United Grade 11 AP Psychology
अध्याय: 5
1. Biological Bases of Behavior
Interaction of Heredity and Environment · Overview of the Nervous System · The Neuron and Neural Firing · The Brain · Sleep · Sensation
- व्यवहार के जैविक आधार – हमारा व्यवहार और सोच एक जीवित शरीर से आते हैं। जीन और वातावरण मिलकर हमें बनाते हैं। तंत्रिका तंत्र का केंद्रीय भाग (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) और परिधीय भाग (बाकी सारी नसें, स्वायत्त तंत्र समेत) होता है। न्यूरॉन विद्युत क्रिया विभव (पूरा या कुछ नहीं) से संदेश भेजते हैं और सिनैप्स पर रासायनिक न्यूरोट्रांसमीटर से आगे देते हैं; अंतःस्रावी तंत्र के हार्मोन धीरे काम करते हैं। मस्तिष्क के हर भाग का मुख्य काम अलग है और मस्तिष्क खुद को नए सिरे से जोड़ सकता है (प्लास्टिसिटी)।
- नींद और चेतना – चेतना यानी अपने और आसपास के बारे में जागरूकता। 24 घंटे की शरीर-घड़ी (सर्केडियन लय), रोशनी और मेलाटोनिन हार्मोन से चलती है और बताती है कब सोना है। नींद में दिमाग़ बंद नहीं होता: वह NREM की N1, N2 और गहरी N3 अवस्था से होकर REM नींद में जाता है, जहाँ साफ़ सपने आते हैं; यह चक्र लगभग 90 मिनट का है। नींद शरीर की मरम्मत, याददाश्त पक्की करने और बढ़ने में मदद करती है; कम नींद ध्यान, मूड और सेहत बिगाड़ती है। आम विकार: अनिद्रा, नार्कोलेप्सी, स्लीप एप्निया, नींद में चलना।
- संवेदन और अवधान – उद्दीपक वह कोई भी बदलाव है जिसे हम पकड़ सकते हैं। हर इंद्रिय (संवेदी प्रकार) एक तरह का उद्दीपक पकड़ती है, पर एक सीमा में: उद्दीपक को निरपेक्ष देहली पार करनी होती है, और बदलाव को भेद देहली। फिर अवधान चुनता है। चयनात्मक अवधान बहुत से उद्दीपकों में से कुछ चुनता है; इसे बाहरी कारक (आकार, तीव्रता, गति, नयापन) और अंदरूनी कारक (ज़रूरत, रुचि) खींचते हैं। निरंतर अवधान एक काम पर लंबे समय तक ध्यान टिकाना है, जो समय के साथ घटता है।
2. Cognition
Perception · Thinking, Problem-Solving, Judgments, and Decision-Making · Introduction to Memory · Encoding Memories · Storing Memories · Retrieving Memories · Forgetting and Other Memory Challenges · Intelligence and Achievement
- प्रत्यक्षण: दिमाग कैसे अर्थ बनाता है – प्रत्यक्षण यानी इंद्रियों से आई सूचना को अर्थ देना। हम नीचे से ऊपर (अंश से पूर्ण) और ऊपर से नीचे (विचार से विवरण) दोनों तरह काम करते हैं। देखने वाले की ज़रूरतें, अपेक्षाएँ और मनोदशा इसे बदलती हैं। गेस्टाल्ट नियम (आकृति-पृष्ठभूमि, निकटता, समानता, पूर्णता, निरंतरता) अंशों को जोड़ते हैं। एकनेत्री और द्विनेत्री संकेत गहराई बताते हैं। स्थैर्य आकार, माप और चमक को स्थिर रखता है। भ्रम वह प्रत्यक्षण है जो सच से मेल न खाए, और संस्कृति इस पर असर डालती है।
