CBSE कक्षा 11 भौतिकी
अध्याय: 10
1. भौतिक जगत और मापन
मात्रक और मापन
- विमाएँ और विमीय विश्लेषण – किसी राशि की विमाएँ बताती हैं कि वह मूल राशियों से कैसे बनी है: द्रव्यमान [M], लंबाई [L], समय [T] (और धारा [A], ताप [K], पदार्थ की मात्रा [mol], ज्योति तीव्रता [cd])। बल = [M L T⁻²]। सही समीकरण में हर पद की विमा एक जैसी होती है (विमीय समांगता का सिद्धांत)। इससे हम समीकरण जाँचते हैं, एक पद्धति से दूसरी में मात्रक बदलते हैं और यह पता करते हैं कि एक राशि दूसरी पर कैसे निर्भर है। यह 2π जैसे संख्यात्मक स्थिरांक नहीं दे सकता, और जोड़, sin, log वाले सूत्र नहीं निकाल सकता।
- सार्थक अंक और मापन में त्रुटियाँ – कोई भी मापन पूरी तरह सही नहीं होता। सार्थक अंक = पक्के अंक + पहला अनिश्चित अंक। त्रुटि बताती है कि पाठ्यांक असली मान से कितना दूर हो सकता है: निरपेक्ष त्रुटि Δa, आपेक्षिक त्रुटि Δa/a और प्रतिशत त्रुटि (Δa/a) × 100. जोड़ या घटाने में निरपेक्ष त्रुटियाँ जुड़ती हैं। गुणा या भाग में प्रतिशत त्रुटियाँ जुड़ती हैं। घात n हो तो प्रतिशत त्रुटि n गुना।
- मात्रक और मापन (कक्षा 11) – मापना यानी किसी राशि की तुलना एक तय, सबके माने हुए परिमाण से करना। उस तय परिमाण को मात्रक (unit) कहते हैं। मापा गया मान = संख्या × मात्रक। आज पूरी दुनिया SI पद्धति चलाती है, जिसमें 7 मूल मात्रक हैं: मीटर, किलोग्राम, सेकंड, ऐम्पियर, केल्विन, मोल और कैन्डेला। बाकी सब मात्रक (जैसे न्यूटन, जूल) इन्हीं के गुणा-भाग से बने व्युत्पन्न मात्रक हैं। किलो (10³), मिली (10⁻³) जैसे पूर्वलग्न बड़ी-छोटी संख्याओं को आसान बनाते हैं।
2. शुद्धगतिकी
सरल रेखा में गति · समतल में गति
- सरल रेखा में गति (कक्षा 11) – गति बताने के लिए पहले संदर्भ तंत्र चुनते हैं: एक मूल बिंदु, एक दिशा और एक घड़ी। स्थिति x समय t के साथ बदलती है। वेग v = dx/dt, यानी x–t ग्राफ की ढाल; त्वरण a = dv/dt, यानी v–t ग्राफ की ढाल। v–t ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल = विस्थापन। a स्थिर हो तो: v = u + at, x = ut + ½at², v² = u² + 2as।
- प्रक्षेप्य गति और एकसमान वृत्तीय गति (कक्षा 11) – समतल में r = r₀ + v₀t + ½at² और v = v₀ + at, x और y पर अलग-अलग लगते हैं। प्रक्षेप्य का क्षैतिज वेग u cos θ स्थिर रहता है और ऊर्ध्वाधर वेग हर सेकंड g से बदलता है, इसलिए पथ परवलय है: y = x tan θ − gx²/(2u²cos²θ)। T = 2u sin θ/g, H = u² sin²θ/2g, R = u² sin 2θ/g (45° पर अधिकतम)। एकसमान वृत्तीय गति में चाल स्थिर पर वेग की दिशा घूमती है, इसलिए केंद्र की ओर अभिकेंद्र त्वरण a = v²/r = ω²r होता है।
- समतल में गति के लिए अदिश और सदिश (कक्षा 11) – अदिश में सिर्फ परिमाण होता है; सदिश में परिमाण और दिशा दोनों। परिमाण और दिशा समान हों तो सदिश बराबर। किसी संख्या से गुणा करने पर लंबाई बदलती है (ऋणात्मक संख्या दिशा उल्टी कर देती है)। सदिश पूँछ-से-सिर जुड़ते हैं; A − B = A + (−B)। समतल का हर सदिश A = Ax î + Ay ĵ, जहाँ Ax = A cos θ, Ay = A sin θ। A·B = AB cos θ एक अदिश है; A×B का परिमाण AB sin θ और दिशा दोनों के लंबवत।
3. गति के नियम
गति के नियम
- अभिकेंद्र बल, समतल सड़क और ढालू सड़क पर कार – वृत्त में चलती वस्तु की दिशा लगातार बदलती है, इसलिए उसे केंद्र की ओर नेट बल चाहिए: अभिकेंद्र बल F = mv²/r. यह कोई नया बल नहीं; तनाव, गुरुत्व, घर्षण या अभिलंब बल का हिस्सा इसे देता है। समतल सड़क पर सिर्फ़ घर्षण देता है, इसलिए vmax = √(μs r g). θ कोण पर ढालू सड़क पर अभिलंब बल का हिस्सा भी मदद करता है: घर्षण के बिना आदर्श चाल v₀ = √(r g tanθ), और घर्षण के साथ vmax = √[r g (μs + tanθ)/(1 − μs tanθ)].
