Ontario Grade 12 HHG4M Human Development throughout the Lifespan (Grade 12, University/College Preparation)
अध्याय: 5
1. A. Research and Inquiry Skills
A1 Exploring · A2 Investigating · A3 Processing Information · A4 Communicating and Reflecting
- जीवन भर मानव विकास – मानव विकास का मतलब है जन्म से पहले से लेकर बुढ़ापे तक इंसान में होने वाले बदलाव। ये बदलाव तीन क्षेत्रों में होते हैं: शरीर (शारीरिक), सोच (संज्ञानात्मक) और भावनाएँ-रिश्ते (सामाजिक-भावनात्मक)। सिद्धांत इन्हें समझाते हैं: सोच के लिए पियाजे, सही-ग़लत के लिए कोहलबर्ग, पहचान के लिए एरिक्सन, और लगाव के लिए बॉल्बी और एन्सवर्थ। दिमाग़ लचीला है: जो जोड़ इस्तेमाल होते हैं वे मज़बूत होते हैं, बाक़ी कट जाते हैं, इसलिए शुरुआती देखभाल बहुत मायने रखती है। गरीबी, उपेक्षा या हिंसा जैसे जोखिम विकास को नुक़सान पहुँचा सकते हैं, जबकि प्यार करने वाला बड़ा, अच्छा स्कूल और सही सरकारी नीतियाँ सुरक्षा देती हैं। जब सहारे जोखिम से भारी हों, तो इंसान मुश्किलों के बावजूद अच्छा करता है; इसे लचीलापन (resilience) कहते हैं।
2. B. Developmental Theories, and Risk and Resilience
B1 Theoretical Perspectives · B2 Risk and Resilience
- मानव विकास: अर्थ, जीवन-काल दृष्टिकोण और प्रभाव – विकास परिवर्तन का वह क्रम है जो गर्भधारण से शुरू होकर पूरे जीवन चलता है। इसमें वृद्धि (आकार में बढ़ोतरी), परिपक्वता (जैविक समय-सारिणी से होने वाले बदलाव) और अनुभव से सीखना शामिल है। जीवन-काल दृष्टिकोण कहता है कि विकास जीवनपर्यंत, बहुआयामी, बहुदिशात्मक, लचीला, ऐतिहासिक परिस्थितियों से प्रभावित, बहुविषयी और संदर्भगत है। इसमें जैविक, संज्ञानात्मक और सामाजिक-संवेगात्मक प्रक्रियाएँ एक-दूसरे पर असर डालती हैं। विकास आनुवंशिकता (जीन-प्ररूप) और पर्यावरण के मेल से होता है, जिससे दिखने वाले लक्षण (लक्षण-प्ररूप) बनते हैं। संदर्भ महत्त्वपूर्ण हैं: ब्रॉनफ़ेनब्रेनर ने सूक्ष्म, मध्य, बाह्य, वृहद् और कालानुक्रमिक तंत्र बताए, और दुर्गानंद सिन्हा ने भारतीय बच्चे के परिवेश को भीतरी और बाहरी परतों में समझाया।
- जीवन भर मानव विकास – मानव विकास का मतलब है जन्म से पहले से लेकर बुढ़ापे तक इंसान में होने वाले बदलाव। ये बदलाव तीन क्षेत्रों में होते हैं: शरीर (शारीरिक), सोच (संज्ञानात्मक) और भावनाएँ-रिश्ते (सामाजिक-भावनात्मक)। सिद्धांत इन्हें समझाते हैं: सोच के लिए पियाजे, सही-ग़लत के लिए कोहलबर्ग, पहचान के लिए एरिक्सन, और लगाव के लिए बॉल्बी और एन्सवर्थ। दिमाग़ लचीला है: जो जोड़ इस्तेमाल होते हैं वे मज़बूत होते हैं, बाक़ी कट जाते हैं, इसलिए शुरुआती देखभाल बहुत मायने रखती है। गरीबी, उपेक्षा या हिंसा जैसे जोखिम विकास को नुक़सान पहुँचा सकते हैं, जबकि प्यार करने वाला बड़ा, अच्छा स्कूल और सही सरकारी नीतियाँ सुरक्षा देती हैं। जब सहारे जोखिम से भारी हों, तो इंसान मुश्किलों के बावजूद अच्छा करता है; इसे लचीलापन (resilience) कहते हैं।
3. C. Understanding Physical Development
C1 Physical Development and Brain Physiology · C2 Sensory and Motor Development · C3 Factors Affecting Physical Development