- चिंतन, समस्या समाधान और तर्कना – चिंतन का मतलब है किसी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मन में जानकारी पर काम करना। इसके आधार हैं मानसिक प्रतिमा और संप्रत्यय। चिंतन से हम समस्याएँ सुलझाते हैं (चरणों में, मानसिक विन्यास और प्रकार्यात्मक स्थिरता से बचकर), तर्क करते हैं (निगमनात्मक: नियम से उदाहरण; आगमनात्मक: उदाहरणों से नियम) और निर्णय लेते हैं।
- मानव स्मृति: हम सूचना कैसे रखते हैं – स्मृति सूचना को समय तक रखती है। इसके तीन चरण हैं: कूटसंकेतन, भंडारण और पुनरुद्धार। अवस्था मॉडल कहता है कि सूचना संवेदी स्मृति (बहुत बड़ी, लगभग एक सेकंड) से अल्पकालिक स्मृति (लगभग 7 मद, लगभग 20 सेकंड) में और दोहराव से दीर्घकालिक स्मृति (असीम, वर्षों) में जाती है। अल्पकालिक स्मृति कार्यकारी स्मृति की तरह काम करती है। प्रक्रमण स्तर उपागम कहता है कि गहरा, अर्थ वाला प्रक्रमण लंबी स्मृति देता है। दीर्घकालिक स्मृति में घोषणात्मक (घटनात्मक और अर्थगत) और प्रक्रियामूलक स्मृति होती है।
- विस्मरण और बेहतर याद रखने के उपाय – भूलना शुरू में तेज़ और फिर धीमा होता है (एबिंगहास वक्र)। तीन मुख्य कारण: चिह्न ह्रास (इस्तेमाल न होने से चिह्न धुँधला), व्यतिकरण (पुराना और नया सीखा एक-दूसरे को रोकें: अग्रलक्षी और पृष्ठोन्मुख) और पुनरुद्धार विफलता (याद है पर सही संकेत नहीं)। स्मृति सुधारने के लिए प्रतिमा (मूल शब्द विधि, स्थान विधि) और संगठन (खंडीकरण, प्रथम अक्षर, श्रेणियाँ) वाले स्मृति-सहायक, साथ में गहरा प्रक्रमण, कम व्यतिकरण, अंतराल पर दोहराव और PQRST विधि काम आते हैं।
- बुद्धि: सिद्धांत, बुद्धि-लब्धि और संवेगात्मक बुद्धि – बुद्धि दुनिया को समझने, साफ़ सोचने और चुनौती में साधनों का ठीक उपयोग करने की योग्यता है। मनोमितिक सिद्धांत इसे कारकों में बाँटते हैं: स्पीयरमैन के g और s, थर्स्टन की सात प्राथमिक योग्यताएँ, गिलफ़र्ड की अनेक योग्यताएँ। गार्डनर आठ अलग बुद्धियाँ बताते हैं। स्टर्नबर्ग के त्रिचापीय सिद्धांत में घटकीय, आनुभविक और सांदर्भिक भाग हैं। PASS मॉडल बुद्धि को योजना, अवधान-भ्रांति और सहकालिक-आनुक्रमिक प्रक्रमण मानता है। बुद्धि-लब्धि = मानसिक आयु ÷ कालानुक्रमिक आयु × 100; ज़्यादातर लोग 90-110 पर। संस्कृति तय करती है कि क्या बुद्धिमानी है। संवेगात्मक बुद्धि भावनाओं को जानने और सँभालने का कौशल है।
3. Development and Learning
Themes and Methods in Developmental Psychology · Physical Development Across the Lifespan · Gender and Sexual Orientation · Cognitive Development Across the Lifespan · Communication and Language Development · Social-Emotional Development Across the Lifespan · Classical Conditioning · Operant Conditioning · Social, Cognitive, and Neurological Factors in Learning
