CBSE कक्षा 11 मनोविज्ञान
अध्याय: 8
1. मनोविज्ञान को समझना
मनोविज्ञान की प्रकृति · मनोविज्ञान का विकास और शाखाएँ
- मनोविज्ञान की प्रकृति: मन और व्यवहार का विज्ञान – मनोविज्ञान वह विज्ञान है जो मानसिक प्रक्रियाओं (सोचना, याद करना), अनुभवों (अंदर की भावनाएँ) और व्यवहार (हम क्या करते हैं) का अध्ययन करता है। मानसिक प्रक्रियाएँ दिखती नहीं, इसलिए उन्हें व्यवहार से समझा जाता है। व्यवहार प्रकट (बाहर से दिखे) या अप्रकट (अंदर छिपा, जैसे तेज़ धड़कन) हो सकता है। मनोविज्ञान अपनी विधियों और सिद्धांतों वाला एक विषय है। प्रयोग करने और मस्तिष्क-शरीर पढ़ने के कारण यह प्राकृतिक विज्ञान है, और परिवार, समूह व संस्कृति में लोगों को पढ़ने के कारण सामाजिक विज्ञान भी। मन और मस्तिष्क जुड़े हैं, पर एक नहीं। "मनोवैज्ञानिक मन पढ़ लेते हैं" जैसी कई लोकप्रिय धारणाएँ सही नहीं हैं।
- मनोविज्ञान का विकास और शाखाएँ: एक प्रयोगशाला से अनेक क्षेत्र – आधुनिक मनोविज्ञान 1879 में शुरू हुआ जब विल्हेम वुंट ने जर्मनी के लाइपज़िग में पहली मनोविज्ञान प्रयोगशाला बनाई (संरचनावाद, अंतर्निरीक्षण विधि)। विलियम जेम्स ने पूछा कि मन क्या करता है (प्रकार्यवाद)। फ्रायड ने अचेतन इच्छाओं पर ज़ोर दिया (मनोविश्लेषण), गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों ने कहा हम पूरा रूप देखते हैं, और वॉटसन ने कहा केवल दिखने वाला व्यवहार पढ़ो (व्यवहारवाद)। बाद में मानवतावादी (रोजर्स, मैस्लो), संज्ञानात्मक और निर्मितिवादी (पियाजे, वाइगोत्स्की) विचार आए। भारत में मन पर विचार प्राचीन हैं; आधुनिक मनोविज्ञान 1915 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से शुरू हुआ और बाद में भारतीय समस्याओं व देशज विचारों पर केंद्रित हुआ। आज इसकी अनेक शाखाएँ हैं और यह दर्शन, चिकित्सा, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, कंप्यूटर विज्ञान, क़ानून और जनसंचार से जुड़ा है।
2. मनोविज्ञान में जाँच की विधियाँ
शोध के लक्ष्य और चरण · मनोविज्ञान की विधियाँ · विश्लेषण, सीमाएँ और नैतिकता
- मनोविज्ञान में शोध के लक्ष्य और चरण – मनोवैज्ञानिक शोध के चार लक्ष्य हैं: वर्णन (क्या होता है), पूर्वकथन (क्या होगा), व्याख्या (क्यों होता है) और अनुप्रयोग (निष्कर्षों से समस्याएँ सुलझाना)। वैज्ञानिक शोध के चार चरण हैं: समस्या का संप्रत्ययीकरण (विषय और जाँचने योग्य परिकल्पना), आँकड़ों का संग्रह (प्रतिभागी, विधि, उपकरण, प्रक्रिया), निष्कर्ष निकालना (सांख्यिकी) और निष्कर्षों का संशोधन (सिद्धांत से मिलान)। चर वह है जो बदल सके; स्वतंत्र चर शोधकर्ता बदलता है, आश्रित चर मापा जाता है। वैज्ञानिक (मात्रात्मक) प्रतिमान के साथ व्याख्यात्मक (गुणात्मक) प्रतिमान भी है जो लोगों के अपने शब्दों में अर्थ खोजता है। आँकड़े जनांकिकीय, भौतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक हो सकते हैं, और ये संदर्भ से पूरी तरह मुक्त नहीं होते।
