National Year 13 Physics
अध्याय: 8
1. 3.6 Further mechanics and thermal physics
3.6.1 Periodic motion · 3.6.2 Thermal physics
- सरल आवर्त गति (SHM) – जो गति तय समय के बाद बार-बार दोहराती है, वह आवर्ती गति है। अगर वस्तु बीच की जगह के इधर-उधर आती-जाती है और वापस खींचने वाला बल दूरी के अनुपात में है (F = −kx), तो वह सरल आवर्त गति है। इसकी स्थिति x = A sin(ωt + φ) है, जहाँ ω = 2π/T = 2πf। बीच में चाल सबसे ज़्यादा, सिरों पर त्वरण सबसे ज़्यादा, और कुल ऊर्जा ½kA² हमेशा वही रहती है।
- गैसों का अणुगति सिद्धांत: दाब, ताप और वर्ग-माध्य-मूल चाल – अणुगति सिद्धांत गैस को बहुत छोटे, तेज़, बेतरतीब चलते अणुओं का समूह मानता है, जो प्रत्यास्थ रूप से टकराते हैं और एक-दूसरे को खींचते नहीं। दीवार से टकराने पर अणु का वेग उलटता है और दीवार को 2mvₓ संवेग मिलता है। सब अणुओं की टक्करें जोड़ने पर दाब P = ⅓ n m v̄² = ⅓ ρ v̄² आता है। इसे PV = N k T से मिलाने पर एक अणु की औसत गतिज ऊर्जा (3/2) k T मिलती है: ताप अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा का माप है। वर्ग-माध्य-मूल चाल v_rms = √(3RT/M) है, इसलिए समान ताप पर हल्की गैस तेज़ चलती है।
2. 3.7 Fields and their consequences
3.7.1 Fields · 3.7.2 Gravitational fields · 3.7.3 Electric fields · 3.7.4 Capacitance · 3.7.5 Magnetic fields
- क्षेत्र और बल – कुछ बलों के लिए छूना ज़रूरी है, जैसे हाथ से धक्का। पर कुछ बल खाली जगह के पार भी लगते हैं: गुरुत्व, विद्युत बल और चुंबकीय बल। इन्हें समझाने के लिए हम क्षेत्र (field) की बात करते हैं: किसी वस्तु के चारों ओर वह जगह जहाँ दूसरी वस्तु बल महसूस करती है। द्रव्यमान से गुरुत्वीय क्षेत्र, आवेश से विद्युत क्षेत्र और चुंबक या धारा से चुंबकीय क्षेत्र बनता है। क्षेत्र रेखाओं का तीर बल की दिशा बताता है; पास-पास रेखाएँ मतलब तेज़ क्षेत्र। गुरुत्व और विद्युत बल व्युत्क्रम वर्ग नियम मानते हैं: दूरी दोगुनी, बल चौथाई। क्षेत्र ऊर्जा भी जमा करते हैं। प्रकृति के सारे बल चार मूल बलों से आते हैं।
- न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम – ब्रह्मांड की हर वस्तु हर दूसरी वस्तु को अपनी ओर खींचती है। r दूरी पर रखे दो द्रव्यमानों m₁ और m₂ के बीच खिंचाव F = G m₁ m₂ / r² होता है। यह बल दोनों को मिलाने वाली रेखा पर लगता है। दोनों एक-दूसरे को बराबर और उलटी दिशा में खींचते हैं। G = 6.67 × 10⁻¹¹ N m² kg⁻² हर जगह एक जैसा है, इसलिए इसे सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहते हैं। कई द्रव्यमान एक वस्तु को खींचें तो बल सदिश की तरह जुड़ते हैं (अध्यारोपण)।
- वैद्युत आवेश तथा क्षेत्र – आवेश दो तरह का होता है, संरक्षित रहता है और e = 1.6 × 10⁻¹⁹ C के पूरे पैकेटों में आता है। दो बिंदु आवेश F = kq₁q₂/r² बल से धकेलते या खींचते हैं (k = 9 × 10⁹ N m² C⁻²)। कई आवेशों के बल और क्षेत्र सदिश की तरह जुड़ते हैं (अध्यारोपण)। बिंदु आवेश का क्षेत्र E = kq/r² है। द्विध्रुव (±q, दूरी 2a) का आघूर्ण p = q·2a है; एकसमान क्षेत्र में उस पर कुल बल शून्य पर बल-आघूर्ण τ = pE sinθ होता है। फ्लक्स Φ = E·A, और गाउस नियम: किसी बंद सतह से कुल फ्लक्स = अंदर का आवेश/ε₀। इससे तार (λ/2πε₀r), समतल चादर (σ/2ε₀) और पतले गोलीय कोश (बाहर kq/r², अंदर 0) का क्षेत्र मिलता है।
