द्वितीय नियम की ज़रूरत क्यों
प्रथम नियम कई ऐसी बातें होने देता है जो कभी नहीं होतीं। चाय का कप ठंडे कमरे से ऊष्मा लेकर और गरम हो सकता था; ऊर्जा तब भी संरक्षित रहती। जहाज़ समुद्र से ऊष्मा लेकर पूरी को कार्य में बदलकर चल सकता था। ऐसा कभी नहीं होता।
ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम प्राकृतिक प्रक्रमों की दिशा बताता है और यह सीमा तय करता है कि कितनी ऊष्मा कार्य बन सकती है।
ऊष्मा इंजन और दक्षता
ऊष्मा इंजन वह युक्ति है जो चक्र में चलकर बार-बार ऊष्मा को कार्य में बदलती है। इसके तीन भाग:
- गरम भंडार (स्रोत) T₁ पर, जो ऊष्मा Q₁ देता है;
- कार्यकारी पदार्थ (गैस, भाप) जो चक्र घूमकर कार्य W करता है;
- ठंडा भंडार (सिंक/अभिगम) T₂ पर, जो छोड़ी गई ऊष्मा Q₂ लेता है।
चक्र में ΔU = 0, इसलिए प्रथम नियम से W = Q₁ − Q₂.
दक्षता η = W/Q₁ = 1 − Q₂/Q₁.
उदाहरण: भाप इंजन, पेट्रोल और डीज़ल इंजन, ताप बिजलीघर।
प्रशीतक और ऊष्मा पंप
प्रशीतक उल्टा चलाया गया ऊष्मा इंजन है। कंप्रेसर का कार्य W, गैस से ठंडे अंदर से ऊष्मा Q₂ लिवाता है और गरम कमरे को Q₁ = Q₂ + W देता है।
निष्पादन गुणांक α = Q₂/W = Q₂/(Q₁ − Q₂).
α, 1 से अधिक हो सकता है (साधारण फ्रिज: 2–6), पर अनंत नहीं, क्योंकि W कभी शून्य नहीं हो सकता। ऊष्मा पंप इसी विचार से ठंडी बाहरी हवा की ऊष्मा लेकर कमरा गरम करता है।
द्वितीय नियम के कथन
केल्विन–प्लांक कथन
ऐसा कोई प्रक्रम संभव नहीं जिसका एकमात्र परिणाम किसी भंडार से ऊष्मा लेकर उसे पूरी तरह कार्य में बदलना हो। यानी कोई इंजन 100% दक्ष नहीं; उसे कुछ ऊष्मा Q₂ ठंडी वस्तु को देनी ही होगी।
क्लॉसियस कथन
ऐसा कोई प्रक्रम संभव नहीं जिसका एकमात्र परिणाम ठंडी वस्तु से गरम वस्तु में ऊष्मा पहुँचाना हो। यानी आदर्श प्रशीतक (W = 0) असंभव; ऊष्मा ऊपर तभी चढ़ती है जब कार्य किया जाए।
दोनों एक ही बात कहते हैं
यदि आदर्श इंजन होता, तो उसके कार्य से फ्रिज चलाते और दोनों मिलकर बिना बाहरी कार्य के ठंडे से गरम में ऊष्मा पहुँचाते, जो क्लॉसियस को तोड़ता। एक को तोड़ो तो दूसरा टूटता है: दोनों तुल्य हैं।
कार्नो इंजन और कार्नो प्रमेय
कार्नो इंजन T₁ स्रोत और T₂ सिंक के बीच एक आदर्श उत्क्रमणीय इंजन है। इसकी गैस कार्नो चक्र घूमती है:
- T₁ पर समतापी प्रसार (Q₁ लेती है),
- रुद्धोष्म प्रसार (T₁ → T₂),
- T₂ पर समतापी संपीडन (Q₂ देती है),
- रुद्धोष्म संपीडन (T₂ → T₁), शुरुआत पर वापस।
इस चक्र के लिए Q₂/Q₁ = T₂/T₁, इसलिए
η(कार्नो) = 1 − T₂/T₁ (T केल्विन में)।
