आत्म की संकल्पना
आत्म (self) यानी व्यक्ति के अपने बारे में सारे सचेत अनुभवों, विचारों और भावनाओं का जोड़।
- व्यक्तिगत पहचान: जो गुण आपको दूसरों से अलग बनाते हैं: नाम, शीलगुण, योग्यता, विश्वास।
- सामाजिक पहचान: जो गुण आपको समूहों से जोड़ते हैं: धर्म, क्षेत्र, स्कूल, परिवार।
आत्म कर्ता और कर्म के रूप में
आत्म जानने वाला (कर्ता: "मैं सोचता हूँ") भी है और जाना जाने वाला (कर्म: "मैं अपने बारे में सोचता हूँ") भी।
आत्म के प्रकार
- व्यक्तिगत आत्म: मुझ पर केंद्रित: मेरी आज़ादी, मेरे लक्ष्य।
- सामाजिक (पारिवारिक) आत्म: सहयोग, बाँटना और दूसरों के लिए त्याग।
- संबंधात्मक आत्म: करीबी रिश्तों में आत्म, जैसे माता-पिता या दोस्त के साथ।
बच्चा माता-पिता, दोस्तों और शिक्षकों से मिलते-जुलते हुए अपना आत्म बनाता है।
आत्म के संज्ञानात्मक पक्ष: आत्म-संप्रत्यय और आत्म-सम्मान
आत्म-संप्रत्यय यानी हम खुद को कैसे देखते हैं: अपनी योग्यता और गुणों के बारे में हमारे विचार। यह सकारात्मक या नकारात्मक हो सकता है।
आत्म-सम्मान यानी हम खुद को कितना मूल्य देते हैं। इसे क्षेत्रों में आँकते हैं: शैक्षिक (पढ़ाई), सामाजिक (दोस्त), शारीरिक (रूप, खेल) और पारिवारिक। लगभग 6-7 साल के बच्चे इन क्षेत्रों में खुद को आँकने लगते हैं; बाद में ये मिलकर सामान्य आत्म-सम्मान बनाते हैं।
- ऊँचा आत्म-सम्मान आत्मविश्वास, अच्छे परिणाम और अच्छी दोस्ती से जुड़ा है।
- कम आत्म-सम्मान चिंता, उदासी और कमज़ोर परिणाम से जुड़ सकता है।
- स्नेही, सहयोगी पालन-पोषण ऊँचा आत्म-सम्मान बनाता है।
व्यवहारात्मक पक्ष: आत्म-सक्षमता और आत्म-नियमन
आत्म-सक्षमता (self-efficacy) (अल्बर्ट बंडूरा) यानी व्यक्ति का विश्वास कि वह काम में सफल हो सकता है। ऊँची आत्म-सक्षमता से हम ज़्यादा कोशिश करते हैं और हार नहीं मानते। यह छोटी सफलताओं और अच्छे आदर्शों से बढ़ती है।
आत्म-नियमन यानी अपने व्यवहार को व्यवस्थित करने और देखने की योग्यता। आत्म-नियंत्रण यानी बड़े लक्ष्य के लिए अभी का सुख टालना (परितोषण विलंब)।
आत्म-नियंत्रण की तकनीकें
- अपने व्यवहार का प्रेक्षण: क्या और कब करते हैं, लिखिए।
- आत्म-अनुदेश: खुद को बताइए क्या करना है ("पहले अध्याय पूरा")।
- आत्म-प्रबलन: लक्ष्य पूरा होने पर खुद को इनाम दीजिए।
संस्कृति और आत्म
संस्कृति तय करती है कि आत्म कहाँ खत्म होता है और दूसरे कहाँ शुरू।
- भारतीय दृष्टि: आत्म और दूसरों के बीच की सीमा लचीली है। आत्म फैलकर परिवार, समुदाय और पूरी दुनिया को समेट सकता है। यह ज़्यादा सामूहिक है।
- पाश्चात्य दृष्टि: सीमा पक्की है। आत्म दूसरों और प्रकृति से अलग है। यह ज़्यादा व्यक्तिवादी है।
इसलिए भारत में कई लोग परिवार के साथ मिलकर निर्णय लेते हैं; कई पाश्चात्य समाजों में लोग ज़्यादा खुद निर्णय लेते हैं। कोई बेहतर नहीं; ये जीने के अलग ढंग हैं।
घर पर करके देखें
"मैं ... हूँ" से शुरू होने वाले 10 वाक्य लिखिए। हर वाक्य पर व (व्यक्तिगत: गुण या पसंद) या स (सामाजिक: समूह या भूमिका) लिखिए। गिनिए। कई भारतीय विद्यार्थी स वाले वाक्य ज़्यादा लिखते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- आत्म: अपने बारे में सारे विचार, अनुभव और भावनाएँ
- व्यक्तिगत पहचान (अनोखापन) बनाम सामाजिक पहचान (समूह)
- आत्म कर्ता (जानने वाला) और कर्म (जाना जाने वाला)
- प्रकार: व्यक्तिगत, सामाजिक, संबंधात्मक आत्म
- आत्म-संप्रत्यय = खुद को कैसे देखूँ; आत्म-सम्मान = खुद को कितना मूल्य दूँ
- आत्म-सक्षमता = "मैं कर सकता हूँ" का विश्वास (बंडूरा)
- आत्म-नियंत्रण तकनीकें: प्रेक्षण, आत्म-अनुदेश, आत्म-प्रबलन
- भारतीय आत्म: लचीली सीमा; पाश्चात्य आत्म: पक्की सीमा
हल किए गए उदाहरण
1. ज़ोया कहती है, "मैं ईमानदार हूँ और मुझे चित्रकारी पसंद है।" यह व्यक्तिगत पहचान है या सामाजिक?
व्यक्तिगत पहचान। ईमानदारी और चित्रकारी की पसंद उसके अपने अनोखे गुण हैं, समूह नहीं।
2. करण एक बार फेल होकर कहता है, "अभ्यास करूँ तो सीख लूँगा।" कौन सा विचार?
ऊँची आत्म-सक्षमता: काम में सफल होने की अपनी योग्यता पर विश्वास।
3. निधि फ़ोन दूसरे कमरे में रखती है, खुद से कहती है "पहले एक टॉपिक", और पूरा करके गेम खेलती है। तकनीकें बताइए।
आत्म-प्रेक्षण/योजना, आत्म-अनुदेश ("पहले एक टॉपिक") और आत्म-प्रबलन (गेम इनाम के रूप में)।
4. रमेश विदेश की नौकरी छोड़कर माता-पिता की देखभाल करता है क्योंकि उसे लगता है वे उसी का हिस्सा हैं। आत्म की कौन सी सांस्कृतिक दृष्टि?
भारतीय (सामूहिक) दृष्टि, जिसमें आत्म की सीमा लचीली है और परिवार उसमें आता है।
आम गलतियाँ
- आत्म-संप्रत्यय और आत्म-सम्मान को मिलाना। संप्रत्यय चित्र है; सम्मान उस चित्र का मूल्य।
- आत्म-सक्षमता को असली योग्यता मानना। यह योग्यता पर विश्वास है।
- सामाजिक पहचान को व्यक्तित्व कहना। सामाजिक पहचान समूहों से जुड़ाव है।
- एक संस्कृति के आत्म को सही और दूसरे को गलत कहना।