- स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता – किसी बिंदु पर विभव V = इकाई धन आवेश को अनंत से उस बिंदु तक लाने में किया गया कार्य। बिंदु आवेश के लिए V = kq/r; कई आवेशों के विभव सीधे (अदिश) जुड़ते हैं। विभवांतर V_B − V_A = W/q। समविभव सतहों पर V बराबर होता है; E उनके लंबवत और E = −dV/dr। दो आवेशों की स्थितिज ऊर्जा U = kq₁q₂/r, द्विध्रुव की U = −pE cosθ। चालक में मुक्त आवेश (अंदर E = 0), परावैद्युत में बंधे आवेश ध्रुवित होकर क्षेत्र को E₀/K कर देते हैं। संधारित्र Q = CV; समांतर प्लेट C = ε₀A/d, परावैद्युत के साथ KC। श्रेणी: 1/C = 1/C₁ + 1/C₂ + …; पार्श्व: C = C₁ + C₂ + …। संचित ऊर्जा U = ½CV² = Q²/2C।
- विद्युत चुंबकीय प्रेरण – जब किसी कुंडली से गुजरने वाला चुंबकीय फ्लक्स बदलता है, तो उसमें emf पैदा होता है: ε = −N dΦ/dt (फैराडे)। ऋण चिह्न लेन्ज़ का नियम है: प्रेरित धारा हमेशा उस बदलाव का विरोध करती है जिससे वह बनी। चुंबकीय क्षेत्र में छड़ चलाने पर गतिक emf ε = Blv मिलता है। बदलती धारा अपनी ही कुंडली में (स्वप्रेरण, L) और पास की कुंडली में (अन्योन्य प्रेरण, M) emf बनाती है।
- धारावाही चालक पर बल, विद्युत मोटर और प्रेरण – चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही तार पर एक धक्का यानी बल लगता है। तार क्षेत्र से 90° पर हो तो बल सबसे ज़्यादा, और क्षेत्र के समांतर हो तो शून्य। बल की दिशा फ्लेमिंग के वामहस्त नियम से मिलती है। मोटर इसी बल से कुंडली घुमाती है; जनित्र उल्टा काम करके गति से धारा बनाता है।
3. 3.8 Nuclear physics
3.8.1 Radioactivity
- रेडियोधर्मिता: अल्फ़ा, बीटा, गामा और अर्ध-आयु – कुछ परमाणुओं के नाभिक अस्थायी होते हैं। वे स्थायी बनने के लिए अपने आप, यादृच्छिक ढंग से विकिरण छोड़ते हैं। इसे रेडियोधर्मी क्षय कहते हैं। अल्फ़ा (2 प्रोटॉन + 2 न्यूट्रॉन), बीटा (तेज़ इलेक्ट्रॉन) और गामा (ऊर्जा की तरंग) मुख्य तीन प्रकार हैं। अर्ध-आयु वह समय है जिसमें आधे अस्थायी नाभिक क्षय हो जाते हैं।
4. 3.9 Astrophysics
3.9.1 Telescopes · 3.9.2 Classification of stars · 3.9.3 Cosmology
- प्रकाशिक यंत्र: सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शक – कोई चीज़ कितनी बड़ी दिखती है, यह आँख पर बने कोण पर निर्भर है। सरल सूक्ष्मदर्शी (एक उत्तल लेंस) m = 1 + D/f (प्रतिबिंब D पर) या D/f (अनंत पर) देता है। संयुक्त सूक्ष्मदर्शी में छोटी फोकस दूरी का अभिदृश्यक और नेत्रिका: m = mₒ × mₑ ≈ (L/fₒ)(D/fₑ)। खगोलीय दूरदर्शक में लंबी फोकस दूरी का अभिदृश्यक और छोटी की नेत्रिका: सामान्य समायोजन में m = fₒ/fₑ, नली की लंबाई fₒ + fₑ। परावर्ती दूरदर्शक में अभिदृश्यक अवतल दर्पण होता है।