- मनोविज्ञान की विधियाँ: प्रेक्षण, प्रयोग, सहसंबंध, सर्वेक्षण, परीक्षण और व्यक्ति अध्ययन – मनोवैज्ञानिक छह मुख्य विधियाँ अपनाते हैं। प्रेक्षण में व्यवहार को ध्यान से देखकर लिखा जाता है — स्वाभाविक या नियंत्रित परिवेश में, सहभागी या असहभागी बनकर। प्रयोग में एक चर (स्वतंत्र चर) प्रयोगात्मक समूह के लिए बदला जाता है, नियंत्रित समूह के लिए नहीं, बाह्य चर समान रखे जाते हैं और असर (आश्रित चर) मापा जाता है; केवल प्रयोग कारण-प्रभाव बताता है। सहसंबंधात्मक शोध दो चरों को मापकर देखता है कि वे कितना साथ बदलते हैं (r −1 से +1: धनात्मक, ऋणात्मक, शून्य), पर कारण सिद्ध नहीं करता। सर्वेक्षण बहुत लोगों से साक्षात्कार या प्रश्नावली से पूछता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण मानकीकृत उपकरण हैं जो विश्वसनीय, वैध और मानकों सहित हों। व्यक्ति अध्ययन एक व्यक्ति या समूह का कई स्रोतों से गहन अध्ययन है।
- मनोवैज्ञानिक शोध में आँकड़ों का विश्लेषण, सीमाएँ और नैतिकता – मनोवैज्ञानिक आँकड़ों का विश्लेषण दो तरह से होता है। मात्रात्मक विश्लेषण संख्याओं और सांख्यिकी (जैसे माध्य) से पैटर्न खोजता है। गुणात्मक विश्लेषण शब्दों, चित्रों और कहानियों को विषयवस्तुओं में छाँटकर अर्थ खोजता है। दोनों अक्सर साथ चलते हैं। मनोवैज्ञानिक अन्वेषण की सीमाएँ हैं: मापनियों में असली शून्य नहीं होता, उपकरण उस संस्कृति पर निर्भर हैं जिसमें बने, और गुणात्मक आँकड़ों की व्याख्या व्यक्तिनिष्ठ हो सकती है। शोध नैतिक होना चाहिए: सहभागिता स्वैच्छिक हो, सूचित सहमति ली जाए, अध्ययन के बाद डीब्रीफ़िंग हो, परिणाम साझा हों और आँकड़े गोपनीय रहें।
3. मानव विकास
अर्थ और प्रभाव · विकास की अवस्थाएँ
- मानव विकास: अर्थ, जीवन-काल दृष्टिकोण और प्रभाव – विकास परिवर्तन का वह क्रम है जो गर्भधारण से शुरू होकर पूरे जीवन चलता है। इसमें वृद्धि (आकार में बढ़ोतरी), परिपक्वता (जैविक समय-सारिणी से होने वाले बदलाव) और अनुभव से सीखना शामिल है। जीवन-काल दृष्टिकोण कहता है कि विकास जीवनपर्यंत, बहुआयामी, बहुदिशात्मक, लचीला, ऐतिहासिक परिस्थितियों से प्रभावित, बहुविषयी और संदर्भगत है। इसमें जैविक, संज्ञानात्मक और सामाजिक-संवेगात्मक प्रक्रियाएँ एक-दूसरे पर असर डालती हैं। विकास आनुवंशिकता (जीन-प्ररूप) और पर्यावरण के मेल से होता है, जिससे दिखने वाले लक्षण (लक्षण-प्ररूप) बनते हैं। संदर्भ महत्त्वपूर्ण हैं: ब्रॉनफ़ेनब्रेनर ने सूक्ष्म, मध्य, बाह्य, वृहद् और कालानुक्रमिक तंत्र बताए, और दुर्गानंद सिन्हा ने भारतीय बच्चे के परिवेश को भीतरी और बाहरी परतों में समझाया।
- मानव विकास की अवस्थाएँ: जन्म से पहले से वृद्धावस्था तक – गर्भकाल गर्भधारण से जन्म तक तीन कालों में चलता है: बीजावस्था (पहले दो हफ़्ते), भ्रूणावस्था (2–8 हफ़्ते) और गर्भस्थ शिशु अवस्था (9 हफ़्ते से जन्म); टेराटोजन कहलाने वाले हानिकारक तत्त्व (शराब, धूम्रपान, दवाएँ, रूबेला जैसे संक्रमण) और माँ का पोषण व तनाव शिशु पर असर डालते हैं। शैशवावस्था (0–2 वर्ष) प्रतिवर्तों से शुरू होकर गामक उपलब्धियों, आसक्ति और वस्तु स्थायित्व (पियाजे की संवेदी-गामक अवस्था) तक जाती है। प्रारंभिक बाल्यावस्था (2–6) में बच्चे प्रतीक और नाटकीय खेल अपनाते हैं पर आत्मकेंद्रित सोचते हैं और संरक्षण नहीं समझते; मध्य बाल्यावस्था (6–11) में ठोस चीज़ों पर तार्किक सोचते हैं। किशोरावस्था में यौवनारंभ, अमूर्त चिंतन, पहचान की खोज और साथियों का दबाव, अपचार, नशा व खाने के विकार जैसी चुनौतियाँ आती हैं। प्रौढ़ावस्था में करियर, विवाह और पालन-पोषण; वृद्धावस्था में सेवानिवृत्ति, हानि और समझ।
4. संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ
संवेदन और अवधान · प्रत्यक्षण
- संवेदन और अवधान – उद्दीपक वह कोई भी बदलाव है जिसे हम पकड़ सकते हैं। हर इंद्रिय (संवेदी प्रकार) एक तरह का उद्दीपक पकड़ती है, पर एक सीमा में: उद्दीपक को निरपेक्ष देहली पार करनी होती है, और बदलाव को भेद देहली। फिर अवधान चुनता है। चयनात्मक अवधान बहुत से उद्दीपकों में से कुछ चुनता है; इसे बाहरी कारक (आकार, तीव्रता, गति, नयापन) और अंदरूनी कारक (ज़रूरत, रुचि) खींचते हैं। निरंतर अवधान एक काम पर लंबे समय तक ध्यान टिकाना है, जो समय के साथ घटता है।
- प्रत्यक्षण: दिमाग कैसे अर्थ बनाता है – प्रत्यक्षण यानी इंद्रियों से आई सूचना को अर्थ देना। हम नीचे से ऊपर (अंश से पूर्ण) और ऊपर से नीचे (विचार से विवरण) दोनों तरह काम करते हैं। देखने वाले की ज़रूरतें, अपेक्षाएँ और मनोदशा इसे बदलती हैं। गेस्टाल्ट नियम (आकृति-पृष्ठभूमि, निकटता, समानता, पूर्णता, निरंतरता) अंशों को जोड़ते हैं। एकनेत्री और द्विनेत्री संकेत गहराई बताते हैं। स्थैर्य आकार, माप और चमक को स्थिर रखता है। भ्रम वह प्रत्यक्षण है जो सच से मेल न खाए, और संस्कृति इस पर असर डालती है।
5. अधिगम
अनुबंधन · अधिगम के अन्य रूप
- अनुबंधन से अधिगम – अधिगम अभ्यास या अनुभव से व्यवहार में अपेक्षाकृत स्थायी बदलाव है। प्राचीन अनुबंधन (पावलव) में एक तटस्थ उद्दीपक, स्वाभाविक अनुक्रिया लाने वाले उद्दीपक के साथ बार-बार आने पर, अकेले ही वह अनुक्रिया लाने लगता है। क्रियाप्रसूत अनुबंधन (स्किनर) में व्यवहार अपने परिणामों से बनता है: पुनर्बलन उसे बढ़ाता है, दंड घटाता है। समय-संबंध, उद्दीपक की तीव्रता और प्रकार, पुनर्बलन की मात्रा, देरी और अनुसूची सीखने को तय करते हैं। मुख्य प्रक्रियाएँ: अर्जन, विलोपन, स्वतः पुनर्प्राप्ति, सामान्यीकरण, विभेदन।
- अधिगम के अन्य रूप – हर अधिगम अनुबंधन नहीं है। प्रेक्षणात्मक अधिगम में हम मॉडल को और उसके परिणाम को देखकर नक़ल करते हैं। संज्ञानात्मक अधिगम में सोचकर सीखते हैं: अंतर्दृष्टि अचानक हल है, और अव्यक्त अधिगम ज़रूरत पड़ने तक छिपा रहता है। वाचिक अधिगम शब्द और सूचियाँ सीखना है (युग्मित सहचर, क्रमिक, मुक्त पुनःस्मरण)। कौशल अधिगम संज्ञानात्मक, साहचर्यात्मक और स्वायत्त चरणों से गुज़रता है। अभिप्रेरणा, तैयारी और सही पुनर्बलन अधिगम में मदद करते हैं। अधिगम अशक्तता सामान्य बुद्धि वाले बच्चों में पढ़ने, लिखने, ध्यान या गणित की कठिनाई है, जो विशेष शिक्षण से सुधरती है।
6. मानव स्मृति
स्मृति तंत्र · विस्मरण और स्मृति सुधार