- मानव विकास: अर्थ, जीवन-काल दृष्टिकोण और प्रभाव – विकास परिवर्तन का वह क्रम है जो गर्भधारण से शुरू होकर पूरे जीवन चलता है। इसमें वृद्धि (आकार में बढ़ोतरी), परिपक्वता (जैविक समय-सारिणी से होने वाले बदलाव) और अनुभव से सीखना शामिल है। जीवन-काल दृष्टिकोण कहता है कि विकास जीवनपर्यंत, बहुआयामी, बहुदिशात्मक, लचीला, ऐतिहासिक परिस्थितियों से प्रभावित, बहुविषयी और संदर्भगत है। इसमें जैविक, संज्ञानात्मक और सामाजिक-संवेगात्मक प्रक्रियाएँ एक-दूसरे पर असर डालती हैं। विकास आनुवंशिकता (जीन-प्ररूप) और पर्यावरण के मेल से होता है, जिससे दिखने वाले लक्षण (लक्षण-प्ररूप) बनते हैं। संदर्भ महत्त्वपूर्ण हैं: ब्रॉनफ़ेनब्रेनर ने सूक्ष्म, मध्य, बाह्य, वृहद् और कालानुक्रमिक तंत्र बताए, और दुर्गानंद सिन्हा ने भारतीय बच्चे के परिवेश को भीतरी और बाहरी परतों में समझाया।
- मानव विकास की अवस्थाएँ: जन्म से पहले से वृद्धावस्था तक – गर्भकाल गर्भधारण से जन्म तक तीन कालों में चलता है: बीजावस्था (पहले दो हफ़्ते), भ्रूणावस्था (2–8 हफ़्ते) और गर्भस्थ शिशु अवस्था (9 हफ़्ते से जन्म); टेराटोजन कहलाने वाले हानिकारक तत्त्व (शराब, धूम्रपान, दवाएँ, रूबेला जैसे संक्रमण) और माँ का पोषण व तनाव शिशु पर असर डालते हैं। शैशवावस्था (0–2 वर्ष) प्रतिवर्तों से शुरू होकर गामक उपलब्धियों, आसक्ति और वस्तु स्थायित्व (पियाजे की संवेदी-गामक अवस्था) तक जाती है। प्रारंभिक बाल्यावस्था (2–6) में बच्चे प्रतीक और नाटकीय खेल अपनाते हैं पर आत्मकेंद्रित सोचते हैं और संरक्षण नहीं समझते; मध्य बाल्यावस्था (6–11) में ठोस चीज़ों पर तार्किक सोचते हैं। किशोरावस्था में यौवनारंभ, अमूर्त चिंतन, पहचान की खोज और साथियों का दबाव, अपचार, नशा व खाने के विकार जैसी चुनौतियाँ आती हैं। प्रौढ़ावस्था में करियर, विवाह और पालन-पोषण; वृद्धावस्था में सेवानिवृत्ति, हानि और समझ।
- लैंगिक विकास और यौन अभिमुखता – जैविक लिंग (sex) शरीर से जुड़ा है: गुणसूत्र, हार्मोन, अंग। जेंडर (gender) वे भूमिकाएँ, गुण और पहचान हैं जिन्हें संस्कृति और व्यक्ति पुरुष, स्त्री या अन्य होने से जोड़ते हैं। बच्चे लगभग 2–3 साल में अपना लिंग बताने लगते हैं और 5–7 साल तक लैंगिक स्थिरता समझते हैं। जेंडर जीवविज्ञान, सामाजिक अधिगम (नकल और प्रशंसा) और जेंडर स्कीमा (मन की श्रेणियाँ) से विकसित होता है, और भूमिकाएँ संस्कृतियों में अलग होती हैं। लैंगिक पहचान, अभिव्यक्ति और यौन अभिमुखता अलग-अलग आयाम हैं। शोध बताता है कि यौन अभिमुखता स्थायी है, चुनी नहीं जाती और परवरिश से नहीं बनती; जैविक कारकों का योगदान है।