- ब्रह्मांड विज्ञान: फैलता ब्रह्मांड और बिग बैंग – ब्रह्मांड विज्ञान (कॉस्मोलॉजी) पूरे ब्रह्मांड की बनावट, इतिहास और भविष्य का अध्ययन है। आकाशगंगाएँ समूहों, गुच्छों और तंतुओं में विशाल रिक्तियों के चारों ओर जुटती हैं। दूर की आकाशगंगाएँ हमसे दूर जा रही हैं, और जितनी दूर उतनी तेज़ (हबल का नियम, v = H₀d), क्योंकि अंतरिक्ष ख़ुद फैल रहा है। इस फैलाव को उल्टा चलाने पर लगभग 13.8 अरब साल पहले की गर्म, घनी शुरुआत मिलती है: बिग बैंग। इसके मुख्य प्रमाण हैं रेडशिफ़्ट, कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड और हाइड्रोजन-हीलियम की मात्रा। ब्रह्मांड का ज़्यादातर हिस्सा डार्क मैटर और डार्क एनर्जी है।
5. 3.10 Medical physics
3.10.1 Physics of the eye · 3.10.2 Physics of the ear · 3.10.3 Biological measurement · 3.10.4 Non-ionising imaging · 3.10.5 X-ray imaging · 3.10.6 Radionuclide imaging and therapy
- आँख का भौतिकी: हम कैसे देखते हैं और लेंस दृष्टि कैसे सुधारते हैं – आँख एक अभिसारी (converging) लेंस तंत्र है: ज़्यादातर मोड़ कॉर्निया पर होता है और लेंस फ़ोकस को बारीकी से ठीक करता है (समंजन)। रोशनी रेटिना पर पड़ती है, जहाँ छड़ें कम रोशनी में संवेदनशील पर कम बारीक दृष्टि देती हैं और तीन तरह के शंकु रंग और बारीकी देते हैं। सामान्य आँख का निकट बिंदु लगभग 25 cm और दूर बिंदु अनंत है। निकट-दृष्टि (आँख लंबी) अवतल लेंस से ठीक होती है जिसकी f = −दूर बिंदु; दूर-दृष्टि (आँख छोटी) उत्तल लेंस से; दृष्टिवैषम्य बेलनाकार लेंस से। लेंस की क्षमता P = 1/f डायोप्टर (D) में; सटे पतले लेंसों की क्षमताएँ जुड़ती हैं।
- कान की भौतिकी – कान हवा के दबाव की छोटी-छोटी तरंगों को नस के संकेतों में बदलता है। कान का पर्दा कंपन करता है, तीन छोटी हड्डियाँ (अस्थिकाएँ) लीवर का काम करती हैं, और पर्दा अंडाकार खिड़की से बहुत बड़ा होने से दबाव लगभग 20 गुना बढ़ जाता है। कोक्लिया में बेसिलर झिल्ली आवृत्ति के अनुसार अलग जगह पर कंपन करती है: ऊँची आवृत्ति आधार (base) पर, नीची शिखर (apex) पर। स्वस्थ युवा कान लगभग 20 Hz से 20 kHz सुनता है और 2–5 kHz पर सबसे संवेदनशील है। 1 kHz पर श्रवण दहलीज़ I₀ = 1.0 × 10⁻¹² W m⁻² है। तीव्रता स्तर L = 10 log₁₀(I/I₀) dB। उम्र से (ऊँची आवृत्तियाँ) और तेज़ शोर से (4 kHz के पास गड्ढा) सुनना कमज़ोर होता है।
- जैविक मापन: ECG – इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ECG) हृदय की मांसपेशी के विध्रुवण और पुनर्ध्रुवण से बनी छोटी वोल्टताओं को रिकॉर्ड करता है। त्वचा पर जेल के साथ लगे इलेक्ट्रोड लगभग 1 mV पकड़ते हैं। ऊँचे इनपुट प्रतिरोध वाला एम्पलीफ़ायर संकेत को लगभग 1000 गुना करता है, और इसे समय के साथ दिखाया जाता है। सामान्य धड़कन में P तरंग (आलिंद विध्रुवित), QRS संकुल (निलय विध्रुवित) और T तरंग (निलय पुनर्ध्रुवित) होती है। दो R चोटियों के बीच का समय एक धड़कन है; हृदय गति = 60 ÷ R–R (सेकंड)।