- जड़त्व, पहला नियम, संवेग, दूसरा नियम और आवेग – कोई वस्तु अपनी विराम या एकसमान गति की अवस्था तब तक नहीं बदलती जब तक उस पर कोई नेट बाहरी बल न लगे (पहला नियम)। बदलाव का यह विरोध जड़त्व है और द्रव्यमान इसका माप है। संवेग p = mv. संवेग बदलने की दर नेट बल के बराबर है: F = dp/dt, द्रव्यमान स्थिर हो तो F = ma (दूसरा नियम)। आवेग J = F × Δt = Δp; रुकने में ज़्यादा समय लगे तो बल कम लगता है।
- घर्षण: स्थैतिक, गतिज और लोटनिक घर्षण, नियम और स्नेहन – घर्षण वह बल है जो छूती सतहों के बीच आपेक्षिक गति (या उसकी शुरुआत) का विरोध करता है। स्थैतिक घर्षण ज़रूरत के हिसाब से ख़ुद बदलता है, पर एक अधिकतम तक: सीमांत घर्षण fs,max = μs N. फिसलना शुरू होते ही गतिज घर्षण fk = μk N लगता है, और μk < μs. घर्षण अभिलंब बल और सतहों की प्रकृति पर निर्भर है, संपर्क क्षेत्रफल पर नहीं। लोटनिक घर्षण सर्पी घर्षण से बहुत कम है; स्नेहक और बॉल बेयरिंग घर्षण घटाते हैं।
- तीसरा नियम, संवेग संरक्षण और बलों का संतुलन – बल हमेशा जोड़े में होते हैं: A ने B पर बल लगाया तो उसी पल B भी A पर बराबर और उलटा बल लगाता है (तीसरा नियम)। यह जोड़ा अलग-अलग वस्तुओं पर लगता है। जिस निकाय पर कोई नेट बाहरी बल न हो, उसका कुल रैखिक संवेग स्थिर रहता है; इससे प्रतिक्षेप, रॉकेट और टक्करें समझ आती हैं। कोई कण संतुलन में है जब उस पर सारे बलों का योग शून्य हो; संतुलन वाले तीन संगामी बल एक बंद त्रिभुज बनाते हैं।
4. कार्य, ऊर्जा और शक्ति
कार्य, ऊर्जा और शक्ति
- एक और दो विमाओं में प्रत्यास्थ और अप्रत्यास्थ संघट्ट – हर संघट्ट (टक्कर) में कुल संवेग संरक्षित रहता है (छोटी सी टक्कर में बाहरी बल नहीं)। प्रत्यास्थ संघट्ट में गतिज ऊर्जा भी संरक्षित रहती है। अप्रत्यास्थ में कुछ गतिज ऊर्जा ऊष्मा, ध्वनि या पिचकने में जाती है; वस्तुएँ चिपक जाएँ तो पूर्णतः अप्रत्यास्थ। 1D प्रत्यास्थ में (वस्तु 2 रुकी हो): v₁ = (m₁ − m₂)u₁/(m₁ + m₂), v₂ = 2m₁u₁/(m₁ + m₂)। 2D में x और y दोनों दिशाओं में अलग-अलग संवेग संरक्षित।
- ऊर्ध्वाधर वृत्त में गति – डोरी से बँधी गेंद ऊर्ध्वाधर वृत्त में नीचे तेज़ और ऊपर धीमी चलती है, क्योंकि गुरुत्व उस पर कार्य करता है। हर बिंदु पर केंद्र की ओर कुल बल mv²/r होना चाहिए। नीचे T = mg + mv²/r (सबसे ज़्यादा); ऊपर T = mv²/r − mg (सबसे कम)। ऊपर डोरी तनी रहे इसके लिए v_ऊपर ≥ √(gr)। ऊर्जा संरक्षण से नीचे u ≥ √(5gr) चाहिए।
- स्थितिज ऊर्जा, स्प्रिंग ऊर्जा और संरक्षी बल – स्थितिज ऊर्जा U स्थिति या आकार के कारण जमा ऊर्जा है। पृथ्वी के पास U = mgh; खिंची या दबी स्प्रिंग में U = ½kx²। जिस बल का कार्य सिर्फ़ शुरू और अंत के बिंदु पर निर्भर करे, रास्ते पर नहीं, वह संरक्षी बल है (गुरुत्व, स्प्रिंग बल)। तब F = −dU/dx और K + U नियत रहता है। घर्षण, वायु प्रतिरोध असंरक्षी हैं: ये यांत्रिक ऊर्जा को ऊष्मा बना देते हैं।