- सृजनात्मक चिंतन, चिंतन और भाषा – सृजनात्मक चिंतन ऐसे विचार देता है जो नए भी हों और उपयोगी भी। यह तैयारी, उद्भवन, प्रदीपन और सत्यापन से गुज़रता है, और इसमें अपसारी (कई विचार) व अभिसारी (एक सबसे अच्छा उत्तर) दोनों चिंतन लगते हैं। चिंतन और भाषा गहराई से जुड़े हैं (व्होर्फ़, पियाजे, वायगोत्स्की)। बच्चे तय चरणों में भाषा सीखते हैं, जिसमें सीखना और जन्मजात तैयारी दोनों मदद करते हैं।
- अनुबंधन से अधिगम – अधिगम अभ्यास या अनुभव से व्यवहार में अपेक्षाकृत स्थायी बदलाव है। प्राचीन अनुबंधन (पावलव) में एक तटस्थ उद्दीपक, स्वाभाविक अनुक्रिया लाने वाले उद्दीपक के साथ बार-बार आने पर, अकेले ही वह अनुक्रिया लाने लगता है। क्रियाप्रसूत अनुबंधन (स्किनर) में व्यवहार अपने परिणामों से बनता है: पुनर्बलन उसे बढ़ाता है, दंड घटाता है। समय-संबंध, उद्दीपक की तीव्रता और प्रकार, पुनर्बलन की मात्रा, देरी और अनुसूची सीखने को तय करते हैं। मुख्य प्रक्रियाएँ: अर्जन, विलोपन, स्वतः पुनर्प्राप्ति, सामान्यीकरण, विभेदन।
- अधिगम के अन्य रूप – हर अधिगम अनुबंधन नहीं है। प्रेक्षणात्मक अधिगम में हम मॉडल को और उसके परिणाम को देखकर नक़ल करते हैं। संज्ञानात्मक अधिगम में सोचकर सीखते हैं: अंतर्दृष्टि अचानक हल है, और अव्यक्त अधिगम ज़रूरत पड़ने तक छिपा रहता है। वाचिक अधिगम शब्द और सूचियाँ सीखना है (युग्मित सहचर, क्रमिक, मुक्त पुनःस्मरण)। कौशल अधिगम संज्ञानात्मक, साहचर्यात्मक और स्वायत्त चरणों से गुज़रता है। अभिप्रेरणा, तैयारी और सही पुनर्बलन अधिगम में मदद करते हैं। अधिगम अशक्तता सामान्य बुद्धि वाले बच्चों में पढ़ने, लिखने, ध्यान या गणित की कठिनाई है, जो विशेष शिक्षण से सुधरती है।
4. Social Psychology and Personality
Attribution Theory and Person Perception · Attitude Formation and Attitude Change · Psychology of Social Situations · Psychodynamic and Humanistic Theories of Personality · Social-Cognitive and Trait Theories of Personality · Motivation · Emotion
- गुणारोपण सिद्धांत और व्यक्ति प्रत्यक्षण – जब हम किसी को कुछ करते देखते हैं, तो हम अंदाज़ा लगाते हैं कि उसने ऐसा क्यों किया। या तो हम व्यक्ति को कारण मानते हैं (आंतरिक गुणारोपण) या स्थिति को (बाहरी गुणारोपण)। हमारे अंदाज़े अक्सर झुके हुए होते हैं: दूसरों के स्वभाव को ज़्यादा दोष देना (मूल गुणारोपण त्रुटि), ख़ुद को बचाना (कर्ता-प्रेक्षक और आत्म-हितैषी पूर्वाग्रह), और पहली छाप से सब कुछ आँकना (प्रभामंडल व प्रथमता प्रभाव)। केली का मॉडल सही फ़ैसले का तरीका देता है।