- अनआयनकारी इमेजिंग – अल्ट्रासाउंड, एंडोस्कोप और MRI से डॉक्टर बिना X-किरण या गामा किरण के शरीर के अंदर देखते हैं, इसलिए आयनन से नुक़सान नहीं होता। अल्ट्रासाउंड में पीज़ोइलेक्ट्रिक प्रोब 1–15 MHz की छोटी पल्स भेजता है; सीमाओं से गूँज लौटती है। गहराई = c t ÷ 2 और परावर्तित भाग ध्वनिक प्रतिबाधा Z = ρc पर निर्भर है: R = (Z₂ − Z₁)² ÷ (Z₂ + Z₁)²। जेल हवा हटाता है जो लगभग सब कुछ लौटा देती। एंडोस्कोप में प्रकाशीय तंतु हैं: प्रकाश पूर्ण आंतरिक परावर्तन से कोर में रहता है। अव्यवस्थित गुच्छा रोशनी अंदर ले जाता है; व्यवस्थित गुच्छा चित्र बाहर लाता है। MRI में तेज़ चुंबकीय क्षेत्र हाइड्रोजन नाभिकों को सीध में लाता है, वे लार्मर आवृत्ति पर पुरस्सरण करते हैं; रेडियो पल्स उन्हें झुकाती है और लौटते समय वे जो रेडियो संकेत देते हैं उससे कोमल ऊतकों का बारीक चित्र बनता है।
- X-किरण इमेजिंग (X-ray Imaging) – X-किरणें बहुत छोटी तरंगदैर्ध्य वाली विद्युतचुंबकीय तरंगें हैं। X-किरण ट्यूब में ऊँची वोल्टता इलेक्ट्रॉनों को तेज़ करती है और वे धातु के लक्ष्य से टकराकर X-किरणें देते हैं। शरीर के अलग-अलग भाग इन्हें अलग मात्रा में सोखते हैं: तीव्रता I = I₀e^(−μx) से घटती है। हड्डी ज़्यादा सोखती है, इसलिए सफ़ेद दिखती है। कंट्रास्ट माध्यम, डिजिटल डिटेक्टर और CT स्कैनर चित्र को साफ़ और त्रि-आयामी बनाते हैं।
- रेडियोन्यूक्लाइड इमेजिंग और उपचार – रेडियोन्यूक्लाइड इमेजिंग में एक रेडियोधर्मी ट्रेसर शरीर में दिया जाता है; वह किसी अंग में जमा होकर गामा किरणें देता है जिन्हें गामा कैमरा पकड़ता है। सबसे ज़्यादा उपयोग टेक्नीशियम-99m का होता है: केवल गामा, 140 keV, भौतिक अर्ध-आयु 6 घंटे, कई रसायनों से आसानी से जुड़ता है। शरीर में मात्रा क्षय से (भौतिक अर्ध-आयु Tp) और शरीर द्वारा बाहर निकालने से (जैविक अर्ध-आयु Tb) घटती है: 1/Te = 1/Tp + 1/Tb। गामा कैमरा में सीसे का कोलिमेटर, सोडियम आयोडाइड क्रिस्टल, फ़ोटोमल्टीप्लायर ट्यूब और कंप्यूटर होते हैं। उपचार में रैखिक त्वरक (linac) से MeV X-किरणें कई दिशाओं से ट्यूमर पर मिलाई जाती हैं, या रेडियोधर्मी इम्प्लांट (ब्रैकीथेरेपी) सीधे ट्यूमर में रखे जाते हैं। हर इमेजिंग विधि (X-किरण, CT, अल्ट्रासाउंड, MRI, गामा कैमरा, PET) के अपने लाभ, ख़र्च और जोखिम हैं।
6. 3.11 Engineering physics
3.11.1 Rotational dynamics · 3.11.2 Thermodynamics and engines
- जड़त्व आघूर्ण, घूर्णन त्रिज्या और घूर्णी गति – सीधी रेखा की गति की हर राशि का एक घूमने वाला जुड़वाँ है: x का θ, v का ω, a का α, m का I, F का τ, p का L = Iω। जड़त्व आघूर्ण I = Σmr² बताता है कि पिंड का घूमना बदलना कितना कठिन है; अक्ष से दूर का द्रव्यमान इसे बहुत बढ़ाता है। घूर्णन त्रिज्या k वह दूरी है जहाँ सारा द्रव्यमान रख दें तो I वही रहे: I = Mk²। मानक मान: वलय MR², चकती ½MR², ठोस गोला ⅖MR², छड़ (बीच से) ML²/12। स्थिर α पर: ω = ω₀ + αt, θ = ω₀t + ½αt², ω² = ω₀² + 2αθ, और τ = Iα।
- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम – आंतरिक ऊर्जा U निकाय के अंदर के अणुओं की कुल ऊर्जा है। यह दो ही तरीकों से बदलती है: ऊष्मा Q (ताप के अंतर से बहने वाली ऊर्जा) और कार्य W (बल से दी गई ऊर्जा, जैसे खिसकता पिस्टन)। प्रथम नियम: ΔQ = ΔU + ΔW. गैस को दी गई ऊष्मा का एक भाग आंतरिक ऊर्जा बढ़ाता है, बाकी से गैस कार्य करती है। स्थिर दाब पर कार्य PΔV है। आदर्श गैस के लिए Cp − Cv = R.
