और उपसमुच्चय: अवयव और ⊂ का मतलब – समुच्चय साफ़-साफ़ बताई गई अलग-अलग चीज़ों का संग्रह है। अंदर की हर चीज़ उसका अवयव (element) है। 4, A में हो तो 4 ∈ A लिखते हैं, और 5 न हो तो 5 ∉ A। अगर B का हर अवयव A में भी है, तो B, A का उपसमुच्चय है: B ⊂ A। एक भी अवयव बाहर हो तो यह नहीं बनता। रिक्त समुच्चय ∅ और A खुद हमेशा A के उपसमुच्चय हैं।
- समुच्चय: निरूपण, प्रकार, उपसमुच्चय, वेन आरेख और संक्रियाएँ – समुच्चय (set) अलग-अलग वस्तुओं का सुपरिभाषित संग्रह है। इसे रोस्टर रूप {2, 4, 6} या समुच्चय-निर्माण रूप {x : x सम है} में लिखते हैं। समुच्चय रिक्त, परिमित, अपरिमित या समान हो सकते हैं। B का हर अवयव A में हो तो B ⊂ A। n अवयवों वाले समुच्चय के 2ⁿ उपसमुच्चय होते हैं। (a, b), [a, b] जैसे अंतराल वास्तविक संख्याओं के उपसमुच्चय हैं। वेन आरेख से सम्मिलन A ∪ B, सर्वनिष्ठ A ∩ B, अंतर A − B और पूरक A′ = U − A साफ़ दिखते हैं।
- समूह सिद्धांत: द्विआधारी संक्रिया, समूह, वलय और क्षेत्र – समूह (group) एक समुच्चय और एक संक्रिया है जो संवृत हो, साहचर्य हो, जिसमें तत्समक हो और हर अवयव का प्रतिलोम हो। घड़ी वाला गणित Z6 यह सब दिखाता है: सारणी, उपसमूह, अवयव की कोटि और लाग्रांज प्रमेय। वलय (ring) और क्षेत्र (field) में दूसरी संक्रिया भी जुड़ती है।
- सम्पूर्ण प्रायिकता प्रमेय और बेज़ प्रमेय – सारी संभावनाओं को ऐसे टुकड़ों में बाँटो जो आपस में न मिलें (विभाजन)। सम्पूर्ण प्रायिकता प्रमेय हर टुकड़े से घटना A का मौका जोड़ता है: P(A) = Σ P(Ei)P(A|Ei)। बेज़ प्रमेय उल्टा चलता है: A हो चुका है, तो हर टुकड़े का नया मौका: P(Ei|A) = P(Ei)P(A|Ei) ÷ P(A)।
- सम्मिश्र संख्याएँ और द्विघातीय समीकरण – x² + 1 = 0 जैसे समीकरण का कोई वास्तविक हल नहीं है, क्योंकि किसी वास्तविक संख्या का वर्ग ऋणात्मक नहीं होता। इसलिए एक नई संख्या i ली गई, जिसमें i² = −1। सम्मिश्र संख्या z = a + ib है: a वास्तविक भाग और b काल्पनिक भाग। जोड़, घटाव, गुणा साधारण बीजगणित जैसे होते हैं, बस i² की जगह −1 लिखें। भाग के लिए ऊपर-नीचे हर के संयुग्मी से गुणा करें। आर्गंड तल पर a + ib बिंदु (a, b) है। संयुग्मी a − ib वास्तविक अक्ष में उसका दर्पण प्रतिबिंब है और मापांक √(a² + b²) मूल बिंदु से दूरी है। जब D = b² − 4ac < 0 हो, तो द्विघात समीकरण के दोनों मूल सम्मिश्र और एक-दूसरे के संयुग्मी होते हैं।
- सरल रेखाएँ (कक्षा 11): ढाल, समीकरण के रूप और दूरी – रेखा की ढाल = ऊपर चढ़ना ÷ दाएँ चलना = (y₂ − y₁)/(x₂ − x₁) = tan θ। समांतर रेखाओं की ढाल बराबर, लंब रेखाओं में m₁m₂ = −1। दो रेखाओं के बीच कोण: tan θ = |(m₂ − m₁)/(1 + m₁m₂)|। रेखा के रूप: y = b या x = a (अक्ष के समांतर), y − y₁ = m(x − x₁) (बिंदु-ढाल), y = mx + c (ढाल-अंतःखंड), दो-बिंदु रूप, x/a + y/b = 1 (अंतःखंड)। बिंदु (x₁, y₁) की रेखा Ax + By + C = 0 से दूरी |Ax₁ + By₁ + C|/√(A² + B²)।