- मानव शरीर के अंग तंत्र – हमारा शरीर स्तरों में बना है: कोशिकाएँ मिलकर ऊतक, ऊतक मिलकर अंग, अंग मिलकर अंग तंत्र और सारे तंत्र मिलकर पूरा जीव यानी हम। हर तंत्र का एक मुख्य काम है: कंकाल (ढाँचा), पेशी (गति), परिसंचरण (ढुलाई), श्वसन (गैसों का लेन-देन), पाचन (भोजन), उत्सर्जन (कचरा), तंत्रिका और अंतःस्रावी (नियंत्रण), प्रतिरक्षा (बचाव), त्वचा तंत्र और जनन तंत्र। कोई तंत्र अकेले काम नहीं करता: व्यायाम में पेशियाँ, दिल, फेफड़े और नसें साथ बदलकर शरीर के अंदर का हाल स्थिर रखते हैं (समस्थिति)।
- धारावाही चालक पर बल, विद्युत मोटर और प्रेरण – चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही तार पर एक धक्का यानी बल लगता है। तार क्षेत्र से 90° पर हो तो बल सबसे ज़्यादा, और क्षेत्र के समांतर हो तो शून्य। बल की दिशा फ्लेमिंग के वामहस्त नियम से मिलती है। मोटर इसी बल से कुंडली घुमाती है; जनित्र उल्टा काम करके गति से धारा बनाता है।
- जीवन भर मानव विकास – मानव विकास का मतलब है जन्म से पहले से लेकर बुढ़ापे तक इंसान में होने वाले बदलाव। ये बदलाव तीन क्षेत्रों में होते हैं: शरीर (शारीरिक), सोच (संज्ञानात्मक) और भावनाएँ-रिश्ते (सामाजिक-भावनात्मक)। सिद्धांत इन्हें समझाते हैं: सोच के लिए पियाजे, सही-ग़लत के लिए कोहलबर्ग, पहचान के लिए एरिक्सन, और लगाव के लिए बॉल्बी और एन्सवर्थ। दिमाग़ लचीला है: जो जोड़ इस्तेमाल होते हैं वे मज़बूत होते हैं, बाक़ी कट जाते हैं, इसलिए शुरुआती देखभाल बहुत मायने रखती है। गरीबी, उपेक्षा या हिंसा जैसे जोखिम विकास को नुक़सान पहुँचा सकते हैं, जबकि प्यार करने वाला बड़ा, अच्छा स्कूल और सही सरकारी नीतियाँ सुरक्षा देती हैं। जब सहारे जोखिम से भारी हों, तो इंसान मुश्किलों के बावजूद अच्छा करता है; इसे लचीलापन (resilience) कहते हैं।
4. D. Cognitive Development, Language Development, and Intelligence
D1 Cognitive Development · D2 Language Acquisition and Development · D3 Intelligence · D4 Factors Affecting Cognitive Development and Language Use
- जीवन भर मानव विकास – मानव विकास का मतलब है जन्म से पहले से लेकर बुढ़ापे तक इंसान में होने वाले बदलाव। ये बदलाव तीन क्षेत्रों में होते हैं: शरीर (शारीरिक), सोच (संज्ञानात्मक) और भावनाएँ-रिश्ते (सामाजिक-भावनात्मक)। सिद्धांत इन्हें समझाते हैं: सोच के लिए पियाजे, सही-ग़लत के लिए कोहलबर्ग, पहचान के लिए एरिक्सन, और लगाव के लिए बॉल्बी और एन्सवर्थ। दिमाग़ लचीला है: जो जोड़ इस्तेमाल होते हैं वे मज़बूत होते हैं, बाक़ी कट जाते हैं, इसलिए शुरुआती देखभाल बहुत मायने रखती है। गरीबी, उपेक्षा या हिंसा जैसे जोखिम विकास को नुक़सान पहुँचा सकते हैं, जबकि प्यार करने वाला बड़ा, अच्छा स्कूल और सही सरकारी नीतियाँ सुरक्षा देती हैं। जब सहारे जोखिम से भारी हों, तो इंसान मुश्किलों के बावजूद अच्छा करता है; इसे लचीलापन (resilience) कहते हैं।
- मानव शरीर के अंग तंत्र – हमारा शरीर स्तरों में बना है: कोशिकाएँ मिलकर ऊतक, ऊतक मिलकर अंग, अंग मिलकर अंग तंत्र और सारे तंत्र मिलकर पूरा जीव यानी हम। हर तंत्र का एक मुख्य काम है: कंकाल (ढाँचा), पेशी (गति), परिसंचरण (ढुलाई), श्वसन (गैसों का लेन-देन), पाचन (भोजन), उत्सर्जन (कचरा), तंत्रिका और अंतःस्रावी (नियंत्रण), प्रतिरक्षा (बचाव), त्वचा तंत्र और जनन तंत्र। कोई तंत्र अकेले काम नहीं करता: व्यायाम में पेशियाँ, दिल, फेफड़े और नसें साथ बदलकर शरीर के अंदर का हाल स्थिर रखते हैं (समस्थिति)।
