National Year 12 Psychology
अध्याय: 7
1. 4.1.1 Social influence
4.1.1 Conformity · 4.1.1 Obedience · 4.1.1 Resistance and minority influence
- समूह: कैसे बनते हैं और हमें कैसे बदलते हैं – समूह दो या अधिक लोगों का ऐसा मेल है जिसमें वे आपस में बात करते हैं, एक लक्ष्य रखते हैं, मानक मानते हैं और 'हम' महसूस करते हैं। लोग सुरक्षा, प्रतिष्ठा, आत्म-सम्मान, ज़रूरतों और लक्ष्यों के लिए समूह में जुड़ते हैं। समूह पाँच चरणों से गुज़रता है: निर्माण, विप्लव, प्रतिमान, निष्पादन, समापन। संरचना में भूमिका, मानक, प्रतिष्ठा और संसक्तता होते हैं। प्रकार: प्राथमिक/द्वितीयक, औपचारिक/अनौपचारिक, अंतःसमूह/बाह्यसमूह। समूह हमारा व्यवहार भी बदलता है: सामाजिक स्वैराचार में साझा काम में हर व्यक्ति कम मेहनत करता है; समूह ध्रुवीकरण में चर्चा के बाद समूह की राय और चरम हो जाती है।
- सामाजिक प्रभाव: भीड़, 'ना' कहना और सोच बदलना – सामाजिक प्रभाव का मतलब है दूसरे लोग हमारी सोच और व्यवहार कैसे बदलते हैं। समूह में दो असर दिखते हैं: सामाजिक आलस्य (मेहनत छिपी हो तो हर व्यक्ति कम कोशिश करता है) और व्यक्तित्व-लोप (भीड़ में गुमनामी से आत्म-नियंत्रण घटता है)। व्यक्तित्व और नैतिकता तय करते हैं कि भीड़ किसी पर कितना असर डाले। सामाजिक समर्थन (एक साथी) और आंतरिक नियंत्रण-स्थल से लोग दबाव का बेहतर विरोध करते हैं। छोटा समूह भी बहुमत बदल सकता है अगर वह निरंतर, प्रतिबद्ध और लचीला हो; स्नोबॉल प्रभाव से सामाजिक परिवर्तन आता है।
2. 4.1.2 Memory
4.1.2 Models of memory · 4.1.2 Forgetting · 4.1.2 Eyewitness testimony
- मानव स्मृति: हम सूचना कैसे रखते हैं – स्मृति सूचना को समय तक रखती है। इसके तीन चरण हैं: कूटसंकेतन, भंडारण और पुनरुद्धार। अवस्था मॉडल कहता है कि सूचना संवेदी स्मृति (बहुत बड़ी, लगभग एक सेकंड) से अल्पकालिक स्मृति (लगभग 7 मद, लगभग 20 सेकंड) में और दोहराव से दीर्घकालिक स्मृति (असीम, वर्षों) में जाती है। अल्पकालिक स्मृति कार्यकारी स्मृति की तरह काम करती है। प्रक्रमण स्तर उपागम कहता है कि गहरा, अर्थ वाला प्रक्रमण लंबी स्मृति देता है। दीर्घकालिक स्मृति में घोषणात्मक (घटनात्मक और अर्थगत) और प्रक्रियामूलक स्मृति होती है।
- विस्मरण और बेहतर याद रखने के उपाय – भूलना शुरू में तेज़ और फिर धीमा होता है (एबिंगहास वक्र)। तीन मुख्य कारण: चिह्न ह्रास (इस्तेमाल न होने से चिह्न धुँधला), व्यतिकरण (पुराना और नया सीखा एक-दूसरे को रोकें: अग्रलक्षी और पृष्ठोन्मुख) और पुनरुद्धार विफलता (याद है पर सही संकेत नहीं)। स्मृति सुधारने के लिए प्रतिमा (मूल शब्द विधि, स्थान विधि) और संगठन (खंडीकरण, प्रथम अक्षर, श्रेणियाँ) वाले स्मृति-सहायक, साथ में गहरा प्रक्रमण, कम व्यतिकरण, अंतराल पर दोहराव और PQRST विधि काम आते हैं।
- प्रत्यक्षदर्शी गवाही (Eyewitness Testimony) – प्रत्यक्षदर्शी गवाही (EWT) वह बयान है जो कोई गवाह अपने देखे अपराध या दुर्घटना के बारे में देता है। स्मृति हर बार याद करते समय फिर से बनती है, इसलिए भ्रामक जानकारी इसे बदल सकती है: जवाब का इशारा देने वाले भ्रामक प्रश्न, और दूसरे गवाहों से बातचीत। चिंता भी असर डालती है: मध्यम तनाव याद तेज़ कर सकता है, पर बहुत ज़्यादा तनाव, ख़ासकर हथियार हो तो, सटीकता घटाता है। संज्ञानात्मक साक्षात्कार चार तरीक़ों (संदर्भ फिर से बनाना, सब कुछ बताना, क्रम बदलना, नज़रिया बदलना) से ज़्यादा सही बातें याद कराता है।
