गर्भकालीन अवस्था
गर्भधारण से जन्म तक (लगभग 38–40 सप्ताह):
- बीजावस्था (पहले 2 सप्ताह): निषेचित अंडा (युग्मनज) विभाजित होकर गर्भाशय की दीवार से जुड़ता है।
- भ्रूणावस्था (2–8 सप्ताह): हृदय, मस्तिष्क, हाथ-पैर और अन्य अंग बनने लगते हैं। हानि के लिए सबसे संवेदनशील समय।
- गर्भस्थ शिशु अवस्था (9 सप्ताह से जन्म): अंग बढ़ते और काम करने लगते हैं; शिशु हिलता और तेज़ी से बढ़ता है।
टेराटोजन वे तत्त्व हैं जो गर्भस्थ शिशु को हानि पहुँचा सकते हैं: शराब, तंबाकू, कुछ दवाएँ और नशीले पदार्थ, विकिरण, रूबेला जैसे संक्रमण। माँ की आयु, पोषण, भावनात्मक तनाव और स्वास्थ्य देखभाल भी मायने रखते हैं।
शैशवावस्था (0–2 वर्ष)
- प्रतिवर्त: जन्म से मौजूद स्वचालित अनुक्रियाएँ — रूटिंग (गाल छूने पर मुड़ना), चूसना, पकड़ना, मोरो (चौंकना) और बेबिन्स्की (तलवा सहलाने पर उँगलियाँ फैलना)।
- संवेदनाएँ: नवजात पास के चेहरे देख सकते हैं, सुन सकते हैं और माँ की आवाज़ पहचानते हैं।
- गामक उपलब्धियाँ: सिर सँभालना, बैठना, घुटनों चलना, खड़े होना, चलना — तय क्रम में, थोड़ी अलग उम्र में।
- संज्ञानात्मक: पियाजे की संवेदी-गामक अवस्था — इंद्रियों और क्रियाओं से सीखना; लगभग 8 महीने में वस्तु स्थायित्व (आँख से ओझल चीज़ भी मौजूद है) विकसित होता है।
- सामाजिक-संवेगात्मक: आसक्ति — देखभाल करने वाले से गहरा भावनात्मक बंधन। हार्लो के अध्ययन ने दिखाया कि केवल भोजन नहीं, स्पर्श और गर्मजोशी ज़्यादा मायने रखते हैं; संवेदनशील देखभाल से सुरक्षित आसक्ति और भरोसा बनता है।
बाल्यावस्था
प्रारंभिक बाल्यावस्था (2–6 वर्ष)
- शरीर लगातार बढ़ता है; दौड़ना, चित्र बनाना, बटन लगाना सुधरता है।
- पियाजे की पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था: बच्चे प्रतीक और नाटकीय खेल अपनाते हैं, पर आत्मकेंद्रिता (दूसरे की दृष्टि से न देख पाना), जीववाद (वस्तुओं को जीवित मानना), केंद्रीयता (एक ही गुण पर ध्यान) दिखाते हैं और संरक्षण नहीं समझते।
- आत्म-संप्रत्यय और लिंग भूमिकाएँ शुरू; माता-पिता शुरुआती नैतिक विचार गढ़ते हैं।
मध्य और उत्तर बाल्यावस्था (6–11 वर्ष)
- पियाजे की मूर्त संक्रियात्मक अवस्था: असली, ठोस वस्तुओं पर तार्किक चिंतन; संरक्षण और वर्गीकरण।
- आत्म-सम्मान, मित्रता और स्कूली उपलब्धि महत्त्वपूर्ण; नैतिक तर्क नियम मानने से न्याय समझने की ओर बढ़ता है।
किशोरावस्था की चुनौतियाँ
किशोरावस्था (लगभग 12–18 वर्ष) यौवनारंभ से शुरू होती है: तेज़ शारीरिक बढ़त और यौन परिपक्वता। चिंतन औपचारिक संक्रियात्मक बनता है: अमूर्त, काल्पनिक और आदर्शवादी। किशोरों में किशोर आत्मकेंद्रिता दिखती है — लगना कि सब उन्हें देख रहे हैं (काल्पनिक दर्शक) या उनके साथ कुछ बुरा नहीं होगा (व्यक्तिगत दंतकथा)।
पहचान निर्माण: एरिक्सन ने इसे "पहचान बनाम भूमिका भ्रम" कहा — "मैं कौन हूँ?" का उत्तर पाने के लिए भूमिकाएँ आज़माना। करियर चुनाव और मूल्य इसका हिस्सा हैं।
मुख्य चुनौतियाँ
- अपचार: नियम या क़ानून तोड़ना, अक्सर कम निगरानी या बुरी संगत से जुड़ा।
- मादक द्रव्य दुरुपयोग: धूम्रपान, शराब, नशा — कभी घुलने-मिलने या तनाव से भागने के लिए।
