अभिगृहीत विधि क्या है?
गणित में हम शून्य से सब कुछ सिद्ध नहीं कर सकते। इसलिए हम कुछ कथन चुनते हैं जो स्पष्ट रूप से सही लगते हैं या हमारे विषय को परिभाषित करते हैं। ये अभिगृहीत (या अभिधारणाएँ) हैं। फिर तर्क से दूसरे कथन सिद्ध करते हैं, जिन्हें प्रमेय कहते हैं। उपपत्ति एक कड़ी है: हर क़दम अभिगृहीतों या पहले सिद्ध प्रमेयों से निकलता है। किसी विषय को इस तरह बनाने की विधि अभिगृहीत विधि है। उपपत्तियों के प्रकार के लिए तर्क और उपपत्ति देखो।
उदाहरण 1: ज्यामिति
सबसे पुराना उदाहरण यूक्लिड की एलिमेंट्स (लगभग 300 ई.पू.) है, जो परिभाषाओं, सर्वनिष्ठ धारणाओं और पाँच अभिधारणाओं से शुरू होती है, जैसे "किन्हीं दो बिंदुओं के बीच सरल रेखा खींची जा सकती है" (यूक्लिड की ज्यामिति देखो)। उनसे वे प्रमेय सिद्ध करते हैं, जैसे त्रिभुज के कोणों का योग 180 डिग्री। 1899 में डेविड हिल्बर्ट ने ज्यामिति के लिए ज़्यादा कड़ी सूची दी। समांतर अभिधारणा बदलने पर नई, ग़ैर-यूक्लिडीय ज्यामितियाँ बनती हैं, जैसे गोले पर ज्यामिति, जहाँ रेखाएँ महावृत्त हैं और कोणों का योग 180 डिग्री से अधिक है।
उदाहरण 2: अंकगणित
जुज़ेप्पे पियानो (1889) ने प्राकृत संख्याओं के सरल अभिगृहीत दिए: 0 एक संख्या है; हर संख्या n की अगली संख्या S(n) है; किसी संख्या की अगली संख्या 0 नहीं होती; अलग संख्याओं की अगली संख्याएँ अलग होती हैं; और आगमन (अगर 0 में कोई गुण है और जिस n में है वह S(n) को देता है, तो सब संख्याओं में है)। नियम a + 0 = a और a + S(b) = S(a + b) से हम 2 + 2 = 4 सिद्ध कर सकते हैं। 2 = S(S(0)) लिखो। तब 2 + 2 = 2 + S(S(0)) = S(2 + S(0)) = S(S(2 + 0)) = S(S(2)) = 4।
उदाहरण 3: प्रायिकता
1933 में आंद्रेई कोल्मोगोरोव ने प्रतिदर्श-समष्टि S पर प्रायिकता P के तीन अभिगृहीत दिए: (1) P(A) कम से कम 0 है; (2) P(S) = 1; (3) अगर A और B साथ नहीं हो सकते, तो P(A या B) = P(A) + P(B)। इनसे हम सिद्ध करते हैं, जैसे P(A नहीं) = 1 − P(A)। उपपत्ति: A और "A नहीं" साथ नहीं हो सकते और मिलकर S को ढकते हैं, इसलिए P(A) + P(A नहीं) = P(S) = 1। आगे का परिणाम: P(A) अधिकतम 1 है, क्योंकि P(A नहीं) कम से कम 0 है। घटनाएँ और प्रायिकता के अभिगृहीत देखो।
अच्छे अभिगृहीत-समूह और मॉडल
हम चाहते हैं कि अभिगृहीत संगत हों (कभी किसी कथन और उसके उलट को सिद्ध न करें), स्वतंत्र हों (कोई बाक़ियों से सिद्ध न हो) और आदर्श रूप से पूर्ण हों (हर कथन तय हो सके)। 1931 में कुर्त गोडेल ने दिखाया कि अंकगणित जितनी मज़बूत किसी भी संगत प्रणाली में कुछ सच्चे कथन उससे सिद्ध नहीं हो सकते: यह विधि की सीमा है, विफलता नहीं। मॉडल वह चीज़ है जिसमें सारे अभिगृहीत सही हों: निष्पक्ष सिक्का प्रायिकता का मॉडल है और गोले की सतह ग़ैर-यूक्लिडीय ज्यामिति का। अभिगृहीतों से असली दुनिया का वर्णन मॉडलिंग है (गणितीय मॉडलिंग देखो)।
खुद करके देखो
एक छोटा अभिगृहीत-खेल बनाओ: "दोस्त का दोस्त दोस्त है" और "हर किसी का कम से कम एक दोस्त है"। सिर्फ़ इन नियमों से एक छोटा परिणाम सिद्ध करो। फिर एक नियम बदलो और देखो क्या बदलता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अभिगृहीत: बिना सिद्ध किए माना जाता है
- प्रमेय: अभिगृहीतों और पहले के प्रमेयों से सिद्ध
- कोल्मोगोरोव: P(A) ≥ 0; P(S) = 1; असंयुक्त A, B के लिए P(A या B) = P(A) + P(B)
- P(A नहीं) = 1 − P(A)
- पियानो: a + 0 = a; a + S(b) = S(a + b)
हल किए गए उदाहरण
1. प्रायिकता के अभिगृहीतों से P(A नहीं) निकालो, यदि P(A) = 0.3।
P(A) + P(A नहीं) = P(S) = 1। इसलिए P(A नहीं) = 1 - 0.3 = 0.7।
2. A और B साथ नहीं हो सकते। P(A) = 0.2 और P(B) = 0.5। P(A या B) निकालो।
अभिगृहीत 3 से P(A या B) = 0.2 + 0.5 = 0.7।
3. पियानो नियमों से 1 + 1 = 2 सिद्ध करो, जहाँ 1 = S(0) और 2 = S(1)।
1 + 1 = 1 + S(0) = S(1 + 0) = S(1) = 2।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि अभिगृहीत सिद्ध किए जाते हैं। वे चुने और माने जाते हैं।
- यह मानना कि अभिगृहीत असली दुनिया में "साफ़ सही" होने चाहिए। उन्हें बस संगत नियम होना चाहिए।
- प्रमेय को अनुमान कहना। प्रमेय अभिगृहीतों से सिद्ध होता है।
- यह भूलना कि समांतर अभिधारणा बदलकर दूसरी ज्यामिति बनती है।