सृजनात्मक चिंतन और उसकी प्रक्रिया
सृजनात्मक चिंतन ऐसे विचार या चीज़ें बनाता है जो नई भी हों और उपयोगी भी। यह विज्ञान, कला, खाना बनाने, व्यापार और रोज़मर्रा में मिलता है, केवल प्रतिभाशाली लोगों में नहीं।
सृजनात्मक प्रक्रिया की अवस्थाएँ
- तैयारी: समस्या समझो, तथ्य और कौशल जुटाओ।
- उद्भवन: कुछ समय अलग हो जाओ; विचार बिना ज़ोर लगाए "पकता" है।
- प्रदीपन: अचानक "अहा!" वाला पल जब हल दिखता है।
- सत्यापन: परखो, सुधारो और देखो कि विचार सच में काम करता है।
अपसारी और अभिसारी चिंतन
अपसारी चिंतन कई उत्तरों की ओर फैलता है। इसमें प्रवाह (ज़्यादा विचार), लचीलापन (अलग-अलग प्रकार), मौलिकता (दुर्लभ विचार) और विस्तारण (ब्योरा जोड़ना) दिखते हैं। अभिसारी चिंतन एक सबसे अच्छे उत्तर पर सिमटता है। सृजन में पहले अपसारी से विकल्प बनते हैं, फिर अभिसारी से चुने और निखारे जाते हैं।
रुकावटें और सृजनात्मकता बढ़ाना
- रुकावटें: आदत, मज़ाक़ बनने का डर, असफलता का डर, ज़्यादा आलोचना, समय की कमी।
- बढ़ाने के उपाय: पहले बिना परखे विचार-मंथन, "अगर ऐसा हो तो?" पूछना, विचार तुरंत लिखना, अलग क्षेत्रों के विचार मिलाना, आराम का समय।
चिंतन और भाषा का संबंध
हम अक्सर शब्दों में सोचते हैं, पर क्या सोचने के लिए भाषा ज़रूरी है? तीन मत:
- भाषा चिंतन को ढालती है (बेंजामिन ली व्होर्फ़): हमारी भाषा के शब्द तय करते हैं कि हम क्या देखते और कैसे सोचते हैं। इसे भाषिक सापेक्षता कहते हैं। कड़ा रूप (भाषा पूरी तरह चिंतन तय करती है) सिद्ध नहीं; हल्का रूप (भाषा असर डालती है) कुछ हद तक सही है।
- चिंतन पहले (ज्याँ पियाजे): बच्चे बोलने से पहले ही क्रियाओं से विचार बनाते हैं (छिपी चीज़ मौजूद है, यह जानना)। भाषा पहले से बने विचार को व्यक्त करती है।
- पहले अलग, फिर जुड़े (लेव वायगोत्स्की): लगभग 2 साल तक चिंतन और भाषा अलग विकसित होते हैं। फिर मिलते हैं: चिंतन शाब्दिक और वाणी तार्किक हो जाती है। बच्चे ख़ुद को राह दिखाने के लिए ज़ोर से बोलते हैं; बाद में यह आंतरिक वाक् बन जाती है।
बच्चों में भाषा विकास
भाषा प्रतीकों (ध्वनि, शब्द, संकेत) की व्यवस्था है जिन्हें नियमों से जोड़कर अर्थ बाँटा जाता है। इसके अंग: ध्वनियाँ (स्वनिम), अर्थ वाली इकाइयाँ (रूपिम), अर्थ (अर्थविज्ञान), वाक्य के नियम (वाक्य-विन्यास) और समाज में उपयोग (व्यावहारिकी)।
चरण
- कूजन (लगभग 0–2 माह): स्वर जैसी कोमल आवाज़ें।
- बलबलाना (लगभग 6 माह): "बा-बा" जैसी दोहराई आवाज़ें; शुरू में हर भाषा के शिशु एक जैसा बलबलाते हैं।
- एक-शब्द अवस्था (लगभग 1 वर्ष): एक शब्द पूरा विचार बताता है ("दूध!")।
- दो-शब्द / तारनुमा अवस्था (लगभग 18–24 माह): केवल मुख्य शब्द ("पापा जाओ")।
- वाक्य (2–5 वर्ष): व्याकरण तेज़ी से बढ़ता है; "मैं जाया" जैसी ग़लतियाँ दिखाती हैं कि बच्चा नियम लगा रहा है।
भाषा अर्जन कैसे होता है?