- सामाजिक मनोविज्ञान: दूसरे लोग हमें कैसे बदलते हैं – सामाजिक मनोविज्ञान यह पढ़ता है कि दूसरे लोग हमारी सोच, भावना और व्यवहार को कैसे बदलते हैं। व्यवहार व्यक्ति और परिस्थिति दोनों पर निर्भर है। समूह में हम अक्सर बहुमत के अनुरूप चलते हैं या अधिकारी का आदेश मानते हैं। रूढ़धारणा (विचार), पूर्वाग्रह (भावना) और भेदभाव (कार्य) समूहों को नुकसान पहुँचाते हैं। जब बहुत लोग देखते हैं, हर किसी को मदद की ज़िम्मेदारी कम लगती है। होड़ से संघर्ष, और साझा लक्ष्य से सहयोग बनता है।
- समूह: कैसे बनते हैं और हमें कैसे बदलते हैं – समूह दो या अधिक लोगों का ऐसा मेल है जिसमें वे आपस में बात करते हैं, एक लक्ष्य रखते हैं, मानक मानते हैं और 'हम' महसूस करते हैं। लोग सुरक्षा, प्रतिष्ठा, आत्म-सम्मान, ज़रूरतों और लक्ष्यों के लिए समूह में जुड़ते हैं। समूह पाँच चरणों से गुज़रता है: निर्माण, विप्लव, प्रतिमान, निष्पादन, समापन। संरचना में भूमिका, मानक, प्रतिष्ठा और संसक्तता होते हैं। प्रकार: प्राथमिक/द्वितीयक, औपचारिक/अनौपचारिक, अंतःसमूह/बाह्यसमूह। समूह हमारा व्यवहार भी बदलता है: सामाजिक स्वैराचार में साझा काम में हर व्यक्ति कम मेहनत करता है; समूह ध्रुवीकरण में चर्चा के बाद समूह की राय और चरम हो जाती है।
- व्यक्तित्व: उपागम और मूल्यांकन – व्यक्तित्व अलग-अलग परिस्थितियों में सोचने, महसूस करने और करने का व्यक्ति का स्थिर, खास ढंग है। प्रकार उपागम लोगों को समूहों में बाँटते हैं (टाइप A और B, अंतर्मुखी और बहिर्मुखी)। शीलगुण उपागम कई आयामों पर वर्णन करते हैं (ऑलपोर्ट, कैटेल, आइज़ेंक, पाँच-कारक)। फ्रायड का मनोगतिक उपागम अचेतन, इड, अहं, पराहम् और रक्षा युक्तियों को देखता है; नव-फ्रायडवादी (युंग, हॉर्नी, एडलर, फ्रॉम, एरिक्सन) सामाजिक और लक्ष्य वाली शक्तियों पर ज़ोर देते हैं। व्यवहारवादी उपागम कहता है व्यक्तित्व सीखा जाता है। सांस्कृतिक उपागम इसे पारिस्थितिकी और जीवन-शैली से जोड़ता है। मानवतावादी (रोजर्स, मैस्लो) विकास और आत्मसिद्धि पर ज़ोर देते हैं। मूल्यांकन आत्म-प्रतिवेदन, प्रक्षेपी तकनीक और व्यवहारात्मक विधियों से होता है।
- अभिप्रेरणा, अभिप्रेरक और मैस्लो का आवश्यकता पदानुक्रम – अभिप्रेरणा वह बल है जो व्यवहार को शुरू करता है, दिशा देता है और लक्ष्य तक बनाए रखता है। यह चक्र में चलती है: आवश्यकता → अंतर्नोद → क्रिया → लक्ष्य → राहत। अभिप्रेरक जैविक (भूख, प्यास, नींद, यौन; समस्थिति से संतुलित) या मनोसामाजिक (संबंधन, शक्ति, उपलब्धि, जिज्ञासा) होते हैं। मैस्लो ने आवश्यकताओं को शारीरिक से आत्मसिद्धि तक पिरामिड में रखा।