- कार्य, गतिज ऊर्जा, कार्य-ऊर्जा प्रमेय और शक्ति – जब बल किसी चीज़ को अपनी दिशा में खिसकाता है तो कार्य होता है: W = F·s = F s cos θ। बदलते बल का कार्य F–x ग्राफ़ के नीचे का क्षेत्रफल है। चलती वस्तु की गतिज ऊर्जा K = ½mv² है। कार्य-ऊर्जा प्रमेय: कुल कार्य = गतिज ऊर्जा में बदलाव। शक्ति यानी कार्य कितनी जल्दी हुआ: P = W/t = F·v।
5. कणों के निकाय तथा दृढ़ पिंड की गति
कणों के निकाय तथा घूर्णी गति
- द्रव्यमान केंद्र: दो कण, दृढ़ पिंड और एकसमान छड़ – द्रव्यमान केंद्र वह एक बिंदु है जो ऐसे चलता है मानो पूरे निकाय का सारा द्रव्यमान वहीं इकट्ठा हो। एक रेखा पर दो कणों के लिए x_cm = (m₁x₁ + m₂x₂)/(m₁ + m₂)। यह दोनों को मिलाने वाली रेखा पर, भारी कण के पास होता है। कई कणों के लिए x_cm = Σmx/Σm (y और z के लिए भी ऐसे ही)। L लंबाई की एकसमान छड़ का द्रव्यमान केंद्र L/2 पर, यानी ठीक बीच में होता है। आंतरिक बल द्रव्यमान केंद्र को नहीं हिला सकते, सिर्फ़ बाहरी बल: M·a_cm = F_ext।
- जड़त्व आघूर्ण, घूर्णन त्रिज्या और घूर्णी गति – सीधी रेखा की गति की हर राशि का एक घूमने वाला जुड़वाँ है: x का θ, v का ω, a का α, m का I, F का τ, p का L = Iω। जड़त्व आघूर्ण I = Σmr² बताता है कि पिंड का घूमना बदलना कितना कठिन है; अक्ष से दूर का द्रव्यमान इसे बहुत बढ़ाता है। घूर्णन त्रिज्या k वह दूरी है जहाँ सारा द्रव्यमान रख दें तो I वही रहे: I = Mk²। मानक मान: वलय MR², चकती ½MR², ठोस गोला ⅖MR², छड़ (बीच से) ML²/12। स्थिर α पर: ω = ω₀ + αt, θ = ω₀t + ½αt², ω² = ω₀² + 2αθ, और τ = Iα।
- बल-आघूर्ण, कोणीय संवेग और दृढ़ पिंडों का संतुलन – बल-आघूर्ण (torque) बल का घुमाने वाला असर है: τ = r × F, परिमाण rF sinθ, मात्रक N m। कोणीय संवेग संवेग का घूमने वाला रूप है: L = r × p; स्थिर अक्ष पर घूमते पिंड के लिए L = Iω। बल-आघूर्ण कोणीय संवेग बदलता है: τ = dL/dt। बाहरी बल-आघूर्ण शून्य हो तो L नहीं बदलता, इसलिए द्रव्यमान अंदर खींचने पर पिंड तेज़ घूमता है। दृढ़ पिंड संतुलन में तब है जब कुल बल शून्य (खिसकना नहीं) और किसी भी बिंदु के परितः कुल बल-आघूर्ण शून्य (घूमना नहीं) हो।
6. गुरुत्वाकर्षण
गुरुत्वाकर्षण
- गुरुत्वीय त्वरण और ऊँचाई-गहराई के साथ उसका परिवर्तन – पृथ्वी के पास मुक्त रूप से गिरती वस्तु का त्वरण g = GM/R² ≈ 9.8 m/s² है। यह गिरने वाली वस्तु के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता। ऊँचाई h पर जाने से g घटता है: g_h = g R²/(R + h)², और कम ऊँचाई पर लगभग g(1 − 2h/R)। गहराई d पर जाने से भी g घटता है: g_d = g(1 − d/R)। पृथ्वी के केंद्र पर g = 0। यानी g सतह पर सबसे ज़्यादा है।