कार्नो प्रमेय: (क) दो दिए तापों के बीच कोई इंजन कार्नो इंजन से अधिक दक्ष नहीं हो सकता; (ख) उन्हीं तापों के बीच सभी उत्क्रमणीय इंजनों की दक्षता बराबर है, कार्यकारी पदार्थ कोई भी हो।
η = 1 केवल T₂ = 0 K पर, जो प्राप्त नहीं हो सकता, इसलिए 100% दक्षता असंभव। कार्नो फ्रिज के लिए α = T₂/(T₁ − T₂)।
परीक्षा टिप: 2–3 अंक में दोनों कथन, दक्षता/COP के प्रश्न और कार्नो चक्र के चार चरण पूछे जाते हैं।
करके देखो
चलते फ्रिज की पीछे की जाली के पास हाथ रखो (तार मत छूना)। गरम है: यही Q₁ = Q₂ + W रसोई में छोड़ी जा रही है। 3D में T₂ को T₁ के पास ले जाओ और देखो कार्नो दक्षता शून्य की ओर गिरती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- इंजन: W = Q₁ − Q₂
- दक्षता η = W/Q₁ = 1 − Q₂/Q₁
- कार्नो: η = 1 − T₂/T₁ (T केल्विन में)
- कार्नो: Q₂/Q₁ = T₂/T₁
- प्रशीतक: α = Q₂/W = Q₂/(Q₁ − Q₂)
- कार्नो प्रशीतक: α = T₂/(T₁ − T₂)
हल किए गए उदाहरण
1. इंजन प्रति चक्र 1000 J ऊष्मा लेता है और 300 J कार्य करता है। दक्षता और छोड़ी गई ऊष्मा?
η = 300/1000 = 30%. Q₂ = 1000 − 300 = 700 J.
2. इंजन हर 800 J लेने पर 600 J छोड़ता है। दक्षता?
η = 1 − 600/800 = 0.25 = 25%.
3. 127 °C और 27 °C के बीच कार्नो इंजन की दक्षता?
T₁ = 400 K, T₂ = 300 K. η = 1 − 300/400 = 25%.
4. फ्रिज 100 J कार्य से अंदर से 300 J निकालता है। COP और कमरे को दी ऊष्मा?
α = 300/100 = 3. Q₁ = 300 + 100 = 400 J.
5. 300 K सिंक वाले कार्नो इंजन की दक्षता 40% है। स्रोत का ताप?
0.4 = 1 − 300/T₁ ⇒ T₁ = 500 K (227 °C)।
6. कार्नो फ्रिज फ्रीज़र को −23 °C पर रखता है, कमरा 27 °C. COP? फ्रीज़र से 5000 J निकालने को कितना कार्य?
T₂ = 250 K, T₁ = 300 K. α = 250/50 = 5. W = 5000/5 = 1000 J.
7. एक आविष्कारक 500 K और 300 K के बीच इंजन का दावा करता है जो 1000 J लेकर 450 J कार्य देता है। क्या संभव है?
अधिकतम (कार्नो) η = 1 − 300/500 = 40%, यानी अधिकतम 400 J. 450 J (45%) का दावा द्वितीय नियम तोड़ता है। संभव नहीं।
आम गलतियाँ
- η = 1 − T₂/T₁ में °C डालना। पहले केल्विन में बदलो।
- यह सोचना कि बेहतर डिज़ाइन से 100% दक्षता मिल सकती है। द्वितीय नियम किसी इंजन के लिए इसकी अनुमति नहीं देता।
- इंजन की दक्षता (W/Q₁, हमेशा 1 से कम) और फ्रिज के COP (Q₂/W, 1 से अधिक हो सकता है) को मिला देना।
- यह सोचना कि क्लॉसियस के अनुसार ऊष्मा कभी ठंडे से गरम नहीं जा सकती। जा सकती है, पर केवल कार्य देने पर (फ्रिज, AC)।