कथन, सप्रतिबंध कथन और विलोम
कथन वह वाक्य है जो या तो सत्य हो या असत्य, जैसे '7 अभाज्य है'।
- P ⇒ Q ('यदि P तो Q'): जब भी P सत्य, Q भी सत्य।
- विलोम (converse) Q ⇒ P है। यह ग़लत हो सकता है: 'यदि n > 2 तो n > 1' सत्य है, पर 'यदि n > 1 तो n > 2' n = 1.5 पर ग़लत।
- P ⇔ Q ('यदि और केवल यदि'): P ⇒ Q और Q ⇒ P दोनों सत्य।
- P ⇒ Q का प्रतिधनात्मक (contrapositive) 'Q नहीं ⇒ P नहीं' है। P ⇒ Q सत्य हो तो यह भी हमेशा सत्य।
उपपत्ति परिभाषाओं, अभिगृहीतों (स्वीकार किए तथ्य) और पहले सिद्ध प्रमेयों को सही तर्क से जोड़ती है।
प्रत्यक्ष उपपत्ति (निगमन)
दिए गए तथ्यों से शुरू करके क़दम-दर-क़दम परिणाम तक पहुँचिए। बीजगणित से हम हर संख्या की बात एक साथ कर सकते हैं:
- सम संख्या: 2n; विषम संख्या: 2n + 1; क्रमागत संख्याएँ: n, n + 1; 3 का गुणज: 3n।
उदाहरण: सिद्ध कीजिए कि दो विषम संख्याओं का योग सम है। मान लें वे 2a + 1 और 2b + 1 हैं। योग = 2a + 2b + 2 = 2(a + b + 1), जो 2 × पूर्ण संख्या है, इसलिए सम। ∎
उपपत्ति एक साफ़ वाक्य या चिह्न ∎ से ख़त्म कीजिए।
सभी स्थितियाँ जाँचना और प्रति-उदाहरण से खंडन
सभी स्थितियाँ (exhaustion): समस्या को कुछ ऐसी स्थितियों में बाँटिए जो हर संभावना ढक लें, फिर हर स्थिति सिद्ध कीजिए। उदाहरण: हर पूर्ण संख्या 3k, 3k + 1 या 3k + 2 है। वर्ग करने पर 9k², 9k² + 6k + 1 और 9k² + 12k + 4 = 3(3k² + 4k + 1) + 1। यानी वर्ग संख्या को 3 से भाग देने पर शेष 0 या 1, कभी 2 नहीं।
प्रति-उदाहरण: दावा ग़लत दिखाने को एक ऐसी स्थिति ढूँढिए जहाँ वह टूटे। 'n² + n + 41 हमेशा अभाज्य है' n = 0 से 39 तक चलता है पर n = 40 पर टूटता है (40² + 40 + 41 = 41²)। बहुत से उदाहरण सामान्य दावा सिद्ध नहीं करते; एक प्रति-उदाहरण हमेशा खंडन कर देता है।
विरोधाभास से उपपत्ति
मान लीजिए कथन असत्य है। सही तर्क करते-करते किसी असंभव बात (विरोधाभास) पर पहुँचिए। इसका अर्थ है मान्यता ग़लत थी, यानी कथन सत्य है।
√2 अपरिमेय है। मान लें √2 = p/q, जहाँ p, q पूर्ण संख्याएँ हैं जिनका कोई उभयनिष्ठ गुणनखंड नहीं। तब p² = 2q², तो p² सम, तो p सम: p = 2k। तब 4k² = 2q², तो q² = 2k², तो q भी सम। दोनों सम यानी 2 उभयनिष्ठ गुणनखंड: विरोधाभास। ∎
अभाज्य संख्याएँ अनंत हैं। मान लें अभाज्य सिर्फ़ p₁, p₂, …, pₙ हैं। N = p₁p₂…pₙ + 1 लीजिए। N को किसी भी सूची वाले अभाज्य से भाग देने पर शेष 1 बचता है, इसलिए N ख़ुद अभाज्य है या उसका कोई अभाज्य गुणनखंड सूची से बाहर है। दोनों हालत में सूची अधूरी थी: विरोधाभास। ∎
ज्यामितीय प्रमेयों की उपपत्ति
ज्यामितीय उपपत्ति क्रमांकित कथनों में लिखिए, हर एक के साथ कारण (दिया है, परिभाषा या ज्ञात प्रमेय)। आम कारण: शीर्षाभिमुख कोण बराबर; समांतर रेखाओं में एकांतर कोण और संगत कोण बराबर; सीधी रेखा पर कोणों का योग 180°; सर्वांगसमता SSS, SAS, ASA, RHS; समरूपता AA, SAS, SSS।
