विकास का अर्थ
विकास क्रमिक, व्यवस्थित और पूर्वानुमेय बदलाव का क्रम है जो गर्भधारण से शुरू होकर पूरे जीवन चलता है। इसमें लाभ और हानि दोनों होते हैं।
- वृद्धि: शरीर या उसके अंगों के आकार में बढ़ोतरी (लंबाई, वज़न)। यह मात्रात्मक है।
- परिपक्वता: जन्मजात जैविक समय-सारिणी से होने वाले बदलाव (बैठना, चलना, यौवनारंभ)।
- अधिगम / अनुभव: अभ्यास और पर्यावरण से आने वाले बदलाव।
विकास में तीनों शामिल हैं। यह निरंतर है और हर अवस्था पिछली पर बनती है।
विकास पर जीवन-काल परिप्रेक्ष्य
- जीवनपर्यंत: विकास गर्भ से बुढ़ापे तक चलता है।
- बहुआयामी: जैविक, संज्ञानात्मक और सामाजिक-संवेगात्मक पक्ष।
- बहुदिशात्मक: कुछ क्षमताएँ बढ़ती हैं, कुछ घटती हैं (बुढ़ापे में शब्दावली बढ़ती, प्रतिक्रिया धीमी)।
- लचीला (नम्य): बदलने की क्षमता; प्रशिक्षण से देर उम्र में भी कौशल सुधरते हैं।
- ऐतिहासिक परिस्थितियाँ: युद्ध या महामारी के समय बड़ा होने वाला बच्चा अलग विकसित होता है।
- बहुविषयी: मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, जीव विज्ञान, चिकित्सा आदि पढ़ते हैं।
- संदर्भगत: लोग अपने परिवेश पर प्रतिक्रिया भी करते हैं और उसे बदलते भी हैं।
तीन प्रक्रियाएँ
जैविक (शरीर, मस्तिष्क, हॉर्मोन), संज्ञानात्मक (चिंतन, भाषा, बुद्धि) और सामाजिक-संवेगात्मक (संवेग, व्यक्तित्व, संबंध) आपस में गुँथी हैं।
विकास को प्रभावित करने वाले कारक
- आनुवंशिकता: माता-पिता से मिले जीन। जीन-प्ररूप आनुवंशिक सामग्री है; लक्षण-प्ररूप व्यक्ति के दिखने वाले गुण हैं, जो जीन और पर्यावरण दोनों पर निर्भर हैं।
- पर्यावरण: पोषण, स्वास्थ्य सेवा, परिवार का प्यार, शिक्षा, गरीबी, संस्कृति।
- परिपक्वता: शरीर की अपनी समय-सारिणी।
- अंतःक्रिया: जीन एक सीमा तय करते हैं; पर्यावरण तय करता है कि व्यक्ति उस सीमा में कहाँ पहुँचे। लोग अपने जीन के अनुकूल परिवेश भी चुनते हैं (संगीत में रुचि वाला बच्चा संगीत खोजता है)।
विकास के संदर्भ
ब्रॉनफ़ेनब्रेनर का पारिस्थितिक मॉडल बच्चे को परतदार तंत्रों में रखता है:
- सूक्ष्म तंत्र: निकट परिवेश — परिवार, स्कूल, मित्र, पड़ोस।
- मध्य तंत्र: सूक्ष्म तंत्रों के बीच संबंध (अभिभावक-शिक्षक बैठक)।
- बाह्य तंत्र: परिवेश जिनमें बच्चा नहीं, पर जो उस पर असर डालते हैं (माता-पिता का कार्यस्थल, स्थानीय स्वास्थ्य सेवाएँ)।
- वृहद् तंत्र: संस्कृति, मूल्य, क़ानून, अर्थव्यवस्था।
- कालानुक्रमिक तंत्र: समय के साथ घटनाएँ और बदलाव (तलाक़, घर बदलना, नया भाई-बहन)।
दुर्गानंद सिन्हा का पारिस्थितिक दृष्टिकोण: भारतीय बच्चे के लिए भीतरी (ऊपरी) परत में घर, स्कूल और साथी समूह; बाहरी परत में बड़ा समुदाय, जाति, आर्थिक स्थिति और संस्कृति। परतें आपस में प्रभाव डालती हैं और समय के साथ बदलती हैं।
करके देखें
अपने घेरे बनाइए: सूक्ष्म तंत्र में 3 चीज़ें, 1 संबंध (मध्य तंत्र), 1 बाह्य तंत्र परिवेश और 1 वृहद् तंत्र मूल्य लिखें। फिर 3D के खुले खेल में स्लाइडर चलाएँ।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- विकास = वृद्धि + परिपक्वता + अधिगम (जीवनपर्यंत)
- जीवन-काल दृष्टिकोण: जीवनपर्यंत, बहुआयामी, बहुदिशात्मक, लचीला, ऐतिहासिक, बहुविषयी, संदर्भगत
- लक्षण-प्ररूप = जीन-प्ररूप × पर्यावरण
- ब्रॉनफ़ेनब्रेनर: सूक्ष्म → मध्य → बाह्य → वृहद् → कालानुक्रमिक
हल किए गए उदाहरण
1. वर्गीकरण करें: (क) बच्चा लगभग 12 महीने में चलने लगता है, (ख) लड़का एक साल में 8 सेमी बढ़ा, (ग) लड़की साइकिल चलाना सीखती है।
(क) परिपक्वता (जैविक समय-सारिणी), (ख) वृद्धि (आकार बढ़ना), (ग) अभ्यास से अधिगम।
2. 70 साल की दादी स्मार्टफ़ोन चलाना सीखती हैं। जीवन-काल दृष्टिकोण की कौन-सी विशेषता?
लचीलापन (नम्यता): किसी भी उम्र में बदलने और सीखने की क्षमता।
3. ब्रॉनफ़ेनब्रेनर मॉडल में रखें: (क) स्कूल, (ख) माता-पिता का दफ़्तर में ओवरटाइम, (ग) बड़ों का सम्मान करने का सांस्कृतिक मूल्य, (घ) माता-पिता की कक्षा-शिक्षक से बात।
(क) सूक्ष्म तंत्र, (ख) बाह्य तंत्र, (ग) वृहद् तंत्र, (घ) मध्य तंत्र।
4. बहुत अलग घरों में पले समरूप जुड़वाँ अलग बुद्धि-अंक दिखाते हैं। इससे क्या पता चलता है?
जीन-प्ररूप वही, लक्षण-प्ररूप अलग: पर्यावरण तय करता है कि आनुवंशिक क्षमता कैसे प्रकट हो।
आम गलतियाँ
- वृद्धि और विकास को एक मानना। वृद्धि केवल आकार है; विकास उससे व्यापक।
- यह मानना कि विकास वयस्कता पर रुक जाता है। यह जीवनपर्यंत है।
- "आनुवंशिकता या पर्यावरण" की बहस करना। दोनों हमेशा साथ काम करते हैं।
- माता-पिता के कार्यस्थल को सूक्ष्म तंत्र मानना। बच्चा वहाँ नहीं, इसलिए यह बाह्य तंत्र है।