- बुद्धि: सिद्धांत, बुद्धि-लब्धि और संवेगात्मक बुद्धि – बुद्धि दुनिया को समझने, साफ़ सोचने और चुनौती में साधनों का ठीक उपयोग करने की योग्यता है। मनोमितिक सिद्धांत इसे कारकों में बाँटते हैं: स्पीयरमैन के g और s, थर्स्टन की सात प्राथमिक योग्यताएँ, गिलफ़र्ड की अनेक योग्यताएँ। गार्डनर आठ अलग बुद्धियाँ बताते हैं। स्टर्नबर्ग के त्रिचापीय सिद्धांत में घटकीय, आनुभविक और सांदर्भिक भाग हैं। PASS मॉडल बुद्धि को योजना, अवधान-भ्रांति और सहकालिक-आनुक्रमिक प्रक्रमण मानता है। बुद्धि-लब्धि = मानसिक आयु ÷ कालानुक्रमिक आयु × 100; ज़्यादातर लोग 90-110 पर। संस्कृति तय करती है कि क्या बुद्धिमानी है। संवेगात्मक बुद्धि भावनाओं को जानने और सँभालने का कौशल है।
5. E. Social-Emotional Development and Personality
E1 Social Emotional Development · E2 Personality and Identity · E3 Factors Affecting Social-Emotional Development
- जीवन भर मानव विकास – मानव विकास का मतलब है जन्म से पहले से लेकर बुढ़ापे तक इंसान में होने वाले बदलाव। ये बदलाव तीन क्षेत्रों में होते हैं: शरीर (शारीरिक), सोच (संज्ञानात्मक) और भावनाएँ-रिश्ते (सामाजिक-भावनात्मक)। सिद्धांत इन्हें समझाते हैं: सोच के लिए पियाजे, सही-ग़लत के लिए कोहलबर्ग, पहचान के लिए एरिक्सन, और लगाव के लिए बॉल्बी और एन्सवर्थ। दिमाग़ लचीला है: जो जोड़ इस्तेमाल होते हैं वे मज़बूत होते हैं, बाक़ी कट जाते हैं, इसलिए शुरुआती देखभाल बहुत मायने रखती है। गरीबी, उपेक्षा या हिंसा जैसे जोखिम विकास को नुक़सान पहुँचा सकते हैं, जबकि प्यार करने वाला बड़ा, अच्छा स्कूल और सही सरकारी नीतियाँ सुरक्षा देती हैं। जब सहारे जोखिम से भारी हों, तो इंसान मुश्किलों के बावजूद अच्छा करता है; इसे लचीलापन (resilience) कहते हैं।
- आत्म: संप्रत्यय, सम्मान और संस्कृति – आत्म हमारे अपने बारे में सारे अनुभवों, विचारों और भावनाओं का जोड़ है। इसमें व्यक्तिगत पहचान (जो मुझे अनोखा बनाए) और सामाजिक पहचान (जिन समूहों का मैं हिस्सा हूँ) है। आत्म जानने वाला (कर्ता) भी है और जाना जाने वाला (कर्म) भी। आत्म-संप्रत्यय यानी हम खुद को कैसे देखते हैं; आत्म-सम्मान यानी पढ़ाई, दोस्त, शरीर और परिवार में हम खुद को कितना मूल्य देते हैं। आत्म-सक्षमता सफल हो सकने का विश्वास है; आत्म-नियमन अपने व्यवहार को सँभालना है, जिसमें आत्म-प्रेक्षण, आत्म-अनुदेश और आत्म-प्रबलन मदद करते हैं। भारतीय संस्कृति में आत्म की सीमा लचीली है जिसमें परिवार और समुदाय आते हैं; पाश्चात्य संस्कृति में व्यक्ति के चारों ओर पक्की सीमा है।
- संस्कृति और समाजीकरण: हम साथ रहना कैसे सीखते हैं – संस्कृति किसी समूह के जीने का पूरा तरीका है, जिसे लोग सीखते हैं और आपस में बाँटते हैं: उनके विचार, नियम और चीज़ें। यह जन्म से नहीं आती, सीखी जाती है। संस्कृति के तीन आयाम हैं: संज्ञानात्मक (हम क्या जानते और मानते हैं), मानकीय (व्यवहार के नियम) और भौतिक (औज़ार और वस्तुएँ)। समाजीकरण वह जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है जिससे एक बच्चा संस्कृति सीखकर समाज का सदस्य बनता है। यह परिवार, मित्र-समूह, विद्यालय, जनसंचार माध्यम और कार्यस्थल, धर्म, समुदाय जैसे अभिकरणों से होता है।