- पलायन वेग, कक्षीय वेग और परिक्रमा करते उपग्रह की ऊर्जा – किसी चीज़ को बगल की ओर काफ़ी तेज़ फेंको तो वह पृथ्वी की ओर गिरते हुए भी ज़मीन पर नहीं पहुँचती, चक्कर लगाती रहती है: यह कक्षीय वेग है, v₀ = √(GM/r), सतह के ठीक ऊपर लगभग 7.9 km/s। और तेज़, पलायन वेग vₑ = √(2GM/R) = √(2gR) ≈ 11.2 km/s से फेंको, तो वह हमेशा के लिए पृथ्वी छोड़ देती है। vₑ = √2 × v₀। वृत्तीय कक्षा में उपग्रह की KE = GMm/2r, स्थितिज ऊर्जा = −GMm/r और कुल ऊर्जा E = −GMm/2r। कुल ऊर्जा ऋणात्मक है, यानी उपग्रह बँधा है। ऊँची कक्षा में चाल कम और समय ज़्यादा: T = 2π√(r³/GM)।
- गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा और गुरुत्वीय विभव – पृथ्वी के केंद्र से r दूरी पर द्रव्यमान m की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा U = −GMm/r है, जब अनंत पर U = 0 मानते हैं। यह ऋणात्मक है क्योंकि गुरुत्व खींचता है: वस्तु को अनंत तक ले जाने के लिए ऊर्जा देनी पड़ती है। ज़मीन के पास थोड़ी ऊँचाई h पर U में बदलाव mgh है। सतह से h ऊँचाई तक उठाने का कार्य GMm(1/R − 1/(R + h)) है। गुरुत्वीय विभव V प्रति किलोग्राम स्थितिज ऊर्जा है: V = −GM/r, मात्रक J/kg। विभव अदिश है, इसलिए कई द्रव्यमानों के विभव सीधे जुड़ते हैं।
- केप्लर के ग्रहीय गति के नियम – केप्लर ने ग्रहों की चाल के तीन नियम दिए। 1) हर ग्रह दीर्घवृत्त (ellipse) में घूमता है और सूर्य उसके एक फोकस पर होता है। 2) सूर्य से ग्रह तक की रेखा बराबर समय में बराबर क्षेत्रफल घेरती है, इसलिए ग्रह सूर्य के पास तेज़ चलता है। 3) परिक्रमण काल का वर्ग (T²) अर्ध-दीर्घ अक्ष के घन (a³) के समानुपाती है। दूसरा नियम असल में कोणीय संवेग का संरक्षण है, और तीसरा नियम न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम से निकलता है।
- न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम – ब्रह्मांड की हर वस्तु हर दूसरी वस्तु को अपनी ओर खींचती है। r दूरी पर रखे दो द्रव्यमानों m₁ और m₂ के बीच खिंचाव F = G m₁ m₂ / r² होता है। यह बल दोनों को मिलाने वाली रेखा पर लगता है। दोनों एक-दूसरे को बराबर और उलटी दिशा में खींचते हैं। G = 6.67 × 10⁻¹¹ N m² kg⁻² हर जगह एक जैसा है, इसलिए इसे सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहते हैं। कई द्रव्यमान एक वस्तु को खींचें तो बल सदिश की तरह जुड़ते हैं (अध्यारोपण)।
7. स्थूल द्रव्य के गुण
ठोसों के यांत्रिक गुण · तरलों के यांत्रिक गुण · द्रव्य के तापीय गुण
- ठोसों के यांत्रिक गुण: प्रतिबल, विकृति और प्रत्यास्थता – किसी ठोस को खींचो, दबाओ या मरोड़ो तो उसका आकार थोड़ा बदलता है। बल हटाने पर वह वापस आ जाए तो वह प्रत्यास्थ (elastic) है। अंदर का प्रत्यानयन बल ÷ क्षेत्रफल = प्रतिबल (stress)। आकार में भिन्नात्मक बदलाव (जैसे ΔL/L) = विकृति (strain)। प्रत्यास्थ सीमा तक प्रतिबल ∝ विकृति — यही हुक का नियम है। इनका अनुपात गुणांक कहलाता है: लंबाई के लिए यंग गुणांक Y, चारों ओर से दबाने पर आयतन गुणांक B, सतह खिसकाने पर दृढ़ता गुणांक G। खिंचा तार पतला भी होता है (पॉयसन अनुपात) और उसमें ऊर्जा = ½ × प्रतिबल × विकृति × आयतन जमा रहती है।