- संवेग: स्वरूप, अभिव्यक्ति, संस्कृति और प्रबंधन – संवेग एक तीव्र भाव है जिसके तीन भाग हैं: शरीर की उत्तेजना, घटना का संज्ञानात्मक मूल्यांकन और बाहरी अभिव्यक्ति। कुछ मूल संवेग हैं जिनकी तीव्रता बदलती है और जो मिल भी सकते हैं। संवेग चेहरे, आवाज़ और शरीर से दिखते हैं; मूल चेहरे के भाव लगभग सार्वभौमिक हैं, पर संस्कृति प्रदर्शन नियम तय करती है। नकारात्मक संवेग संभाले जा सकते हैं (पहचान, पुनर्मूल्यांकन, विश्राम, व्यायाम, सहारा) और सकारात्मक बढ़ाए जा सकते हैं (आभार, आशा, दया, दोस्त, प्रवाह)।
5. Mental and Physical Health
Introduction to Health Psychology · Positive Psychology · Explaining and Classifying Psychological Disorders · Selection of Categories of Psychological Disorders · Treatment of Psychological Disorders
- स्वास्थ्य मनोविज्ञान और सकारात्मक मनोविज्ञान – स्वास्थ्य मनोविज्ञान पढ़ता है कि हमारा मन, आदतें और सामाजिक जीवन शरीर के स्वास्थ्य पर कैसे असर डालते हैं। जैव-मनो-सामाजिक मॉडल कहता है कि शरीर, मन और समाज साथ मिलकर काम करते हैं। तनाव इस पर निर्भर है कि हम तनावकारक को कैसे आँकते हैं; लंबा तनाव सामान्य अनुकूलन संलक्षण (GAS) के तीन चरणों से गुज़रता है और प्रतिरक्षा तंत्र को कमज़ोर कर सकता है। सामना करने के तरीके और अच्छी आदतें बचाती हैं। सकारात्मक मनोविज्ञान पूछता है कि जीवन अच्छा कैसे चले: PERMA के पाँच खंभे, फ़्लो, लचीलापन और चरित्र-शक्तियाँ।
- असामान्यता और मनोवैज्ञानिक विकारों का वर्गीकरण – व्यवहार तब असामान्य कहलाता है जब उसमें 4 D दिखें: विचलन (बहुत अलग), कष्ट (व्यक्ति को दुख), दुष्क्रिया (रोज़ का जीवन बिगड़ना) और कभी-कभी ख़तरा। बहुत पहले लोग आत्माओं को दोष देते थे, यूनानियों ने शरीर को कारण माना, बाद में सुधारकों ने दयालु देखभाल शुरू की, और आज जैव-मनो-सामाजिक दृष्टि अपनाई जाती है। विशेषज्ञ दो पुस्तिकाओं से वर्गीकरण करते हैं: DSM-5-TR (अमेरिकी मनोरोग संघ) और ICD-11 (विश्व स्वास्थ्य संगठन)। विकार जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों के मेल से बनते हैं। प्रवणता-दबाव मॉडल कहता है: जन्मजात कमज़ोरी और पर्याप्त दबाव मिलकर विकार ला सकते हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य: भावनाएँ, तनाव और सहारा – मानसिक स्वास्थ्य यानी हम कैसे सोचते, महसूस करते, मुश्किलें सँभालते और दूसरों से जुड़ते हैं। शारीरिक स्वास्थ्य की तरह यह सबके पास है और ऊपर-नीचे होता है। भावनाएँ काम के संकेत हैं। तनाव बाल्टी में पानी की तरह जमा होता है; अच्छे तरीके (नींद, व्यायाम, बात करना, धीमी साँस, योजना) उसे बाहर निकालते हैं। आत्म-सम्मान और अच्छे रिश्ते हमें बचाते हैं। अगर भारी भावनाएँ दो हफ़्ते या ज़्यादा रहें, या रोज़ का जीवन रुकने लगे, तो भरोसेमंद बड़े या विशेषज्ञ से बात करें — मदद माँगना हिम्मत है।