चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल
चुंबकीय क्षेत्र में चलते आवेश पर बल लगता है। धारा यानी बहुत सारे चलते आवेश, इसलिए चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही तार पर भी बल लगता है।
बल कितना होगा, यह किस पर निर्भर है?
- धारा (I): धारा ज़्यादा तो बल ज़्यादा।
- क्षेत्र की प्रबलता (B): तेज़ चुंबक, ज़्यादा बल।
- क्षेत्र में तार की लंबाई (L): लंबा तार, ज़्यादा बल।
- तार और क्षेत्र के बीच कोण θ: 90° (लंबवत) पर बल अधिकतम, और समांतर (0° या 180°) होने पर शून्य।
संक्षेप में F ∝ I · B · L · sin θ. (कक्षा 10 में विचार समझना काफ़ी है; सूत्र F = BIL sin θ आगे की कक्षाओं में आता है।)
बल किस ओर? फ्लेमिंग का वामहस्त नियम
बाएँ हाथ का अँगूठा, तर्जनी और मध्यमा आपस में समकोण पर फैलाओ। तर्जनी क्षेत्र की दिशा (N से S) में और मध्यमा धारा की दिशा में रखो। तब अँगूठा चालक पर लगने वाले बल (गति) की दिशा बताता है। धारा या क्षेत्र में से एक को उलटो तो बल उलट जाता है; दोनों उलटो तो बल वैसा ही रहता है।
विद्युत मोटर (2026-27 में केवल रचनात्मक मूल्यांकन)
ध्यान दें: CBSE 2026-27 में मोटर, विद्युत चुंबकीय प्रेरण और जनित्र केवल रचनात्मक (स्कूल स्तर के) मूल्यांकन में हैं, बोर्ड परीक्षा में नहीं। फिर भी इन्हें ज़रूर समझो, हर पंखा और बिजलीघर इन्हीं से चलता है।
विद्युत मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है। इसके भाग:
- आर्मेचर (कुंडली): विद्युतरोधी ताँबे के तार की आयताकार कुंडली, जो अक्सर नर्म लोहे के क्रोड पर लिपटी होती है और चुंबक के ध्रुवों के बीच रखी होती है।
- विभक्त वलय (दिक्परिवर्तक): दो आधे हिस्सों में कटा छल्ला, जो कुंडली के सिरों से जुड़ा रहता है और उसके साथ घूमता है।
- ब्रुश: कार्बन या धातु की दो पट्टियाँ, जो विभक्त वलय को छूती हैं और बैटरी से धारा पहुँचाती हैं।
यह कैसे काम करती है
कुंडली की एक लंबी भुजा में धारा एक दिशा में और दूसरी में उल्टी दिशा में बहती है, तो वामहस्त नियम से एक भुजा ऊपर और दूसरी नीचे धकेली जाती है, और कुंडली घूमती है। आधे चक्कर के बाद विभक्त वलय के दोनों आधे हिस्से ब्रुश बदल लेते हैं, कुंडली में धारा उलट जाती है, और बल फिर उसी दिशा में घुमाता है। इस तरह कुंडली लगातार एक ही दिशा में घूमती है। व्यावसायिक मोटरों में विद्युत चुंबक, बहुत सारे फेरे और नर्म लोहे का क्रोड होता है ताकि वे ज़्यादा शक्तिशाली हों।
विद्युत चुंबकीय प्रेरण और विद्युत जनित्र
माइकल फैराडे ने उल्टा प्रभाव खोजा: कुंडली से गुज़रने वाला चुंबकीय क्षेत्र बदले, तो कुंडली में धारा बनती है। इसे विद्युत चुंबकीय प्रेरण और इस धारा को प्रेरित धारा कहते हैं।
- गैल्वेनोमीटर से जुड़ी कुंडली में चुंबक धकेलो: सुई विक्षेपित होती है।
- बाहर खींचो: सुई दूसरी ओर घूमती है।
- चुंबक रोक दो: कोई विक्षेप नहीं, क्योंकि क्षेत्र बदल नहीं रहा।
- तेज़ चलाओ, तेज़ चुंबक लो या फेरे बढ़ाओ: विक्षेप बढ़ता है।
फ्लेमिंग का दक्षिणहस्त नियम
क्षेत्र में चलते चालक के लिए दाएँ हाथ का अँगूठा, तर्जनी और मध्यमा समकोण पर रखो। तर्जनी = क्षेत्र, अँगूठा = चालक की गति, मध्यमा = प्रेरित धारा की दिशा।
विद्युत जनित्र