- मानव स्मृति: हम सूचना कैसे रखते हैं – स्मृति सूचना को समय तक रखती है। इसके तीन चरण हैं: कूटसंकेतन, भंडारण और पुनरुद्धार। अवस्था मॉडल कहता है कि सूचना संवेदी स्मृति (बहुत बड़ी, लगभग एक सेकंड) से अल्पकालिक स्मृति (लगभग 7 मद, लगभग 20 सेकंड) में और दोहराव से दीर्घकालिक स्मृति (असीम, वर्षों) में जाती है। अल्पकालिक स्मृति कार्यकारी स्मृति की तरह काम करती है। प्रक्रमण स्तर उपागम कहता है कि गहरा, अर्थ वाला प्रक्रमण लंबी स्मृति देता है। दीर्घकालिक स्मृति में घोषणात्मक (घटनात्मक और अर्थगत) और प्रक्रियामूलक स्मृति होती है।
- विस्मरण और बेहतर याद रखने के उपाय – भूलना शुरू में तेज़ और फिर धीमा होता है (एबिंगहास वक्र)। तीन मुख्य कारण: चिह्न ह्रास (इस्तेमाल न होने से चिह्न धुँधला), व्यतिकरण (पुराना और नया सीखा एक-दूसरे को रोकें: अग्रलक्षी और पृष्ठोन्मुख) और पुनरुद्धार विफलता (याद है पर सही संकेत नहीं)। स्मृति सुधारने के लिए प्रतिमा (मूल शब्द विधि, स्थान विधि) और संगठन (खंडीकरण, प्रथम अक्षर, श्रेणियाँ) वाले स्मृति-सहायक, साथ में गहरा प्रक्रमण, कम व्यतिकरण, अंतराल पर दोहराव और PQRST विधि काम आते हैं।
7. चिंतन
चिंतन और समस्या समाधान · सृजनात्मकता और भाषा
- चिंतन, समस्या समाधान और तर्कना – चिंतन का मतलब है किसी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मन में जानकारी पर काम करना। इसके आधार हैं मानसिक प्रतिमा और संप्रत्यय। चिंतन से हम समस्याएँ सुलझाते हैं (चरणों में, मानसिक विन्यास और प्रकार्यात्मक स्थिरता से बचकर), तर्क करते हैं (निगमनात्मक: नियम से उदाहरण; आगमनात्मक: उदाहरणों से नियम) और निर्णय लेते हैं।
- सृजनात्मक चिंतन, चिंतन और भाषा – सृजनात्मक चिंतन ऐसे विचार देता है जो नए भी हों और उपयोगी भी। यह तैयारी, उद्भवन, प्रदीपन और सत्यापन से गुज़रता है, और इसमें अपसारी (कई विचार) व अभिसारी (एक सबसे अच्छा उत्तर) दोनों चिंतन लगते हैं। चिंतन और भाषा गहराई से जुड़े हैं (व्होर्फ़, पियाजे, वायगोत्स्की)। बच्चे तय चरणों में भाषा सीखते हैं, जिसमें सीखना और जन्मजात तैयारी दोनों मदद करते हैं।
8. अभिप्रेरणा एवं संवेग
अभिप्रेरणा · संवेग
- अभिप्रेरणा, अभिप्रेरक और मैस्लो का आवश्यकता पदानुक्रम – अभिप्रेरणा वह बल है जो व्यवहार को शुरू करता है, दिशा देता है और लक्ष्य तक बनाए रखता है। यह चक्र में चलती है: आवश्यकता → अंतर्नोद → क्रिया → लक्ष्य → राहत। अभिप्रेरक जैविक (भूख, प्यास, नींद, यौन; समस्थिति से संतुलित) या मनोसामाजिक (संबंधन, शक्ति, उपलब्धि, जिज्ञासा) होते हैं। मैस्लो ने आवश्यकताओं को शारीरिक से आत्मसिद्धि तक पिरामिड में रखा।
- संवेग: स्वरूप, अभिव्यक्ति, संस्कृति और प्रबंधन – संवेग एक तीव्र भाव है जिसके तीन भाग हैं: शरीर की उत्तेजना, घटना का संज्ञानात्मक मूल्यांकन और बाहरी अभिव्यक्ति। कुछ मूल संवेग हैं जिनकी तीव्रता बदलती है और जो मिल भी सकते हैं। संवेग चेहरे, आवाज़ और शरीर से दिखते हैं; मूल चेहरे के भाव लगभग सार्वभौमिक हैं, पर संस्कृति प्रदर्शन नियम तय करती है। नकारात्मक संवेग संभाले जा सकते हैं (पहचान, पुनर्मूल्यांकन, विश्राम, व्यायाम, सहारा) और सकारात्मक बढ़ाए जा सकते हैं (आभार, आशा, दया, दोस्त, प्रवाह)।