- तरलों में दाब और पास्कल का नियम – तरल (द्रव या गैस) जिस सतह को छूता है, उस पर धक्का देता है। यह लंबवत बल ÷ क्षेत्रफल = दाब, P = F/A। गुरुत्व के कारण ऊपर के तरल का भार होता है, इसलिए गहराई के साथ दाब बढ़ता है: P = P₀ + ρgh। स्थिर द्रव में एक ही गहराई पर दाब बराबर होता है, बर्तन का आकार कुछ भी हो। पास्कल का नियम: बंद तरल पर लगाया गया अतिरिक्त दाब हर जगह बराबर पहुँचता है। हाइड्रॉलिक लिफ़्ट और ब्रेक इसी पर चलते हैं: छोटे पिस्टन पर छोटा बल, बड़े पिस्टन पर बड़ा बल, F = f × A/a।
- पृष्ठ तनाव, स्पर्श कोण और केशिका उन्नयन – द्रव की सतह के अणु पड़ोसियों द्वारा अंदर की ओर खींचे जाते हैं, इसलिए सतह तनी हुई झिल्ली जैसी बर्ताव करती है। सतह के प्रति एकांक क्षेत्रफल में जमा अतिरिक्त ऊर्जा पृष्ठ ऊर्जा है, और यह पृष्ठ तनाव S (प्रति एकांक लंबाई बल, N/m) के बराबर है। जहाँ द्रव ठोस से मिलता है, स्पर्श कोण θ बताता है कि द्रव ठोस को गीला करता है (θ < 90°, जैसे काँच पर पानी) या नहीं (θ > 90°, जैसे पारा)। घुमावदार सतह के अंदर अतिरिक्त दाब होता है: बूँद या द्रव में हवा के बुलबुले में 2S/r, साबुन के बुलबुले में 4S/r। पतली नली में द्रव h = 2S cosθ / (rρg) चढ़ता (या उतरता) है।
- श्यानता, स्टोक्स का नियम और बर्नूली प्रमेय – बहता तरल एक-दूसरे पर फिसलती परतों जैसा है। परतों के बीच का घर्षण श्यानता (viscosity) है: F = ηA(dv/dx)। तरल में गिरती छोटी गेंद पर श्यान बल F = 6πηrv लगता है (स्टोक्स नियम); जब श्यान बल + उत्प्लावन बल भार के बराबर हो जाए, तो गेंद स्थिर सीमांत वेग से गिरती है। धीमा बहाव धारारेखी होता है; क्रांतिक वेग (रेनॉल्ड्स संख्या लगभग 2000) के ऊपर विक्षुब्ध। स्थिर धारारेखी प्रवाह में Av नियत (सांतत्य) और P + ½ρv² + ρgh नियत (बर्नूली)। यानी तेज़ बहाव पर दाब कम। इसी से टॉरिसेली का बहिःस्राव वेग √(2gh), वेंचुरीमीटर और पंखों व घूमती गेंद पर उत्थापक बल समझ आते हैं।
- ऊष्मा स्थानांतरण: चालन, संवहन और विकिरण – ऊष्मा तीन तरीक़ों से चलती है। चालन में ऊष्मा कण से कण तक जाती है, कण अपनी जगह रहते हैं; पट्टी से बहाव की दर H = kA(T₁ − T₂)/L, जहाँ k ऊष्मा चालकता है। संवहन में तरल ख़ुद चलता है: गरम तरल हल्का होकर ऊपर उठता है, ठंडा नीचे आता है। विकिरण में ऊष्मा विद्युतचुंबकीय तरंगों से जाती है और किसी माध्यम की ज़रूरत नहीं। कृष्णिका (blackbody) सारा विकिरण सोखती है और सबसे अच्छी उत्सर्जक है। ताप बढ़ने पर उसकी शिखर तरंगदैर्ध्य घटती है (वीन: λmT = b), और कुल उत्सर्जित शक्ति T⁴ के साथ बढ़ती है (स्टेफ़न: P = σAT⁴)। न्यूटन का शीतलन नियम: वस्तु के ठंडा होने की दर परिवेश से उसके ताप-आधिक्य के समानुपाती है।