- सर्वांगसमता: वही आकार, वही माप – दो आकृतियाँ सर्वांगसम (≅) होती हैं अगर दृढ़ गतियों से एक को दूसरी पर बिल्कुल बैठाया जा सके: स्थानांतरण (खिसकाना), परावर्तन (पलटना) और घूर्णन (घुमाना), किसी भी क्रम में। दृढ़ गतियाँ हर लंबाई और हर कोण वैसा ही रखती हैं, इसलिए सर्वांगसम आकृतियों की संगत भुजाएँ और संगत कोण बराबर होते हैं। विस्तारण (dilation) माप बदल देता है, इसलिए सर्वांगसमता नहीं रखता; उससे समरूप आकृति बनती है। सर्वांगसमता सिद्ध करने के लिए दृढ़ गतियों का क्रम बताओ और शीर्ष क्रम से मिलाओ (A↔A′, B↔B′…)। त्रिभुजों के लिए SSS, SAS और ASA इन्हीं गतियों से निकलने वाले शॉर्टकट हैं।
- सर्वोत्तम फिट रेखा (Line of Best Fit) – सर्वोत्तम फिट रेखा (ट्रेंड लाइन) प्रकीर्ण आलेख (scatter plot) के बिंदुओं के बीच से खींची गई एक सीधी रेखा है। लगभग आधे बिंदु इसके ऊपर और आधे नीचे होते हैं, और दूरियाँ छोटी रहती हैं। इसका समीकरण y = mx + c एक रैखिक मॉडल है: ढाल m बताती है कि x में 1 बढ़ने पर y कितना बदलता है, और अंतःखंड c वह मान है जब x = 0 हो। इससे हम उन मानों का अनुमान लगाते हैं जो हमने नापे नहीं।
- सांख्यिकी: प्रश्न पूछना, औसत और स्टैक्ड दंड आलेख – सांख्यिकी एक ऐसे प्रश्न से शुरू होती है जिसके कई जवाब हो सकते हैं। हम आँकड़े इकट्ठा करते हैं, उन्हें व्यवस्थित करते हैं, ग्राफ बनाते हैं और एक संख्या निकालते हैं जो सबका सार बताए। माध्य बराबर का हिस्सा है, माध्यिका बीच का मान है और बहुलक सबसे ज़्यादा आने वाला मान है। भारित माध्य कुछ मानों को ज़्यादा महत्व देता है। स्टैक्ड और 100% स्टैक्ड दंड आलेख दिखाते हैं कि पूरा हिस्सों में कैसे बँटा है।
- सांख्यिकी: वर्गीकृत आँकड़ों का माध्य, माध्यक और बहुलक – जब आँकड़े वर्गों में बँटे हों (जैसे अंक 20–30), तो हर एक मान नहीं दिखता। माध्य के लिए हर वर्ग का बीच का मान लेते हैं, माध्यक के लिए चलता जोड़ (संचयी बारंबारता), और बहुलक के लिए सबसे ऊँचा खंभा। तीनों अलग तरीके से आँकड़ों का 'केंद्र' बताते हैं।
- सांख्यिकीय अनुमिति – सांख्यिकीय अनुमिति (statistical inference) का मतलब है: एक छोटे नमूने को देखकर पूरी समष्टि (population) के बारे में बात कहना। समष्टि के बारे में संख्या (जैसे असली अनुपात p या माध्य μ) प्राचल (parameter) कहलाती है। नमूने से निकली संख्या (जैसे p̂ या x̄) प्रतिदर्शज (statistic) है, और यही हमारा बिंदु आकलन है। अलग-अलग नमूने अलग उत्तर देते हैं: यह नमूना परिवर्तनशीलता है। बहुत सारे नमूनों के उत्तर मिलकर नमूना वितरण बनाते हैं, जिसका बीच असली मान पर होता है और फैलाव मानक त्रुटि (SE) कहलाता है: अनुपात के लिए √(p(1−p)/n), माध्य के लिए σ/√n। बड़ा नमूना = कम फैलाव। 95% विश्वास्यता अंतराल = आकलन ± 1.96 × SE; ऐसे 100 में से लगभग 95 अंतराल असली मान को पकड़ते हैं। सिमुलेशन से जाँचते हैं कि कोई दावा आँकड़ों से मेल खाता है या नहीं। अच्छी अनुमिति के लिए यादृच्छिक नमूना ज़रूरी है, और साथ-साथ बदलना कारण साबित नहीं करता।
- सांख्यिकीय जाँच चक्र – सांख्यिकीय जाँच आँकड़ों से किसी सवाल का जवाब पाँच चरणों में ढूँढती है: समस्या (साफ़ सवाल), योजना (किससे, क्या, कैसे पूछना है), आँकड़े (इकट्ठा करना और लिखना), विश्लेषण (सारणी, आलेख, औसत) और निष्कर्ष (जवाब, सीमाएँ, नया सवाल)। फिर चक्र दोबारा शुरू हो सकता है।