अधिगम मत (बी.एफ. स्किनर): बच्चे नक़ल करते हैं और सही बोलने पर पुनर्बलन पाते हैं। जन्मजात मत (नोम चॉम्स्की): बच्चों में जन्म से भाषा अर्जन यंत्र होता है जो व्याकरण पकड़ने के लिए तैयार रखता है; इससे वे बिना सुने नए वाक्य बनाते हैं। आज अधिकतर मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जैविक तैयारी और भाषा से भरा माहौल, दोनों ज़रूरी हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सृजनात्मकता = नए + उपयोगी विचार
- सृजन की अवस्थाएँ: तैयारी → उद्भवन → प्रदीपन → सत्यापन
- अपसारी चिंतन: प्रवाह, लचीलापन, मौलिकता, विस्तारण
- अभिसारी चिंतन: एक सबसे अच्छा उत्तर
- व्होर्फ़: भाषा → चिंतन; पियाजे: चिंतन → भाषा; वायगोत्स्की: पहले अलग, फिर जुड़े
- भाषा के चरण: कूजन → बलबलाना → एक शब्द → दो शब्द (तारनुमा) → वाक्य
- स्किनर: नक़ल + पुनर्बलन; चॉम्स्की: जन्मजात भाषा अर्जन यंत्र
हल किए गए उदाहरण
1. एक रसोइया नई मिठाई सोचने में उलझता है, रात को छोड़ देता है और सुबह आम-नारियल लड्डू का विचार लेकर उठता है। कौन-सी अवस्थाएँ दिखीं?
तैयारी (समस्या से जूझना), उद्भवन (रात भर दूर रहना), प्रदीपन (विचार के साथ जागना)। बनाकर चखना सत्यापन होगा।
2. आशा प्लास्टिक की बोतल के 20 उपयोग 6 प्रकारों (भंडारण, बगीचा, खिलौना, कला, विज्ञान, पानी फ़िल्टर) में लिखती है। अपसारी चिंतन के कौन-से गुण दिखे?
प्रवाह (20 विचार) और लचीलापन (6 प्रकार)। अगर कुछ विचार कक्षा में दुर्लभ हों तो मौलिकता भी।
3. 20 माह का बच्चा कहता है "गेंद गई"। भाषा विकास का कौन-सा चरण है? इसे यह नाम क्यों?
दो-शब्द या तारनुमा अवस्था। पुराने तार (टेलीग्राम) की तरह केवल मुख्य शब्द रहते हैं, छोटे शब्द छूट जाते हैं।
4. 4 साल का बच्चा कहता है "मैंने खाया लिया" या अंग्रेज़ी में "I runned"। यह ग़लती क्या बताती है?
बच्चे ने भूतकाल का नियम पकड़ लिया है और उसे हर जगह लगा रहा है। बड़े ऐसा नहीं बोलते, इसलिए यह दिखाता है कि बच्चा नियम बनाता है (चॉम्स्की), सिर्फ़ नक़ल नहीं करता।
5. 5 साल की बच्ची पहेली जोड़ते हुए ख़ुद से बोलती है: "नीला टुकड़ा... ऊपर जाएगा"। वायगोत्स्की इसे कैसे समझाते हैं?
यह निजी वाक् है: भाषा चिंतन को राह दिखा रही है। बाद में यह चुप आंतरिक वाक् बन जाती है। यह दिखाता है कि चिंतन और भाषा जुड़ गए हैं।
आम गलतियाँ
- सृजनात्मकता को केवल कलाकारों की चीज़ मानना: यह हर क्षेत्र और रोज़ की समस्याओं में है।
- उद्भवन (आराम) और प्रदीपन (अहा पल) को मिलाना।
- अभिसारी चिंतन को "सृजन-विरोधी" मानना: विचार चुनने और निखारने के लिए यही चाहिए।
- यह कहना कि व्होर्फ़ ने सिद्ध किया कि भाषा पूरी तरह चिंतन तय करती है: केवल हल्का असर माना जाता है।