समूह की प्रकृति
समूह दो या अधिक ऐसे लोग हैं जो:
- आपस में अंतःक्रिया करते हैं, यानी बात करते हैं और एक-दूसरे पर असर डालते हैं;
- एक साझा लक्ष्य रखते हैं;
- मानक (साझा नियम) मानते हैं;
- उनकी भूमिका और प्रतिष्ठा होती है;
- खुद को एक इकाई मानते हैं ('हम' की भावना)।
समूह बनाम भीड़: बस स्टॉप पर खड़े लोग भीड़ हैं। वे संयोग से साथ हैं, न लक्ष्य, न नियम। समूह बनाम टोली (टीम): टीम ख़ास समूह है जिसमें सदस्यों के कौशल एक-दूसरे को पूरा करते हैं और सब एक ही परिणाम के लिए ज़िम्मेदार होते हैं।
करके देखें: अपने तीन समूह लिखिए। हर एक का लक्ष्य और एक बिना लिखा नियम लिखिए।
लोग समूह में क्यों जुड़ते हैं?
- सुरक्षा: अकेलापन कम, सुरक्षित महसूस।
- प्रतिष्ठा: सम्मानित समूह में होना हमें ख़ास महसूस कराता है।
- आत्म-सम्मान: अच्छा समूह हमें अपने बारे में अच्छा महसूस कराता है।
- ज़रूरतें पूरी करना: अपनापन, पसंद किया जाना, जानकारी पाना।
- लक्ष्य पाना: कुछ काम कई हाथों से ही होते हैं।
- ज्ञान: दूसरों से सीखना।
समूह बनने के कारक
- निकटता: पास रहने, बैठने या काम करने वालों से बार-बार मिलना।
- समानता: मिलती-जुलती पसंद, उम्र या सोच वाले जल्दी घुलते-मिलते हैं।
- साझा लक्ष्य: एक ही चीज़ चाहने वाले हाथ मिलाते हैं।
समूह निर्माण के चरण
टकमैन का मॉडल पाँच चरण बताता है:
- निर्माण (Forming): लोग मिलते हैं, झिझकते हैं, एक-दूसरे को जानते हैं।
- विप्लव (Storming): नेता कौन होगा और काम कैसे होगा, इस पर टकराव।
- प्रतिमान (Norming): नियम और भूमिकाएँ तय; 'हम' की भावना बढ़ती है।
- निष्पादन (Performing): समूह मिलकर लक्ष्य पर काम करता है।
- समापन (Adjourning): काम पूरा, समूह बिखर जाता है (जैसे स्कूल उत्सव समिति)।
समूह हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलता। नया सदस्य आने पर फिर विप्लव हो सकता है।
समूह संरचना
- भूमिका: किसी पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षित व्यवहार (कप्तान, सचिव, गोलकीपर)।
- मानक: बिना लिखे नियम जिन्हें सब मानें (समय पर आना, नोट्स बाँटना)।
- प्रतिष्ठा: सदस्य को मिला स्थान या सम्मान। ऊँची प्रतिष्ठा वालों की बात ज़्यादा चलती है।
- संसक्तता: सदस्य समूह से कितना जुड़ा महसूस करते हैं और उसमें रहना चाहते हैं। ज़्यादा संसक्तता वफ़ादारी लाती है, पर बहुत ज़्यादा होने पर समूह-चिंतन (groupthink) हो सकता है: शांति बनाए रखने के लिए सब हाँ कहते हैं और ग़लत फ़ैसले पर कोई सवाल नहीं उठाता।
समूह के प्रकार
- प्राथमिक बनाम द्वितीयक: प्राथमिक समूह (परिवार, पक्के दोस्त) छोटे, आमने-सामने, नज़दीकी और लंबे चलने वाले होते हैं; अक्सर हम इनमें जन्म लेते हैं। द्वितीयक समूह (क्लब, राजनीतिक दल, दफ़्तर) बड़े, ढीले और किसी उद्देश्य के लिए बने होते हैं; इन्हें हम चुनते हैं।
- औपचारिक बनाम अनौपचारिक: औपचारिक समूह में लिखित नियम और तय पद होते हैं (स्कूल, कंपनी)। अनौपचारिक समूह अपने आप बनते हैं (आपकी टिफ़िन टोली)।
- अंतःसमूह बनाम बाह्यसमूह: अंतःसमूह 'हम' है, जिसका मैं सदस्य हूँ। बाह्यसमूह 'वे' हैं। हम अपने समूह के लोगों को अलग-अलग और अच्छा मानते हैं, पर बाहर वालों को 'सब एक जैसे'। इससे पक्षपात पैदा हो सकता है।
समूह प्रभाव: सामाजिक स्वैराचार
सामाजिक स्वैराचार (social loafing) का अर्थ है: साझा काम में समूह में रहकर व्यक्ति अकेले की तुलना में कम मेहनत करता है। रस्साकशी में हर नया व्यक्ति थोड़ा कम खींचता है।
यह क्यों होता है
- ज़िम्मेदारी बँट जाती है; 'दूसरे कर लेंगे'।
- मेरी मेहनत दिखती या नापी नहीं जाती, तो न तारीफ़, न दोष।
- 'दूसरे ढील दे रहे हैं, तो मैं क्यों मेहनत करूँ?'