- सांतत्य (Continuity) और मध्यमान प्रमेय – फलन किसी बिंदु पर संतत होता है जब वहाँ उसकी सीमा और उसका मान बराबर हों। अंतराल पर संतत फलन में कोई छलांग नहीं होती, इसलिए वह दो मानों के बीच का कोई मान छोड़ नहीं सकता (मध्यमान प्रमेय)। अगर वह कड़ाई से एकदिष्ट भी हो, तो हर ऐसा मान ठीक एक बार मिलता है।
- सांतत्य तथा अवकलनीयता – किसी बिंदु पर फलन सतत तब है जब वहाँ ग्राफ़ टूटता नहीं: बायीं सीमा, दायीं सीमा और फलन का मान तीनों बराबर हों। अवकलज स्पर्श रेखा की ढाल है। शृंखला नियम, अस्पष्ट अवकलन, eˣ, ln x और प्रतिलोम त्रिकोणमितीय फलनों के सूत्र, लघुगणकीय अवकलन और प्राचलिक रूप से कक्षा 12 का लगभग हर फलन अवकलित हो जाता है। द्वितीय अवकलज बताता है कि ढाल खुद कैसे बदल रही है, यानी वक्र कैसे मुड़ रहा है।
- सामाजिक-भावनात्मक कौशल और गणितीय प्रक्रियाएँ – गणित अच्छा करना सिर्फ़ संख्याओं की बात नहीं है। सामाजिक-भावनात्मक कौशल आपको अपनी भावनाएँ पहचानने, तनाव शांत करने, ग़लती के बाद भी डटे रहने, दूसरों के साथ अच्छे से काम करने और 'मैं सीख सकता हूँ' मानने में मदद करते हैं। गणितीय प्रक्रियाएँ अच्छे हल करने वालों की आदतें हैं: समस्या समझो, योजना बनाओ, करो और जाँचो; तर्क और प्रमाण दो; विचार जोड़ो; उपकरण चुनो; शब्द, तालिका, ग्राफ़ और मॉडल से दिखाओ; और साफ़ समझाओ।
- सारणिक (Determinants): उपसारणिक, सहखंड, सहखंडज, व्युत्क्रम और समीकरण निकाय – सारणिक एक वर्ग आव्यूह से बनी एक संख्या है, जिसे |A| लिखते हैं। 2 × 2 के लिए यह ad − bc है और स्तंभों से बने समांतर चतुर्भुज के क्षेत्रफल के बराबर है। 3 × 3 में हम उपसारणिक और सहखंड से एक पंक्ति पर प्रसार करते हैं। |A| = 0 हो तो A अव्युत्क्रमणीय है, उसका व्युत्क्रम नहीं होता। सारणिक का आधा त्रिभुज का क्षेत्रफल देता है। सहखंडज (सहखंड आव्यूह का परिवर्त) से A⁻¹ = (adj A)/|A| मिलता है, फिर AX = B का हल X = A⁻¹B। |A| और (adj A)B से पता चलता है कि निकाय संगत है या नहीं।
- सिंप्लेक्स विधि: तालिका से रैखिक प्रोग्रामन हल करना – आलेखीय विधि दो चरों तक काम करती है, पर असली समस्याओं में बहुत चर होते हैं। सिंप्लेक्स विधि उन्हें एक तालिका (tableau) से हल करती है। हर ≤ शर्त में एक स्लैक चर जोड़ो, मूल बिंदु से शुरू करो, और पिवट करो: उद्देश्य पंक्ति में सबसे ऋणात्मक संख्या का स्तंभ चुनो, अनुपात परीक्षण से पंक्ति चुनो, और स्तंभ साफ़ करो। हर पिवट संभव क्षेत्र के बेहतर कोने पर ले जाता है। जब उद्देश्य पंक्ति में कोई ऋणात्मक न बचे, हल इष्टतम है। C न्यूनतम करना हो तो −C अधिकतम करो।
- सिग्मा संकेतन (∑) – चिह्न ∑ का मतलब है "इन पदों को जोड़ो"। k = 1 से n तक a_k का ∑ यानी a_1 + a_2 + ... + a_n। अचर संख्या ∑ से बाहर आ जाती है, योग को तोड़ा जा सकता है, और k, k² तथा k³ के योग के तैयार सूत्र हैं। टेलिस्कोपिक योग में ज़्यादातर पद कट जाते हैं।
- सिविल इंजीनियरिंग में सर्वेक्षण – सर्वेक्षण ज़मीन की नाप है ताकि सड़क, पुल और इमारत की योजना बने और निशान लगें। दूरी टेप, रेंजिंग पोल और इलेक्ट्रॉनिक यंत्र से नापते हैं और क्षैतिज में बदलते हैं (H = L cos θ)। कोण थियोडोलाइट या कंपास से नापते हैं। दूरी और कोण मिलकर नक्शे पर कोई भी बिंदु तय करते हैं।