7. 3.12 Turning points in physics
3.12.1 The discovery of the electron · 3.12.2 Wave-particle duality · 3.12.3 Special relativity
- इलेक्ट्रॉन की खोज – कम दाब की विसर्जन नलियों में कैथोड से किरणें निकलती थीं। ये कैथोड किरणें सीधी रेखा में चलती हैं, ऋण आवेश ले जाती हैं और विद्युत व चुंबकीय क्षेत्रों से मुड़ती हैं। इलेक्ट्रॉन गन में गरम तंतु तापायनिक उत्सर्जन से इलेक्ट्रॉन छोड़ता है और एनोड वोल्टता V उन्हें तेज़ करती है: eV = ½mv²। जे. जे. थॉमसन ने विद्युत क्षेत्र को चुंबकीय क्षेत्र से संतुलित किया ताकि किरण सीधी रहे: v = E/B। फिर e/m = v² ÷ 2V ≈ 1.76 × 10¹¹ C kg⁻¹, हाइड्रोजन आयन से लगभग 1800 गुना — यानी कण बहुत हल्का है और हर धातु में एक-सा है। मिलिकन ने आवेशित तेल की बूँदों को प्लेटों के बीच संतुलित किया (QV/d = mg) और पाया कि हर आवेश e = 1.6 × 10⁻¹⁹ C का पूर्ण गुणज है: आवेश क्वांटीकृत है।
- द्रव्य तरंगें और दे ब्रॉग्ली संबंध – प्रकाश तरंग की तरह भी चलता है और कण की तरह भी। 1924 में लुई दे ब्रॉग्ली ने कहा कि द्रव्य भी ऐसा ही करता है: हर गतिमान कण के साथ एक तरंग होती है, जिसकी तरंगदैर्ध्य λ = h/p = h/mv। गतिज ऊर्जा K वाले कण के लिए λ = h/√(2mK); V वोल्ट से त्वरित इलेक्ट्रॉन के लिए λ = 1.227/√V nm। रोज़ की चीज़ों की λ बहुत ही छोटी होती है, पर इलेक्ट्रॉन की λ परमाणु के आकार जितनी होती है।
- विशेष आपेक्षिकता (Special Relativity) – विशेष आपेक्षिकता (आइंस्टीन, 1905) दो अभिधारणाओं पर टिकी है: सभी जड़त्वीय निर्देश-तंत्रों में भौतिकी के नियम एक-से हैं, और निर्वात में प्रकाश की चाल c ≈ 3.00 × 10⁸ m/s हर प्रेक्षक के लिए एक-सी है। इससे निकलता है कि चलती घड़ी धीमी चलती है (t = γt₀), चलती वस्तु गति की दिशा में छोटी दिखती है (L = L₀/γ), और द्रव्यमान ऊर्जा का रूप है (E = mc²), जहाँ γ = 1/√(1 − v²/c²)। रोज़ की चाल पर γ ≈ 1, इसलिए न्यूटन की यांत्रिकी काम करती है; c के पास वह असफल होती है।
8. 3.13 Electronics
3.13.1 Discrete semiconductor devices · 3.13.2 Analogue and digital signals · 3.13.3 Analogue signal processing · 3.13.4 Operational amplifier configurations · 3.13.5 Digital signal processing · 3.13.6 Data communication systems
- अर्धचालक और p-n संधि डायोड – अर्धचालक में ऊर्जा अंतराल छोटा (लगभग 1 eV) होता है, इसलिए थोड़ी गर्मी से कुछ इलेक्ट्रॉन मुक्त हो जाते हैं। शुद्ध सिलिकॉन नैज है (इलेक्ट्रॉन = होल)। 5 संयोजकता वाला परमाणु मिलाने से n-प्रकार, 3 वाला मिलाने से p-प्रकार बनता है। p और n जोड़ने पर ह्रास परत और लगभग 0.7 V का विभव प्राचीर बनता है। डायोड अग्र बायस में धारा चलाता है, पश्च में लगभग नहीं, इसलिए यह AC को DC में बदल सकता है।