जनित्र यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है। चुंबक के ध्रुवों के बीच कुंडली घुमाई जाती है; उसकी भुजाएँ क्षेत्र को काटती हैं और धारा प्रेरित होती है। सर्पी वलय लगाने पर धारा हर आधे चक्कर में उलटती है, यानी AC (प्रत्यावर्ती धारा जनित्र)। विभक्त वलय लगाने पर धारा एक ही दिशा में रहती है, यानी DC (दिष्ट धारा जनित्र)।
प्रत्यावर्ती धारा (AC) और दिष्ट धारा (DC)
दिष्ट धारा (DC) हमेशा एक ही दिशा में बहती है। सेल, बैटरी और सोलर पैनल DC देते हैं।
प्रत्यावर्ती धारा (AC) बराबर समय के बाद बार-बार अपनी दिशा बदलती है। भारत में घर की बिजली लगभग 220 V, 50 Hz की AC है: यह एक सेकंड में 100 बार दिशा बदलती है (हर चक्र में दो बार)।
| AC | DC |
|---|---|
| दिशा बार-बार उलटती है | केवल एक दिशा |
| बिजलीघरों के AC जनित्र से | सेल, बैटरी, DC जनित्र से |
| कम ऊर्जा हानि के साथ दूर तक भेजी जा सकती है (ट्रांसफ़ॉर्मर से वोल्टता बदलती है) | वोल्टता आसानी से घटाना-बढ़ाना कठिन; इलेक्ट्रॉनिक्स में उपयोग |
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- F ∝ I · B · L · sin θ (चालक पर बल; आगे की कक्षाओं में F = BIL sin θ)
- θ = 90° → बल अधिकतम; θ = 0° या 180° → बल शून्य
- वामहस्त नियम (मोटर): तर्जनी = क्षेत्र, मध्यमा = धारा, अँगूठा = बल
- दक्षिणहस्त नियम (जनित्र): तर्जनी = क्षेत्र, अँगूठा = गति, मध्यमा = प्रेरित धारा
- मोटर: विद्युत → यांत्रिक ऊर्जा; जनित्र: यांत्रिक → विद्युत ऊर्जा
- भारत की मेन सप्लाई: AC, 220 V, 50 Hz → एक सेकंड में 100 बार दिशा बदलती है
हल किए गए उदाहरण
1. एक तार पूर्व से पश्चिम जाता है (धारा पश्चिम की ओर) और चुंबकीय क्षेत्र ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर है। बल किस दिशा में होगा?
तर्जनी नीचे (क्षेत्र), मध्यमा पश्चिम (धारा)। तब बाएँ हाथ का अँगूठा दक्षिण की ओर होता है। बल दक्षिण की ओर है।
2. धारावाही तार को चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के समांतर रखा गया। उस पर कितना बल लगेगा?
तार और क्षेत्र के बीच कोण 0° है, sin 0° = 0, इसलिए बल शून्य है। तार बिल्कुल नहीं धकेला जाएगा।
3. पटरी वाले प्रयोग में छड़ बाईं ओर जाती है। (a) धारा उलटने पर, (b) धारा और क्षेत्र दोनों उलटने पर क्या होगा?
(a) एक को उलटने से बल उलटता है, छड़ दाईं ओर जाएगी। (b) दोनों उलटने पर दो बार उलटाव होता है जो एक-दूसरे को रद्द कर देते हैं, छड़ फिर बाईं ओर ही जाएगी।
4. भारत में AC सप्लाई 50 Hz है। एक सेकंड में धारा कितनी बार दिशा बदलती है?
हर चक्र में दो बार दिशा बदलती है। 50 × 2 = 100 बार प्रति सेकंड।
5. मोटर में विभक्त वलय की ज़रूरत क्यों है?
इसके बिना आधे चक्कर के बाद भुजाओं पर बल कुंडली को वापस घुमा देगा और वह बस आगे-पीछे डोलेगी। विभक्त वलय हर आधे चक्कर पर कुंडली में धारा पलटता है, जिससे घुमाव हमेशा एक दिशा में रहता है।
आम गलतियाँ
- चालक पर बल के लिए दायाँ हाथ लगाना। बल (मोटर) = बायाँ हाथ; प्रेरित धारा (जनित्र) = दायाँ हाथ।
- यह मानना कि कुंडली में रुका हुआ चुंबक धारा बनाता है। धारा तभी बनती है जब क्षेत्र बदल रहा हो (सापेक्ष गति हो)।
- यह सोचना कि हर कोण पर बल बराबर है। 90° पर सबसे ज़्यादा, समांतर पर शून्य।
- वलयों में गड़बड़: DC मोटर और DC जनित्र में विभक्त वलय, AC जनित्र में सर्पी वलय।