- खाने के विकार: एनोरेक्सिया और बुलिमिया, शरीर की छवि की चिंता से जुड़े।
- साथ ही: साथियों का दबाव, परीक्षा तनाव, माता-पिता से टकराव।
सहारे: परिवार में खुली बातचीत, अच्छे मित्र, स्पष्ट लक्ष्य, खेल और शौक़, और परामर्श।
प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था
- प्रारंभिक प्रौढ़ावस्था: करियर और काम, साथी चुनना, विवाह, माता-पिता बनना। इन नई भूमिकाओं से समायोजन मुख्य कार्य है।
- मध्य आयु: शारीरिक बदलाव (नज़र, ऊर्जा; स्त्रियों में रजोनिवृत्ति), लक्ष्यों की समीक्षा, बच्चों और बूढ़े माता-पिता दोनों की देखभाल।
- वृद्धावस्था: सेवानिवृत्ति, बच्चों के जाने पर "ख़ाली घोंसला", जीवनसाथी या मित्रों का बिछड़ना, स्वास्थ्य समस्याएँ। स्फटिकीकृत क्षमताएँ (ज्ञान, शब्दावली, समझ) मज़बूत रहती हैं; तरल क्षमताएँ (गति, नई समस्या सुलझाना) धीमी होती हैं। सक्रिय और सामाजिक रूप से जुड़े बुज़ुर्ग अच्छा करते हैं; भारत में सम्मान और संयुक्त परिवार की देखभाल मदद करती है, पर बदलते परिवार अकेलापन भी लाते हैं।
करके देखें
परिवार के किसी दूसरी अवस्था वाले सदस्य से पूछें: "मेरी उम्र में आपकी सबसे बड़ी चुनौती क्या थी?" फिर 3D के खुले खेल में आयु स्लाइडर से अवस्थाओं की तुलना करें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- गर्भकाल: बीजावस्था (0–2 सप्ताह) → भ्रूणावस्था (2–8 सप्ताह) → गर्भस्थ शिशु (9 सप्ताह–जन्म)
- पियाजे: संवेदी-गामक (0–2) → पूर्व-संक्रियात्मक (2–7) → मूर्त संक्रियात्मक (7–11) → औपचारिक संक्रियात्मक (11+)
- एरिक्सन (किशोरावस्था): पहचान बनाम भूमिका भ्रम
- वृद्धावस्था: स्फटिकीकृत क्षमताएँ बनी रहती हैं; तरल क्षमताएँ घटती हैं
हल किए गए उदाहरण
1. भ्रूणावस्था टेराटोजन के प्रति सबसे संवेदनशील क्यों है?
क्योंकि इसी समय मुख्य अंग (हृदय, मस्तिष्क, हाथ-पैर) बन रहे होते हैं; तब की हानि स्थायी दोष दे सकती है।
2. 6 महीने का शिशु ढके खिलौने को खोजना छोड़ देता है, पर 10 महीने का कपड़ा उठा लेता है। समझाइए।
बड़े शिशु में वस्तु स्थायित्व है (ओझल चीज़ भी मौजूद है), जो संवेदी-गामक अवस्था में लगभग 8 महीने में विकसित होता है।
3. 4 साल की बच्ची कहती है चाँद उसके पीछे चलता है और उसका टेडी भूखा है। विशेषताएँ बताइए।
आत्मकेंद्रिता (दुनिया उसी के चारों ओर) और जीववाद (वस्तुओं को जीवित मानना) — पूर्व-संक्रियात्मक चिंतन।
4. 15 साल के लड़के को लगता है पार्टी में सबने उसका मुँहासा देखा। कौन-सा विचार इसे समझाता है?
काल्पनिक दर्शक, जो किशोर आत्मकेंद्रिता का हिस्सा है।
5. किशोरों को नशे से बचाने के लिए स्कूल तीन क्या उपाय कर सकता है?
जीवन-कौशल और "ना कहना" प्रशिक्षण, परामर्श सेवा, और खेल या क्लब जो स्वस्थ जुड़ाव और तनाव-मुक्ति दें।
आम गलतियाँ
- गर्भस्थ शिशु अवस्था को सबसे संवेदनशील मानना। भ्रूणावस्था सबसे संवेदनशील है।
- प्रतिवर्तों को सीखा हुआ मानना। ये जन्म से होते हैं।
- किशोरावस्था को केवल "समस्या की उम्र" मानना। यह विकास, आदर्श और पहचान का समय भी है।
- यह कहना कि बुढ़ापे में सब क्षमताएँ घटती हैं। ज्ञान और समझ अक्सर बने रहते या बढ़ते हैं।