- सीमा (कक्षा 11): फलन किस संख्या के पास जाता है – सीमा बताती है कि जब x किसी बिंदु के पास जाता है तो f(x) किस संख्या के पास पहुँचता है। हम बिंदु की ओर बाएँ से भी चलते हैं और दाएँ से भी। दोनों ओर से एक ही संख्या मिले, तो वही सीमा है। यहाँ बहुपद, परिमेय, त्रिकोणमितीय, चरघातांकी और लघुगणकीय फलनों की सीमाएँ और ज़रूरी मानक परिणाम सीखेंगे।
- सीमांत उत्पाद और अवकलन – सीमांत उत्पाद (MP) वह अतिरिक्त उत्पादन है जो एक इकाई और आगत (इनपुट) लगाने से मिलता है। जब उत्पादन एक चिकना सूत्र Q(L) हो, तो MP उसका अवकलज है: MP = dQ/dL, यानी उत्पादन-वक्र की ढलान। आगत बढ़ाने पर MP घटे तो इसे घटते प्रतिफल कहते हैं। यही विचार सीमांत लागत MC = dC/dq देता है।
- सीमांत लागत और अवकलन का विचार – सीमांत लागत एक और चीज़ बनाने का अतिरिक्त खर्च है। जब हम कदम को छोटा करते जाते हैं, तो यह लागत-वक्र का ढलान बन जाता है। यही ढलान अवकलज (derivative) है। C = q² के लिए अवकलज 2q है।
- सुंदरता और गणित – चीज़ें तब सुंदर लगती हैं जब वे सरल, संतुलित और व्यवस्थित होती हैं। गणित इस व्यवस्था को बताता है: सममिति (दर्पण और घूर्णन), आवर्तिता (पैटर्न तय दूरी के बाद दोहराना) और सामंजस्य (हिस्सों का सरल अनुपात, जैसे 2 : 3)। कोटि n की घूर्णन सममिति वाली आकृति 360° ÷ n घुमाने पर वैसी ही दिखती है।
- स्थानीय मान, क्रम और ऋणात्मक संख्याएँ – हमारी संख्या पद्धति में हर स्थान अपने दाएँ वाले स्थान से 10 गुना होता है। अंक का मान = अंक × उसके स्थान का मान। तुलना के लिए स्थान मिलाओ और बाएँ से जाँचो। ऋणात्मक संख्याएँ शून्य के बाईं ओर होती हैं; जितनी बाएँ, उतनी छोटी।
- स्वर्ण अनुपात (गोल्डन रेशियो) – किसी लंबाई को बड़े हिस्से a और छोटे हिस्से b में ऐसे काटो कि पूरा ÷ a = a ÷ b हो। यह बराबर वाला अनुपात स्वर्ण अनुपात φ (फाई) = (1 + √5) ÷ 2 ≈ 1.618 है। जिस आयत की भुजाएँ इस अनुपात में हों, वह सुनहरा आयत है: उसमें से एक वर्ग काटो तो बचा टुकड़ा फिर सुनहरा होता है। पास-पास की फिबोनाची संख्याओं का अनुपात φ के और पास आता जाता है।
- AM–GM असमिका – दो धनात्मक संख्याओं a और b के लिए समांतर माध्य (a+b)/2 कभी भी गुणोत्तर माध्य √(ab) से छोटा नहीं होता। दोनों तभी बराबर होते हैं जब a = b। इससे जोड़ तय हो तो गुणनफल का अधिकतम और गुणनफल तय हो तो जोड़ का न्यूनतम मान मिलता है।
- EMI: समान मासिक किस्त, फ्लैट दर और घटती शेष राशि – EMI (समान मासिक किस्त) वह बराबर रकम है जो ऋण और ब्याज चुकाने के लिए हर महीने दी जाती है। फ्लैट दर विधि में पूरे समय पूरे ऋण पर ब्याज लगता है: EMI = (P + P×R×T/100) ÷ n। घटती शेष राशि विधि में ब्याज सिर्फ़ बचे बकाया पर लगता है: EMI = P·r·(1+r)^n ÷ ((1+r)^n − 1), जहाँ r मासिक दर (दशमलव में) और n महीनों की संख्या है। हर EMI में कुछ ब्याज और कुछ मूलधन होता है; ब्याज वाला हिस्सा घटता है और मूलधन वाला बढ़ता है, जब तक बकाया शून्य न हो जाए।