3. 4.1.3 Attachment
4.1.3 Caregiver-infant interaction · 4.1.3 Animal studies and explanations · 4.1.3 Types of attachment · 4.1.3 Deprivation and later effects
- लगाव (Attachment) – लगाव शिशु और देखभालकर्ता के बीच गहरा, लंबा भावनात्मक बंधन है, जो पास रहने की इच्छा, अलग होने पर दुख और मिलने पर ख़ुशी से दिखता है। यह देखभालकर्ता-शिशु की बातचीत (पारस्परिकता और अंतःक्रियात्मक तालमेल) से बढ़ता है और चरणों में विकसित होता है (शैफ़र)। पशु अध्ययन (लॉरेंज़ का छापन, हार्लो की कपड़े वाली माँ) बताते हैं कि बंधन आराम से बनता है, भोजन से नहीं। अधिगम सिद्धांत कहता है बच्चा खिलाने वाले से जुड़ता है; बॉल्बी कहते हैं यह इच्छा जन्मजात है, एक मुख्य देखभालकर्ता पर केंद्रित, नाज़ुक अवधि में बनती है और आंतरिक कार्य मॉडल देती है। एन्सवर्थ की अजनबी स्थिति सुरक्षित, परिहारी और प्रतिरोधी प्रकार बताती है, जिनका मेल संस्कृति के साथ बदलता है। वंचना और संस्थागत देखभाल आगे के विकास को नुक़सान पहुँचा सकते हैं।
4. 4.2.1 Approaches in psychology
4.2.1 Origins and learning approaches · 4.2.1 Cognitive and biological approaches
- अनुबंधन से अधिगम – अधिगम अभ्यास या अनुभव से व्यवहार में अपेक्षाकृत स्थायी बदलाव है। प्राचीन अनुबंधन (पावलव) में एक तटस्थ उद्दीपक, स्वाभाविक अनुक्रिया लाने वाले उद्दीपक के साथ बार-बार आने पर, अकेले ही वह अनुक्रिया लाने लगता है। क्रियाप्रसूत अनुबंधन (स्किनर) में व्यवहार अपने परिणामों से बनता है: पुनर्बलन उसे बढ़ाता है, दंड घटाता है। समय-संबंध, उद्दीपक की तीव्रता और प्रकार, पुनर्बलन की मात्रा, देरी और अनुसूची सीखने को तय करते हैं। मुख्य प्रक्रियाएँ: अर्जन, विलोपन, स्वतः पुनर्प्राप्ति, सामान्यीकरण, विभेदन।
- मनोविज्ञान के उपागम (Approaches in Psychology) – उपागम यह बताने वाले विचारों का समूह है कि व्यवहार का कारण क्या है और उसे कैसे पढ़ें। 1879 में वुंट की प्रयोगशाला से मनोविज्ञान विज्ञान बना। व्यवहारवाद सिर्फ़ दिखने वाले व्यवहार को अनुबंधन से सीखा मानता है; सामाजिक अधिगम सिद्धांत नक़ल जोड़ता है। संज्ञानात्मक उपागम मन को सूचना-प्रक्रमक मानता है जो स्कीमा का उपयोग करता है, और मॉडल व ब्रेन स्कैन से पढ़ता है। जैविक उपागम जीन, तंत्रिका रसायन और विकास से समझाता है। मनोगतिक उपागम (फ़्रायड) अचेतन, इदम्-अहम्-पराहम्, बचाव तंत्र और मनोलैंगिक चरणों पर ज़ोर देता है। मानवतावादी उपागम (मैस्लो, रॉजर्स) स्वतंत्र इच्छा, आत्म-सिद्धि और सामंजस्य पर। उपागम स्वतंत्र इच्छा बनाम नियतिवाद, प्रकृति बनाम पालन-पोषण, न्यूनीकरणवाद और वैज्ञानिक विधि पर अलग हैं।
5. 4.2.2 Biopsychology
4.2.2 Biopsychology basics