- तापीय प्रसार, विशिष्ट ऊष्मा, कैलोरीमिति और गुप्त ऊष्मा – ताप बताता है कि वस्तु कितनी गरम है; ऊष्मा वह ऊर्जा है जो ताप के अंतर के कारण बहती है। ज़्यादातर चीज़ें गरम होकर फैलती हैं: ΔL = αLΔT, ΔA = βAΔT, ΔV = γVΔT, जहाँ β = 2α और γ = 3α। पानी 0 °C से 4 °C के बीच अपवाद है: गरम करने पर सिकुड़ता है, इसलिए 4 °C पर सबसे घना। किसी वस्तु को गरम करने की ऊष्मा Q = mcΔT, जहाँ c विशिष्ट ऊष्मा है; गैसों की दो होती हैं, Cp > Cv, और प्रति मोल Cp − Cv = R। कैलोरीमिति में गरम वस्तुओं की खोई ऊष्मा = ठंडी वस्तुओं की पाई ऊष्मा। पिघलते या उबलते समय ताप स्थिर रहता है और ऊष्मा Q = mL अवस्था बदलने में लगती है।
8. ऊष्मागतिकी
ऊष्मागतिकी
- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम: निकाय, ऊष्मा, कार्य और ΔU – ऊष्मागतिकी ऊर्जा का हिसाब रखती है। जिस भाग को हम पढ़ते हैं वह निकाय है, बाकी सब परिवेश, और दोनों के बीच की दीवार परिसीमा। निकाय खुला, बंद या विलगित हो सकता है। आंतरिक ऊर्जा U निकाय में भरी कुल ऊर्जा है। यह केवल दो तरह से बदलती है: ऊष्मा q से या कार्य w से। प्रथम नियम: ΔU = q + w (IUPAC नियम: निकाय में आने वाली ऊर्जा धनात्मक)। U अवस्था फलन है; q और w पथ फलन हैं। स्थिर बाहरी दाब पर प्रसार में w = −p_ext ΔV; आदर्श गैस के उत्क्रमणीय समतापी प्रसार में w = −2.303 nRT log(V₂/V₁)।
- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम – आंतरिक ऊर्जा U निकाय के अंदर के अणुओं की कुल ऊर्जा है। यह दो ही तरीकों से बदलती है: ऊष्मा Q (ताप के अंतर से बहने वाली ऊर्जा) और कार्य W (बल से दी गई ऊर्जा, जैसे खिसकता पिस्टन)। प्रथम नियम: ΔQ = ΔU + ΔW. गैस को दी गई ऊष्मा का एक भाग आंतरिक ऊर्जा बढ़ाता है, बाकी से गैस कार्य करती है। स्थिर दाब पर कार्य PΔV है। आदर्श गैस के लिए Cp − Cv = R.
- ऊष्मागतिक प्रक्रम: समतापी, रुद्धोष्म और अन्य – ऊष्मागतिक प्रक्रम गैस को एक अवस्था से दूसरी में ले जाता है; P–V ग्राफ पर यह एक रास्ता है। समतापी: T स्थिर, PV = नियत, W = nRT ln(V₂/V₁), ΔU = 0. रुद्धोष्म: ऊष्मा का लेन-देन नहीं, PV^γ = नियत, W = nR(T₁ − T₂)/(γ − 1), फैलने पर गैस ठंडी होती है। समदाबी: P स्थिर, W = PΔV. समआयतनिक: V स्थिर, W = 0. उत्क्रमणीय प्रक्रम धीरे-धीरे साम्य अवस्थाओं से गुज़रते हैं; वास्तविक, तेज़ प्रक्रम अनुत्क्रमणीय हैं। चक्रीय प्रक्रम में गैस शुरुआत पर लौटती है, ΔU = 0 और नेट कार्य = लूप का क्षेत्रफल।
- ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम, ऊष्मा इंजन और प्रशीतक – प्रथम नियम कहता है ऊर्जा संरक्षित है; द्वितीय नियम बताता है ऊष्मा और ऊर्जा किस दिशा में जा सकती है। ऊष्मा अपने-आप केवल गरम से ठंडे की ओर बहती है (क्लॉसियस)। कोई इंजन ली गई सारी ऊष्मा को कार्य में नहीं बदल सकता; कुछ ठंडी वस्तु में फेंकनी पड़ती है (केल्विन–प्लांक)। ऊष्मा इंजन गरम स्रोत से Q₁ लेता है, कार्य W करता है, Q₂ छोड़ता है: दक्षता η = W/Q₁ = 1 − Q₂/Q₁. प्रशीतक कार्य W से ठंडे से गरम में Q₂ ले जाता है: COP α = Q₂/W. सबसे अच्छे, कार्नो इंजन के लिए η = 1 − T₂/T₁.