- डेटा निरूपण: कंप्यूटर संख्या, अक्षर, चित्र और आवाज़ कैसे रखता है – डेटा कच्चे तथ्य हैं; अर्थ मिलने पर वह सूचना (information) बनता है; जिस सूचना से हम काम ले सकें वह ज्ञान है। कंप्यूटर सारा डेटा बिट (0 या 1) में रखता है। 8 बिट = 1 बाइट; 1 kB = 1000 बाइट, 1 MB = 1000 kB, 1 GB = 1000 MB, 1 TB = 1000 GB। संख्याएँ बाइनरी में रहती हैं, जहाँ स्थानीय मान दोगुने होते जाते हैं: 1, 2, 4, 8… अक्षरों के लिए कैरेक्टर सेट होता है: ASCII में 'A' = 65; यूनिकोड में हर लिपि है। बिटमैप चित्र पिक्सेल का जाल है; साइज़ = चौड़ाई × ऊँचाई × कलर डेप्थ। ध्वनि के सैंपल लिए जाते हैं: साइज़ = सैंपल रेट × बिट डेप्थ × सेकंड। वेक्टर चित्र पिक्सेल की जगह आकृतियाँ रखता है। कम्प्रेशन फ़ाइल छोटी करता है: लॉसलेस हर बिट बचाता है, लॉसी कुछ बारीकी हटा देता है।
- एनालॉग सिग्नल प्रोसेसिंग: LC अनुनाद फ़िल्टर और आदर्श ऑप-एम्प – एनालॉग संकेत लगातार और धीरे-धीरे बदलता है। इसे हम दो तरह से संभालते हैं: LC परिपथ एक आवृत्ति को चुनता है (फ़िल्टर), और ऑप-एम्प वोल्टेज के छोटे अंतर को बहुत बड़ा कर देता है। अनुनादी आवृत्ति f₀ = 1/(2π√LC)। Q = f₀/Δf बताता है कि शिखर कितना नुकीला है। आदर्श ऑप-एम्प का खुला-लूप लाभ अनंत, इनपुट प्रतिरोध अनंत और आउटपुट प्रतिरोध शून्य होता है।
- ऑपरेशनल एम्पलीफायर विन्यास: इनवर्टिंग, नॉन-इनवर्टिंग और समिंग – ऋणात्मक फीडबैक वाला ऑप-एम्प केवल प्रतिरोधों से तय, स्थिर लाभ देता है। इनवर्टिंग: G = −Rf/Rin (आउटपुट उल्टा)। नॉन-इनवर्टिंग: G = 1 + Rf/Rin (आउटपुट सीधा)। समिंग: Vout = −Rf(V1/R1 + V2/R2 + …), ऑडियो मिक्सर और DAC में काम आता है। असली ऑप-एम्प का लाभ और बैंडविड्थ सीमित हैं (लाभ × बैंडविड्थ ≈ स्थिर) और आउटपुट सप्लाई के पास संतृप्त हो जाता है।
- डिजिटल सिग्नल प्रोसेसिंग: संयोजी लॉजिक, अनुक्रमिक लॉजिक और एस्टेबल – डिजिटल संकेत के केवल दो स्तर हैं: 1 (ऊँचा) और 0 (नीचा)। संयोजी लॉजिक (AND, OR, NOT, NAND, NOR, XOR गेट) का आउटपुट केवल अभी के इनपुट पर निर्भर है। अनुक्रमिक लॉजिक (फ्लिप-फ्लॉप, काउंटर) पिछली अवस्था पर भी निर्भर है, यानी इसमें स्मृति है; यह क्लॉक पल्स पर बदलता है। एस्टेबल की कोई स्थिर अवस्था नहीं, यह खुद पलटकर क्लॉक की वर्ग तरंग बनाता है। f = 1/T।
- डेटा संचार तंत्र (Data Communication Systems) – संचार तंत्र सूचना को ट्रांसमीटर से चैनल के रास्ते रिसीवर तक भेजता है। चैनल ताँबे का तार, ऑप्टिकल फ़ाइबर या रेडियो तरंगें हो सकता है। रेडियो से संदेश भेजने के लिए उसे तेज़ वाहक तरंग पर चढ़ाते हैं: AM में वाहक का आयाम और FM में आवृत्ति संदेश के साथ बदलती है। समय-विभाजन मल्टीप्लेक्सिंग (TDM) में कई संकेत बारी-बारी छोटे समय-खानों में एक ही चैनल बाँटते हैं।