- जैव-मनोविज्ञान: शरीर और मस्तिष्क व्यवहार को कैसे चलाते हैं – जैव-मनोविज्ञान (biopsychology) पढ़ता है कि शरीर, ख़ासकर तंत्रिका तंत्र और हॉर्मोन, हमारे सोचने, महसूस करने और करने को कैसे बनाते हैं। तंत्रिका तंत्र का एक केंद्रीय भाग (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) और एक परिधीय भाग (कायिक और स्वायत्त नसें) है। न्यूरॉन अपनी लंबाई में विद्युत संकेत से और सिनैप्स की दरार पर रसायन (न्यूरोट्रांसमीटर) से संदेश भेजते हैं; यह रसायन उत्तेजक या निरोधी हो सकता है। अंतःस्रावी तंत्र ग्रंथियों और हॉर्मोन से काम करता है; ख़तरे में अनुकंपी शाखा और एड्रेनालिन 'लड़ो या भागो' प्रतिक्रिया लाते हैं। कुछ काम मस्तिष्क के ख़ास क्षेत्रों में होते हैं (स्थानीयकरण) और कुछ एक अर्धगोल में (पार्श्वीकरण), जैसा स्प्लिट-ब्रेन अध्ययन दिखाते हैं। मस्तिष्क ख़ुद को बदल सकता है (प्लास्टिसिटी) और क्षति के बाद सुधर सकता है। वैज्ञानिक fMRI, EEG, ERP और शव-परीक्षण से इसे पढ़ते हैं। शरीर लय पर भी चलता है: सर्केडियन (लगभग 24 घंटे), अल्ट्राडियन (छोटी) और इन्फ्राडियन (लंबी), जिन्हें भीतरी पेसमेकर चलाते हैं और रोशनी जैसे ज़ाइटगेबर ठीक करते हैं।
6. 4.1.4 Psychopathology
4.1.4 Definitions of abnormality · 4.1.4 Phobias, depression, OCD
- असामान्यता और मनोवैज्ञानिक विकारों का वर्गीकरण – व्यवहार तब असामान्य कहलाता है जब उसमें 4 D दिखें: विचलन (बहुत अलग), कष्ट (व्यक्ति को दुख), दुष्क्रिया (रोज़ का जीवन बिगड़ना) और कभी-कभी ख़तरा। बहुत पहले लोग आत्माओं को दोष देते थे, यूनानियों ने शरीर को कारण माना, बाद में सुधारकों ने दयालु देखभाल शुरू की, और आज जैव-मनो-सामाजिक दृष्टि अपनाई जाती है। विशेषज्ञ दो पुस्तिकाओं से वर्गीकरण करते हैं: DSM-5-TR (अमेरिकी मनोरोग संघ) और ICD-11 (विश्व स्वास्थ्य संगठन)। विकार जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों के मेल से बनते हैं। प्रवणता-दबाव मॉडल कहता है: जन्मजात कमज़ोरी और पर्याप्त दबाव मिलकर विकार ला सकते हैं।
7. 4.2.3 Research methods
4.2.3 Methods · 4.2.3.1 Scientific processes · 4.2.3.2 Data handling and analysis
- मनोविज्ञान में शोध के लक्ष्य और चरण – मनोवैज्ञानिक शोध के चार लक्ष्य हैं: वर्णन (क्या होता है), पूर्वकथन (क्या होगा), व्याख्या (क्यों होता है) और अनुप्रयोग (निष्कर्षों से समस्याएँ सुलझाना)। वैज्ञानिक शोध के चार चरण हैं: समस्या का संप्रत्ययीकरण (विषय और जाँचने योग्य परिकल्पना), आँकड़ों का संग्रह (प्रतिभागी, विधि, उपकरण, प्रक्रिया), निष्कर्ष निकालना (सांख्यिकी) और निष्कर्षों का संशोधन (सिद्धांत से मिलान)। चर वह है जो बदल सके; स्वतंत्र चर शोधकर्ता बदलता है, आश्रित चर मापा जाता है। वैज्ञानिक (मात्रात्मक) प्रतिमान के साथ व्याख्यात्मक (गुणात्मक) प्रतिमान भी है जो लोगों के अपने शब्दों में अर्थ खोजता है। आँकड़े जनांकिकीय, भौतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक हो सकते हैं, और ये संदर्भ से पूरी तरह मुक्त नहीं होते।
- मनोवैज्ञानिक शोध में आँकड़ों का विश्लेषण, सीमाएँ और नैतिकता – मनोवैज्ञानिक आँकड़ों का विश्लेषण दो तरह से होता है। मात्रात्मक विश्लेषण संख्याओं और सांख्यिकी (जैसे माध्य) से पैटर्न खोजता है। गुणात्मक विश्लेषण शब्दों, चित्रों और कहानियों को विषयवस्तुओं में छाँटकर अर्थ खोजता है। दोनों अक्सर साथ चलते हैं। मनोवैज्ञानिक अन्वेषण की सीमाएँ हैं: मापनियों में असली शून्य नहीं होता, उपकरण उस संस्कृति पर निर्भर हैं जिसमें बने, और गुणात्मक आँकड़ों की व्याख्या व्यक्तिनिष्ठ हो सकती है। शोध नैतिक होना चाहिए: सहभागिता स्वैच्छिक हो, सूचित सहमति ली जाए, अध्ययन के बाद डीब्रीफ़िंग हो, परिणाम साझा हों और आँकड़े गोपनीय रहें।