- तापीय साम्य और शून्यवाँ नियम – दो वस्तुएँ छूती हैं तो ऊष्मा का लेन-देन तब तक होता है जब तक उनका ताप बराबर न हो जाए। तब वे तापीय साम्य में होती हैं। शून्यवाँ नियम: यदि A और B दोनों अलग-अलग C के साथ तापीय साम्य में हैं, तो A और B भी आपस में तापीय साम्य में हैं। थर्मामीटर इसी नियम से काम करता है। साम्य में गैस को अवस्था चरों P, V, T, n से बताते हैं, जो अवस्था समीकरण से जुड़े हैं। आदर्श गैस के लिए PV = nRT.
9. आदर्श गैसों का व्यवहार और गैसों का अणुगति सिद्धांत
अणुगति सिद्धांत
- स्वातंत्र्य कोटि, ऊर्जा का समविभाजन और विशिष्ट ऊष्माएँ – स्वातंत्र्य कोटि (degree of freedom) वह एक स्वतंत्र तरीका है जिससे अणु चल सकता है और ऊर्जा रख सकता है। एक परमाणु सिर्फ़ x, y, z में चल सकता है (f = 3)। O₂ जैसा डम्बल अणु दो अक्षों पर घूम भी सकता है (f = 5), और बहुत गर्म होने पर कंपन भी करता है (2 और)। ऊर्जा के समविभाजन का नियम कहता है कि ऊष्मीय संतुलन में हर स्वातंत्र्य कोटि को औसतन ½kT ऊर्जा मिलती है (कंपन को kT, क्योंकि उसमें गतिज और स्थितिज दोनों हैं)। इसलिए एक मोल की ऊर्जा U = (f/2)RT, Cv = (f/2)R, Cp = Cv + R और γ = 1 + 2/f। ठोस में हर परमाणु 3 दिशाओं में कंपन करता है, इसलिए C = 3R।
- आदर्श गैस समीकरण PV = nRT और गैस को दबाने में कार्य – गैस अनगिनत छोटे-छोटे अणुओं से बनी है जो हर तरफ़ भागते रहते हैं। दीवारों पर उनकी टक्कर से दाब बनता है। कम घनत्व वाली गैस के लिए तीन आसान नियम हैं: ताप स्थिर हो तो P × V स्थिर (बॉयल); दाब स्थिर हो तो V केल्विन ताप के साथ बढ़ता है (चार्ल्स); एक जैसे P और T पर बराबर आयतन में बराबर अणु (आवोगाद्रो)। तीनों मिलकर बनते हैं PV = nRT = N k T। एक मोल में 6.022 × 10²³ कण होते हैं, यही आवोगाद्रो संख्या है। पिस्टन को अंदर धकेलने में गैस पर कार्य होता है; यह कार्य P–V ग्राफ़ के नीचे के क्षेत्रफल के बराबर है, और स्थिर ताप पर W = nRT ln(V₁/V₂)।
- गैसों का अणुगति सिद्धांत: दाब, ताप और वर्ग-माध्य-मूल चाल – अणुगति सिद्धांत गैस को बहुत छोटे, तेज़, बेतरतीब चलते अणुओं का समूह मानता है, जो प्रत्यास्थ रूप से टकराते हैं और एक-दूसरे को खींचते नहीं। दीवार से टकराने पर अणु का वेग उलटता है और दीवार को 2mvₓ संवेग मिलता है। सब अणुओं की टक्करें जोड़ने पर दाब P = ⅓ n m v̄² = ⅓ ρ v̄² आता है। इसे PV = N k T से मिलाने पर एक अणु की औसत गतिज ऊर्जा (3/2) k T मिलती है: ताप अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा का माप है। वर्ग-माध्य-मूल चाल v_rms = √(3RT/M) है, इसलिए समान ताप पर हल्की गैस तेज़ चलती है।