त्रिभुज के कोणों का योग। ऊपर के शीर्ष से आधार के समांतर रेखा खींचिए। ऊपर वाले कोण के दोनों ओर के कोण आधार के दोनों कोणों के बराबर हैं (एकांतर कोण)। अब तीनों कोण एक सीधी रेखा पर हैं, इसलिए योग 180°। ∎
संश्लेषणात्मक (synthetic) उपपत्ति ऐसी शुद्ध ज्यामिति है। विश्लेषणात्मक (analytic) उपपत्ति आकृति को निर्देशांकों पर रखकर बीजगणित लगाती है: जैसे समांतर चतुर्भुज के विकर्ण एक-दूसरे को समद्विभाजित करते हैं, यह दिखाने को शीर्ष (0, 0), (a, 0), (b, c), (a + b, c) लीजिए; दोनों विकर्णों का मध्य-बिंदु ((a + b)/2, c/2) एक ही है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सम: 2n · विषम: 2n + 1 · क्रमागत: n, n + 1
- P ⇒ Q: यदि P तो Q · विलोम: Q ⇒ P
- प्रतिधनात्मक: Q नहीं ⇒ P नहीं (P ⇒ Q जैसा ही सत्य)
- P ⇔ Q: P ⇒ Q और Q ⇒ P
- सिद्ध करना = सारी स्थितियाँ · खंडन = एक प्रति-उदाहरण
- विरोधाभास: P नहीं मानो → असंभव → P सत्य
- त्रिभुज के कोणों का योग = 180° (समांतर रेखा + एकांतर कोण)
हल किए गए उदाहरण
1. सिद्ध कीजिए कि दो विषम संख्याओं का गुणनफल विषम है।
(2a + 1)(2b + 1) = 4ab + 2a + 2b + 1 = 2(2ab + a + b) + 1, जो 2n + 1 रूप में है, इसलिए विषम। ∎
2. सिद्ध कीजिए कि तीन क्रमागत पूर्ण संख्याओं का योग 3 का गुणज है।
n + (n + 1) + (n + 2) = 3n + 3 = 3(n + 1), 3 का गुणज। ∎
3. खंडन कीजिए: 'यदि n अभाज्य है, तो 2n + 1 अभाज्य है।'
n = 7 लीजिए: 2(7) + 1 = 15 = 3 × 5, अभाज्य नहीं। एक प्रति-उदाहरण काफ़ी। ∎
4. n = 1, 2, 3, 4, 5 के लिए सभी स्थितियाँ जाँचकर दिखाइए कि n³ − n सम है।
0, 6, 24, 60, 120: सब सम। (सामान्य रूप में n³ − n = (n − 1)n(n + 1) में एक सम संख्या ज़रूर है, इसलिए हमेशा सम।)
5. विरोधाभास से सिद्ध कीजिए कि कोई सबसे बड़ी सम संख्या नहीं है।
मान लें E सबसे बड़ी सम संख्या है। तब E + 2 भी सम है और E + 2 > E। यह E के सबसे बड़ा होने के विरुद्ध है। इसलिए कोई सबसे बड़ी सम संख्या नहीं। ∎
6. रेखाएँ AB और CD बिंदु O पर काटती हैं। सिद्ध कीजिए ∠AOC = ∠BOD।
∠AOC + ∠COB = 180° (रेखा AB पर कोण)। ∠COB + ∠BOD = 180° (रेखा CD पर कोण)। इसलिए ∠AOC = 180° − ∠COB = ∠BOD। ∎ (शीर्षाभिमुख कोण बराबर।)
आम गलतियाँ
- कुछ उदाहरण जाँचकर उसे उपपत्ति मान लेना। उदाहरण बस संकेत देते हैं; उपपत्ति हर स्थिति ढकती है।
- दो अलग संख्याओं के लिए एक ही अक्षर लेना: दो विषम संख्याएँ 2a + 1 और 2b + 1 हैं, दो बार 2n + 1 नहीं।
- विलोम को सत्य मान लेना। P ⇒ Q का अर्थ Q ⇒ P नहीं।
- ज्यामिति के क़दम बिना कारण लिखना। हर पंक्ति के साथ 'दिया है', परिभाषा या प्रमेय का नाम चाहिए।