- काम में रुचि कम या समूह से जुड़ाव कम।
इसे कैसे घटाएँ
- हर व्यक्ति का काम पहचाना जा सके (हर हिस्से पर नाम)।
- काम को ज़रूरी और रोचक बनाएँ।
- प्रतिबद्धता और संसक्तता बढ़ाएँ; छोटे समूह मदद करते हैं।
- समूह के परिणाम की तुलना दूसरे समूहों या पुराने रिकॉर्ड से करें।
इससे जुड़ा विचार: सामाजिक सुगमीकरण, जिसमें दूसरों के देखने पर आसान और अभ्यास किया हुआ काम बेहतर होता है। फ़र्क़: सुगमीकरण में आपका अपना काम दिखता है।
समूह प्रभाव: समूह ध्रुवीकरण
समूह ध्रुवीकरण वह प्रवृत्ति है जिसमें चर्चा के बाद समूह उसी दिशा में और ज़्यादा चरम राय अपना लेता है जिधर वह पहले से झुका था। सदस्य थोड़ा पक्ष में थे तो समूह ज़ोरदार पक्ष में; थोड़ा सतर्क थे तो बहुत सतर्क। (इसका शुरुआती रूप 'जोखिम की ओर झुकाव' कहलाता था।)
कारण
- नए समर्थक तर्क: एक जैसी सोच वालों में अपने पक्ष के और तर्क सुनकर भरोसा बढ़ता है।
- देखा-देखी / सामाजिक तुलना: अच्छा सदस्य दिखने के लिए हर कोई दूसरों से थोड़ा आगे जाता है।
- अंतःसमूह पहचान: 'हम' बनाम 'वे' समूह को बाहर वालों की राय से और दूर धकेलता है।
नुकसान: सोशल मीडिया के 'इको चैंबर', भीड़ का उग्र होना, समितियों के चरम फ़ैसले। उपाय: अलग राय वालों को बुलाएँ, कोई 'विरोधी पक्ष' रखने की भूमिका निभाए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समूह: 2+ लोग, अंतःक्रिया, साझा लक्ष्य, मानक, भूमिका/प्रतिष्ठा, 'हम' भावना
- बनने के कारक: निकटता, समानता, साझा लक्ष्य
- टकमैन चरण: निर्माण → विप्लव → प्रतिमान → निष्पादन → समापन
- संरचना: भूमिका, मानक, प्रतिष्ठा, संसक्तता
- प्रकार: प्राथमिक/द्वितीयक, औपचारिक/अनौपचारिक, अंतःसमूह/बाह्यसमूह
- सामाजिक स्वैराचार: साझा, न पहचाने जाने वाले काम में प्रति व्यक्ति कम मेहनत
- समूह ध्रुवीकरण: चर्चा से समूह की राय उसी दिशा में और चरम
हल किए गए उदाहरण
1. प्लेटफ़ॉर्म पर बीस लोग ट्रेन का इंतज़ार कर रहे हैं। क्या वे समूह हैं?
नहीं, वे भीड़ हैं। न बातचीत, न साझा लक्ष्य, न नियम, न 'हम' भावना। अगर ट्रेन रद्द हो और वे मिलकर शिकायत लिखें, तो वे समूह बनने लगते हैं।
2. नई क्विज़ टीम पहले कप्तान को लेकर बहस करती है, फिर अभ्यास का समय तय करती है। दोनों चरण बताइए।
नेतृत्व पर बहस = विप्लव। अभ्यास का समय और भूमिकाएँ तय करना = प्रतिमान। इसके बाद निष्पादन आता है।
3. समूह प्रोजेक्ट में केवल अंतिम चार्ट पर पूरे समूह को अंक मिलते हैं। कई सदस्य कम काम करते हैं। समझाइए और दो उपाय दीजिए।
यह सामाजिक स्वैराचार है: व्यक्तिगत मेहनत नहीं दिखती, ज़िम्मेदारी बँटी है। उपाय: हर सदस्य को नाम वाला अलग हिस्सा दें जिसके अलग अंक हों; विषय को रोचक बनाएँ और समूह छोटा रखें।
4. नई इमारत को थोड़ा नापसंद करने वाले निवासी मिलकर बात करते हैं और बड़े विरोध की योजना बनाकर लौटते हैं। क्या हुआ और क्यों?
समूह ध्रुवीकरण। एक जैसी सोच की चर्चा से विरोध में और तर्क मिले, सदस्य प्रतिबद्ध दिखना चाहते थे, और 'हम निवासी बनाम वे बिल्डर' ने राय को चरम पर पहुँचा दिया।
5. वर्गीकरण कीजिए: (क) आपका परिवार, (ख) जिस क्रिकेट क्लब में आप जुड़े, (ग) लिखित नियमों वाली स्कूल परिषद, (घ) आधी छुट्टी की दोस्त-मंडली।
(क) प्राथमिक (और अनौपचारिक)। (ख) द्वितीयक। (ग) औपचारिक (और द्वितीयक)। (घ) अनौपचारिक (और प्राथमिक)।
आम गलतियाँ
- हर भीड़ को समूह कहना। भीड़ या दर्शकों में साझा लक्ष्य, मानक या 'हम' भावना नहीं होती।
- यह मानना कि ध्रुवीकरण में समूह दो खेमों में बँट जाता है। असल में पूरा समूह उसी दिशा में और आगे खिसकता है जिधर पहले झुका था।
- सामाजिक स्वैराचार और सामाजिक सुगमीकरण को मिलाना। स्वैराचार: काम छिपा हो तो कम मेहनत। सुगमीकरण: दूसरे देखें तो आसान काम बेहतर।
- यह सोचना कि ज़्यादा संसक्तता हमेशा अच्छी है। बहुत ज़्यादा होने पर समूह-चिंतन और ग़लत फ़ैसले हो सकते हैं।