- गैस अणुओं का माध्य मुक्त पथ – गैस के अणु बहुत तेज़ हैं, फिर भी गंध धीरे फैलती है, क्योंकि हर अणु बार-बार दूसरों से टकराकर दिशा बदलता है। दो टक्करों के बीच अणु जितनी औसत दूरी तय करता है, वह उसका माध्य मुक्त पथ λ है। व्यास d वाला अणु हर उस अणु से टकराता है जिसका केंद्र उसके रास्ते से d के भीतर आए, यानी वह πd² अनुप्रस्थ काट वाली टक्कर नली बनाता है। इस नली के अणु गिनने पर λ = 1/(√2 n π d²) = k_BT/(√2 π d² P) मिलता है। भीड़ ज़्यादा (n या P बड़ा) या अणु बड़े हों तो λ छोटा; कम दाब और ऊँचे ताप पर λ लंबा। कमरे की हवा में λ लगभग 0.1 माइक्रोमीटर है।
10. दोलन और तरंगें
दोलन · तरंगें
- सरल आवर्त गति (SHM) – जो गति तय समय के बाद बार-बार दोहराती है, वह आवर्ती गति है। अगर वस्तु बीच की जगह के इधर-उधर आती-जाती है और वापस खींचने वाला बल दूरी के अनुपात में है (F = −kx), तो वह सरल आवर्त गति है। इसकी स्थिति x = A sin(ωt + φ) है, जहाँ ω = 2π/T = 2πf। बीच में चाल सबसे ज़्यादा, सिरों पर त्वरण सबसे ज़्यादा, और कुल ऊर्जा ½kA² हमेशा वही रहती है।
- स्प्रिंग के दोलन और सरल लोलक – स्प्रिंग से बँधा गुटका F = −kx का खिंचाव महसूस करता है, जहाँ k बल नियतांक (कठोरता) है। यह SHM करता है, T = 2π√(m/k)। सरल लोलक छोटे झूलों में mg sinθ ≈ mgθ का खिंचाव महसूस करता है और SHM करता है, T = 2π√(L/g)। लोलक का आवर्तकाल गोलक के द्रव्यमान पर और (छोटे झूलों में) आयाम पर निर्भर नहीं करता।
- विस्पंद – जब थोड़ी अलग आवृत्तियों f₁ और f₂ वाली दो ध्वनियाँ साथ सुनाई देती हैं, तो वे अध्यारोपण से जुड़ती हैं। आवाज़ नियमित रूप से तेज़ और धीमी होती है। हर तेज़ होना एक विस्पंद है। हर सेकंड विस्पंदों की संख्या = विस्पंद आवृत्ति, f = |f₁ − f₂|। विस्पंद से वाद्य मिलाए जाते हैं और अज्ञात आवृत्ति निकाली जाती है।
- प्रगामी तरंगें: प्रकार, चाल और समीकरण – तरंग ऊर्जा को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती है, पदार्थ को नहीं। अनुप्रस्थ तरंग में कण तरंग की दिशा के लंबवत हिलते हैं; अनुदैर्ध्य में उसी दिशा में। चाल v = fλ। डोरी पर v = √(T/μ); गैस में ध्वनि के लिए v = √(γP/ρ)। +x की ओर जाती तरंग y = A sin(kx − ωt), जहाँ k = 2π/λ और ω = 2πf।
- अध्यारोपण, परावर्तन और अप्रगामी तरंगें – जब तरंगें मिलती हैं तो उनके विस्थापन जुड़ जाते हैं (अध्यारोपण)। बंधे सिरे से लौटी तरंग उलटी हो जाती है; खुले सिरे से सीधी लौटती है। तरंग और उसकी परावर्तित तरंग मिलकर अप्रगामी तरंग बनाती हैं, जिसमें निस्पंद (बिल्कुल न हिलने वाले बिंदु) और प्रस्पंद (सबसे ज़्यादा हिलने वाले) होते हैं। दोनों सिरे बंधी डोरी: fₙ = n·v/2L। खुला पाइप: fₙ = n·v/2L; एक सिरा बंद पाइप: सिर्फ़ विषम संनादी, fₙ = n·v/4L (n = 1, 3, 5…)।